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  • कथा-कहानी
  • व्यंग्य
  • आधुनिक मत्तविलास प्रकरण

    पल्लव वंश के राजा सिंहविष्णु वर्मा के पुत्र महाकवि महेन्द्रविक्रम वर्मा (प्रथम) ‘मत्तविलास’ नामक प्रहसन के प्रणेता हैँ। इतिहासकार उनके शासनकाल का समय ६०० ईस्वी से ६३० ईस्वी का निश्चय करते हैँ। प्रस्तुत प्रकरण सुप्रसिद्ध संस्कृत प्रहसन ‘मत्तविलास प्रहसन’ को श्रद्धाञ्जलि स्वरूप अर्पित है। प्रस्तुत कथा मूल पाठ को बनाए रखती है और विक्षेप केवल आधुनिक सन्दर्भोँ का है, इसलिए इस कथा का श्रेय भी महाकवि महेन्द्रविक्रम वर्मा को ही दिया जाना चाहिए। शेष जो भी अन्तर प्रकट है वह प्रचण्ड प्रवीर के सौजन्य से है। इस प्रकरण का एक उद्देश्य मूल कथा को सञ्ज्ञान मेँ लाना भी है।

    *********

    [नई दिल्ली मेँ प्रसिद्ध खान मार्केट मेँ किसी एक बीयर बार मेँ कपाली का अपनी गर्लफ्रेण्ड सङ्ग प्रवेश होता है।]

    कपाली – (झूमते हुए) प्यारी देवसोमा। यह सत्य है कि तपस्या के द्वारा इच्छानुसार रूप उपलब्ध होते हैँ। क्योँकि तुमने भी चाँद-तारे, बादल-बिजली, फूल-पत्ती, प्रगतिवाद-नारीवाद करते-करते एक कवयित्री का दर्ज़ा पा ही लिया। और इस तरह तुम भी आकर्षक कपड़ोँ मेँ लिपटी वैसी कामिनी बन गयी हो, जिस पर सभी छोटे-बड़े आलोचक भोग्या सम दृष्टि रखते हैँ।

    देवसोमा – भगवन्! मुझे आप कवयित्री कहते हैँ? आप तो स्वयं एक बड़े कवि हैँ। ऐसा कहने का अर्थ यह प्रतीत होता है कि आप पर नशा चढ़ गया है वरना आपका शरीर यूँ झूम न रहा होता और अपने सामने आप किसी अन्य की प्रशंसा कभी न करते। एक कवि का दूसरे समकालीन कवि की झूठी प्रशंसा तक करना केवल नशे मेँ ही सम्भव है, क्योँकि हमारे युग का धर्म ही सभी को गालियाँ देने का है। आप मतवाले जान पड़ते हैँ प्रभु।

    कपाली – क्या मैँ ही मतवाला हूँ?
    देवसोमा– भगवन्! सारी पृथ्वी घूम रही है, घूम रही है। मानोँ सामने अब मैँ आपकी प्रशंसा सुन कर आपके चरणोँ मेँ गिरी जा रही हूँ। इसलिए मुझे सँभालिए।

    कपाली – प्यारी, अच्छा (गिरते हुए को सहारा देने का प्रयास करते हुए दूसरी तरफ आगे बढ़ कर)। देवसोमा, क्या तुम क्रोधित हो गई कि सहारा देने के लिए पास मेँ आए हुए मुझसे तुम छिटकी दूर चली जा रही हो?
    देवसोमा – आश्चर्य है कि सोमदेवा क्रोधित है और तुम्हारे द्वारा पाँव पड़ने पर भी दूर होती जा रही है।

    कपाली– क्या तुम ही सोमदेवा हो? (सँभल कर, पलट कर) सोमदेवा नहीँ, देवसोमा।
    देवसोमा – स्वामी, क्या वैसी प्यारी सोमदेवा को मेरे नाम से पुकारोगे?
    कपाली – प्यारी, पदोँ के हेरफेर मेँ मेरा प्रमाद है, तुम्हारा अपराध नहीँ। आज मदिरा पान से मुझपर ऐसा प्रभाव हो रहा है। अच्छा-अच्छा, आज से मदिरा बन्द केवल बीयर चालू।
    देवसोमा – नहीँ नहीँ, मेरे कारण आप इतना बड़ा बलिदान न दीजिए। जब तक आप मदिरापान न करेँगे आप कुछ नया कैसे लिख पाएँगे? क्योँकि:–
    महाकवि वह है जो नवीन कल्पनाओँ की सृष्टि करे और प्राचीन मेँ नवीनता का रङ्ग देकर अधिक आह्लादक बना दे। अतः हे स्वामी, आपको नवीन सृजन के लिए मदिरा का त्याग कदापि न करेँ।
    कपाली – सत्य कहती हो। गुटखा खाने वाले और गुटखे वाले साहित्य समारोह मेँ जाने वाले साहित्यकार वस्तुतः मिथ्यादृष्टि वाले मात्र लिक्खाड़ हैँ। क्योँकि:–
    कविता न करना ठीक है पर कुकवि होना ठीक नहीँ। वह सजीव मरण है।
    देवसोमा – पाप शान्त हो, शान्त हो।
    कपाली – पाप शान्त हो, शान्त हो। वे पापी निन्दापरक मुँह से कुछ भी कहने लायक नहीँ हैँ; जो दिनरात सोशल मीडिया पर अलाई-बलाई लिखते हैँ, हर ऐसी-वैसी पोस्ट पर शुभकामना संदेश और बधाई चेपते हैँ, हर पुरस्कार को मुँह बाए रहते हैँ, जो स्वयँ कुछ नवीन करने की अपेक्षा दूसरोँ पर कुदृष्टि रखते हैँ, वे अपने पापपूर्ण आचरण से सर्वसाधारण को भ्रमित कर रहे हैँ। जो लिक्खाड़ होते हैँ, उनका कार्य ही यही है कि वे सत्य और मिथ्या मेँ अन्तर मिटा देना चाहते हैँ। इसलिए इस समय निन्दित साहित्यकारोँ का नाम लेने से अपवित्र हुई अपनी जीभ को मैँ विदेश से आयातित वोदका से धोना चाहता हूँ।
    देवसोमा – इसीलिए इस समय हम दोनोँ दूसरे मदिरालय मेँ चलेँ।
    कपाली – प्रिये, ठीक है।

