किताब की दुनिया में पंद्रह करोड़ की हलचल है। ऐसे में प्रचण्ड प्रवीर ने यह लिखा है। आप भी पढ़िए- मॉडरेटर
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कल की बात है। जैसे ही मैँने कैफेटेरिया मेँ कदम रखा, बनवारी जी कुछ परेशान-से बैठे दिखाई दिये। मैँने नमस्ते कह कर सामने की खाली कुर्सी पकड़ी। बनवारी जी से उनकी उदासी का सबब पूछा। बनवारी फट पड़े, “प्रकाशन का धन्धा ही चौपट है। प्रिण्टर पढ़े-लिखे नहीँ होते। बाइण्डर उनसे भी गये गुजरे होते हैँ। विश्व पुस्तक मेला आने में महीना भर से कम समय रह गया है। काम की मारा-मारी है। आप बताइये, आपने किसलिये हमेँ इतना जोर देकर बुलाया?” मैँने अपने लाल कोट पर बायाँ हाथ फेरा और काला चश्मा चढ़ाकर मूँछोँ पर ताव देते हुये थोड़ा करीब जा के और फुसफुसा के कहा, “मामला पाँच-सौ करोड़ का है। यह बातेँ फोन पर थोड़ी होँगी?”
बनवारी जी कुर्सी से गिरते-गिरते बचे। जब मैँने सँभाला तब वे कहने लगे, “जिस साल मैँ पैदा हुआ था, उस साल मरहूम देवानन्द साहेब ने ‘सौ करोड़’ नाम की फिल्म बनायी थी। आप उनसे पाँच गुना आगे निकल गये।“ मैँने बनवारी जी को पानी का गिलास देते हुए समझाया, “तकनीकी रूप से मामला सौ करोड़ का ही होगा। लेकिन पाँच प्रतियाँ छापनी हैँ, इसलिये पाँच सौ करोड़ कह रहा था।“
बनवारी जी की आँखेँ फट गयीँ। मुँह से निकला, “आप क्या कह रहे हैँ?” मैँने उनका मफलर गले मेँ दुरुस्त करते हुए गालोँ पर प्यार से चपत लगाकर समझाया, “बिल्कुल ठीक समझ रहे हो। मेरी अगली किताब का मूल्य सौ करोड़ होगा और उसकी केवल पाँच प्रतियाँ छपेँगी। यानी कुल खेल पाँच सौ करोड़ का है।“ बनवारी जी को चार सौ चालीस वोल्ट का झटका लग गया था। मैँने समझाया, “भाई, सोने की प्लेट पर प्लैटिनम की ईबारत नहीँ होगी। कुल ढाई सौ पेज की, सादे कागज की किताब होगी।“
बनवारी जी की जान मेँ जान आयी। फिर मुझसे उलटा सवाल किया, “इतनी महँगी किताब कौन खरीदेगा?” मैँने झिड़का, “अपना देश है। आज तक किताब के बिकने की हमने परवाह की है क्या? दर्जन से ज्यादा किताब लिखी है और उनमेँ से कोई एक दर्जन भर भी आज तक नहीँ बिकी। पर इसका न अफसोस है न कोई गम। चलिये हम आपका काम आसान कर देते हैँ। आप अपने ‘वेरा प्रकाशन’ से हमारी किताब छापिये और उस पर ‘निन्यानवे करोड़ निन्यनावे लाख निन्यानवे हजार चार सौ निन्यानवे’ की छूट दीजियेगा।“
“ये कौन-सा फेरा लगा रहे हैँ आप? मरवा ही डालेँगे।“ बनवारी जी अभी तक होश मेँ नहीँ आये थे। बनवारी जी कहने लगे, “प्रकाशक हूँ इसलिये जानता हूँ कि फिरदौसी ने तीस साल लगा कर ‘शाहनामा’ की एक प्रति लिखी थी। उसे आशा थी कि महमूद गजनी उसे साठ लाख सोने की मोहरेँ देगा, लेकिन बादशाह के दरबारी ने चालाकी की और सोने की मुहरेँ बदल कर चाँदी की मुहरेँ भिजवा दीँ। फिरदौसी ने यह रकम ठुकरा दी और देश छोड़ कर भाग गया। बाद मेँ जब बादशाह ने फिरदौसी को सोने की साठ लाख मोहरेँ भेजीँ, उसके मिलने से पहले ही शायर जन्नत-मकानी हो गया। मुझे नहीँ लगता है कि आपने अपनी किताब को लिखने मेँ जिन्दगी के तीस साल लगाये होँगे।“
