आज प्रस्तुत है आसित आदित्य की कविताएँ। जानकीपुल पर प्रकाशन होने का उनका यह पहला अवसर है। आदित्य की कविताएँ इससे पूर्व अन्य पत्रिकाओं व विभिन्न ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुकी हैं, आज कुछ नई कविताएँ यहाँ प्रस्तुत हैं- अनुरंजनी
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1. शहर के बहाने
मैं लोगों को उनके चेहरों से कम
उनके शहरों से अधिक चीन्हता हूँ
शहरों को पहचानता हूँ उनकी नदियों से
हर किसी का होता है एक शहर जो
किसी और शहर में—जिसमें वो रहता है पर
जो उसका होता नहीं दरअस्ल—घुस आता है चोरी–छिपे
मैंने अक्सर पाया है कि
बनारस के आसपास के ज़िलों के भीड़–भड़क्कम इलाकों में
जब मैं होता हूँ तब बनारस में होता हूँ
गलियों में मुझे मसाले महकते हैं
फागुन की दुपहरी इमारतों के बीच गुजरते
घेर लेती है मुझे एक ख़ास किस्म की शीतलता
ऑटो वालों से मिलती है झल्लाहट और ’भोसड़ी के’ से शांति
(शहर की याद दरअस्ल उस व्यक्ति की याद होती है जो
याद आ रहे शहर में याद की तरह नहीं रहता!)
शहर बदलना देह बदलते की तरह नहीं होता
पिछले जन्म की स्मृतियाँ शेष रह जाती हैं
ज्यों प्रेमिका से प्यार करने वाला जानता है
महीने के कुछ दिनों उसकी चिड़चिड़ाहट का सबब
बाप से प्यार करने वाला जानता है
नाराज़गी के पीछे दुबकी–सहमी बैठी है लाचारी
शहर से प्यार करने वाले जानते हैं
कि किस कोने किस तिराहे पर
क्या–क्या हो सकता था और कहाँ क्या कमी है
यदि इस बसंत
मेरी मृत्यु की पहुँचे ख़बर तुम तक
तो जानना कि मैं
फूलों के अभाव में मारा गया हूँ
2. आश्चर्य का विलोप
भारी उमस के बीच
वो पड़ोस के भौजाई की
लगभग नग्न पीठ थी
उतर आई थीं पसीने की बूँदें जिसपर
वो कलुआ था
जो मारे दुलार के
मुँह चाट गया था मेरा
वो पश्चिम में झूलते सिंदूरी बादल थें;
तुम नहीं, तुम्हारा कुछ नहीं
वो भादो की एक साँझ थी
मेरी देह से लिथड़ी थी
बरसाती पानी में सड़ते
किन्हीं अनचीन्हे घासों की गमक
वो छप्पर पर नेनुआ के फूल थें
सिमटते ख़ुद में
वो आँवले की पत्तियाँ थीं
तुम नहीं
तुम्हारा होना नहीं— कभी नहीं!
अनन्त दिशाओं से बढ़ते आते
मेरी तरफ़
अधियारे में
घुली, दूर कहीं झिलमिलाती
दीए की लौ–सी
तुम्हारे न होने की सच्चाई
मगर हाय! कि अब अचरज नहीं।
3. अपने जैसा सब
मुझे ऐसी आँखें नहीं चाहिए
जो ठहर न जाएँ फूलों पर
मुझे ऐसे फूल नहीं चाहिए जिनके
उगने के लिए
हो भूमि आरक्षित
ऐसी नहीं चाहिए भूमि मुझे जो
बन जाना चाहती हो आसमान
ना ही ऐसा आसमान जहाँ
बसते हो केवल देवता
बहुत छोटी–सी ज़िन्दगी में
मुझे चाहिए बहुत कम चीज़ें
बस उन बहुत कम चीज़ों में
यों नहीं कि बहुत कम रहूँ मैं
4. दुख की भाषा में दुख से आगे
(• रॉबर्ट ब्रेसों की फ़िल्म ‘ओ अज़ार बाल्ताज़ार’ के मुख्य पात्र के लिए)
तुम उनमें से किसी की भी कोख से
जनम सकते थे जो भोर के तारे की शीतलता
भर लेती थीं अपनी आँखों में
जो पापीहों के चीखने और गायों के रंभाने से
बहुत पहले धर लेती थीं भट्टे की राह
तुम मेरे गाँव के धोबियों के घर जनम सकते थे
बनते उनकी दरिद्रता के साक्षी
देसी शराब में लिथड़ी उनकी गालियों और झगड़ों में
