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  • वागीश शुक्ल की ग़ज़लें

    प्रकांड विद्वान वागीश शुक्ल अनेक विषयों, अनेक विधाओं के माहिर विद्वान माने जाते रहे हैं। हाल में उन्होंने कुछ ग़ज़लें लिखीं। हमारे मरहूम दोस्त शायर इरशाद ख़ान सिकंदर से शायरी को लेकर उनकी लगातार बातचीत होती रहती थी। उनकी याद में पेश हैं वागीश शुक्ल की पाँच ग़ज़लें। उन्होंने कुल ग्यारह ग़ज़लें कही हैं। आज पाँच ग़ज़लें उनकी टीका के साथ पढ़िए। शेष बाद में। वागीश जी लेटेक्स सॉफ़्टवेयर में काम करते हैं। उस सॉफ़्टवेयर में टाइप की गई ग़ज़लों को यहाँ प्रकाशित करने लायक़ बनाने में युवा लेखक प्रचण्ड प्रवीर ने बहुत मेहनत की है। हम उनके भी आभारी हैं। आप वागीश जी की ग़ज़लें पढ़ें- मॉडरेटर

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    बाभन को धन केवल इच्छा

    वागीश शुक्ल

    मुतख़ल्लिस ब० ‘बाभन’

    १ सितम्बर २०२५

     

    इरशाद ख़ान ‘सिकन्दर’ युवावस्था मेँ ही समकालीन उर्दू-हिन्दी साहित्य के ज़िक्रतलब नामोँ मेँ शामिल थे। उनके कहने पर ही मैँने कुछ खिलवाड़ के तौर पर मन्ज़ूम करना शुरूअ किया था। कुछ समय पहले वह हम सबको दुख मेँ डुबोते हुए इस दुनिया को छोड़ कर अचानक जन्नत-मकानी हो गये। हालाँकि यह क़ाफ़िय०-पैमाई पुराने उस्तादोँ के कलाम से हेरफेर कर के की गयी है— फिर भी, उनकी याद मेँ उनको याद करने वालोँ के हुजूर मेँ इसे पेश करने की गुस्ताख़ी कर रहा हूँ क्योँकि इसको उन्होँने देख रखा था और इसलाह की भी मिह्रबानी की थी।

    — वागीश शुक्ल

     

    संसार किसी का हो, घरबार रहे अपना
    सरकार किसी की हो, किरदार रहे अपना ॥


    सत्कार बड़ोँ का हो, करतार कृपामय हो
    व्यवहार सभी से हो, अधिकार रहे अपना ॥


    कोठार किसी का हो, जँतसार रहे अपनी
    दरबार किसी का हो, परिवार रहे अपना ॥


    व्यभिचार किसी के होँ, कुलचार रहेँ अपने
    अभिचार किसी के होँ, हुतचार रहे अपना ॥


    हथिसार किसी की हो, गोसार रहे अपनी
    लोहसार किसी की हो, भँड़सार रहे अपना ॥


    हथियार किसी के होँ, कुछ यार रहेँ अपने
    सरदार किसी के होँ, दिलदार रहे अपना ॥


    इस पार न होँ टुच्चे, उस पार न होँ लुच्चे
    हो नाव किसी की पर, घटवार रहे अपना ॥


    महकार हो फूलोँ की, पुरख़ार न हो बगिया
    एरण्ड भले द्रुम हो, सहकार रहे अपना ॥


    मधुमास न हो पतझड़, पटवास न हो खंखड़
    अधिवास न हो कंकड़, सुखचार रहे अपना ॥


    दरिया है तलातुम मेँ, मँझधार मेँ है नैया
    जो डाँड़ पकड़ थामे पतवार, रहे अपना ॥


    सोहर मेँ रहे सोहिला, आल्हा मेँ न हो माहिल
    घर जाँय किसी के तो, सोहकार रहे अपना ॥


    भर-ठूँस नहीँ लालच, गुजरान है कम खाना
    दिल बोदा भले है पर ग़मख़ार रहे, अपना ॥


    आँखो॑ मेँ चमक बाक़ी, चेहरे मेँ दमक बाक़ी,
    ख़न्जर तले आवाज़०, दमदार रहे अपना ॥


    चाक़ू की न हो हाजत नाख़ुन से खुलेँ उक़दे
    नदियाँ बहेँ तेशा बिन, कुहसार रहे अपना ॥


    बटमार न होँ पीछे, गँठमार न होँ पीछे,
    लठमार न होँ पीछे, पथपार रहे अपना ॥


    उस बार पराया था, जिस बार पराया था
    तिस बार पराया था, इस बार रहे अपना ॥


    गिरहस्थ न हो रूखा, साधू न रहे भूखा
    बोदर न रहे सूखा, सरशार रहे अपना ॥


    दमड़ी भी बचे अपनी, चमड़ी भी बचे अपनी
    उखुड़ी भी बचे अपनी, कोल्हार रहे अपना ॥


    होँ देग़ किसी के पर, झबिया तो रहे अपनी
    बाज़ार ठठेरोँ का, धरकार रहे अपना ॥


    परमेय किसी के होँ, निरमेय रहेँ अपने
    चाँदा के सहित, लँगड़ा परकार रहे अपना ॥


    लढ़िया बची रह जाये, मढ़िया बची रह जाये
    खटिया बचे, सिल-लोढ़ा जियतार रहे अपना ॥