    (दोनोँ गली मेँ घूमते हैँ)

    कपाली – अहो, इस खान मार्केट की विभूति वर्णनातीत है। बस तीन खटारा गलियोँ मेँ बसा बाजार, जिसकी भूमि टूटी-फूटी है, जहाँ जगह-जगह ढँका-खुला मेनहोल हैँ, राह के दोनोँ किनारे पर सौ साल पुरानी बदहाल इमारतेँ हैँ, फिर भी यह दिल्ली के बिगड़े रईसोँ की अय्याशी का अड्डा है। यहाँ नगर की श्रेष्ठ रमणियाँ और कमसिन युवतियाँ सौन्दर्य प्रर्दशन करने आँखोँ पर चश्मा चढ़ा कर आती हैँ। यहाँ आवारा लड़के अपनी आवारगी को ‘स्टैण्डर्ड’ देने मात्र सिगरेट फूँकने आया करते हैँ और अपना फेफड़ा खराब करते हैँ चरित्र नहीँ। यहाँ शराबखानोँ मेँ कोई हिन्दी नहीँ बोलता, क्योँकि वह शर्म की भाषा है। पर देवसोमा, इसी खान मार्केट से एक चोर रास्ता निकलता है, जो सीधे ‘इण्डिया इण्टरनेशल सेन्टर’ को जाता है। सुना है वहाँ का रस-रञ्जन अद्भुत होता है। न जाने कब मुझे वहाँ जाने का सौभाग्य मिलेगा?”

    देवसोमा – मिलेगा भगवन्। आप जैसे प्रतिभाशाली कवि को नहीँ मिलेगा तो किसे मिलेगा?
    कपाली – देवसोमे, देखो, देखो। यह शराबखाना लोकप्रसिद्धि का ही अनुकरण कर रहा है। यहाँ प्रवेश पाना, फेसबुक पर ‘ब्लू टिक’ पाने के समान है। यहाँ की परिचारिकाओँ से मदिरा पात्र मेँ प्राप्त करना ही सोशल मीडिया के अनुसरणकर्ताओँ की अनुकूल टिप्पणियाँ हैँ। यहाँ का चखना ही ‘लाइक्स’ हैँ। यहाँ की बढ़िया स्कॉच पीना मानोँ ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ पा लेना है। यहाँ ‘हैप्पी आवर्स’ से लेकर देर रात तक लगातार पी कर धुत्त हो जाना ही ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ है। यहाँ का शूल्यमांस (बार्बेक्यू) खाना ही फाउण्डेशन की प्रायोजित पेरिस यात्रा सम सुख है। यहाँ के मालिकोँ से अटूट दोस्ती के फलस्वरूप यहाँ निरन्तर मिलता निर्बाध आसन ही ‘बुकर इण्टरनेशनल प्राइज’ है।

    देवसोमा – वाह! वास्तव मेँ आप कल्पनाशील कवि हैँ।
    कपाली – देवसोमा। कवि तीन तरह के होते हैँ:– १. शास्त्र कवि २. काव्य कवि ३. उभय कवि। मैँ तो केवल उत्कृष्ट काव्य कवि हूँ। अब हम दोनोँ इस मदिरालय मेँ जाएँगे और अपने ही प्याले मेँ छक कर मदिरा पिएँगे। प्यारी, मेरा कपाल कहाँ है?
    देवसोमा – मैँ भी नहीँ देख रही।
    कपाली – (ध्यान लगा कर) अहो, उसी बीयर बार मेँ छोड़ दिया। ऐसा अनुमान है। अस्तु, हम दोनोँ लौट कर देखेँ।

    (दोनोँ लौट कर देखते हैँ।)

    कपाली – यहाँ भी नहीँ दिखाई दे रहा है! (विषाद का अभिनय करता है)
    अरे खान मार्केट के चाहने वालोँ! क्या आप लोग ने भी मेरा बीयर मग नहीँ देखा? क्या कह रहे हैँ नहीँ देखा? अरे, बीयर हो या दारू, वोदका हो या रम, अपनी खोपड़ी सदृश मग मेँ ही पेय पीता हूँ। वह कपाल जैसा मग मुझे प्राग से एक चाहने वाले ने मेरी कविता का जर्मन अनुवाद पढ़ कर भेजा था। अब मैँ कैसे कपाली कहलाऊँगा? मेरा संसार लुट गया। साहित्यिक करियर तबाह हो गया। हा दुःख, हाः दुःख।
    जिस पवित्र मग से मैँने बीयर पान किया, मदिरा पान किया, कभी-कभी गर्म पानी से स्नान भी किया, उस कपाल मग ने मेरा बड़ा उपकार किया था। आज उसका बिछोह मुझ को पीड़ा दे रहा है।
    [गिरते हुए अपना माथा ठोक कर] अच्छा, कपाल तो चिह्न था, फिर भी कपाली नाम से मैँ विछिन्न कहाँ हूँ। अब भी सोशल मीडिया वाले मुझे कपाली ही कहेँगे। [खड़ा होता है।]

    देवसोमा – नाथ, आखिर किसने आपका कपाल ले लिया?
    कपाली – प्यारी देवसोमा, कपाल के अन्दर बार्बेक्यू का टुकड़ा लिपटा था। हो सकता है जब मैँ यहाँ से निकल रहा होऊँगा तब उसे किसी कुत्ते ने या कुत्ता करने वाले ने उठा लिया होगा।
    देवसोमा – इसलिए उसे खोजने के लिए हम दोनोँ सम्पूर्ण खान मार्केट का चक्कर लगाते हैँ।
    कपाली – प्यारी, ऐसा ही करते हैँ।

