आज बिहार विधानसभा के लिए पहले चरण का मतदान है। दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र मुशर्रफ परवेज़ ने यह दिलचस्प टिप्पणी लिखी है जिसमें उन्होंने मन्नू भंडारी के उपन्यास ‘महाभोज’ और बिहार चुनाव की तुलना की है। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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हाल में बिहार सरकार द्वारा “मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना” अंतर्गत महिलाओं के खाते में ₹10,000 भेजा गया तभी मुझे “महाभोज” वाले दा साहब याद आ गए। “घरेलू-उद्योग योजना” स्कीम के पीछे का कारण भी समझ आने लगा। दा साहब ने भी सरोहा गांव के लोगों को चुनाव से डेढ़-महीने पूर्व ₹5,000 देने का ऐलान किया था।
ख़ैर, मन्नू भंडारी से अपना परिचय दिल्ली आने पर हुआ। इस नाते प्रो० नीलिमा चौहान मैम का आभार तो बनता ही है कि उन्होंने “अस्मितामूलक विमर्श” पढ़ाने के दौरान “आपका बंटी” उपन्यास का ज़िक्र किया। जबसे नॉर्थ कैम्पस रहने लगा और आज भी “मिरांडा हाउस” होकर गुजरता हूँ तो टीचर्स कॉलोनी आते ही दिमाग़ में ये बात दौड़ने लगती है कि मन्नू जी कभी यहीं रहा करतीं थीं।
बिहार को लोकतंत्र की जननी कहा जाता है। समूचे देश की नज़र बिहार पर होती है। ये भी कहा जाता है कि जो बिहार में बहुमत पाता है उसकी केंद्र में भी सरकार बनती है। वर्तमान में NDA एलायंस की सरकार है बाक़ी बिहार का रुझान तो 14 नवंबर को ही पता चल पाएगा।
इन दिनों बिहार में दो महापर्व हैं। एक आस्था का महापर्व “छठ पूजा” जो बीत गया और दूसरा लोकतंत्र का महापर्व “बिहार चुनाव” जिसका परिणाम 14 नवंबर को आना है। वर्तमान में बिहार चुनाव अपने चरम पर है। आज पहले चरण का मतदान चल रहा है। दिल्ली, बम्बई, कलकत्ता, बनारस, गुजरात आदि राज्यों से लोग दोनों महापर्व का हिस्सा बनने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं।
वैसे तो मैं कोई राजनीतिक विशेषज्ञ हूँ नहीं। लेकिन अपनी जन्मभूमि बिहार है तो थोड़ी बहुत समझ राजनीति की है। साल 2010 से विधान सभा चुनाव को बड़ी पैनी नज़र से देखता आ रहा हूँ। बिहार चुनाव दो दशक से मुख्य रूप से दो धुरी पर टिका रहा है। आपके में मन में ये प्रश्न उठ सकता है आख़िर कैसे? एक धुरी NDA समर्थित नीतीश बाबू की तो दूसरी धुरी INDIA समर्थित तेजस्वी की है। ठीक वैसा ही सन् 1979 का मन्नू भंडारी लिखित उपन्यास “महाभोज” है। जिसमें एक तरफ़ “दा साहब” जो बतौर मुख्यमंत्री हैं वहीं दूसरी तरफ़ “सुकूल बाबू” जो भूतपूर्व मुख्यमंत्री हैं। इसीलिए प्रेमचंद का ये वाक्य प्रासंगिक हो जाता है कि “साहित्य समाज का दर्पण है”।
महाभोज की पृष्ठभूमि में सरोहा का एक गांव है। जहां के हरिजन टोला की झोपड़ियों में आग लगवा दीं गईं थीं। जिसके प्रमाण बिसेसर उर्फ़ बिसु के पास थी। वो दोषियों को सज़ा दिलाने हेतु सारे प्रमाण दिल्ली ले जाना चाहता था। लेकिन उससे पहले ही उसकी हत्या करवा दी गई। उसी हत्या को आधार बनाकर दोनों धुरी के नेताओं ने चुनावी बिगुल बजाया। अंत में बिसु को न तो इंसाफ मिल सका और न ही दोषियों को सज़ा।
तमाम राजनीतिक दलों की बिहार में भरपूर रैलियां हो रहीं हैं। सभी दलों के द्वारा दर्जनों वादे किए जा रहे हैं। ठीक वैसे ही जैसे महाभोज के पूर्व-मुख्यमंत्री, सुकूल बाबू एक रैली में कह रहे होते हैं- “यह मत सोचिए कि मैं यहां आपसे वोट मांगने आया हूँ”। असल में इतने प्रपंच वोट के लिए ही किए जा रहे हैं। ताकि बिसु की हत्या को भुनाकर चुनाव को भेदा जा सके।
आपने अमूमन देखा होगा कि जब कभी कोई राजनीति पोषित घटना होती है उस समय राजनेता उस घटना को छुपाने के लिए मीडिया को बैसाखी बनाकर नया मुद्दा छेड़वा देते हैं ताकि भोली-भाली जनता उसी में उलझकर रह जाए। समूचे हरिजन टोला में लोग हत्या को लेकर आग-बबूला थे पर जैसे ही घरेलू-उद्योग योजना का ऐलान हुआ लोग बिसु को चंद लम्हों में भूल गए।
दा साहब रैली करने से पूर्व हीरा जो बिसु का बाप है उसके घर जाते हैं। उस समय पूरा टोला हीरा के क़िस्मत की दुहाई देना लगता है। लेकिन हीरा जिसका वारिस छीना गया है उसके दिल की बात कोई नहीं कर रहा। आज भी बिहार में जब कभी गोलियां चलतीं हैं, या बच्चे डूब जाते हैं, या सड़क दुर्घटना हो जातीं हैं उस समय तमाम दलों के नेता पीड़ित के घर जाते हैं। अगल-बगल में चर्चाएं चलने लगतीं हैं कि चलो बेटा गया तो गया ₹50,000 का चेक तो मिला न हिरवा को।
चुनावी रैलियों का समीकरण यही रहा है कि मोटरसाइकिल के पेट्रोल के लिए ₹300 और ₹500 पर लड़के फिट किए जाते हैं और भीड़ जुटाई जाती हैं। सोशल मीडिया के आगमन ने युवाओं को इतना क्रांतिकारी बना दिया है कि वे “सेल्फी” के चक्कर में ये सवाल नहीं पूछते हैं कि बेरोज़गारी क्यों नहीं कम रही?
सुकूल बाबू ने भी रैली में अपने बिचौलिए के मार्फ़त ये कहलवा दिया है कि प्रति व्यक्ति को दो समय का खाना और ₹5, ₹5 दिए जाएंगे।
अब देखना ये है कि 14 नवम्बर को किसके सिर पर मुख्यमंत्री का ताज चढ़ता है। क्या नीतीश जी 10वीं बार मुख्यमंत्री बनते हैं या युवा जोश के साथ तेजस्वी। बाक़ी बिहार की जनता किसको चुनती है ये बड़ा दिलचस्प होने वाला है। इस बार के चुनाव में जनसुराज भी तृतीय शक्ति के रूप में है। देखना ये है कि इस तृतीय शक्ति का क्या रुझान रहता है? वाकई में इस दल के रैलियों की भीड़ वोट में परिवर्तित होती है या हवा-हवाई बनकर रह जाती है।