    परचम न लठैती हो, बरबत न बकैती हो,
    लय, गत न, भँड़ैती हो, सुर, तार रहे अपना ॥


    ज़न्जीर है पैरोँ मेँ, शमशीर है ग़ैरोँ की,
    तक़दीर है औरोँ की, बस यार रहे अपना ॥


    सुरसा का बदन बढ़ता, प्रभु राम अँगूठी देँ
    हनुमान जलधि लाँघेँ, पुलपार रहे अपना ॥


    चोटी न कटे अपनी, बोटी न कटे अपनी
    नाक़ूस न गुमसुम हो, ज़ुन्नार रहे अपना ॥


    बाभन को मिले भिच्छा, सज्जन की पुरे इच्छा
    दुर्जन को मिले सिच्छा सिखवार रहे अपना ॥

    [[ किरदार = पात्र, चरित्र, भूमिका; कोठार = अन्न का विशाल भाण्डार-गृह; जँतसार = घरेलू चक्की मेँ आटा पीसते हुए गाया जाने वाला गीत; व्यभिचार = मर्यादा के विपरीत आचरण; कुलचार = पारिवारिक मर्यादाओँ के भीतर रहते हुए आचरण; अभिचार = किसी के अ-हित की इच्छा से किया गया मान्त्रिक प्रयोग; हुतचार = देवताओँ के निमित्त विधिपूर्वक हवन के बाद प्राप्त भोजन पर निर्वाह; हविष्यान्न का भोजन;
    हथिसार = पालतू हाथियोँ के रहने के लिए बनवाया गया मकान, हाथीख़ाना; गोसार = गोशाला; लोहसार = वह भट्ठी जिसमेँ लोहा गलाया जाता है; भँड़सार = वह चूल्हा जिसमेँ चबेने के लिए चना आदि भूना जाता है;
    घटवार = घाट पर का वह केवट जो नावोँ के आवागमन का मुख्य प्रबन्धक होता है;
    महकार = सुगन्ध; पुरख़ार = काँटोँ से भरी;
    एरण्ड भले द्रुम हो सहकार रहे अपना = जिस देश मेँ कोई पेड़ नहीँ होता वहाँ रेँड़ी का पेड़ भी ‘द्रुम’ कहलाता है —  तो भले ही रेँड़ी का पेड़ ‘द्रुम’ कहलाये लेकिन अपना आम का पेड़ बचा रहे, सहकार = आम का पेड़
    मधुमास न हो पतझड़ = वसन्त पतझड़ मेँ न बदले
    पटवास न हो खंखड़ = साड़ी घिस कर ऐसी न हो जाय कि उसकी बुनावट मेँ छेद हो जाँय
    अधिवास न हो कंकड़ = रहने की जगह कँकरीली न हो,
    सुखचार = आराम से चलना फिरना
    तलातुम = तूफ़ान
    सोहर मेँ रहे सोहिला = पुत्रजन्म के अवसर पर सोहर के नाम से जो गीत गाये जाते हैँ उनमेँ स्त्रियोँ के कष्टो॑ का ही विशेषतः वर्णन होता है इसलिए कहा जाता है कि सोहर मेँ कुछ ‘सोहिला (= शोभन)’ भी होना ज़रूरी है ताकि उसकी माङ्गलिकता बनी रहे;
    आल्हा मेँ न हो माहिल = आल्हा-ऊदल की कहानी मेँ सारे उत्पात की जड़ ‘माहिल’ नामक खल पात्र न हो
    घर जाँय किसी के तो, सोहकार रहे अपना = हम इस योग्य होँ कि अगर किसी के घर जाँय तो हमारा स्नेह से स्वागत किया जाय, लोग हमसे बचने की कोशिश न करेँ
    गुजरान = सन्तोषपूर्वक अल्प साधनोँ मेँ ही जीवन-यापन कर लेना;
    खन्जर तले आवाज़० दमदार रहे अपना = ज़िब्ह किये जाते समय भी हमारी चीख़ पूरे ज़ोर से निकले, ‘आवाज़० = पुकार’ को ‘आवाज़ा’ पढ़ना चाहिए
    दिल बोदा भले है पर ग़मख़ार रहे अपना ग़ालिब की पंक्ति “ग़म खाने मेँ बोदा दिल+ए+ना-काम बहुत है” पर ध्यान दीजिए,
    ग़मख़ार = ग़म खाने वाला
    हाजत = आवश्यकता; उक़दे = गाँठेँ
    नदियाँ बहेँ तेशा बिन, कुहसार रहे अपना = फ़रहाद ने तेशा (= कुल्हाड़ी) से कुहसार ( = पहाड़) काट कर नदी निकाली थी हमेँ पहाड़ इतना अपना माने कि विना ऐसी आक्रामकता के ही हमेँ पहाड़ से नदी प्राप्त हो जाय
    बोदर = सिँचाई के लिए बनाया गया छोटा गड्ढा जिसका पानी उलीच कर खेतोँ मेँ पहुँचाया जाता है; सरशार = लबालब भरा हुआ
    उखुड़ी = ऊख; कोल्हार = वह जगह जहाँ ईख का रस कोल्हू मेँ पेर कर रस निकाला जाता है और उसे पका कर गुड़ बनाया जाता है
    देग़ = धातु का बड़ा बर्तन जिसमेँ बहुत लोगोँ का भोजन बन सकता है झबिया= बाँस की छोटी टोकरी; धरकार = बाँस से झबिया, पँखा,  डलिया जैसे सामान बनाने वाला
    परमेय = प्रमेय; निरमेय = (ज्यामिति के) निर्मेय
    लढ़िया = बैलगाड़ी; मढ़िया = झोँपड़ी; जियतार = जीवन्त
    परचम = झन्डा; बरबत = छोटे सितार की तरह का एक वाद्य-यन्त्र जिसका यह नाम इसलिए है कि इसकी आकृति बत्तख की छाती की तरह होती है
    नाक़ूस = शंख; ज़ुन्नार = जनेऊ
    सिखवार = शिक्षक ]]