मैँने झिड़क कर कहा, “अमाँ, कैसी बातेँ करते हो? हमने ‘तीन घण्टे बयालिस मिनट’ मेँ यह किताब लिख डाली है। आप प्रकाशक हैँ इसलिये जानते ही होँगे कि पहले किताबोँ को हाथोँ से लिखना और रङ्गोँ से सजाना मुश्किल काम था। अपने देश मेँ अकबर ने ‘दास्तान-ए-अमीर’ हम्जा को रङ्ग और नक्काशी मेँ तैयार कराने मेँ लाखो-करोड़ो खर्च किये और बादशाही की अय्याशी भरी कारगुजारी मेँ पन्द्रह-बीस साल से अधिक का वक्त लगा। लेकिन अब वो जमाना नहीँ रहा। आप प्रकाशक हैँ इसलिये आप जानते ही होँगे कि कुछ पेण्टिङ् अरबोँ मेँ बिकती है। वह सोने-चाँदी के कैनवास पर नहीँ बनती। न ही प्लैटिनम या रेडियम उसकी शान मेँ सलमे-सितारे की तरह जड़े जाते हैँ। दुनिया भर की तमाम कलाकृतियोँ मेँ जो रङ्ग और कैनवास लगता है वह इतना महँगा नहीँ होता कि आम आदमी उसे खरीद न सके। उससे कहीँ महँगा तो एक पियानो खरीदना हो जाता है। फिर भी पेण्टिङ् अरबोँ मेँ बिकती हैँ। कभी सोचा है कैसे?“
बनवारी जी अब कुछ जोश मेँ आये। “पेण्टिङ् का बाजार है इसलिये। किताबोँ का और कहानियोँ का क्या बाजार है?”
मैँने समझाया, “अपने देश मेँ किसी समय रामकुमार और निर्मल वर्मा दो सगे भाई हुआ करते थे। बात ऐसी थी कि रामकुमार पेण्टिङ् बनाते थे जिसके लिये उनको चालीस रुपये का भुगतान मिलता था और वहीँ निर्मल वर्मा को एक कहानी के लिये पचास रुपये का भुगतान मिला करता था। बात ये हुई कि इण्टरनेशनल बाजार खुलने के बाद दुनिया भर के स्मगलरोँ के काले धन को चित्रकारोँ की कूँची के रङ्गोँ से सफेद होने का शराफत भरा जरिया मिल गया।“
बनवारी ने व्यङ्ग्य किया, “आप भी वही जरिया चाह रहे हैँ? लेकिन भले मानुस, जरा अपने कदम सख्त जमीन पर रखिये। हिन्दी मेँ छपने वाली किताब को विदेश मेँ कौन खरीदेगा? इसे बेचना भी तो अपने देश मेँ ही है।“
मैँने भी व्यङ्ग्य का जवाब रुखाई से दिया, “आपकी जानकारी के लिये बता दूँ कि अपने देश मेँ मिठाई की दुकान, स्टेशनरी की दुकान और प्रकाशन जगत इन सबने नया रास्ता अपनाया है। दरअसल हकीकत यह है कि आपमेँ ‘आन्त्रेप्रेनर’ के लक्षण ही नहीँ हैँ। बाजार बनाया जाता है। कहा गया है कि यदि आपको आगे का रास्ता दिख रहा है इसका मतलब है कि यह रास्ता आपका नहीँ बल्कि किसी और का रास्ता है, जिस पर आप चल रहे हैँ।“
“महाजनो येन गतः स पन्थाः। युधिष्ठिर ने यक्ष को यह पहले ही कह दिया है।“ बनवारी जी अब बहस मेँ हमारे साथ दो-दो हाथ करने के मूड मेँ आ गये थे।
मैँने समझाया, “भले मानुस। यह पिटी-पिटाई लकीर पकड़ोगे तो युधिष्ठिर की तरह स्वर्ग के भागी होगे, धरती का राजपाट ‘आरआरआर’ ले जायेगा। अगर ‘आरआरआर’ से आगे निकलना है तो मेरी पुस्तिका ‘मत्तविलास प्रकरण’ को प्रकाशित करके उसका दाम सौ करोड़ रख दिया जाय। इसी मेँ आपका भी भला और हमारा भी।“
