• रपट
  • सेतु प्रकाशन वार्षिकोत्सव: साहित्य,समाज, लोकधर्म पर बहुआयामी संवाद

    6 दिसम्बर, 2025 को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में सेतु प्रकाशन के वार्षिकोत्सव का आयोजन हुआ। उसकी विस्तृत रपट पढ़िए- मॉडरेटर

    ============================

    इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के कमलादेवी कॉम्प्लेक्स में आयोजित सेतु प्रकाशन के वार्षिकोत्सव ने इस वर्ष साहित्य, समाजशास्त्र, इतिहास और लोकधर्म को एक साथ जोड़ने वाले अत्यंत समृद्ध विमर्शों का मंच प्रदान किया। सभागार में प्रतिष्ठित साहित्यकारों, अध्यापकों, शोधार्थियों, पाठकों और विद्यार्थियों की उल्लेखनीय उपस्थिति थी, जिससे समारोह एक जीवंत और विचारपूर्ण संवाद का रूप लेता गया। इस अवसर पर दो उत्कृष्ट पाण्डुलिपियों—संतोष दीक्षित के उपन्यास ‘छाया सच’ तथा नरेश गोस्वामी की शोधकृति ‘काँवड़ यात्रा : लोकधार्मिकता का नेपथ्य’—का विधिवत लोकार्पण किया गया। दोनों पुस्तकों ने अपने-अपने क्षेत्रों में विचार, इतिहास, आस्था और सामाजिक परिवर्तन को देखने की नयी दृष्टि प्रस्तुत की है, जिसके चलते समारोह में इन पर हुई चर्चाएँ विशेष आकर्षण का केंद्र रहीं।

    कार्यक्रम का आरम्भ स्वागत भाषण से हुआ, जिसमें  अमिताभ राय ने पिछले सात वर्षों के सेतु प्रकाशन के सफ़र, उसके उद्देश्यों, प्रतिबद्धताओं और उपलब्धियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने यह भी बताया कि प्रकाशन जगत की चुनौतियों के बीच सेतु ने गुणवत्ता, संपादकीय दक्षता और विषय-वस्तु की मौलिकता को अपनी प्राथमिकता बनाये रखा है। सेतु की आगामी योजनाओं और नई पाण्डुलिपि-योजना पर भी उन्होंने संकेत किया, जिसे श्रोताओं ने उत्साहपूर्वक सुना। ‘सेतु पाण्डुलिपि पुरस्कार 2025’ प्राप्त संतोष दीक्षित के उपन्यास ‘छाया सच’ के औपचारिक लोकार्पण के साथ कार्यक्रम की साहित्यिक धारा आरम्भ हुई।

    अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार ममता कालिया ने उपन्यास के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आयामों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि यह कथा न केवल पटना की गलियों और 1857 की स्मृतियों को पुनर्जीवित करती है, बल्कि हमारे समय में व्याप्त “कृत्रिम सच” के विरुद्ध एक ज़रूरी साहित्यिक हस्तक्षेप भी है। उन्होंने उपन्यास में भाँड़ों, नाचनेवालों, हाशिये के कलाकारों और औपनिवेशिक दबावों से जूझते समाज के बिम्बों को अत्यंत मौलिक बताया। लेखिका अनामिका ने ‘छाया सच’ को “शहर-नॉस्टेल्जिया और भावनात्मक भूगोल का जीवंत दस्तावेज़” बताते हुए कहा कि यह उपन्यास केवल अतीत का मानचित्र नहीं, बल्कि मनुष्य और शहर के अंतर्संबंध को समझने का काव्यात्मक प्रयास है।

    साहित्यकार राजू शर्मा ने उपन्यास को सामूहिक अवचेतन, सामाजिक स्मृति और राजनीतिक nostalgia के संदर्भ में पढ़े जाने योग्य बताया। उन्होंने कहा कि यह कथा प्रतिरोध का नारा नहीं बुलंद करती, परंतु “अंतर्धारा में वह प्रतिरोध की गहरी, आत्मिक ध्वनि रचती है।” अपनी रचना-प्रक्रिया का साझा करते हुए संतोष दीक्षित ने कहा कि आज “हिन्दुत्त्व के नाम पर पूरे देश में जो लूट और भय का वातावरण है, वही बेचैनी उन्हें इतिहास की परतों में झाँकने और वर्तमान को समझने के सूत्र खोजने की ओर ले गयी।”