     

     

    हस्ती+ए+बातिल हक़ हुई? सचमुच नशे मेँ चूर हैँ?
    हम हैँ जहन्नम मेँ, यहाँ कौसर है क्योँ? क्योँ हूर हैँ?

    खाली+ए+पुर-अज़-हेच है, पैमान०+ए+नुह-आसमाँ
    बसती दुआ दुश्नाम मेँ, ख़ुशदिल सभी महजूर हैँ ॥

    तुम हो खिरद मैँ हूँ जुनूँ? यह तफ़रक़ा है रज़्म मेँ
    अहल+ए+ख़िरद सब बज़्म मेँ मजनून हैँ, मसरूर हैँ॥

    “दीवानगी हो बा-ख़ुदा, हुशयार रहियो बा-शराअ”
    ऐसे मआनी से लुग़त के, लफ़्ज़ मेरे दूर हैँ ॥

    थी जाम+ए+जम मेँ इक फ़क़त दुनिया, सिफ़ाली जाम के
    क़तरोँ मेँ मूसा अनगिनत, आलाफ़ ज़ौ, सद तूर हैँ ॥

    आतश़फ़िशान+ए+ इन्क़िलाब+ए+नुज़ुम आख़िर क्या हुए
    कुछ बन्दगी करते दिखे, मिनबर प० कुछ महसूर हैँ ॥

    थे जो सरापा बालपन, वे हैँ सरापा बाँकपन
    थे जो हिलगते बेहिचक, नाज़ाँ हैँ वे, मग़रूर हैँ ॥

    कविता उन्हीँ की है बड़ी, जिनको न छपने की पड़ी
    ग़ज़लेँ हज़ारोँ होँ न होँ, अशआर सब मशहूर हैँ ॥

    बाभन की दुनिया मेँ ज़ुलम, हैँ रोशनी बन छा गये
    शप्पर बने जुगनू, दिये बुझते हुए पुरनूर हैँ ॥

     

    [[ हस्ती+ए+बातिल हक़ हुई? = क्या यह मिथ्या जीवन परम सत्य मेँ देहान्तरित हो गया?

    जहन्नम = दोज़ख़; कौसर = जन्नत मेँ पायी जाने वाली मदिरा की नहर; हूर = जन्नत मेँ पायी जाने वाली सुन्दरियाँ जो सच्चे मुसलमानोँ को प्राप्त होती हैँ
    खाली+ए+पुर-अज़-हेच है पैमान०+ए+नुह-आसमाँ = नौ आसमानोँ का बना यह रिक्त मदिरा-पात्र शून्य से पूरा भरा हुआ है

