• स्तंभ वाणी त्रिपाठी
  • राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल के साठ साल

    आज प्रसिद्ध संस्कृतकर्मी वाणी त्रिपाठी टिक्कू ने  राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के रंगमंडल के साठ साल के गौरवपूर्ण इतिहास पर लिखा है। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

    ==================================

    जब 1964 में चार युवा अभिनेता — राममूर्ति, मीना विलियम्स, सुधा शिवपुरी और ओम शिवपुरी — दिल्ली के एक छोटे से मंच पर उतरे, तो उन्हें शायद अंदाज़ा भी नहीं था कि वे भारतीय रंगमंच के इतिहास की सबसे दीर्घजीवी प्रयोगशालाओं में से एक की नींव रख रहे हैं। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) की रेपर्टरी कम्पनी का जन्म किसी तामझाम से नहीं, बल्कि एक गहरी ज़रूरत से हुआ था — प्रशिक्षण और पेशेवर जीवन के बीच एक पुल बनाने की ज़रूरत। साठ साल बाद भी यह प्रयोग सांस लेता है, सवाल उठाता है और कभी-कभी, अद्भुत चमत्कार रच देता है।

    एनएसडी रेपर्टरी कम्पनी महज़ एक मंडली नहीं रही; वह एक जीवित प्रयोगशाला रही है — जहां अभ्यास, प्रयोग और प्रदर्शन एक दूसरे में घुलते हैं। इन छह दशकों में इसने भारतीय रंगमंच के तमाम द्वंद्वों को अपने भीतर समेटा है — परंपरा और आधुनिकता का संघर्ष, शिल्प और समाज का रिश्ता, और दर्शक को जगाए रखने की सतत चुनौती।

    भारत की रंग परंपरा उतनी ही पुरानी है जितनी उसकी सभ्यता, लेकिन आधुनिक भारतीय रंगमंच — शहरी, बहुभाषिक, धर्मनिरपेक्ष — बीसवीं सदी की देन है। 1959 में स्थापित एनएसडी ने इस परंपरा को अकादमिक आकार दिया। और 1964 में बनी रेपर्टरी कम्पनी ने इसे निरंतरता दी। एनएसडी से निकलने वाले सैकड़ों विद्यार्थियों के लिए यह एक आश्रय बना — जहां वे न केवल अभिनय करते थे, बल्कि अभ्यास, असफलता और पुनः प्रयास के ज़रिए सीखते थे।

    साठ और सत्तर के दशक में, ओम शिवपुरी और बाद में मनोहर सिंह के नेतृत्व में रेपर्टरी एक अनुशासित और गंभीर कलात्मक संस्था बन गई। तुग़लक, आधे अधूरे, हयवदन, अंधा युग जैसी प्रस्तुतियाँ केवल नाटक नहीं थीं — वे सांस्कृतिक घटनाएँ थीं। उन्होंने भारतीय रंगमंच की दृश्य, भाषिक और अभिनय व्याकरण गढ़ी।

    पर रेपर्टरी की असली उपलब्धि उसके मंच पर नहीं, उसके रिहर्सल रूम में रही। उस कठोर अभ्यास में जहां अभिनय को पेशा नहीं, साधना माना गया। शायद इसी वजह से एनएसडी रेपर्टरी किसी संस्था से ज़्यादा एक विचार रही — यह विश्वास कि रंगमंच सिर्फ मनोरंजन नहीं, आत्म-अनुशासन और आत्म-खोज की प्रक्रिया है।

    अस्सी के दशक तक आते-आते रेपर्टरी एक परिपक्व संस्था बन चुकी थी। उसने संस्कृत नाटकों से लेकर आधुनिक भारतीय नाटक और विश्व रंगमंच के अनुवाद तक सब कुछ मंचित किया। ब्रेख्त से लेकर भास और कर्नाड से लेकर चेख़व तक, उसने रंगभाषा की सीमाएँ तोड़ीं।

    दिल्ली का वार्षिक “ग्रीष्म रंगोत्सव” उसका पहचान बन गया। पुराने नाटक पुनः मंचित हुए, नए प्रयोग हुए और दर्शकों ने देखा कि एक सरकारी संस्था भी जीवंत, जोखिमभरी और समकालीन हो सकती है। देश-विदेश के दौरों ने रेपर्टरी को दिल्ली की सीमाओं से बाहर ले जाकर भारत का सांस्कृतिक दूत बना दिया।

    लेकिन इस यात्रा में संघर्ष भी था। भारत में संस्थागत रंगमंच हमेशा एक विरोधाभास के साथ जूझता रहा है — वह राज्य से सहयोग चाहता है, पर स्वतंत्र भी रहना चाहता है। रेपर्टरी ने इस संतुलन को बार-बार साधा है — कभी साहस से, कभी संकोच से।

    राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रैपर्टरी कंपनी के महान नाट्य-शिल्पी

     

    🔹 1. ओम शिवपुरी

    एनएसडी रैपर्टरी के पहले प्रमुख (1964–76), अभिनेता, निर्देशक और ‘दिशंतर’ संस्था के संस्थापक।

