सत्यजित रे की फ़िल्म ‘पाथेर पांचाली’ के सत्तर साल हो गये। इस महान फ़िल्म को याद कर रही हैं प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी वाणी त्रिपाठी– मॉडरेटर
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संघर्ष और सादगी से जन्मी, सत्यजित रे की पहली फिल्म हमें याद दिलाती है—तमाशे और शोर के इस दौर में भी करुणा, गरिमा और रोज़मर्रा की ज़िंदगी की कविता ही सिनेमा की सबसे बड़ी विजय है।
1956 की वह शाम जब पथेर पांचाली कान्स फिल्म समारोह में प्रदर्शित हुई, भारतीय सिनेमा की आत्मा ने पहली बार दुनिया को छुआ। उस क्षण तक भारत की छवि विदेशों में रंगीन गीतों, नाटकीय भावनाओं और चकाचौंध भरे परिदृश्यों से बंधी हुई थी। रे की पहली फिल्म ने उस परदे को एक झटके में चीर डाला—सामने था बंगाल का गाँव, गरीबी से जूझता एक परिवार, जहाँ बच्चे सरसों के खेतों में दौड़ते हुए ट्रेन का पीछा करते हैं और मां जीवन का बोझ ममता और कड़वाहट के बीच सँभालती है। यह भारत था—सच्चा, साधारण, परन्तु बेहद गहरा।
सात दशक बाद भी पथेर पांचाली केवल याद नहीं, अनुभव की तरह जीवित है। यह किसी संग्रहालय में काँच के भीतर रखी वस्तु नहीं, बल्कि आज भी साँस लेती हुई कला है। इसकी ताक़त इस बात में है कि यह सिर्फ़ गरीबी की कथा नहीं, बल्कि जीवन की अनगिनत परतों का आईना है।
बिभूतिभूषण बंदोपाध्याय के उपन्यास से उपजी यह फिल्म एक निर्धन ब्राह्मण परिवार की कथा है। हरिहर—सपनों में जीने वाला पिता, जो रोज़गार की तलाश में भटकता है। सरबजया—थकी हुई, पर अडिग मां, जो गुस्से और प्रेम के बीच डोलती रहती है। दुर्गा—मस्ती और विद्रोह से भरी बेटी, जिसके मन में कोमलता भी उतनी ही है जितनी आग। और अपू—जिज्ञासु, विस्मय से भरी आँखों वाला बालक, जो पहली बार दुनिया को खोज रहा है।
उनकी तकलीफ़ें साधारण हैं—उधार, भूख, बीमारी। लेकिन रे इन तकलीफ़ों को सिनेमा की सबसे उजली कविताओं में बदल देते हैं। याद कीजिए वह दृश्य—अपू और दुर्गा खेतों से भागते हैं, और क्षितिज पर से गुजरती ट्रेन को निहारते हैं। यह दृश्य केवल बच्चों की दौड़ नहीं, बल्कि अनंत संसार की ओर पहला कदम है।
या सरबजया का दुर्गा को डाँटना—अमरूद चुराने पर। करुणा बनर्जी का चेहरा एक ही पल में लज्जा, क्रोध और प्रेम से भर उठता है। यही तो जीवन है—न कोई अभिनय, न कोई सजावट। और फिर बूढ़ी इंदिर ठाकुरुन—चुनीबाला देवी की कांपती चाल, उनकी निर्भरता और स्वाभिमान का मिलाजुला स्वरूप। उनकी मृत्यु पर कोई शोर नहीं—बस खामोशी, जो पूरे घर को खाली कर देती है।
पथेर पांचाली का निर्माण स्वयं धैर्य और संघर्ष की दास्तान है। रे—जो उस समय विज्ञापनकर्मी और चित्रकार थे—तीन वर्षों तक टुकड़ों-टुकड़ों में फिल्म शूट करते रहे। पैसों की कमी इतनी थी कि पत्नी के गहने तक गिरवी रखने पड़े। अंततः पश्चिम बंगाल सरकार ने हाथ बढ़ाया। युवा दल में सब लगभग अनुभवहीन थे। 21 वर्षीय सुब्रत मित्रा ने पहली बार प्राकृतिक प्रकाश में “बाउंस लाइटिंग” जैसी तकनीक खोजी। रवि शंकर ने पूरी रात में संगीत रचा। सीमाएँ थीं, पर उन्हीं सीमाओं से जन्मा एक अनोखा सौंदर्य।
विदेश में फिल्म पहुँची तो मानो एक रहस्योद्घाटन हुआ। कान्स में इसे “सर्वश्रेष्ठ मानव दस्तावेज़” का पुरस्कार मिला। आलोचकों ने इसे दे सिका और जाँ रेनुआर से तुलना की, पर जल्द ही साफ हो गया—रे की आवाज़ अपनी है। भारतीय सिनेमा को उसका पहला महान हस्ताक्षर मिल चुका था।
फिल्म की आत्मा करुणा है। रे न गरीबी को महिमामंडित करते हैं, न ही उसे सस्ते भावुकपन में बेचते हैं। वे पात्रों को सम्मान और कोमलता से देखते हैं। उनकी खुशियाँ क्षणिक हैं, दुख गहरे हैं, पर वे प्रतीक नहीं—जीवित मनुष्य हैं।
आज भी दर्शक इन क्षणों में खुद को पाते हैं। अपू की ट्रेन—हर बच्चे की विस्मय भरी खोज। दुर्गा की मौत—हर मनुष्य का पहला गहरा शोक। सरबजया का साहस—हर मां की कहानी, जो टूटने पर भी परिवार को थामे रहती है।
आज पथेर पांचाली को क्यों याद करें? जब सिनेमाई दुनिया शोर और तमाशे में डूबी हो, यह फिल्म ख़ामोशी की शक्ति का स्मरण कराती है। जब भारतीय सिनेमा फिर से विश्वपटल पर चमक रहा है—चाहे पायल कपाड़िया की ऑल वी इमैजिन ऐज़ लाइट का कान्स विजय हो या आरआरआर का ऑस्कर पर धूम मचाना—हमें नहीं भूलना चाहिए कि यह सफ़र बंगाल की एक छोटी पगडंडी से शुरू हुआ था। रे ने साबित किया था कि ईमानदारी और सादगी का सौंदर्य दूर तक गूंजता है।
पथेर पांचाली कोई धरोहर भर नहीं है। यह जीवित ग्रंथ है, जो आज भी हमसे पूछता है—हम किसकी कहानियाँ कह रहे हैं? क्या हम अब भी साधारण जीवन को गरिमा से देख सकते हैं, या केवल चकाचौंध और शोर में खो गए हैं?
छोटी राह का गीत अब भी गूंजता है। ट्रेन अब भी गुज़रती है, बच्चे अब भी दौड़ते हैं, मां अब भी खामोशी से देखती है। वह राह समय से परे जाकर आज भी चलती है—अपू, दुर्गा और शायद हमारे अपने पदचिह्नों के साथ।
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