अमृत रंजन की चार नई कविताएँ

क्या अच्छी कविता लिखने की कोई उम्र होती है? क्या लेखन में परिपक्वता का सम्बन्ध उम्र से होता है?  अमृत रंजन की नई कविताएँ पढ़ते हुए मन में यही सवाल उठते रहे. 15 साल की उम्र में अगर कि==सी कवि के अहसास इतने बेचैन करने लगें तो ओरहान पामुक के उपन्यास ‘स्नो’ के ओरहान बे की याद आती है जिसके ऊपर इल्हाम की तरह कविता उतरती थी. फिलहाल चार कविताएँ पढ़िए- मॉडरेटर

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1.

पानी टूटा,
हवा पीछे चलने लगी
फिर हवा भी टूट गई।

आसमान का छेद अब केवल सूरज नहीं था
भरोसा टूटा
ब्रह्मांड ख़त्म हुआ,
और धरती बीच में आ गई।

शायद किसी ने वहाँ कदम रखा होगा,
जहाँ कोई नहीं गया।

रात में फेंका गया पत्थर
आज तक वापस नहीं लौटा।

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2.

कितना चुभता है
नल से निकलते
पानी की चीख सुनी है?

मानो हमारे जीवन के लिए
पानी मर रहा है।

3.
थरथराती बूंदें
तुमसे टकराने लगी
पेड़ हवा से चौंक उठे
चादर ओढ़े गरमी लग रही थी
लेकिन ठंड के डर ने सहमा के रखा

चीखो!
हवा के अलावा
कोई नहीं सुनेगा तुम्हारी
बादल अंधेरे-अकेले आसमान के चमचे होते हैं
चाँद को छिपा लिया
शायद आसमान के
काले एकांत पर दया आ गई होगी।

4.

ज़्यादा दूर मत चले जाना
क्योंकि मेरी नज़र से बाहर की दूरी
मुझसे नहीं सही जाएगी।

अगर मेरी साँस को किसी ने पकड़ा नहीं
तो साँस गुम।

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