    🔹 2. मनोहर सिंह

    रैपर्टरी प्रमुख (1976–88), ‘तुग़लक’ और अनेक क्लासिक नाटकों के शानदार अभिनेता।

     

    🔹 3. राम गोपाल बजाज

    एनएसडी के पूर्व निदेशक, रैपर्टरी प्रमुख, अभिनेता व रंग-चिंतक।

     

    🔹 4. अमाल अल्लाना

    विख्यात डिज़ाइनर और निर्देशक, रैपर्टरी के लिए कई मशहूर प्रस्तुतियाँ दीं, बाद में एनएसडी की अध्यक्ष बनीं।

     

    🔹 5. नायमा ख़ान उप्रेती

    एनएसडी स्नातक, रैपर्टरी की सक्रिय अभिनेत्री, उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ीं।

    🔹 6. सुरेखा सीकरी

    एनएसडी व रैपर्टरी की वरिष्ठ अभिनेत्री, राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता, फिल्मों व टीवी में भी विशिष्ट पहचान।

     

    🔹 7. उत्तरा बावकर

    रंगमंच व फिल्मों की सफल अभिनेत्री, रैपर्टरी की अहम सदस्य, राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित।

     

    🔹 8. नीना गुप्ता

    एनएसडी स्नातक, रैपर्टरी में कार्य किया, आगे चलकर फिल्मों व टीवी में प्रसिद्धि पाई।

     

    🔹 9. पंकज कपूर

    रैपर्टरी के साथ जुड़े, बाद में टीवी और फिल्मों में लोकप्रिय अभिनेता-निर्देशक बने।

     

    🔹 10. नसीरुद्दीन शाह

    एनएसडी के रचनात्मक परिवेश से जुड़े, कई रैपर्टरी कलाकारों के साथ लंबे समय तक कार्य किया।

     

    🔹 11. अनुपम खेर

    एनएसडी व रैपर्टरी से करियर की शुरुआत, आगे चलकर हिंदी सिनेमा में बड़ा नाम बने।

     

    🔹 12. सुषमा सेठ

    वरिष्ठ अभिनेत्री, रंगमंच और सिनेमा दोनों में सक्रिय, रैपर्टरी के प्रशिक्षण और सांस्कृतिक गतिविधियों में योगदान।

    🔹 13. रघुवीर यादव

    रंगमंच और फिल्मों के प्रमुख अभिनेता, रैपर्टरी में कार्यरत, ‘पिपली लाइव’ जैसे कार्यों के लिए प्रसिद्ध।

    🔹 14. आलोक नाथ

    एनएसडी 1978 बैच के प्रतिभाशाली अभिनेता, रैपर्टरी में कार्य के बाद टीवी व फिल्म जगत में प्रसिद्ध हुए।

    🔹 15. भानु भारती

    निर्देशक, डिज़ाइनर और शिक्षक; रैपर्टरी के साथ जुड़कर कई महत्वपूर्ण प्रस्तुतियाँ कीं।

    🔹 16. मोहन महर्षि

    नाटककार, निर्देशक और एनएसडी के पूर्व निदेशक; रैपर्टरी में रचनात्मक भूमिका निभाई।

    🔹 17. कीर्ति जैन

    रंगनिर्देशक और एनएसडी की पूर्व निदेशक, रैपर्टरी में अनेक सृजनात्मक प्रस्तुतियाँ दीं।

    🔹 18. बी. एम. शाह

    हिन्दी  रंगमंच के प्रमुख नाम, उत्तराखण्ड से जुड़े और नाट्य संगीत पर अद्भुत काम, एनएसडी से जुड़े, रैपर्टरी में सक्रिय निर्देशन किया, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक भी रहे।

    🔹 19. साबिना मेहता जैतली

    रैपर्टरी में अभिनेत्री के रूप में सक्रिय, बाद में फिल्मों और अन्य माध्यमों में भी काम किया।

    🔹 20. त्रिपुरारी शर्मा

    नाटककार, निर्देशिका और एनएसडी संकाय सदस्य; रैपर्टरी के साथ कई प्रगतिशील नाटक मंचित किए।

    इन सभी उपरोक्त कलाकारों ने यहाँ राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) रैपर्टरी कंपनी के साथ लंबे समय तक काम किया, नाट्य कलाकारों और कलाकारों, निर्देशकों और रचनात्मक हस्तियों जिन्होंने न केवल रैपर्टरी के मंच को समृद्ध किया, बल्कि भारतीय रंगमंच और सिनेमा को नई दिशा दी।

    आज जब मंच के दर्शक मोबाइल स्क्रीन पर जा बसे हैं, तब एक सवाल उठता है — क्या रेपर्टरी जैसी संस्था अब भी प्रासंगिक है? जवाब आसान नहीं। रंगमंच का जादू उसकी नकल में नहीं, उसके क्षणिक अस्तित्व में है। हर प्रदर्शन अद्वितीय होता है, दोहराया नहीं जा सकता। लेकिन यही उसकी कमजोरी भी है।