    [दोनोँ घूमते हैँ]

    [इसके बाद कन्धे पर झोला लटकाए चर्चित साहित्य संयोजक ‘आरारार’ प्रवेश करता है।]

    आरारार – सभी कुत्ता करने वालोँ के लिए मञ्च दे कर, लटकोँ-झटकोँ वालोँ के हाथोँ मेँ माइक पकड़ा कर, जीवन के अन्य क्षेत्रोँ मेँ घोर असफल लोग को मौका देने वाले साहित्यिक फाऊण्डेशनोँ की महिमा अद्भुत है। जिस लिट-फेस्ट मेँ मैँने जब चाहा अपना कुत्ता पढ़ा और वाहवाही लूटी। किसी ने कभी किसी कुत्ते का औचित्य पूछा तो कुत्ते को ‘मार्मिक कविता’ कहकर पूछने वाले के कठोर हृदय को लानत दी। अभी फाउण्डेशन की दया से मिले रुपयोँ से दिन के ‘हैप्पी आवर्स’ मेँ छक कर ह्विस्की पीयूँगा। (परिक्रमा कर के अपने मन मेँ) अत्यन्त दयालु पियक्कड़ धनी चित्रकारोँ ने अपने जीवन के सन्ध्याकाल मेँ साहित्यकारोँ के लिए खैराती फाउण्डेशन और नकली प्रकाशन बनाया। उन फाउण्डेशनोँ ने दूर दराज से भेड़-बकरियोँ को साहित्य का चारा खिलाया और सार्वजनिक रूप से जुगाली की। क्या दूरदर्शी फाउण्डेशन वालोँ ने होटलोँ मेँ निवास, सुन्दर सेज लगे पलङ्गोँ पर शयन, पहले प्रहर मेँ पराँठा-मक्खन का नाश्ता, अपराह्म मेँ मीठे जूसोँ का पान, गर्मीँ मेँ एसी की ठण्डी हवा और रस-रञ्जन की व्यवस्था करते हुए क्या प्रायोजित राइटर्स रेसीडेन्सी मेँ स्त्री-सङ्ग का विधान भी नहीँ किया होगा? ज़रूर किया होगा! अवश्य ही इन निरुत्साही तथा दुष्ट वृद्ध आयोजकोँ ने हम नवयुवकोँ से डाह कर लिट-फेस्ट और रेसीडेन्सी नियमावली से स्त्री-सङ्ग का विधान को अलग कर दिया है—ऐसा मैँ समझता हूँ। मैं इस भूल को सुधारूँगा। ऐसा गड़बड़ी उजागर करके मैं फाउण्डेशन वालोँ का बहुत बड़ा उपकार करूँगा, ताकि वे साहित्यकारोँ की सेवा कर सकेँ।

    [घूमता है]

    देवसोमा – स्वामी, देखो, देखो। रईसजादोँ के आने-जाने वाले इस खान मार्केट मेँ, फैब इण्डिया का कुर्ताधारी वह पुरुष अपने सभी अङ्गोँ को सिकोड़ कर दोनोँ तरफ देखता हुआ तथा भयभीत होकर पैर रखता हुआ जल्दी-जल्दी जा रहा है।
    कपाली – प्यारी, हाँ, मुझे भी ऐसा लगता है। देखो, देखो उसके कन्धे पर लिट-फेस्ट की छाप वाला एक झोला भी है जिसके भीतर कोई गोल चीज रखी मालूम होती है।
    देवसोमा – स्वामी, इस कारण उसके पास जाकर उसे लेकर हम दोनोँ समझेँ।
    कपाली – प्रिये, ऐसा ही हो। (समीप मेँ जा कर) ऐ कुत्ता करने वाले! रुको, रुको।

    [पीछे मुड़कर और देख कर ] आरारार – कौन मुझे इस तरह पुकारता है? अरे, यह तो दुष्ट कपाली महाकवि है, जिस पर दो फाउण्डेशन, तीन प्रकाशन और अनगिनत वेब पत्रिकाओँ ने अघोषित बैन लगा रखा है। अस्तु, मदिरा के नशे मेँ रहने वाले इस दुष्ट के सामने न होऊँगा।

    [शीघ्रता से जाता है।]

    कपाली – प्यारी, अहा। मैँने अपना कपाल वाला मग पा ही लिया! क्योँकि मुझे देख कर भय के कारण इसका यूँ भागना ही चोरी का प्रमाण है। (जल्दी से पास मेँ जाकर आगे से रोकता है।) अरे धूर्त! अब कहाँ जाओगे?
    आरारार – नहीँ, नहीँ ऐसी कोई बात नहीँ है। अरे यह क्या (मन ही मन), इसकी गर्लफ्रेण्ड बड़ी सुन्दर है!

