• फिल्म समीक्षा
  • प्रेमरत देह में बसे लालित्य का रूपांकन-डेनिएल आर्बिड

     

    लेबनानी मूल की फ्रेंच फिल्मकार डेनिएल आर्बिड ने नोबेल पुरस्कार से सम्मानित फ्रेंच उपन्यासकार एनी अर्नो के उपन्यास ‘सिम्पल पैशन’ पर इसी शीर्षक से 2020 में फ़िल्म बनाई थी। इस फ़िल्म को कान, लोकार्नो, न्यूयॉर्क, सैन सेबस्टियन टोरंटो, ज़्यूरिख़, बुसान सहित कई फ़िल्म फ़ेस्टिवल में दिखाया गया था। इसे ख़ूब प्रशंसा मिली और पुरस्कार भी मिले। उनकी फ़िल्मों पर अश्लीलता के आरोप लगे और लेबनान में उनकी फिल्मों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक बताया गया। अब वे इसी माह अपनी नई फिल्म ‘लव कॉन्कर्स ऑल’ की शूटिंग शुरू कर चुकी हैं। ‘सिम्पल पैशन’ को लेकर उनसे लिए गए इंटरव्यूज़ के अंश प्रस्तुत हैं। अनुवाद किया है  रवीन्द्र व्यास ने- मॉडरेटर 

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    फ्रेंच फ़िल्मकार डेनिएल आर्बिड कहती हैं कि एनी अर्नो के उपन्यास ‘सिम्पल पैशन’ ने मुझ पर अजब असर किया। मैं मुग्ध थी और तल्लीन। लंबे अरसे तक मैंने यह उपन्यास अपनी जेब में रखे रखा। इसे पढ़ती रहती। मुझे लगता, यह तो मेरे बारे में ही है। मैंने इसकी प्रतियां अपने उन दोस्तों और परिचितों को भेंट की जो हाल ही में प्रेम में थे। यह एक उद्दाम प्रेम की ‘परफेक्ट पिक्चर’ है। इसीलिए यह उपन्यास सिर चढ़कर बोलता है। अंतरंग प्रेम की कल्पना करता, प्रेम में प्रतीक्षारत एक स्त्री को काया और चेहरा देता हुआ..

    और मैं यह कहानी कहना चाहती थी कि आप कितने भाग्यशाली होते हैं, जब प्रेम में होते हैं। यह वास्तव में भावनात्मक रूप से, तेज़ी से बहा ले जाने वाला विरल अनुभव होता है। जब आप प्रेम में होते हैं, अपने पर नियंत्रण पूरी तरह खो देते हैं। आप अपने बस में नहीं होते। यह उपन्यास पढ़ते समय मैंने जो महसूस किया, मैं उसे फिर से पा लेना चाहती थी। उसकी एक उजली स्मृति को जीवंत कर देना चाहती थी।

    इसीलिए मैंने अपने समय की एक कहानी को, जो कालातीत है, फ़िल्म में रूपांतरित करना चाहा। मैं चाहती थी, इसकी नायिका सिर्फ़ घर में ही नहीं, अपने प्रेमी की कहीं भी प्रतीक्षा करे। मैं टेक्नोलॉजी की, सेल फोन्स की शुक्रगुज़ार हूं। इसलिए नायिका दुनिया में कहीं भी अपने प्रेमी की प्रतीक्षा कर सकती है। उसके आसपास की दुनिया सिकुड़ रही है क्योंकि वह सब कुछ भूलकर सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने प्रेमी के लिए प्रतीक्षारत है। वह उद्धत है और चाहती है कि वह अपने प्रेमी की ख़्वाहिश के सामने अपने  को पूरी तरह समर्पित कर दे। वह चकित है, चारों ओर से प्रेम से घिरी। यह शुद्ध डोपेमाइन है। सचमुच, एक ड्रग। अंतत: वह एक स्त्री है, जिसने प्रेम की वज़ह से अपने प्रेमी के लिए सब कुछ समर्पित कर दिया है। लेकिन यह उसका अपना फ़ैसला है। और इसी नज़रिए से मैं ‘सिम्पल पैशन’ की कहानी को देखती हूं। एक स्वैच्छिक की निगाह से, किसी शिकार हो गई स्त्री की निगाह से नहीं।