शायद सबकी तरह तुम्हें भी रस मिलता
पर तुम इन सबसे बहुत दूर जन्मे जहाँ
तुम्हें रखने और तुमसे काम लेने के लिए
अपने नाम के साथ एक विशेष शब्द नहीं जोड़े रखना था
यूँ तुम मानव जाति के एक गहरे काले धब्बे से अनजान रहे
चूँकि कोई तुमसे प्यार करता था
तुम्हारे ही हिस्से आना था उसका नफ़रत जिसे
तुमसे प्यार करने वाला करता था तिरस्कृत
तुम्हारी पूँछ में आग लगी थी
और क्योंकि तुम ना उड़ सकते थे ना खोद सकते थे ज़मीन
भागे थे सोलहों दिशाओं में बदहवास
मैंने तुम्हारे पदचिह्न दर्ज़ कर लिए हैं
मेरे समय की मानव सभ्यता उसका अनुसरण करती है
तुम्हारे ढेंचू–ढेंचू दूर पहाड़ों से टकरा–टकराकर
हर बार लौट आते हैं मेरे पास
अपने साथ बहन की आत्महत्या से पहले का रुदन लाते हैं
तुम्हारे टाँग में लगी गोली मैं
उस राख में से उठाता हूँ जो
मेरी देह और लकड़ियों का महज़ बदला हुआ रूप है
गोली तपती है, बाल्तज़ार
जैसे एकांत में बसे एक मकान के एक बन्द कमरे में
तुमसे प्यार करने वाली का निर्वस्त्र शरीर
5. मैं और मेरे समय लोग
बहुत कम समय था हमारे पास
और उस कम समय को भी हमने
‘समय कम है’ की शिकायत में बह जाने दिया
दृश्य थें सामने
और हमने देखा था उनको जो
छूट चुके थें पीछे
कहा था : जो रीता वो सुन्दर था अधिक
पूस में ताकते रहें जेठ की राह
जेठ की तपन में टटोला सावन के बादल
हम कहते रहें—
यूँ न होना था जीवन
कैसा होना था
नहीं जानते थें
6. प्रतीक्षा में अप्रतीक्षित
तुम्हारे शहर से आने वाली ट्रेन के
आने के बिल्कुल ठीक समय पर
रेलवे स्टेशन की भीड़ में घेरे रहता हूँ अपनी जगह
लौटता हूँ वापस जब
कोई परिचित परछाईं
मेरी परछाईं में नहीं घुल–मिल जाती
नाउम्मीदी में पगी प्रतीक्षाओं की धूप में
खिलता है दुख का फूल उजला
तुम्हारे लौट आने की राह देखता मैं दरअस्ल
तुम्हारे लौट आने की कामना से
उतना नहीं भरा होता जितना भरता हूँ अपना ख़ालीपन
तुम नहीं आती
कभी नहीं आती
मैं लौट आता हूँ
तुम्हारे शहर से आई ट्रेन से
नोंच लेता हूँ तुम्हारे घुँघराले बालों की गंध
अपने फूलों को अर्पित करता हूँ
7. जो परिभाषित करता है
एक बात होती है जिसे तुम
कहना चाहते हो चीख़–चीख़
पर नहीं कहते
अपने होंठों पर उसे आने से रोकने के लिए
तुम अपना कंठ दबाते हो लगाकर अपनी पूरी ताक़त
यूँ तुम अपने ही हाथों मारे जाते हो
भीड़–भड़क्के में जिसे
जब तब उघाड़ देते हैं परिचित–अपरिचित
तुम नहीं सुनना चाहते
सो अपने होने को पिघलाकर
भर देते हो अपने कानों में
ना तुम बचते हो
ना तुम्हारे कान बचते हैं
बात फ़िर भी बची रह जाती है
वही वो बात है
वो चीज़ है जिसके विषय में वो बात है
जिसने पास है तुम्हारे मैं की सबसे सटीक परिभाषा
8. न होने के मध्य होना
नहीं होने के साथ चलते–चलते
हो जाता है घटित कुछ
कुछ घटित हो चुकने के बाद
और गहरा हो जाता है
नहीं होना
ज्यों
सबके रोने–धोने
शव उठने के बाद
और गाढ़ी हो जाती है मृत्यु
परिचय-
आसित आदित्य
गाज़ीपुर, उत्तर प्रदेश
हिंदवी, सदानीरा, इंद्रधनुष, पोएम्स इंडिया, गोल चक्कर, कृति बहुमत आदि वेब पोर्टलों व पत्रिकाओं में प्रकाशित
सम्पर्क : 7309728587
ईमेल : aasitaditya@outlook.com