    कपाली – ऐ कुत्ता करने वाले, दिखाओ जो तुम्हारे झोले के भीतर है।
    आरारार – इसमेँ क्या देखने लायक है? यह तो एक मामूली बीयर का मग है।
    कपाली – वाह! इसीलिए, इसीलिए तो मैँ इसे देखना चाहता हूँ।
    आरारार – ओह! नहीँ, नहीँ। इसे छुपाए हुए ही ले जाना चाहिए।
    कपाली – ठीक ही है। इस प्रकार कुकर्म छिपाना ही तुम्हारे फाउण्डेशन का धर्म है।
    आरारार – यह ठीक है।
    कपाली – सत्य तो मैँ कहता ही रहता हूँ। अब तुम उसे अपने मुख से पुकार कर पुण्य के भागी बनोँ क्योँकि जो सत्य वचन कहता है वह अपने पापोँ को क्षीण करने वाला महान् पुण्य अर्जित करता है।
    आरारार – अब तक मजाक हुआ। ‘हैप्पी आवर्स’ का समय निकला जा रहा है। मैँ जाता हूँ। (प्रस्थान करता है)
    कपाली – अरे धूर्त! कहाँ चले? मेरा कपाल दो। (कुर्ते का कोना पकड़ता है)
    आरारार – (झट से मोबाइल से फोटो खीँच कर) मैँ इस निन्दनीय व्यवहार को सोशल मीडिया पर लगाऊँगा और फौरन सौ ‘लाइक्स’ पाऊँगा।
    कपाली – नीचे कैप्शन लिखना कि चोरी करते हुए पकड़ा गया हूँ। वैसे तो मैँ नकलची ही था, अब चोरी भी करने लगा। देखो, चोरी करने मेँ तुम पेशेवर ही हो। क्योँकि :–
    जिसने साहित्य की परम्परा के सभी बड़े कवियोँ की रचना से देखते-देखते ही अपना कोश भर लिया है अर्थात् जिस तरह कोई व्यक्ति डाका डालकर किसी के धन को ग्रहण कर मालदार बन जाता है उसी प्रकार फाउण्डेशनोँ ने भी पूर्वजोँ और दूसरोँ के कवि-कर्म को डिजिटाइज़ करके अपनी वेबसाइट भर ली है।
    आरारार – ओह पाप शान्त हो, पाप शान्त हो।
    कपाली – भला इस प्रकार के सुन्दर आचरण वाले कवि का पाप क्योँ न शान्त हो!
    देवसोमा – स्वामी, थके से लगते हो। यह कपाल सरलता से प्राप्त नहीँ होने वाला। इसीलिए बीड़ी को सुलगा कर दो कश लो या गुटखा फाँक कर, स्थितचित्त होकर इसके साथ विवाद करो।
    कपाली – ऐसा ही हो। सार्वजनिक रूप से बीड़ी पीने मेँ इमेज खराब होगी, तुम गुटखा निकालो।

    [देवसोमा कपाली को गुटखा का पाउच फाड़ कर देती है।]
    कपाली – (गुटखा खाकर) प्यारी, तुम भी तनिक गुटखा खा लो।
    देवसोमा – स्वामी, ऐसा ही करती हूँ। (खाती है।)
    कपाली – यह हमारा अपकार करने वाला है। किन्तु सिद्धान्त तो बराबर-बराबर बाँट लेने का है। इसीलिए बचे हुए को इस कुकवि को दे दो।
    देवसोमा – जो आप आज्ञा देते हैँ। आप ग्रहण करेँ।

    आरारार – (अपने मन मेँ) अहो, अभ्युदय तो अनायास ही प्राप्त हुआ। दोष इतना ही है कि कोई देख कर फोटो खीँच कर सोशल मीडिया पर डाल देगा। (प्रकट रूप से) देवि। नहीँ, ऐसा नहीँ। हमारे यहाँ ये सब नहीँ चलता। (ओठ चाटता है।)
    देवसोमा – तुम नष्ट हो जाओ। तेरा इतना सौभाग्य कहाँ?
    कपाली – प्यारी, मुख मेँ पानी भर आने के कारण इसकी यह वाणी इच्छा के विपरीत मालूम होती है।
    आरारार – अब भी तुझे दया नहीँ है!
    कपाली – यदि दया ही रह गयी तो मैँ वीतरागी कैसे होऊँगा? एक महाकवि को आवारा, यायावर, पियक्कड़ और वीतरागी ही होना चाहिए। आवारगी से जाँघें दृढ़ हो जाती हैँ। आत्मा भी मज़बूत और फलग्राही हो जाती है और उसके सारे पाप पथ पर ही थक कर नष्ट हो जाते हैँ। तभी वह वीतरागी बन पाता है।
    आरारार – वीतरागी व्यक्ति को भी दयालु होना चाहिए।
    कपाली – यदि मेरा कपाल के चिह्न वाला मग दे दोगे तो शान्त हो जाऊँगा।
    आरारार – तेरा अपना क्या है?
    कपाली – कपाल!
    आरारार – कैसा कपाल?
    कपाली – ‘कैसा कपाल?’ ऐसा कहते हो। अथवा यह ठीक ही है :–
    काम, क्रोध, लोभ, मोह को बढ़ाने वाले; आइडेन्टिटी का झूठा परचम लहराने वाले, काम पिपासा को ही अपनी पहचान बताने वाले; धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, धी, विद्या, सत्य, नीति, त्याग और आर्जवता को छुपाने वाले; तुम टैक्स की चोरी करने वाले तथा विदेशी पैसे पर फलते-फूलते फाउण्डेशन के कर्मचारी इस छोटे-से कपाल को छिपा देने मेँ क्योँ नहीँ समर्थ हो?
    देवसोमा – महाकवि, यह केवल प्यार से नहीँ देगा। इसलिए महाबली बन के इसके हाथ से छीन कर के चलेँ।
    कपाली – प्यार, तुम ठीक कहती हो। (जबरदस्ती लेने के लिए तत्पर होता है)
    आरारार – दुष्ट कपाली, तू नष्ट हो जा। (हाथ से पकड़ कर पैर से मारता है)
    कपाली – ओह, मैँ गिर गया।
    देवसोमा – आह… तुम्हारे गिरने से तो मैँ मर गयी।
    आरारार – उठो, उठो देवी। (इसके बाद देवसोमा को उठाता है।)
    कपाली – खान मार्केट के लोग, देखो, देखो इस दुष्ट कवि को जो मेरी गर्लफ्रेण्ड का हाथ पकड़ रहा है। (चिल्लाता है) देखो, देखो।
    आरारार– अरे! नहीँ ऐसा नहीँ है। हमारा धर्म ही है कि आपत्ति मेँ पड़े हुए पर दया करना। जो कहीँ नहीँ छपेँ हो उनको छापना। जिन्होँने कभी मञ्च ना पाया हो उनको मञ्च देना। जो कहीँ भी गिरेँ हो उनको उठा कर सिर पर बिठाना।
    कपाली – क्या यह भी फाउण्डेशन की नीति है, क्योँकि पहले तो मैँ गिरा था (पहले मुझे उठाना चाहिए था।) अब तो तेरे सिर का कपाल ही मेरा बीयर का मग बनेगा।