    बसती दुआ दुश्नाम मेँ = मङ्गलकामना का निवास कोसने मेँ है; ख़ुशदिल सभी महजूर हैँ = सभी प्रसन्न-हृदय लोग वस्तुतः दुःखपीडित हैँ
    तुम हो ख़िररद मैँ हूँ जुनूँ? = तुम धीर-बुद्धि हो और मैँ विक्षेप हूँ?
    यह तफ़रक़ा है रज़्म मेँ = यह अन्तर तभी है जब हममेँ तुममेँ लड़ाई हो
    अहल+ए+ख़िरद सब बज़्म मेँ मजनून हैँ, मसरूर हैँ = मदिरापान की गोष्ठी मेँ तो सभी धीरचेत्ता विक्षिप्त और मदमत्त ही होते हैँ
    “दीवानगी हो बा-ख़ुदा, हुशयार रहियो बा-शरअ” = जितनी विक्षिप्तता है सब अल्लाह के वास्ते हो तभी क्षम्य है, इस्लामी शरीअत के अनुसार चलने मेँ कोई ढिलाई नहीँ होनी चाहिए
    ऐसे मआनी से लुग़त के, लफ़्ज़ मेरे दूर हैँ = मेरे शब्दकोष के शब्द इस प्रकार का अर्थ नहीँ बताते
    थी जाम+ए+जम मेँ इक फ़क़त दुनिया = ईरान के प्रसिद्ध मिथकीय बादशाह जम के मदिरा-पात्र मेँ केवल यह लौकिक जगत् ही दिखायी देता था
    सिफ़ाली जाम के क़तरोँ मेँ मूसा अनगिनत, आलाफ़ ज़ौ, सद तूर हैँ= (जब कि इसके विपरीत हमारे) मिट्टी के चुक्कड़ की एक-एक बूँद मेँ अनगिनत मूसा हैँ, हज़ारोँ रोशनियाँ हैँ, सैकड़ोँ तूर हैँ, आलाफ़= ‘अल्फ़’ का बहुवचन, हज़ारोँ,  ज़ौ = ज्योति
    (हज़रत मूसा के लिए तूर पर्वत पर ईश्वरीय ज्योति प्रकट हुई थी किन्तु वे उसका साक्षात्कार नहीँ कर पाये, इस शराब की एक-एक बूँद मेँ ईश्वरीय ज्योति अनगिनत बार प्रकट होती है और उसका निरन्तर साक्षात्कार होता रहता है)
    आतश़फ़िशान+ए+ इन्क़िलाब+ए+नुज़ुम = व्यवस्थाओँ मेँ परिवर्तन की आग भड़काने वाले;
    नुज़ुम = निज़ाम (= व्यवस्था) का बहुवचन; मिनबर प० कुछ महसूर हैँ = कुछ अपने प्रवचन-पीठोँ के भीतर बन्द हैँ
    हिलगना = आत्मीयता दिखाते हुए लिपट जाना; नाज़ाँ = नखरे करते हुए; मग़रूर = गर्वोद्धत
    अशआर = ‘शेर (= कविता)’ का बहुवचन
    ज़ुलम = अँधेरे; शप्पर = चमगादड़; पुरनूर = प्रकाशपूर्ण ]]

     

     

    खीँचो न० कमाँ को, ने तलवार निकालो ज़ूद
    जब तोप मुक़ाबिल हो, अख़बार निकालो ज़ूद ॥

    ड्रेस-कोड मेँ नाड़े की, जो शर्त है यह लिक्खी
    ज़न्जीर है, तोड़ इसको, शलवार निकालो ज़ूद ॥

    महकूम कि० हाकिम हैँ — कुछ याद नहीँ हम को
    सदियोँ से पड़ा शजर० बेकार, निकालो ज़ूद ॥

    मज्लिस मेँ य० साया जो, दीवार से चिपका है
    सौ बार लरज़ता है, सौ बार निकालो ज़ूद ॥

    बुलबुल को न० गुलशन मेँ, बसने दो ऐ सय्यादो!
    ज़ागो!! ज़ग़नो!!! चुग़्दो !!!! सरकार !!!!!! निकालो ज़ूद ॥

    आशिक़ का जनाज़ा है, हो फूल सा हलका पर
    कन्धोँ प० रक़ीबोँ के, है बार, निकालो ज़ूद ॥

    गुल, शमअ हैँ दुक्का मेँ, गुलगीर+व+गुलचीँ हैँ
    यूसुफ़ का नहीँ कोई बाज़ार, निकालो ज़ूद ॥

    जो कस न० सकेँ सोना, क्योँ उनको कसौटी दो
    कब दुर्द-तलब होते, मय-ख़ार? निकालो ज़ूद ॥

    ज़ुह्हाद ने कल घेरा मस्जिद मेँ, लगे कहने
    तसबीह मेँ यह कैसे ज़़ुन्नार, निकालो ज़ूद ॥

    वाइज़ को हुआ क्या है? मिनबर से लगे करने
    अंगूर की बेटी की मनुहार, निकालो ज़ूद ॥

    नासिह दिखे कुछ बदले, शीरीँ है ज़बाँ उनकी
    सूली प० चढ़ायेँगे पुचकार, निकालो ज़ूद ॥

    खिसकी दिखी ख़िश्त+ए+ख़ुम, क्योँ तर्ह मेँ क़िबले की?
    मुफ़्ती ने तहज्जुद मेँ ली ढार, निकालो ज़ूद ॥

    माशूक़ को ‘तुम’ कह कर, गुमनाम किया क्योँकर?
    मजनूँ मेँ ख़िरद पैठा, हुशयार! निकालो ज़ूद ॥

    कुछ लन्ठ हैँ रिन्दोँ मेँ पहचान लो, हाथ उनके
    काँपेँगे क़दह थामे, धुरझार निकालो ज़ूद ॥

    बाभन न० कहो ग़ज़लेँ, ऐसी कि० लगेँ भाका
    मतरूक दिखेँ जो भी, हर बार निकालो ज़ूद ॥