    ‘सिम्पल पैशन’ पर फ़िल्म बनाते समय मुझे इसमें अभिव्यक्त सरसराहटों, सनसनाहटों, उत्तेजना और संवेदनाओं ने सबसे ज्यादा छुआ। मैं इनका ही फ़िल्मांकन करना चाहती थी। मैं इसे लेकर बहुत रोमांचित और उत्साहित थी। मैं अपने को एक क़िस्सागो मानती हूं लेकिन मुझे यह बिलकुल पसंद नहीं कि फ़िल्म सिर्फ़ कहानी सुनाए। मैं फ़िल्म को कहानी से आगे ले जाकर कुछ और फ़िल्माना चाहती थी। मैं तो इस फ़िल्म में तमाम सनसनियों को भी बताना चाहती थी। मैं इसी तरह से देखती हूं। मैंने हमेशा चाहा कि मेरी फ़िल्में बहुत प्रबलता के साथ किसी सुगंध, किसी रूप या विधि में घुली-मिली हों। निश्चित ही कहानी महत्वपूर्ण है लेकिन मुझे यह बात प्रेरित करती है कि वह कहानी से पार जाकर परदे पर कैसे सच्ची-खरी रूपायित हो सके। ‘सिम्पल पैशन’ मेरे लिए एक ऐसा सुनहरा मौक़ा था जिसके जरिए मैं यह सब कल्पित, साकार और जीवंत कर सकूं।

    मैं एक बहुत ही ऐंद्रिक फ़िल्म बनाना चाहती थी। मेरे लिए देह का फ़िल्मांकन करना कलाकारों को ग्लैमराइज़ करने का एक ढंग है। मैं चाहती हूं, वे मोहक लगें। भरसक कोशिश रहती है कि मैं यौन दृश्यों को स्वाभाविक रूप से लिखूं ताकि कलाकार यह जान सकें कि मैं सेट पर उनसे क्या अपेक्षाएं रखती हूं। मैं ऐसे ही कलाकारों को चुनती हूं जो अपनी देह के साथ बहुत सहज हों। मैं उनमें से वह बात नहीं चुराना चाहती जिसे देने में वे सहज तैयार ना हों। शूटिंग करने के बहुत पहले ही मैं यह फ़ैसले ले चुकी होती हूं। वे मुझमें यक़ीन करते हैं और मैं छवियां रचकर उन्हें यह यक़ीन लौटा देने की कोशिश करती हूं।

    मैं सहज रूप से एक आज़ाद स्त्री हूं लेकिन इस उपन्यास ‘सिम्पल पैशन’ की असल ताक़त यह है कि यह सबकुछ की व्याख्या करने या स्पष्टीकरण देने की कोशिश नहीं करता। भले ही आप स्त्री हों या पुरुष, पैशन मे संभवत: यह ख्वाहिश होती है कि आप दूसरों के प्रति समर्पित हो जाएं। आप अपना आत्म उसमें तिरोहित कर देते हैं। कोई नैतिक फ़ैसला इसमें कतई भूमिका नहीं निभाता। जैसा कि अपने इस उपन्यास के छपने के बाद एनी अर्नो खुद कहती हैं-‘मैं फ़ेमिनिस्ट हूं।‘ मैंने जब स्क्रिप्ट लिखना शुरू किया तो उनके इस नजरिए का सम्मान किया।

    निश्चित ही मैं चुनौतियों को पसंद करती हूं। मैं किसी सामान्य स्वीकृति को हासिल करने के बजाय जोखिम लेना पसंद करती हूं। हो सकता है इस फ़िल्म की आलोचना की जाए। जब यह उपन्यास पहली बार छपकर आया, इसकी आलोचना की गई थी लेकिन मैं किसी के सामने यह स्पष्टीकरण नहीं देना चाहती कि उद्दाम प्रेम के जोखिम की कैसे अनदेखी की जा सकती है।