    [आपस मेँ कलह करने लगते हैँ।]

    आरारार – दुःख है, दुःख है।
    कपाली – ऐ खान मार्केट के अमीरजादोँ, अमीरजादियोँ। देखो देखो! यह दुष्ट कुत्ता करने वाले मेरा बीयर का मग चुरा कर स्वयं चिल्लाता है। अच्छा मैँ भी चिल्लाऊँगा। चोर चोर। मारो, मारो।

    [इसके बाद बुद्धिजीवी का प्रवेश होता है, जो हर फटे मेँ साधिकार अपनी टाँग अड़ाता है।]

    बुद्धिजीवी – (कपाली को सम्बोधित कर के) क्योँ चिल्लाते हो?
    कपाली – भो बुद्धिजीवी! यह दुष्ट कुकवि मेरा बीयर का मग चुराकर मुझे देना नहीँ चाहता।
    बुद्धिजीवी – (अपने मन मेँ) जो हम न कर सके, उसे फाउण्डेशन के एक अदना कर्मचारी ने कर दिया। यह दुष्ट महाकवि… उसकी सुन्दर गर्लफ्रेण्ड जो मेरी प्रिया है, उसे उसने सम्मोहित कर रखा है। इसलिए इस समय प्रतिद्वन्द्वी के प्रोत्साहन से न शत्रुपक्ष को नष्ट कर डालता हूँ। (प्रकट रूप से) भो आरारार! क्या यही बात है, जैसा कि यह महाकवि कह रहा है?
    आरारार – क्या तुम भी ऐसा कहते हो? तुम जो हमारे साथ इण्डिया इण्टरनेशनल सेन्टर मेँ विना किसी शुल्क के मध्यरात्रि तक रस-रञ्जन करते रहते हो, आज उसके प्रलाप को प्रमाण मान रहे हो? हम फाउण्डेशन वाले नकल करते हैँ परन्तु सीना तान कर। किसी की चीज़ उठाते हैँ तो सबको ज्ञापित कर। और तो और, नैतिकता वही है जो हम कहते हैँ। ज्ञान वही है जिस पर हमारी आस्था है। तर्क वही है जो हमारे अनुकूल है। मुझपर आरोप लगाकर तुम फाउण्डेशन विरोधी ही नहीँ, स्त्री विरोधी, विज्ञान विरोधी, प्रगति विरोधी, और महान पाखण्डी सिद्ध हुए। हम निष्पाप हैँ यह हमारा सिद्धान्त है।
    बुद्धिजीवी – कपाली, इनका ऐसा ही सिद्धान्त है। इसमेँ विरोध की क्या आवश्यकता?
    कपाली – अरे, हमारा भी कुछ न बोलना और झटके से टाँग तोड़ देना सिद्धान्त है।
    बुद्धिजीवी (कनपटी पर उँगली टकटका कर) – दोनोँ ही सिद्धान्त युक्तिसङ्गत हैँ। इसमेँ निर्णय का उपाय ही क्या है?
    आरारार – फाउण्डेशन के सिद्धान्त के अनुसार हम ‘हैप्पी आवर्स’ मेँ मदिरा पान कर सकते हैँ। दिन मेँ हम बीयर का सेवन कर सकते हैँ। इसके लिए मैँ अपने झोले मेँ बीयर मग रखता हूँ। इसके अलावा और क्या कारण है? काहे को रार मचाई, काहे को रार मचाई, छोड़ो भी यह निठुराई, काहे को रार मचाई।
    बुद्धिजीवी – केवल तुम्हारे सिद्धान्त की प्रतिज्ञा से तर्क का निगमन नहीँ हो सकता।
    कपाली – प्रत्यक्ष प्रमाण मेँ कारण की आवश्यकता नहीँ।
    देवसोमा – हे बुद्धिजीवी, तनिक बुद्धि का प्रयोग करेँ। इसके झोले मेँ कुछ गोल-गोल मग जैसी चीज है।
    बुद्धिजीवी – आपने सुना?
    आरारार – महाशय, यह बीयर मग किसी और का नहीँ, आरारार का है।
    कपाली – किसी और का नहीँ है तो दिखाओ।
    आरारार – अच्छा। (झोले से निकाल कर दिखाता है।)
    कपाली – देखो, देखो, देखने वालोँ देखो। कपाली के अन्याय और आरारार की सज्जनता को देखेँ।
    आरारार – फाउण्डेशन के दिए मग पर लिट-फेस्ट की मुहर भी है।

    [दोनोँ नाचने लगते हैँ।]

    आरारार – हाय, धिक्कार है। लज्जा के अवसर पर भी नाच रहा है।
    कपाली – अरे, कौन नाच रहा है? (चारोँ ओर देख कर) अहो, मेरे खोए हुए कपाल के दर्शन के कुतूहलवश वायु द्वारा प्रेरित इन मदिरालयोँ के विलासोँ मेँ इस आरारार नामक कुकवि को केवल नाच ही दीख रहा है। कुत्ता करते-करते इसे मतिभ्रम हो गया है।
    बुद्धिजीवी – (किञ्चित आश्चार्य से) यह कैसा आक्षेप है! कुत्ता करना क्या होता है?
    कपाली – वाह रे बुद्धिजीवी! इतना भी नहीँ पता? पहले शायर लोग शेर कहते थे। पहले कवि कविता करते थे। अब गिने-चुने लोग कविता करते हैँ और स्वयं को काव्य कवि कहते हैँ। काव्य कवि भी आठ तरीके के होते हैँ —  १. रचनाकवि २. शब्दकवि ३. अर्थकवि ४. अलङ्कारकवि ५. उक्तिकवि ६. रसकवि ७. मार्गकवि ८. शास्त्रार्थकवि। जो इनमेँ भी नहीँ आते और फिर भी किसी तरह के कवि होने का दम भरते हैँ, वे बाकी लोग जो आरारार जैसा स्वांग करते हैँ, वे वस्तुतः कुत्ता करते हैँ। ध्वनिविकास शास्त्र का सिद्धान्त है कि ‘व’ वर्ण वस्तुतः ‘उ’ वर्ण से व्युत्पन्न है। सो कविता – > कउइता – > कुइता हो जाता है। कात्यायन प्रातिशाख्य के अनुसार ‘इ’ के साथ ‘त’ वर्ण का संयोग सहज रूप से द्वित्व को प्राप्त होता है। अतः कुइता -> कुइत्ता – > कुत्ता बन गया है। अब प्रयोग के अनुसार यही शब्द उचित है जिसे शीघ्र ही शब्दकोश मेँ स्थान मिलेगा।