    [[ पहला शेर अकबर इलाहाबादी के मशहूर शेर से से बनाया गया है; ने = न; मुक़ाबिल = सामने; ज़ूद = शीघ्र
    महकूम कि० हाकिम हैँ— कुछ याद नहीँ हम को— सदियोँ से पड़ा शजर० बेकार निकालो, ज़ूद = हम शासित जाति के हैँ या शासक जाति के हैँ, यह हमेँ भूल गया है क्योँकि जो वंशवृक्ष हमेँ यह बता सकता था, वह सैकड़ोँ वर्षोँ से उपेक्षित पड़ा है, उस वंशवृक्ष को अविलम्ब निकालो ता कि हम यह जान सकेँ कि हम शासित जाति के हैँ या शासक जाति के; महकूम = शासित; हाकिम = शासक; शजरा = वंशवृक्ष
    मीर का शेर है : रात हम भी तेरी मज्लिस मेँ खड़े थे चुपके; जैसे तसवीर लगा दे कोई दीवार के साथ;  लरज़ता है = थरथराता है, तसवीर की तरह स्थिर नहीँ है।
    सय्याद = बहेलिया; ज़ाग़ = कौआ; ज़ग़न = चील चुग़्द = उल्लू
    रक़ीब = आशिक़ का प्रतिद्वन्द्वी जो उसके विपरीत केवल वासना से ग्रस्त रूपलोभी है; बार = भार
    गुल = फूल;  शमअ = दिया या मोमबत्ती; दुक्काँ = दुक्कान = दूकान; गुलगीर = दिये या मोमबत्ती की बत्ती काटने वाली कैँची; गुलचीँ = गुलचीन = फूल तोड़ लेने वाला; यूसूफ़ = एक पैग़म्बर जो अपनी ख़ूबसूरती के लिए मशहूर हैँ और जो मिस्र के बाज़ार मेँ बेच दिये गये थे— मीर का शेर है, युसूफ़ से ले के ता गुल, और गुल से ले के ता शमअ; ये हुस्न किसको ले कर बाज़ार तक न० पहुँचा
    कब दुर्दतलब होते, मयख़ार? निकालो ज़ूद = जिनको मदिरापात्र की तलहटी मेँ जमी करकट की इच्छा है, क्या वे मदिरा-पायी कहे जा सकते हैँ— उनको पान-गोष्ठी से अविलम्ब निकालो— ग़ालिब का शेर है, कहते हुए साक़ी से हया आती है वर्न०; है यूँ कि मुझे दुर्द+ए+तह+जाम बहुत है
    ज़ुह्हाद = ‘जाहिद’ का बहुवचन, मज़हब के पाबन्द लोगोँ का गिरोह;
    तसबीह मेँ यह कैसे ज़ुन्नार, निकालो ज़ूद = तुम्हारी यह जो अल्लाह के नाम जपने के लिए माला है, इसके दाने एक धागे मेँ क्योँ गुँथे हुए हैँ, इस धागे मेँ कुफ़्र है, इसे जल्दी तोड़ फेँको— ज़ुन्नार = धागा, जनेऊ
    वाइज़ = उपदेशक, जो मस्जिद मेँ नमाज़ के बाद धर्मोपदेश करते हैँ; मिनबर = मस्जिद मेँ बना वह मंच जिस पर से वाइज़ उपदेश करते हैँ; अंगूर की बेटी = शराब
    नासिह = मज़हब की सही राह पर चलने की नसीहत देने वाला; शीरीँ = मीठी
    खिसकी दिखी ख़िश्त+ए+ख़ुम, क्योँ तर्ह में किबले की? मुफ़्ती ने तहज्जुद मेँ ली ढार, निकालो ज़ूद = मस्जिद मेँ जो मिहराब यह बताती है कि किधर मुँह करके नमाज़ पढ़नी चाहिए, उसकी नीँव शराब के मटके के ढकने पर रखी जाने वाली ईँट थी — वह क्योँ अपनी जगह से खिसकी दीख रही है और इस प्रकार उस मिहराब को ग़लत दिशा मेँ मोड़ दिया है? ऐसा लगता है कि मुफ़्ती साहब ने तहज्जुद की नमाज़ पढ़ते समय ईँट हटा कर मटके मेँ से सारी शराब पी ली, इन मुफ़्ती साहब को मस्जिद से अविलम्ब निकालो क्योँकि इन्हेँ इस्लाम के बारे मेँ कुछ पता नहीँ है; मुफ़्ती = इस्लाम धर्मशास्त्र का ऐसा विशेषज्ञ जिसके पास फ़तवा देने का अधिकार है; तहज्जुद = पाँच नमाज़ोँ के अतिरिक्त वह छठी नमाज़ हो आधी रात को अत्यन्त धार्मिक लोगोँ द्वारा पढ़ी जाती है

    मजनूँ = मजनून = विक्षिप्त आशिक़, ख़िरद = सन्तुलित बुद्धि;  हुशयार= होशयार = सावधान
    रिन्द = पियक्कड़; क़दह = शराब का बड़ा प्याला; धुरझार = धूल झाड़ते हुए, यह भोजपुरी का शब्द है और भागने का क्रियाविशेषण है
    मतरूक = बहिष्कृत शब्द; उर्दू से भारतीय बोलियोँ के शब्द निकाल कर उसमेँ अरबी-फ़ारसी के शब्द डालने का एक आन्दोलन अठारहवीँ सदी के उर्दू उस्तादोँ ने चलाया था— ‘भाका’ उस हिन्दी का नाम है जिसमेँ संस्कृत के तत्सम शब्द या बोलियोँ के देशज शब्द भी आ जाते हैँ, और इस आन्दोलन के निशाने पर यह ‘भाका’ ही थी।  ]]