    ‘सिम्पल पैशन’ उपन्यास पर फ़िल्म बनाना मैंने इसलिए चुना कि मैं उन तमाम दोस्तों को एक सुंदर तोहफ़ा देना चाहती हूं जो हाल ही में प्रेम में हैं। हालांकि मैंने यह सोचा नहीं था कि मैं इस पर फ़िल्म बना सकूंगी क्योंकि यह उपन्यास सिनेमैटोग्राफी से बहुत दूर की चीज़ है। बतौर फ़िल्मकार, इस उपन्यास में जाना बहुत मुश्किल है। हालांकि मैं एक महान प्रेम कहानी को स्क्रीन पर साकार करने के लिए बेचैनी से एक अच्छी कहानी की तलाश में थी। ऐसे में ‘सिम्पल पैशन’ मेरे लिए एक बेहतरीन पसंद थी। इसी उपन्यास ने मुझे वह हौसला दिया कि मैं इसे फ़िल्म में रूपांतरित कर सकूं। इसे पटकथा में बदलने के लिए मैंने बार-बार और ख़ूब सोचा। लेकिन जैसा कि ‘मादाम बावेरी’ के बारे में क्लॉद चैबरोल ने कहा था : ‘हो सकता है, मैं यह फ़िल्म बनाने में असमर्थ रहूं, लेकिन अगर मैंने इसे बनाने की कोशिश नहीं कि तो मैं ज़िंदगीभर अपने को एक कायर के रूप में देखता रहूंगा।‘

    मैंने तय किया, मैं ‘सिम्पल पैशन’ बनाऊंगी।

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    एनी अर्नो ने जब यह फ़िल्म देखी तो उनकी प्रतिक्रिया से मैं भावुक हो गई, मैंने राहत की सांस ली। उन्होंने कहा- ‘मैं दृ्श्यों में डूब गई, इस फ़िल्म में मैं पूरी तरह जीवंत हो गई।‘ इससे ख़ूबसूरत सराहना की मैं उम्मीद नहीं करती कि वे अपने को भूल गईं और यह महसूस किया वे इस फिल्म में हैं। इस उपन्यास का रिश्ता उनके ही जीवन से कितनी गहराई से जुड़ा है।

    कुछ लोग मुझे एक ऐसी फ़िल्मकार के रूप में देखते हैं जो जोखिम उठाती है। वे मुझे एक विद्रोही फ़िल्मकार की तरह देखते हैं। मैं समझती हूं, मेरी फ़िल्में किसी भी बने बनाए ढांचे, रूप या नियम को तोड़ने की कोशिश करती हैं। यह तोड़ना ही मेरी फिल्मों की प्राणवायु है।

    मेरी फ़िल्मों पर अश्लीलता और नग्नता का आरोप लगाया जाता है। मेरी कतई यह मंशा नहीं होती कि मैं दर्शकों को उत्तेजित करूं। प्रेमरत देहों का एक सुंदर रूप खींचकर उसमें से निसृत गरिमा और लालित्य को अभिव्यक्त करना ही मेरी मंशा रही है। ऐसा करते हुए मैं चित्रकारी के क़रीब जाने की कोशिश करती हूं। मैं कलाकारों को कुछ संवारने, उन्हें एक दूसरे धरातल पर ले जाने की कोशिश ही करती हूं। यही सब जोखिम उठाने की मेरी प्रेरणा को संभव करता है।

    असंख्य लोग प्रेम में होते हैं, बहुत गहराई और तमाम जज़्बातों के साथ प्रेम में डूबे होते हैं। इन लोगों ने शायद यह उपन्यास पढ़ा होगr। मुझे यक़ीन है, जो लोग प्रेम के दर्द से निपटने के लिए कुछ रास्तों की खोज में हैं, वे ठोकर खाकर इस उपन्यास पर आकर रूके होंगे। इसे पढ़ा-गुना होगा।