    बुद्धिजीवी (बनते हुए) – मुझे पहले से ही पता था। मैँ बुद्धिजीवी हूँ इसलिए भाषा विशेषज्ञ भी हूँ, साहित्यकार भी हूँ, आलोचक भी हूँ, इतिहासकार भी हूँ, राजनीति विशेषज्ञ भी हूँ, खेल विशेषज्ञ भी हूँ, कंस्लटेण्ट भी हूँ, चुनाव भविष्यवक्ता भी हूँ, साथ ही मैँ भी कुत्ता करता हूँ।
    आरारार – बताओ, बताओ, यह बीयर मग किस रङ्ग का है?
    कपाली – इसमेँ क्या कहना है, यह तो कौव्वे से भी काला मग है।
    आरारार – फिर तो यह मेरा है यह स्वयं सिद्ध हो गया ।
    कपाली – हाँ, एक रङ्ग से दूसरे रङ्ग मेँ रङ्ग देना सिद्ध हो गया। इसमेँ भी कपाल का चिह्न बना है। मुझे कपाल के आरूप का यह मग प्राग से एक विदेशी प्रशंसक ने जर्मन भाषा मेँ मेरी कविताओँ का अनुवाद पढ़ कर भेजी थी।
    देवसोमा – हाय, हाय मैँ अभागन नष्ट हुई। सभी सुन्दर लक्षणोँ से युक्त, पूर्णिमा के चन्द्रमा की भाँति दर्शनीय, जिससे बीयर की गन्ध आ रही है, इसके गन्दे झोलेँ मेँ रखने से वह दैवी श्वेत बीयर मग इस तरह काला पड़ गया है।
    कपाली – प्यारी, संताप करना व्यर्थ है, व्यर्थ है। फिर से साफ हो जाएगा। क्योँकि सुनते हैँ कि कुकवि के संसर्ग मेँ आया अशुद्ध पदार्थ, महाकवि के संसर्ग से मैल रहित हो जाता है। क्योँकि:–
    जो कुत्ता करते हैँ वे गन्दगी मेँ लिपटे आवारा श्वान की तरह अपने कर्मोँ से स्वयं मैले हो जाते हैँ। जब वे किसी मत्त महाकवि के संसर्ग मेँ आकर उनकी स्तुति करते हैँ और अपने किए कुत्ते का पश्चाताप करते हैँ, वही पुनः पुण्य को प्राप्त करते हैँ। कुकवि से कवि बनने के लिए उन्हेँ सीखना होगा कि जो सम्मत हो उसे करे और जो लोकसम्मत न हो उसका प्रयत्नपूर्वक त्याग करे। किन्तु जनापवादमात्र से आत्मनिन्दा मेँ प्रवृत्त नहीँ होना चाहिए क्योँकि वर्तमान कवि का काव्य, कुल स्त्री का रूप ए‌वं गृहवैद्य की विद्या कदाचित् ही किसी के पसन्द आती है। इस तरह जो कालिदास के नाम से अङ्कित मनकोँ का कण्ठहार पहनते हेँ, जो दण्डी को कवि मान का नित्य वन्दना करते हैँ, जो भवभूति के समक्ष श्रद्धा से शिर झुकाते हैँ, जो भारवि की निरन्तर उपासना करते हैँ, उन्हीँ मेँ बाणभट्ट जैसी निपुणता आ सकती है। वही पापरहित होकर शुद्ध हो सकते हैँ।

    बुद्धिजीवी – यही वचन यूरोप के किसी फालाना जॉनसन साहेब ने भी अपनी ढिकानी किताब मेँ कही थी। अतः मैँ भी इसे मानता हूँ।
    आरारार – अरे कपाली, यह मग को मैँने रङ्गीन किया, पर इसका आकार-प्रकार वैसा ही है क्या? इसमेँ तो लिट-फेस्ट का भी चिह्न है।
    कपाली – तुम्हेँ कैसे पता कि यह आकार-प्रकार वैसा है या नहीँ? यह चिह्न तो तुमने लगा लिया होगा क्योँकि तुमने तो अपने कुर्ते पर भी यह चिह्न लगा कर उसे हाफ जैकेट से छुपा रखा है। यह समय कुत्ता करते हुए शङ्का प्रकट करने का नहीँ, बल्कि महाकवि के संसर्ग मेँ आकर पश्चाताप करने का है।
    आरारार – इसके बाद मैँ किसकी शरण मेँ जाऊँ?
    कपाली – फाउण्डेशन के दुप्पटे मेँ जा कर मुँह छुपाने के अतिरिक्त कोई मार्ग शेष नहीँ है। कुत्ता करते-करते तुम चोरी पर उतर आए।
    बुद्धिजीवी – मैँ यहाँ फैसला नहीँ दे सकता।
    कपाली – आप फैसला देने वाले होते कौन हैँ?
    बुद्धिजीवी (अनसुना करके ) – हमेँ इसके लिए न्यायालय जाना होगा।
    देवसोमा – ऐसी बात है तो कपाल को नमस्कार। जाने दीजिए।
    बुद्धिजीवी – क्या अभिप्राय?
    देवसोमा – न्यायालय मेँ किसकी चलती है? वह तो कर्मचारियोँ को घूस-रिश्वत देकर ही मामला बन्द करने मेँ समर्थ है। हम जैसे के लिए, जो साँप के केचुल के मात्र विभव वाले दरिद्र कपाली की परिचारिकाएँ हैँ, वहाँ प्रवेश पाने के लिए धन कहाँ से लाएँगे?
    बुद्धिजीवी – ऐसी बात नहीँ है। यदि तुम दोनोँ वहाँ नहीँ चलोगे तो मैँ सोशल मीडिया पर बदनाम कर दूँगा। कहूँगा कि निर्दोष आरारार पर सर+ए+आम झूठा आरोप लगाया। यह भी कहूँगा कि देवसोमा को कपाली ने कुछ प्रत्यक्षदर्शियोँ के सामने छेड़ा। फिर देवसोमा के कुछ कहने ना कहने, आरोप के दण्ड के भय से, या विवाद के निपटारा होने से संतुष्ट होने या आरोप वापस लेने से मामल रफा-दफा नहीँ होगा। कपाली को हम हर मदिरालय मेँ जाने से प्रतिबन्ध लगा देँगे। वह खान मार्केट तो क्या हौजखास मार्केट भी न जा पाएगा। हम उसकी पब्लिक लिञ्चिङ् करेँगे और उसे ट्रोलिङ् कहेँगे। हम गालियाँ देँगे, किन्तु उसे केवल शाब्दिक आलोचना कहेँगे। हम चरित्र हनन करेँगे, साथ मेँ कोई प्रमाण नहीँ देँगे।
    कपाली – इस धमकी की आवश्यकता नहीँ। न्यायी व्यक्ति को कहीँ से भी भय नहीँ।
    आरारार – तुम्हीँ आगे चलो।
    बुद्धिजीवी – अच्छा।