    अलफ़ाज़ क्योँ ग़लत हैँ, मआनी है क्योँ ग़लत
    अव्वल ग़लत रहे, भला सानी है क्योँ ग़लत ॥

    सबका चलन ग़लत है तो दामन प० दाग़ क्या
    गर ख़ादिमा ग़लत हुई, रानी है क्योँ ग़लत ॥

    कुछ इन्तिज़ाम खोटा सख़ावत का लग रहा
    साइल ग़लत है, सत्य! प० दानी है क्योँ ग़लत ॥

    आधा गिलास ख़ाली कि० आधा भरा हुआ?
    गर ‘हेच’ है सहीह, ‘मदानी’ है क्योँ ग़लत ॥

    है धुँधलका नज़र का कि० अन्क़ा हुआ मन-म
    मिनज़ार मुसक़्क़ल किया, पानी है क्योँ ग़लत ॥

    जाहिल ग़लत है मान लिया पर बताओ तो
    दानिशवरो! तुम्हीँ, हम०दानी है क्योँ ग़लत ॥

    सूखी ज़बान थी मेरी, कुछ कह सका न० मैँ
    सोचो, तुम्हारी चर्बज़बानी है क्योँ ग़लत ॥

    बेगाने संगज़न सभी, है आशना कहाँ?
    महमिल की क़ाफ़िले मेँ रवानी है क्योँ ग़लत ॥

    संग+ए+मज़ार मेँ है लिखा क्या, नहीँ दिखा
    आँखोँ मेँ हो लहू न०, तो पानी है क्योँ ग़लत ॥

    बुझ गर गये दिये सभी, दिल मेँ तो आग है
    छलनी है सीन०, रोशनी आनी है क्योँ ग़लत ॥

    ‘तुम’ और ‘मैँ’ के बीच, फ़क़त वह्म है य० ‘वह’
    वहदत मेँ यह शुहूद-गुमानी है क्योँ? ग़लत!! ॥

    बातिल है? हक़ है? बीच मेँ कुछ? कौन जानता
    मुहमिल मेँ यह तलाश+ए+मआनी है क्योँ? ग़लत!! ॥
    बाभन! तुम्हारा तर्ज़+ए+बयाँ क्योँ हुआ उदास
    मर्ग+ए+सुखन  प० मर्सिय०-ख़ानी है क्योँ ग़लत॥

    [[         अलफ़ाज़ = ‘लफ़्ज़’ शब्द’ का बहुवचन; मआनी = अर्थ; अव्वल = जो पहले हैँ; सानी = दूसरा, जो बाद मेँ आया
    ख़ादिमा = नौकरानी
    सख़ावत = दानशीलता; साइल = याचक
    गर ‘हेच’ है सहीह,  ‘म-दानी’ है क्योँ ग़लत = ‘हेच-म-दानी (=  अज्ञान)’ शब्द तीन शब्दोँ से मिल कर बना है, ‘हेच = कुछ’, ‘म =नहीँ’, और ‘दानी = जानना’ किन्तु ‘हेच’ का अर्थ ‘कुछ नहीँ’ भी होता है इसलिए ‘हेच-दान’ और ‘हेच-म-दान’ दोनोँ का अर्थ ‘अज्ञानी’ ही होता है; शेर मेँ कहा है कि जब ‘हेच-मदानी’ का आधा टुकड़ा ‘हेच= कुछ नहीँ’ वस्तुतः परम सत्य है तो ‘म-दानी  = न जानना’ ग़लत क्योँ है— तात्पर्य यह है कि अ-सत्ता ही परम सत्ता है इसलिए उसको न जान पाना ही ज्ञान है। ‘सहीह= ठीक, सच’ को अब हिन्दी और उर्दू मेँ भी ‘सही’ लिखते-बोलते हैँ, यह ठीक नहीँ, ‘सही’ कभी अकेला नहीँ आता, ‘सहीक़द = सीधे क़द वाला’ जैसे प्रयोगोँ मेँ ही आता है।
    अन्क़ा= एक मिथकीय पक्षी जो अदृश्य होता है, मन-म = मैँ हूँ;
    मिनज़ार = दर्पण; मुसक़्क़ल = जिसको अच्छी तरह रगड़ कर उससे सारी ज़ंग निकाल दी गयी है। मिसरे मेँ प्रश्न है कि ऐसे दर्पण मेँ उचित मात्रा मेँ चमक क्योँ नहीँ आयी— क्या यह दर्पण का ही दोष है?
    जाहिल = मूर्ख; दानिशवर = ज्ञानी; हम०दानी = सर्वज्ञता
    चर्बज़बानी = स्निग्ध और अविरल वाग्व्यवहार
    बेगाने संगज़न सभी, है आशना कहाँ? महमिल की क़ाफ़िले मेँ रवानी है क्योँ ग़लत = मजनूँ को जो लोग पत्थर मार कर संगसार कर रहे है, वे सभी उसके लिए पराये हैँ, जो अपनी परिचित है वह लैला उनमेँ नहीँ है तो इसका कारण यही है कि वह जिस परदे मेँ ऊँट पर सवार क़ाफ़िले मेँ चली जा रही है, उसका वेगप्रवाह उसे ग़लत दिशा मेँ दूर ले जा रहा है जबकि लैला मजनूँ को पत्थर मारने के लिए उसके पास आना चाहती है— ऐसा क्योँ है? बेगाना = अपरिचित, पराया; संगज़न = पत्थर मारने वाले; आशना = परिचित, माशूक़; महमिल = वह पर्दा जिसमेँ छिपी हुई लैला ऊँट पर सवार एक क़ाफ़िले मेँ यात्रा करती है
    संग+ए+मज़ार = क़ब्र पर लगा पत्था जिसपर मरने वाले का नाम और अन्य परिचय लिखे होते हैँ
    वहदत मेँ यह शुहूद-गुमानी है क्योँ? ग़लत!! =  तादात्म्य मेँ यह ‘दर्शन’ का भ्रम क्योँ है— यह ग़लत है क्योँकि दर्शन होगा तो द्रष्टा और दृश्य की भिन्न सत्ताएँ भी होँगी जब कि वस्तुतः एक ही सत्ता है
    बातिल = असत्य; हक़= सत्य; मुहमिल = निरर्थक, दुर्बोध; तलाश+ए+मआनी = अर्थ की खोज
    तर्ज़+ए+बयाँ क्योँ हुआ उदास, मर्ग+ए+सुख़न प० मर्सिय०-ख़ानी है क्योँ ग़लत = कविता की मृत्यु पर शोकगीत पढ़ना तो कोई अनुचित कार्य नहीँ है, फिर इस शोकगीत की लय-योजना मेँ उदासी क्योँ झलक रही है?  ]]

