प्रीतपाल कौर की कहानी ‘खिड़की की आँख’


प्रीतपाल कौर एक जमाने में एनडीटीवी की एंकर थीं. संवेदनशील पत्रकार प्रीतपाल कौर की एक संवेदनशील कहानी- मॉडरेटर 
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खिड़की के बाहर का चौकोर आसमान का टुकड़ा खिड़की जितना ही बड़ा है. लेकिन इसमें से भी पूरा आसमान नहीं दिख रहा. दरअसल इस चौकोर खालीपन में जो मुख्य भरावट है वह है, हरेभरे लहकते मदमाते अनार के पेड़ की शाखाएंआकाश तो बस इन शाखाओं के हरे पत्तों और दहकते केसरिया रंग के फूलों के बीच कभी कभी अपनी एक झलक सी दिखा जाता है. हल्की मोटी शाखाओं पर टंकी पत्तियां देख कर दीप्ति को महसूस होने लगता है कि बाहर हवा चल रही होगी. लेकिन इस बात से उसे कोई आश्चर्य नहीं होता. यहाँ इस शहर में जब हवा न चले तो आश्चर्य होता है.
एकाएक एक डाली बड़ी जोर से हिल उठी. दीप्ति ने चौंक कर हल्का सा उठने की कोशिश की और अपनी कोहनी तकिये से टिका अधलेटी हो गयी. आश्चर्य से उसने देखा, जाने कहाँ से एक काला लम्बा सा चूहा पेड़ की एक पतली सी डाल पर लगा छूटा कच्चा हरा अनार कुतर रहा है. चूहा और पेड़ पर? यूँ दिन दहाड़े… ?
दीप्ति ने उसके ध्यान अपनी तरफ करने के लिए जोरजोर सेशी……” की आवाज़ की. मानों कह रही हो—“अरे भाई! तुम कैसे चूहे हो? जो ओएद पर चढ़कर अनार खाते हो. मैंने तो तुम लोगों के बारे में कहीं भी ऐसा न पढ़ा न सुना. ज़रा अपने चेहरा तो इधर करो.”
उस चूहे ने न जाने दीप्ति की आवाज़ से या अपने ही पेट से दिमाग की ओर पहुंचाते संकेतों से प्रेरति हो कर अनार कुतरना छोड़ कर खिड़की की ओर मुंह किया. ऐसा करते ही झटके से उसने जो देह घुमाई तो उसकी पीठ पर की लम्बी सामानांतर गहरीहल्की धारियां दीप्ति को दिख गयीं.
धत तेरे कीपहती वह फिर दायीं कोहनी का सहारा छोड़ कर अपने बिस्तर पर सीधी लेट गयी. ‘किटकिटक्रमशः धीमी होती गयी और उसे सुनायी देने लगी गौरैया की चींचीं……. मार्च का  खुशगवार मौसम दीप्ति को बेहद पसंद है. अगर बुखार में जकड़ी देह को लेकर बिस्तर में पड़े रहने को मजबूर न हो तो….
उसने दायीं दीवार पर लगी क्लॉक पर नज़र डाली, साढ़े ग्यारह बजे थे. बाहर खिड़की की चौखट में झूमते अनार के पेड़ के पत्तों पर धुप झिलमिलाने लगी है. इसकी चमक में वे पत्ते हलके हरे हो कर पारदर्शी से हो आये हैं. दीप्ति को लगा जैसे उनमें बहता रस उए दिखायी देने लगा है.
पत्तों की कोशिकाओं की शिराओं में बहते रस की आवाज़घू घूकरती उसके कानों में गूंजने लगी. चिड़िया कीचीं चींऔर दूर रसोईं में हो रही बर्तनों की खटपट के साथ मिल कर यहघू घूउसे बेहद परेशान करने लगी. सिर में बेतरह दर्द हो आया. उसने आँखें बंद कर ली.
अपने सामने के चौकोर खिडकी देखते उसे याद आया पिछले हफ्ते उसके पीछे की सीट पर बैठी निवेदिता नेसरकी नयी भड़कीली चेक की कमीज़ पर बड़ा कसावदार व्यंग्य किया था. आसपास बैठी सभी लड़कियां इसका मज़ा ले रही थी. पर शायद दीप्ति के चेहरे का हास्य कुछ ज्यादा ही मुखर हो आया था. ‘सरकी दहाड़ भरीस्टैंड अप दीप्तिपर वह बिना एक पल गवाए खडी हो गयी थी.
बहुत देर तक सर इस हंसी के रहस्य को जानने के प्रयत्न में वाक्यों और प्रशनों का प्रहार उसकी पर करते रहे और वह सर झुक कर सूखे गले से थूक निगलती खडी रही थी. सहपाठियो के अपराध का घनीभूत हुआ लबादा अपने ऊपर ओढ़े , उन प्रहारों को झेलतीसर का धर्य शीघ्र ही छूट गया था और उन्होंने अपने स्वर में से मुलामियत को छान कर अपने पास रखते हुए उसी दहाड़ से भरा आदेश दिया था,” गेट आउट ऑफ़ माय क्लास“.