    [सबके सब घूमते हैँ। घूमते– घूमते खान मार्केट से सवा किलोमीटर दूर स्थित इण्डिया इण्टरनेशनल सेण्टर पहुँच जाते हैँ।]

    पगला :– यही, यही वह दुष्ट कुक्कुर है। बार्बेक्यू (शूल्यमांस) लिपटे कपाल वाले मग ले कर दौड़े जा रहे हो। अरे कुत्ते, कहाँ जाओगे। अरे, अब यह कपाल मग फेँक कर मुझे खा डालने की इच्छा से मेरी ओर क्योँ आ रहे हो? (दिशाओँ की ओर देख कर) इस पत्थर से तुम्हारे दाँत तोड़ दूँगा। अरे गलती हो गयी, तुम्हेँ कुत्ता कह दिया। तुम्हेँ डॉगी कहना चाहिए था। नहीँ नहीँ, कुकवि कहना चाहिए।
    बचाओ, बचाओ।
    [भागता है]

    बुद्धिजीवी – अरे यह पगला इधर ही आ रहा। ओह, यह तो पहले किसी पत्रिका का सम्पादक हुआ करता था, पर कार्य के अत्यधिक बोझ, अहंकार और मतिभ्रम ने इसे पगला बना दिया। इसमेँ इसका कोई दोष नहीँ बल्कि समाज का दोष है। जो यह –
    वृद्ध कुकवियोँ और अल्पबुद्धि वाले आलोचकोँ के अधूरे और बचकाने नाना-नाना प्रकार के विषयोँ के लेखोँ और कविताओँ को अपनी पत्रिका मेँ बिना जाँचे-परखे जगह देने वाला, सूखे और उड़ते हुए केशोँ पर सस्ता खिजाब लगाता हुआ, तगादोँ से नज़रे बचाने के लिए काला चश्मा पहनता हुआ, नए कवियोँ को एकदम न छापता हुआ, पुराने बासी विमर्श की धौँकनी मेँ कलेजे से फूँक-फूँक अनवरत धुआँ देता हुआ, लोभी आलोचकोँ और विदेशी प्रोफेसरोँ से सतत् पीछा किया जाता हुआ, आइडेण्टिटी पॉलिटिक्स का पैरोकार, अपने मत को ही अन्तिम सत्य मानता हुआ, दिग्भ्रमित मनुष्य की आकृति मेँ घूमता हुआ यह इधर ही आ रहा है।

    पगला – तब मैँ इनके पास मैँ जाता हूँ। (समीप जाकर) महासाधु जो चाण्डाल कुत्ता है….
    आरारार – (रोष मेँ भर कर चीखते हुए) मेरी कविता को कुत्ता कहना अपमान है।
    पगला – भगवन्, मैँ आपकी कविता को नहीँ, सचमुच के कुत्ते के बारे मेँ कह रहा हूँ कि उससे मिले हुए इस कपाल को ग्रहण करेँ।
    बुद्धिजीवी– (घृणा से गन्दे मग को देखते हुए) योग्य कवि को दीजिए।
    पगला – हे फाउण्डेशन के कर्मचारी, कृपा कीजिए।
    आरारार – (भृकुटि टेढ़ी कर के) कपाली इसके योग्य हैँ।
    पगला – (कपाली के पास जाकर कपाल को जमीन पर रखकर प्रदक्षिणा करके तथा पैरोँ पर गिरकर) हे महाकवि, दया करेँ। आपके लिए यह अञ्जलि है।
    कपाली – यह मेरा कपाल चिह्न वाला मग है।
    देवसोमा – (प्रसन्न हो कर) हाँ, ऐसा ही।
    कपाली – भगवान् की कृपा से मैँ पुनः कपाल वाला बन गया। (लेना चाहता है।)
    पगला – अधम पुत्र, विष खाओ। (कपाल छीन कर चल देता है)
    कपाली – (पीछा करके) यह यम का दूत मेरे आनन्द के कारण का हरण कर रहा है। आप दोनोँ इसे पकड़ेँ।
    दोनोँ (बुद्धिजीवी और आरारार) – अच्छा, हम दोनोँ तुम्हारे सहायक होते हैँ।

    [सबके सब रोक लेते हैँ।]