    आज रेपर्टरी के सामने संसाधनों, दर्शक-आकर्षण और दृष्टि — तीनों की चुनौतियाँ हैं। युवा दर्शकों तक पहुँचना कठिन होता जा रहा है। डिजिटल माध्यम तेज़ हैं, थिएटर धीमा। लेकिन यह धीमापन ही उसका सौंदर्य है। यह वही ठहराव है जो संवेदना को जन्म देता है।

    फिर भी, यह स्वीकार करना होगा कि रेपर्टरी को अपनी विविधता और समावेशन के प्रश्नों से जूझना पड़ेगा। क्या इसके मंच पर भारत की असंख्य भाषाएँ, बोलियाँ, जातीय और क्षेत्रीय कथाएँ पर्याप्त रूप से मौजूद हैं? क्या यह केवल दिल्ली का रंगमंच रह गया है, या भारत का भी है?

    इस वर्ष रंग षष्टि — साठवीं वर्षगाँठ — के अवसर पर आयोजित समारोह इस आत्ममंथन का ही प्रतीक है। पुराने नाटकों की पुनर्प्रस्तुतियाँ और नई प्रयोगशीलता दोनों यह याद दिलाते हैं कि परंपरा कोई वस्तु नहीं, एक प्रक्रिया है — जो निरंतर चलती रहती है।

     

    रंगमंच और राष्ट्र

    रेपर्टरी की कहानी दरअसल भारत की कहानी भी है — स्वतंत्रता के बाद की वह यात्रा जो आदर्शवाद से शुरू हुई, विविधता में पली-बढ़ी और अब तकनीक व वैश्वीकरण से जूझ रही है। जैसे राष्ट्र, वैसे ही रंगमंच — स्मृति और नवाचार के बीच संतुलन की खोज।

    एक रिहर्सल रूम में समय रुक जाता है। संवाद, मौन, प्रतीक्षा — सबका अपना अर्थ होता है। यह दुनिया की सबसे मानवीय जगह है। एनएसडी रेपर्टरी ने साठ वर्षों तक इसी धीमे जादू की रक्षा की है।

     

    आगे का रास्ता

    अगले साठ वर्षों के लिए तीन बातें ज़रूरी हैं।

    पहली — विविधता। रेपर्टरी को अपनी सीमाओं से बाहर निकलना होगा। असम, कश्मीर, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, मणिपुर — हर भाषा, हर परंपरा को मंच देना होगा। यह संस्था तभी राष्ट्रीय कहलाएगी जब इसकी आवाज़ें बहुभाषिक और बहुस्तरीय होंगी।

    दूसरी — संग्रह और अभिलेखन। साठ वर्षों का इतिहास केवल स्मृति नहीं, धरोहर है। नाट्य ग्रंथ, डिज़ाइन, तस्वीरें, निर्देशक की टिप्पणियाँ, वीडियो — सबको सुरक्षित और डिजिटाइज़ किया जाना चाहिए। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए पाठशाला होगी।

    तीसरी — जोखिम और प्रयोग। नौकरशाही स्थिरता अक्सर रचनात्मकता को दबा देती है। रेपर्टरी का जन्म प्रयोग के भाव से हुआ था। वह जिद, वह बेचैनी, वही रंग-साहस उसे जीवित रखेगा।

     

    जब एनएसडी रेपर्टरी का मंच उजाला लेता है, तो सिर्फ एक नाटक शुरू नहीं होता — साठ वर्षों का सामूहिक श्रम, सैकड़ों कलाकारों की स्मृति, और अनगिनत रिहर्सलों की सांसें उसमें शामिल होती हैं। इन कलाकारों ने न केवल भारतीय रंगमंच को आकार दिया, बल्कि हमारे समाज की संवेदनशीलता को भी विस्तार दिया है। साठ साल बाद रेपर्टरी की यह वर्षगाँठ किसी उत्सव से अधिक एक स्मरण और संकल्प है — यह याद कि कला तभी टिकती है जब वह निरंतर संवाद में रहे; जब संस्था केवल ढांचा नहीं, विचार बन जाए; और जब मंच पर उठती खामोशी, तालियों से कहीं अधिक गहरी हो। इस साल रेपिटरी कंपनी ने देश विदेश में कई यात्राएं करीं और पिछले दिनों सिंगापुर में वो तीन नाटक लेकर वहां बड़े महोत्सव करके लौटे हैं।नाटक थे “बाबूजी” “ताजमहल का टेंडर “और “अभिज्ञान शाकुंतलम”। पूरे साल भर एक रंगरथ यानि थिएटर बस में बैठकर वो देश के सभी राज्यों में यात्राएं कर रहे हैं और मंशा तो ये भी है कि अगले साल तक षष्ठी खत्म होने तक और कई देशों की यात्राएं भी हो पाएंगी।

    नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की रेपर्टरी कम्पनी ने साठ वर्षों से उस खामोशी को जिंदा रखा है।

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    1 mins