वैसे ही सिर झुकाए, अपमान से दहकता लाल भभूका चेहरा लिए बैग को लगभग घसीटती सी वह बाहर चली आयी थी. दत्ता सर जब दहाड़ते हैं तो उनकी मूंछे फडकने लगती हैं, आख्ने चौड़ी हो जाती हैं, माथे पर बल पड़ने लगते हैं, बिलकुल गिलहरी की पीठ पर पडी धारीओं जैसे….
चौकोर खिड़की से झांकता दत्तासरका चेहरा धीरेधीरे बदलने लगाकुछ देर में ही सामानांतर रेखाएं टेढ़ीमेढ़ी होती हुयी आपस में गड्डमड्ड हो गयीं. दीप्ति ने देखा, वहां गिलहरी का बड़ा सा चेहरा , बहुत बड़ा, खिड़की के फ्रेम से कुछ ही छोटा, फ्रेम पर टिका उसके कमरे ला जायजा ले रहा हैशायद गिलहरी अपने खाने के लिए कुछ ढूंढ रही थी.
लेकिन इतनी बड़ी गिलहरी के लायक यहाँ भला क्या होगा? यही सोच कर दीप्ति ने उसे टोका,”अरे सुनो, क्या चाहिए तुम्हें?”
गिलहरी की पलक रहित गोलमटोल आँखें निर्निमेष 
 
कमरे में टंगे पिछले साल के कलेंडर पर टिकी थी, जिसमें तरबूज की एक फांक का खूबसूरत चित्र छपा था. चित्र में तरबूज के बीज कई अलगअलग रंगों में थे.
चौंक कर गिलहरी ने दीप्ति की तरफ देखा और बोली,” यह भला कैसा तरबूज है? मैंने तो कई तरबूज  खाए हैं. ऐसे बीजों वाला तरबूज कहीं नहीं होता.”
ऐसाहै, जहाँ तक मैं समझती हूँ, असली तरबूज में नकली बीज लगा कर यह तस्वीर खींची गयी है.  ” एकएक शब्द स्पष्ट बोलती, बात को समझा कर कहती दीप्ति की भंगिमा में थोड़े से दत्ता सर आ गए.
चिढ़ाते से स्वर में गिलहरी ने कहा,” जहाँ तक मैं समझती हूँ……….क्या समझती हो तुम? अपनेआप को क्या समझती हो तुम? “
उसके इस अचानक आक्रमण से दीप्ति घबरा गयी.
नहीं. ऐसा कुछ नहीं है. मैं खुद को वही समझती हूँ जो कि मैं हूँ.”
क्याहो तुम? ज़रा मैं भी तो सुनु?”
मैंदीप्ति हूँ. “गिलहरी के साथसाथ वह स्वयं अपनेआप को भी विश्वास दिलाना चाहती था.
क्याहोती है दीप्ति? मुझे तो तुम एक अच्छी खासी लडकी दिखाई पड़ती हो. क्यूँ अपने आग को आग कहती फिरती हो? “गिलहरी के स्वर में डांट स्पष्ट थी.
यहमेरा नाम है.” दीप्ति रुआंसी हो आयी थी.
नाम?” गिलहरी ने कास के ठहाका लगाया और उसकी मूंछों के बाल खतरनाक ढंग से ऊपरनीचे होने लगे.
तुमआदमी लोग बड़े वाहियात  होते हो. पैदा होते हो, नामा रख देते हो, फिर जाति चुन लेते फिर आपस में लड़ना शुरू कर देते हो. अपनेआप को एक लडकी कहने में शर्म आती है तुम्हें? “
नहींमुझे क्यूँ शर्म आयेगी भला? पर मेरा कोई नाम तो होना चाहिए ना. वर्ना मेरी पहचान क्या होगी?”
दीप्ति के स्वर में स्वभिनाम आया तो स्वर ऊंचा और कठोर हो गया. यह दो टके की गिलहरी…. क्या सोच कर अकडती चली जा रही है?
क्यूँहोनी चाहिए पहचान? मेरा तो कोई नाम नहीं. मुझे तो इससे कि परेशानी नहीं होती.”
क्यूंकितुम गिलहरी हो, लडकी नहीं.”
तुम्हारेयहाँ तो लड़कों के भी नाम सुने हैं मैंने.”
दीप्ति ने अपने सिर पकड़ लिया.
कैसी…. गिलहरी हो तुम? लड़कियों की तरह लड़कों की भी तो पहचान होनी चाहिए कि नहीं? ” उसका स्वर नर्म हो आया और अंदाज़ में फिर दत्ता सर झलक गए.
ठीकहै. होती होगी. मैं तुमसे बहस करने तो आयी नहीं.”