    कपाली – हे, ठहरो, ठहरो।
    पगला – किस कारण से मुझे रोक रहे हैँ?
    कपाली – हमारा कपाल देकर जाओ।
    पगला – मूर्ख, क्या देख नहीँ रहे। यही इस वर्ष का मेरी पत्रिका द्वारा प्रायोजित पुस्कार का स्मृति चिह्न है। मैँ हजार कवियोँ की चार हजार कविताएँ मात्र चार दिन मेँ पढ़कर, किसी अपने चमचे को सबकी उपस्थिति मेँ महत्त्वपूर्ण नवोदित कवि घोषित करते हुए यह चिह्न दूँगा और कहूँगा कि यह प्राग से आया है। किसी विदेशी ने विजेता की कविताओँ का जर्मन भाषा मेँ आपरूपी मशीनी अनुवाद पढ़ कर उपहार स्वरूप भेजा है।
    कपाली – चलो, उपहास मेँ कही तुम्हारी बात सच निकलेगी। यह सचमुच मेँ प्राग से भेजा गया है। भेजने वाला फ्रैंज कॉफ्का का पड़पोता था।
    आरारार – (अचकचा कर) क्या कहते हो?
    पगला  – वो काफ्का का पड़पोता मैँ ही हूँ। यह कपालनुमा मग सरोजिनी नगर की फुटपाथ पर दर्जन के हिसाब से मिलता है। हा हा हा।
    आरारार – क्या यह पगला है?
    पगला – ‘पगला’ शब्द बारम्बार सुनता हूँ। इसे ले कर पगले को दिखाओ। (कपाली को कपाल उछाल कर देता है और खुद भाग जाता है।)
    कपाली – (कपाल लेकर) अरे, यह तो इस समय दीवार के ओझल हो गया। जल्दी से इसका पीछा करेँ।
    बुद्धिजीवी – उसका पीछा करने से कोई लाभ नहीँ। वह अभी किसी सभा मेँ कुत्ता पढ़ने और सुनने गया होगा। वहाँ अगर हम पहुँचे तो सैकड़ोँ कुत्तोँ की बौछार से अधमरे हो जाएँगे।
    आरारार – अहो आश्चार्य! मैँ शत्रु की भलाई से संतुष्ट हूँ।
    कपाली – (कपाल का आलिङ्गन कर) मैँने बहुत दिनोँ तक अखण्डित साधना की थी, तब जाकर प्राग से फ्रैंज कॉफ्का का पड़पोते ने मुझे यह कपाल भेजा। वह पगला तो सुखपूर्वक आँखोँ से ओझल हो गया किन्तु हे हमारे कुशलि कपाल! तुम आज दिखाई दे रहे हो।
    देवसोमा – महाराज, चन्द्रमा के साथ आए हुए संध्याकालीन समय (प्रदोष) के समान आपको देखती हुई मेरी आँखेँ आज प्रफुल्लित हो रही हैँ।
    बुद्धिजीवी – सौभाग्यवश आपकी उन्नति हो रही है।
    कपाली – यह उन्नति तो आपकी ही है।
    बुद्धिजीवी – (मन ही मन)– यह सत्य है कि निरपराध को भय नहीँ है; क्योँकि यह भिखारी आज सिंह के मुँह से छुटकारा पाया है। (उच्च स्वर मेँ) अब मैँ इस समय मित्र के अभ्युदय-जनित आनन्द को ही सामने कर सर्वप्रथम भगवान् पार्थिवेश्वर महादेव के प्रदोषकालीन पूजन करने जा रहा हूँ। और आज से–
    तुम दोनोँ यह विरोधपूर्ण पहला सम्बन्ध, भगवान् किरातधारी शङ्कर और अर्जुन की भाँति दिनोँ दिन परस्पर प्रेम बढ़ाने वाला हो।

    [बुद्धिजीवी निकल गया।]

    कपाली – भो आरारार, चूँकि मैँने अपराध किया है, अतः मैँ भी अब प्रसन्नचित्त आपको देखना चाहता हूँ।
    आरारार – क्या यह भी प्रार्थना के योग्य है? मैँ तेरा उपकार क्या करूँ?
    कपाली – यदि मेरे ऊपर आप प्रसन्न हैँ तो, इससे बढ़ कर मैँ क्या चाहूँ?
    आरारार – तब मैँ जाता हूँ।
    कपाली – फिर से दर्शन देने के लिए आप जाँय।
    आरारार – ऐसा ही होवे। (चला जाता है)
    कपाली – प्यारी देवसोमा, चलो चलेँ।

    [भरत वाक्य]

    अग्निदेव, निन्दकोँ की पीड़ा से विधिपूर्वक दी गयी गालियोँ को निरन्तर धारण करेँ। कुकवि निर्बाध होकर कुत्ता पढ़ेँ। इण्डिया इण्टरनेशनल मेँ खैराती रस-रञ्जन होता रहे। यह संसार भी जब तक चन्द्रमा और तारागण हैँ तब तक अपने-अपने धर्म मेँ निरत होकर तथा आपत्ति से रहित हो, आलोचक अपनी शक्ति से कुकवियोँ को शान्त करेँ, बुद्धिजीवियोँ के प्रपञ्च को उजागर करेँ, महाकवियोँ को यश दे। उनके तेज से यह देश हरा– भरा बने।

    इति श्री
     
    भाद्रपद शुक्ल प्रदोष, संवत् २०८२

    One thought on “आधुनिक मत्तविलास प्रकरण

    1. अद्भुत पैरॅडी बनाई है। लेकिन कहीं कहीं कसावट मागती है। शायद फिनिश भी तसल्र्सलीबख्श नहीं हुई मजेदार रसपूर्ण कटाक्ष। खान मार्केट की एक बीयर बार और इंडिया इंटरनेशनल सेंटर को फील कर पाया।

      प्रूफ / टाईपिंग की अशुद्धियां डिस्ट्रेक्ट करती हैं। ठीक करवा लें।

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