     

    तुमको नहीँ पसन्द है उसको नहीँ पसन्द
    दुनिया+ए+ना-पसन्दगी हमको नहीँ पसन्द ॥

    जमहूरियत मेँ क्या गुज़र उस नेकदिल का हो
    दस को जो हो पसन्द प० दस को नहीँ पसन्द ॥

    ज़ौक़+ए+जफ़ा कमाल का क्या उसके पास है
    कहता—’’सताना है तुम्हेँ हमको नहीँ पसन्द” ॥

    शाइर ने ली जो बैयत+ए+वाइज, ग़दर मचा
    घुँघरू छनक उठे कि० गत उनको नहीँ पसन्द ॥

    यूँ नूह ने बचाया गुनाह-ओ-सवाब सब
    मासूम एक रिन्द था उनको नहीँ पसन्द ॥

    मस्जिद के ज़ेर+ए+साय० ख़राबात! शेख़ ने
    की यह दुआ कि नाज़िरी हमको नहीँ पसन्द ॥

    दिल मुतमइन हुआ कि० शहंशाह ने कहा
    हैँ दुश्मन इन्क़िलाब के हमको नहीँ पसन्द ॥

    सबको जो ना-पसन्द वह उसको पसन्द है
    सबको जो है पसन्द वह उसको नहीँ पसन्द ॥

    सय्याद लाया लाश०+ए+बुलबुल ब०-बाल+ओ+पर
    गुल ने कहा—य० बे-ज़ुबाँ हमको नहीँ पसन्द ॥

    क़ुमरी को देख सर्व प० यौम+ए+क़ियामत उठ
    बोला—य० सर प० ख़ाक है हमको नहीँ पसन्द ॥

    महफ़िल मेँ शमअ ने कहा परवाने से — सुनो
    मच्छर का भनभनाना है हमको नहीँ पसन्द ॥

    रिज़वान ने रोका जो तो कौसर उमड़ पड़ा
    प्यासे प० थी यज़ीदियत उसको नहीँ पसन्द ॥

    जिस दर्द की दवा है गुज़रना हदोँ से पार
    उस दर्द की चार०गरी हमको नहीँ पसन्द ॥

    दामन ने यार के दिया जब आँधियोँ का साथ
    हमने कहा—दिये! य० लौ हमको नहीँ पसन्द ॥

    बाभन! ‘नहीँ पसन्द’ रदीफ़ और क़ाफ़िय०
    मेँ पूछताछ, तर्ज़ य० किसको नहीँ पसन्द ॥

     

     