तोकिसलिए आयी हो?”
तुममनुष्य वाकई वाहियात होते हो. बात करना तक तो आता नहीं.”वह फिर व्यंग्य से मुंह बिचकाने लगी थी.
मुझेबात करना तुम सीखोगी?” दत्ता सर दीप्ति के कंठ में दहाड़ उठे.
तुम्हेंक्या कोई बता करना सिखाएगा? तुम्हें तो कैसी भी तमीज नहीं.”
गिलहरी जोरजोर से किटकिट करने लगी. उसकी लम्बीलम्बी मूंछे होटों के हिलने के साथ ही ऊपरनीचे होती बारबार खिड़की के पल्ले पर सरकती सर्ररसर्रर करने लगी. दीप्ति को लगा जैसे मिट्टी से सने फर्श पर कोई लोहे का भरी संदूक खींच रहा हो.
सर्ररसर्रर की लगातार चलती तरंग उसके भेजे को चीरती आरपार जाने लगी. दर्द से तिलमिलाते उसने अपने माथे को दांयें हाथ की अंगुलिओं से जोर से दबाया.
तुमकहना क्या चाहती हो?क्यूँ लड़ने आयी हो मुझसे?”
हमगिलहरियाँ तुम जैसी नहीं होतीं. हम किसी से लडाई नहीं करती. समझी तुम. ” उसकी किटकिट और तेज़ हो गयी. और मूंछों की रगड़ खाने की आवाज़ अपनी सीमा लांघ चली.
सिर पर हाथ रखेरखे दर्द से तिलमिलाते क्षीण स्वर में दीप्ति ने कहा,” अच्छा! अब तुम साफ़साफ़ बताओ क्यों आयी हो यहाँ?”
क्यूँआयी हूँ? अपने ही कम से आयी हूँ. तुमने मुझे दावत पर तो बुलाया नहीं.” सर्ररसर्रर के आवाज़ बदस्तूर जारी थी.
दीप्ति दर्द के मारे बेहाल कुछ बोल नहीं पाई. उसने हाथों से अपने माथे को भींच लिया.
तुमनेमेरे बेटे को क्यूँ चिढ़ाया था?” उसकी किटकिट भी अब सीमा पार कर चुकी थी.
तुम्हाराबेटा? कौन…..? किसकी बता कर रही हो तुम….?”
दीप्ति अपना सर दर्द भूल गयी. विस्फारित आँखों में विस्मय और प्रश्न अटक गए. यह गिलहरी और इसका बेटा ? उसे कुछ समझ नहीं आया.
हाँ, मेरा बेटा. यहाँ इसी दाल पर बैठा अनार खा रहा था. तुमने उसे चिढ़ा कर भगा दिया. क्यूँ? जवाब दो मुझे.”
गुस्से से उसकी नाक ऊपरनीचे होने लगी. आँखों से चिंगारियां निकलने लगीं. चेहरा बड़ा और बड़ा होने लगा.
दीप्ति एकाएक सकपका गयी. अपना बचाव करने की बता मन में आयी तो सिर का दर्द भूल गया.
लेकिनमैंने तो उसे डराया नहीं…. मैं तो उससे बात करना चाहती थी.” दीप्ति का क्षमा याचना में डूबा स्वर कांपने लगा.
क्यूँबात करना चाहती थी तुम उससे? छोटेछोटे बच्चों से बात करने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं.”
बच्चोंसे बात करने में अधिकार की बता कहाँ से आ गयी?” दीप्ति फिर तल्ख़ हो आयी.
मैंकहती हूँ इसलिए.”
क्यूँकहती हो ऐसा? हम लोग तो अनजान बच्चों से अक्सर बात  कर लिया करते हैं.”
तुममनुष्य तो होते ही ऐसे हो, वाहियात. ” तीसरी बार उसने वहियात्त शब्द के इस्तेमाल किया तो दीप्ति को लगने लगा कि सच ही मनुष्य वाहियात होते हैं.
थोड़ी देर चुप्पी छाई रही. दीप्ति ने सोचा शायद गिलहरी का गुस्सा शांत हो गया है और फिर यह लड़ने भी तो नहीं आयी. उसका सर दर्द कम होने लगा. उसने माथे पर से हाथ हटा लिए लेकिन गिलहरी की किटकिट फिर गूँज उठी.
लेकिनहम गिलाहरिओं में ऐसा बिलकुल नहीं चलता. क्यूँ डराया तुमने मेरे बेटे को…..? क्यूँ? जवाब दो…..क्यूँ डराया तुमने? “
गिलहरी लगातार यही प्रश्न करने लगी. उसका स्वर कमरे की दीवारों से प्रतिध्वनित होता दीप्ति के कानों को गुंजाने लगा. माथे की ढीली पडी शिराएँ फिर तन उठी. सर से दर्द की फिर एक तीखी लहर गुज़र गयी.

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