    अपनी फ़िल्म (सिम्पल पैशन) के सेट पर मैंने पाया कि मैं सचमुच यह फ़िल्म बनाने में समर्थ हूं, और इसने मुझे रोमांचित कर दिया। मैं यह फ़िल्म इसलिए बना रही हूं कि यह फ़िल्म एक साथ किसी व्यक्ति विशेष की उत्कट, आवेगपूर्ण, प्रेमिल और कामुकता भरी कहानी कहती है। मेरे लिेए यह खोज पाना मुश्किल था कि किसी एक किताब या किसी एक फ़िल्म में गहरा प्रेम और सेक्स एक साथ इस तीव्रता और गहराई घुला-मिला हो कि उसे अलग करना असंभव हो। मैं ऐसा लेखन खोज पाने में असफल रही जिसमें इस तरह की थीम की खोज की गई हो। मैं एक शुद्ध प्रेम कहानी कहना चाहती हूं जिसमें बहुत सरलता के साथ भावनाओं का उफान हो। मैं ऐसी कहानी तो कतई नहीं कहना चाहती थी जो किसी सामाजिक या आर्थिक असमानता में बंटी हो और वह इसी के इर्दगिर्द घूमती रहती हो। और ना ही ऐसी कहानी कहना चाहती थी जो सिर्फ़ व्यभिचार से जुड़ी हो। मैं वह कहानी कहना चाहती हूं जो सिर्फ़ उद्दाम प्रेम पर हो।

    ‘सिम्पल पैशन’ एक आइकॉनिक उपन्यास है। लोगों ने इसकी ख़ूब सराहना भी की है। यह मुझे बहुत भावोत्तेजक लगता है कि लोग किस तरह से प्रेम की चुनौती को अपनाते हैं। यह मेरी ताक़त की परीक्षा भी है कि मैंने इस उपन्यास को फ़िल्म बनाने के लिए चुना। मुझे नहीं पता, मुझमें कितना साहस, कितनी सामर्थ्य है। मैं वह सब कर जाना चाहती हूं, जिसकी मुझमें थोड़ी बहुत ताक़त है। हर फ़िल्म पर विचार करने के दौरान मेरी गहरी ख़्वाहिश रहती है कि इस फ़िल्म को बना डालना चाहिए।

    मुझे सेक्स दृश्यों को निर्देशित करना पसंद है। मेरी नज़र में यह एक तरह से शिल्प, नृत्य, इम्प्रेशनिज़्म की पेंटिंग और ख़्वाहिश का एक ही समय में घटित होना है। इसकी अपेक्षा मेरे लिए एक कॉफी हाउस में बैठे दो लोगों को बातचीत करते शूट करना बेहद मुश्किल जान पड़ता है।  

    मैं इस बात में यक़ीन नहीं करती कि सेक्स सीन फ़िल्माने में एक निर्देशिका और निर्देशक में कोई ख़ास अंतर होता है। सेक्स सीन फ़िल्माने में एक स्त्री और एक पुरुष के नज़रिए में अंतर नहीं होता। ऐसी स्त्रियां हैं जो पुरुषों को ज्यादा पसंद करती हैं और इसके उलट भी सही है। मिसाल के लिए पेट्राइस शेरिआऊ की फिल्म है ‘इंटीमेसी’। मैंने पाया कि इस फ़िल्म में सेक्स सीन निहायत ही ख़ूबसूरत ढंग से फ़िल्माए गए हैं। ये उन फ़िल्मों के सेक्स सीन से ज्यादा ख़ूबसूरत और अर्थपूर्ण थे जो महिला फ़िल्मकारों ने बनाई हैं। जाहिर है, अंतत: यह व्यक्ति विशेष की संवेदनशीलता और नज़रिए पर निर्भर करता है कि वह सेक्स सीन कैसे फ़िल्माता है।

    जहां तक मेरा सवाल है, मैं सेक्स सीन में ‘ग्रेस’ को खोजने की कोशिश करती हूं। मैं अपनी फ़िल्मों में दर्शकों को वहां ले जाती हूं, जहां वे यह महसूस कर सकें कि वे कैसे जीना चाहते हैं। मैं भी इसीलिए फ़िल्में देखने जाती हूं, इसलिए नहीं कि वे मेरा मनोरंजन करती हैं। मैं फ़िल्मों को जीने के लिए देखती हूं।

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