    [[         दुनिया+ए+ना-पसन्दगी = अरुचि का संसार
    जमहूरियत = जनतन्त्र
    ज़ौक़+ए+जफ़ा कमाल का = पूर्णता को पहुँचा हुआ अत्याचार का आस्वाद
    शाइर ने ली जो बैयत+ए+वाइज़ = जब कवि ने धर्मोपदेशक का शिष्यत्व स्वीकार किया
    यूँ नूह ने बचाया गुनाह+ओ-सवाब सब; मासूम एक रिन्द था उनको नहीँ पसन्द = हज़रत नूह ने महाप्रलय के समय एक नाव मेँ सभी प्राणियोँ के सृष्टि-बीज बचा लिये जिससे आगे के प्राणिजगत् का विस्तार हुआ जिसमेँ पापी भी हैँ और पुण्यात्मा भी, किन्तु एक सर्वथा निर्दोष मद्यप ही उनको पसन्द नहीँ था जिसके नाते इस संसार मेँ मद्यप न रहे और ढोँगी पियक्कड़ ही दिखायी देते हैँ।
    मस्जिद के ज़ेर+ए+साय० ख़राबात! शेख़ ने; की यह दुआ कि नाज़िरी हमको नहीँ पसन्द = ग़ालिब का शेर है— मस्जिद के ज़ेर+ए+साय० ख़राबात चाहिए; भौँ पास आँख क़िबल०+ए+हाजात चाहिए — इसमेँ भौँह को मस्जिद की मिहराब और आँख को मदिरालय से उपमित किया है। उस सन्दर्भ मेँ शेर मेँ कहा गया है कि जब शेख़ ने सुना कि अल्लाह ‘नाज़िर’ है, अर्थात् सब देखता  है तो उन्होँने दुआ की कि ऐ अल्लाह! तेरा  यह सब कुछ देखना हमेँ पसन्द नहीँ क्योँकि मस्जिद के नीचे मदिरालय का होना कुफ़्र है।
    मुतमइन = आश्वस्त (क्योँकि शाहंशाह स्वयं परिवर्तन-कामियोँ का साथी होने की घोषणा कर रहे हैँ)
    सय्याद लाया लाश०+ए+बुलबुल ब०-बाल+ओ+पर; गुल ने कहा—य० बे-ज़ुबाँ हमको नहीँ पसन्द = जब बहेलिये ने परोँ और डैनोँ के सहित बुलबुल की लाश फूल के सामने प्रस्तुत की तो वह माशूक़ फिर भी सन्तुष्ट न हुआ और कहा कि ऐसा आशिक़ हमको पसन्द नहीँ है जो दर्द से चीख़ न रहा हो।
    क़ुमरी को देख सर्व प० यौम+ए+क़ियामत उठ; बोला—य० सर प० ख़ाक है हमको नहीँ पसन्द = क़ुमरी नामक पक्षी सर्व नामक पेड़ का आशिक़ माना जाता  और उसपर बैठा रहता है। क़ुमरी का रंग राख जैसा होता है और सर्व के पेड़ की लम्बाई बहुत अधिक होती है इसलिए उसकी उपमा क़ियामत से देते हैँ जिसके आने के दिन सभी मुर्दे उठ खड़े होते हैँ ओर अपने अच्छे-बुरे कर्मोँ का फल सुनते हैँ। शेर मेँ कहा है क़ुमरी को सर्व पर बैठा हुआ देख कर क़ियामत का दिन उठ खड़ा हुआ और कहने लगा कि यह सर्व के सिर पर क़ुमरी का बैठना हमेँ पसन्द नहीँ क्योँकि इससे यह लगता है कि माशूक़ के सिर पर ख़ाक डाली जा रही है जो माशूक़ का अपमान है।

    रिज़वान ने रोका जो तो कौसर उमड़ पड़ा; प्यासे प० थी यज़ीदियत उसको नहीँ पसन्द = जब जन्नत मेँ घुसने से मद्यार्थी को वहाँ के दरबान ने रोका तो जन्नत के भीतर से ‘कौसर’ नामक दिव्य मदिरा की नहर उमड़ कर बाहर आ गयी क्योँकि उसे रिज़वान का यह आचरण रुचिकर नहीँ लगा जो यज़ीद के उस आचरण से तुलनीय है जिसके अनुसार उसने कर्बला के शहीदोँ के लिए नदी का पानी बन्द कर दिया था और उन्हेँ प्यासा रख कर उनकी हत्या कर दी।
    जिस दर्द की दवा है गुज़रना हदोँ से पार; उस दर्द की चार०गरी हमको नहीँ पसन्द = ग़ालिब का मिसरा है — दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना — उस सन्दर्भ मेँ कहा है कि जिस दर्द का हद से गुज़र जाना ही उसकी दवा है उस दर्द का कोई इलाज करे यह हमेँ पसन्द नहीँ है।
    दामन ने यार के दिया जब आँधियोँ का साथ; हमने कहा — दिये! य० लौ हमको नहीँ पसन्द = जब यार का दामन भी दिया बुझाने के लिए आँधियोँ का साथ देने लगा तो हमने कहा कि ऐ दिये! यह तुम्हारी जलती हुई लौ हमेँ पसन्द नहीँ है।
    ‘नहीँ पसन्द’ रदीफ़ और क़ाफ़िय० मेँ पूछताछ, तर्ज़ य० किसको नहीँ पसन्द = जिस ग़ज़ल मेँ रदीफ़ ‘नहीँ पसन्द’ है जिसे हर शेर मेँ दुहराया गया है और क़ाफ़िया सिर्फ़ ‘को’ से बनाया गया है जिसका अर्थ ‘कौन?’ होता है, ऐसी ग़ज़ल का तर्ज़ किसको नहीँ पसन्द है?
    (‘को’ की फ़ारसी वर्तनी ‘काफ़’, ‘वाव’ है और इसका अर्थ ‘कौन’ है — इसी वर्तनी के साथ ‘कू’ उच्चारण करने पर इसका अर्थ ‘कहाँ’ भी होता है और ‘गली’ भी। इसके साथ ही हिन्दी की कई बोलियोँ मेँ भी ‘को’ का अर्थ ‘कौन’ होता है।)    ]]

     

     

     

     

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