*अंधकार में मोमबत्तियों की तरह होना* 

हाल में रज़ा फ़ाउंडेशन द्वारा अंतरराष्ट्रीय कविता का आयोजन किया गया है। ‘संसार’ शीर्षक से आयोजित इस आयोजन की संक्षिप्त लेकिन सारगर्भित रपट लिखी है जानकी पुल की संपादक अनुरंजनी ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर 

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रज़ा न्यास द्वारा आयोजित ‘संसार: अंतरराष्ट्रीय कविता समारोह’ एक ऐसा कार्यक्रम था जिसमें 10 विभिन्न देशों से 13 कवि – इंद्रे वालंतिनाइते (लिथुआनिया), औश्रा काज़िलिउनाइते (लिथुआनिया), के. एल्तिनाए (सूडान), ग्रेगर पोडलोगार (स्लोवेनिया), ग्लोरजाना वेबर (स्लोवेनिया), याहिया लबाबिदी (मिस्र), कतेरीना कालित्को (यूक्रेन), आंद्रे नफ़्फ़िस साहेली (इटली), डैनियल लिपारा (अर्जेंटीना), सिनान अंतून (इराक), दुन्या मिखाइल (इराक), अकरम अलक़तरेब (सीरिया), समीरा नेगरूश (अल्जीरिया)शामिल हुए जिनमें से आठ साक्षात् तो बाक़ी अपने वीडियो रिकॉर्डिंग के ज़रिए। उद्घाटन सत्र में ‘न्यास’ के प्रबंध न्यासी अशोक वाजपेयी ने जैसा कहा था कि “ये सारे कवि अंधकार में मोमबत्ती की तरह हैं” इसका अनुभव विगत तीन दिनों तक( पंद्रह सत्रों) तक होता रहा। 
हम अपने केशों को कब धोते हैं? इसका जवाब यही होगा कि “जब मन करे तब, ये कैसा सवाल है?” हाँ, यह हमारे लिए सवाल नहीं है लेकिन जो देश वर्षों से युद्ध में घिरा हुआ हो वहाँ के नागरिकों के लिए यह महत्त्वपूर्ण सवाल है। जब कतेरिना कालित्को यह बताती हैं कि यूक्रेन में कब शैंपू करना है वहाँ यह तय ही नहीं कर पाते क्योंकि एक दिन बिजली नहीं है तो एक दिन पानी नहीं…यह सुनना हमें झटका देता है कि यह हमारे लिए कितनी सामान्य बात है लेकिन उनके लिए?
तीन दिनों तक चले इस समारोह के तीन आयाम देखने को मिले – पहला, विभिन्न देशों के कवियों द्वारा उनका मूल कविता पाठ एवं उनकी कविताओं का हिन्दी व अंग्रेजी अनुवाद की प्रस्तुति। दूसरा, उन कविताओं पर भारतीय चित्रकारों द्वारा बनाए गए चित्रों की प्रदर्शनी तथा तीसरा ‘संसार: विश्व कविता संचयन’ किताब का लोकार्पण। इस समारोह में कितना कुछ था जिससे प्रत्येक व्यक्ति सीख सकता है। जिसमें सबसे बड़ी बात है विनम्रता। कहने को तेहर कवि थे, उन सब की कविताओं की अलग-अलग विशेषताएँ, अलग-अलग कहन था लेकिन एक विशेषता जो सबमें समान थी वह थी विनम्रता और जीवन के प्रति आभारी होना। प्रत्येक कवि अपनी कविताओं के प्रति और प्रत्येक व्यक्तियों के प्रति विनम्र थे, जो उनके व्यवहार में सहजता से शामिल था। इस समारोह ने यह भी सिखाया कि कितनी भी बुरी परिस्थितियाँ आएँ, हमें उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। इन कवियों के यहाँ बार-बार युद्ध के दंश का, उदासी का, निराशा का उल्लेख है लेकिन फिर भी उनकी कविताएँ उम्मीद नहीं छोड़तीं। ठीक उसी तरह जिस तरह ग़ालिब कहते हैं – “रात दिन गर्दिश में हैं सात आसमाँ, हो रहेगा कुछ न कुछ घबराएँ क्या”
उन्हें उम्मीद है इसलिए मुक्ति की छटपटाहट भी बार-बार है। इसलिए अशोक वाजपेयी कहते हैं कि ये कवि अंधकार में मोमबत्ती की तरह हैं…

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