    उनकी टिप्पणी पर सभागार में उपस्थित श्रोताओं ने उत्साहपूर्वक तालियाँ बजाईं, जो इस विषय पर उनकी गहन संवेदनशीलता का संकेत था। कार्यक्रम के दूसरे सत्र में प्रस्तुत हुई पुस्तक ‘काँवड़ यात्रा : लोकधार्मिकता का नेपथ्य’, जिसे प्रथम समाज विज्ञान सेतु पाण्डुलिपि पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। यह पुस्तक लोकधर्म, ग्रामीण समाज की अर्थ-राजनीति और उदारीकरण के बाद उत्पन्न सामाजिक बदलावों को नये दृष्टिकोण से समझने का महत्त्वपूर्ण प्रयास है। अध्यक्षता कर रहीं प्रो. मधुलिका बैनर्जी ने कहा कि यह पुस्तक धर्म, समाजशास्त्र और राजनीति की पारंपरिक सीमाओं को तोड़ते हुए लोकधर्म का नया विश्लेषण प्रस्तुत करती है। उन्होंने कहा कि “धर्म के किसी एक पहलू का अध्ययन भी अपने आप में राजनीतिक कृत्य है, और हिन्दू धर्म की बहुलवादी परंपरा इस बात को और जटिल बनाती है।” उन्होंने यह भी कहा कि पुस्तक का स्वरूप इतना व्यापक है कि इसे किसी एक खांचे में बांधना संभव नहीं।

    मणिन्द्र नाथ ठाकुर ने काँवड़ यात्रा को केवल आस्था का विमर्श न मानकर इसे राजनीतिक–सांस्कृतिक परियोजना बताया। उन्होंने कहा कि यात्रा का यह रूपांतरण बाज़ार, धार्मिक पुनरुत्थान और सत्ता-तंत्र की संयुक्त कार्यप्रणालियों से निर्मित हुआ है। समाजशास्त्री जी.एन. त्रिवेदी ने कहा कि काँवड़ यात्रा “उदारीकरण के बाद बनी भौतिक असुरक्षाओं, सांस्कृतिक तनावों और राजनीतिक पुनर्संयोजनों की सम्मिलित अभिव्यक्ति” है। उन्होंने हिन्द स्वराज और politics of relativism के माध्यम से आज के धार्मिक–राजनीतिक वातावरण की चुनौतियों का विश्लेषण किया।

    विचारक नरेश गोस्वामी ने अपनी कृति की रचनात्मक यात्रा के बारे में  कहा कि “लोकधर्म किसी धर्मग्रंथ की देन नहीं, बल्कि समाज के भीतर लगातार उभरती बेचैनियों, उम्मीदों और आस्थाओं का तापमान है। काँवड़ यात्रा को केवल धार्मिक घटना मान लेना उसे छोटा करना है—यह उस समाज की धड़कन है जो आर्थिक असुरक्षा, सत्ता-प्रेरित बदलावों और आधुनिकता की अनिश्चितताओं से एक साथ जूझ रहा है।” उन्होंने यह भी कहा कि “लोकधर्म का अध्ययन हमें यह समझने में मदद करता है कि मनुष्य किस क्षण राजनीति की ओर जाता है और किस क्षण आध्यात्मिकता की ओर लौट आता है। काँवड़ यात्रा दोनों दिशाओं में फैले इसी द्वंद्व का जीवंत उदाहरण है।”

    कार्यक्रम में दिल्ली और देशभर से आए लेखक, अध्यापक, शोधार्थी, युवा पाठक और सामाजिक विज्ञान के विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित थे। दोनों पुरस्कृत लेखक—संतोष दीक्षित और नरेश गोस्वामी—अपनी पुस्तकों के साथ मंच पर मौजूद रहे, जिससे विमर्श और भी समृद्ध हुआ। प्रो. राजकुमार विमान रद्द होने के कारण कार्यक्रम में सम्मिलित नहीं हो सके, जिसकी सूचना मंच से दी गयी। कार्यक्रम के अंत में सेतु प्रकाशन समूह की निदेशक अमिता पाण्डेय ने संस्था की उपलब्धियों, भविष्य की योजनाओं और साहित्यिक–सामाजिक प्रतिबद्धताओं की चर्चा करते हुए सभी वक्ताओं, लेखकों और श्रोताओं के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।

    इस पूरे समारोह का प्रभावशाली, संयत और संवेदनशील संचालन स्मिता सिन्हा ने किया।

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    1 mins