बनवारी जी की बनिया बुद्धि काम करने लगी। सोच-विचार कर के बोले, “इसमेँ निगेटिव पब्लिसिटी मिलेगी। इसके अलावा और क्या फायदा हो सकेगा पाँच किताबेँ बेच कर?” मैँने अपना फोन निकाल कर कहा, “मुझे मालूम था कि बात यहाँ आकर अटकेगी। इसका मैँने इंतजाम कर रखा है।“ मैँने झट से फोन लगाकर कहा, “अब आपकी जरूरत आ पड़ी है। आ जाइए, मैँने आपके लिये भी कोल्ड कॉफी आर्डर कर दी है। देर होगी तो वह गरम हो जायेगी।“
जब निराली निर्झर स्वयं प्रकट हो जायेँ तो अच्छे-अच्छोँ के होश उड़ जाते हैँ। लावण्यमयी निराली निर्झर पास मेँ ही बैठी मेरे कॉल कर इंतजार कर रहीँ थीँ। निराली ने आकर बनवारी जी को नमस्ते किया और साथ मेँ बैठ गयीँ। निराली जी ने मुझसे पूछा, “बनवारी को सौ करोड़ का हिसाब समझा दिया?”
मैँने लम्बी साँस भरते हुए कहा, “समझा रहा हूँ, पर ये समझ नहीँ रहे हैँ।“ निराली ने तभी आयी कोल्ड कॉफी को सिप कर के टेबल पर रखा और बनवारी जी से कहा, “बनवारी, आप इसे बड़े खेल मेँ बहुत छोटे-से मोहरे हैँ। सारी बातेँ समझने की नहीँ होती हैँ। कुछ अमल करने की होती हैँ।“ निराली निर्झर की ठण्डी आवाज ने बनवारी के होश उड़ा दिये। अब उनको समझ मेँ आने लगा कि प्रकाशन का खेल क्या है। निराली निर्झर ने आगे समझाया, “हाथी की दाँत दिखाने के और होते हैँ और खाने के और होते हैँ। सवाल इतना है कि आप दिखाने के दाँत तुड़वाने हैँ या खाने का दाँत या दोनोँ।“
बनवारी जी थोड़ी देर के लिये खामोश हो गये। फिर उन्होँने कहा, “मेरी किताबे ई-कॉमर्स पोर्टल पर बिकती है। इतनी ज्यादा कीमत की चीजेँ कोई पोर्टल नहीँ बेचेगा, भले ही आप उस पर ‘निन्यानवे करोड़ निन्यनावे लाख निन्यानवे हजार चार सौ निन्यानवे’ की छूट दे देँ। सौ करोड़ की किताब क्या मामूली पोर्टल पर बिकेगी?”
मैँने सिर पकड़ लिया। निराली ने मुस्कुराते हुए कहा, “सौ करोड़ की किताब को बेचना कौन चाह रहा है?”
“फिर आप दोनोँ क्या चाहते हैँ?” बनवारी जी ने दोनोँ हाथ जोड़ लिये।
“बहुत कुछ।“ मैँने कहना शुरू किया, “सबसे पहले इसका ग्रन्थोदय होगा।“ निराली जी ने आगे समझाया, “आने वाले विश्व पुस्तक मेले मेँ पुस्तक का लोकार्पण नहीँ, ग्रन्थोदय होगा। एक टेबल की नीचे की शेल्फ पर दो प्रतियाँ होँगी। टेबल का ऊपरी हिस्सा बीच मेँ से फटकर दो भागोँ मेँ अलग-अलग सरक जायेगा। नीचे से धातु के बने दो हाथोँ मेँ पुस्तक की दो प्रतियाँ उदित होँगी।“ बनवारी जी ने अपना सिर पकड़ कर हमारी सरकार मेँ टेबल पर सटा दिया।
पिंजरे में चलके आप, आ जाता है शिकार
क़ातिल पे भी कभी, आ जाता है यूँ प्यार
बातोँ ही, बातोँ मेँ, होना है जो हो जाता है
ये थी कल की बात!
दिनाङ्क: ११/१२/२०२५
सन्दर्भ: १. गीतकार – आनन्द बक्षी , चित्रपट – अपना देश (१९७२)


मज़ेदार । सम सामयिक ।