• लेख
  • यांग शुआंग-ज़ी और इंटरनेशनल बुकर प्राइज़

    इस साल इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ 2026 ताइवानी लेखक यांग शुआंग-ज़ी के उपन्यास ताइवान ट्रैवलॉग को मिला है। मंदारिन भाषा में लिखा गया यह उपन्यास पहली बार 2020 में ताइवान में प्रकाशित हुआ था, जिसके अंग्रेज़ी अनुवादक का नाम है लिन किंग। याद दिलाता चलूँ कि पिछले साल यह पुरस्कार कन्नड़ भाषा की लेखिका बानू मुश्ताक़ के कहानी संग्रह ‘हार्ट लैंप’ को मिला था, जिसका अनुवाद किया था दीपा भस्थी ने। यह भी याद दिलाता चलूँ कि कुछ साल पहले यह पुरस्कार हिन्दी लेखिका गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘रेत समाधि’ के अंग्रेज़ी अनुवाद ‘टॉम्ब ऑफ सैंड’ को मिला था, जिसका अनुवाद किया था डेज़ी रॉकवेल ने। यह पुरस्कार लेखकों के साथ साथ अनुवादकों को भी दिया जाता है। बहरहाल, बुकर इंटरनेशनल प्राइज़ और यांग शुआंग जी के उपन्यास ताइवान ट्रैवलॉग के बहाने से यह लेख लिखा है कुमारी रोहिणी ने, जो कोरियन भाषा विशेषज्ञ हैं। आप यह लेख पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर 

    ====================== 

    पिछले कुछ सालों में दुनिया के बड़े साहित्यिक पुरस्कारों ने बार-बार यह साबित किया है कि अनुवाद अब “मूल” साहित्य का रूपांतरण भर नहीं रह गया है।
    चाहे टॉम्ब ऑफ़ सैंड हो, ओल्गा टोकार्चुक की रचनाएँ हों, ऑर्बिटल हो, कर्स्ड बनी या हान कांग और जोखा अलहार्थी जैसे लेखकों का ट्रांसलेटेड साहित्य अब दुनिया की साहित्यिक संवेदना के केंद्र में है।
    शायद इसलिए भी होने लगा हैं पढ़ने-लिखने की दुनिया के संवेदनशील लोग अब समझने लगे हैं कि अनुवाद केवल भाषाओं की सीमाएँ दूर करने का माध्यम नहीं है। बल्कि उसके ज़रिए एक अनुवादक किसी देश-संस्कृति के भूगोल, इतिहास, स्मृतियों और मनुष्यता को दूसरी भाषा के पाठकों तक पहुँचाने की कोशिश करता है।
    मुझे ये सब याद आ रहा है जब इस साल इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ मिला है ताइवान ट्रैवलॉग को, जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद लिन किंग ने किया है। यह पहली बार है जब मूल रूप से मंदारिन चीनी में लिखे किसी उपन्यास को यह पुरस्कार मिला है।
    1938 में जब ताइवान जापान का उपनिवेश था, उसी की पृष्ठभूमि में इस उपन्यास को रखा गया है। इसलिए पहली नज़र में एक ट्रैवलॉग और फ़ूड-मेमॉयर जैसी लगती है। लेकिन पढ़ते हुए धीरे-धीरे एहसास होता है कि यह दरअसल दो स्त्रियों के बीच बनते उस संबंध की किताब भी है, जो साथ की यात्राओं, बातचीतों और साझा अनुभवों के भीतर आकार लेता है। पिछले दिनों रामचंद्र गुहा और उनके संपादक रकुल की बातचीत पर आधारित किताब चर्चा में रही थी, और यहाँ भी लेखक और अनुवादक का रिश्ता केवल पेशेवर सहयोग नहीं रह जाता, बल्कि टेक्स्ट की संवेदना का हिस्सा बन जाता है।
    यह उपन्यास जापानी लेखिका आओयामा चिज़ुको की ताइवान यात्रा और उनकी ताइवानी दुभाषिया ओ चिज़ुरु के साथ विकसित होते संबंधों का वर्णन करता है। उपन्यास की सबसे दिलचस्प बात यह लगी कि इसमें भोजन केवल भोजन नहीं है। एक जगह चिज़ुको कहती है “when it comes to food, I will forever have room in my stomach.” और सचमुच, पूरी किताब में खानपान ही स्मृति, इच्छा, संस्कृति और सत्ता, चारों का माध्यम बन जाता है।
    रेल यात्राओं, लोकल कॉफ़ी और टी हाउस, seafood, बाज़ारों और छोटी-छोटी बातचीत के बीच दोनों स्त्रियों के बीच एक ऐसा अपनापन जन्म लेता है जिसे व्यक्त करने के लिए हमेशा शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती। लेकिन इसी के साथ किताब बहुत शांत ढंग से यह भी दिखाती चलती है कि उपनिवेश केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं होता; वह लोगों के स्वाद, भाषा, व्यवहार और देखने के तरीकों में भी बस जाता है।
    इस किताब को पढ़ने वालों का भी मानना है कि उपन्यास का असली तनाव इसी में है कि “कौन लिख रहा है, और किसे लिखा जा रहा है।” चिज़ुको ताइवान को बेहद प्रेम और उत्सुकता से देखती है, लेकिन धीरे-धीरे पढ़ने वाले को महसूस होने लगता है कि प्रेम और जिज्ञासा के भीतर भी सत्ता-संबंध छिपे हो सकते हैं। शायद इसी वजह से यह किताब केवल एक यात्रा-वृत्तांत नहीं रह जाती, बल्कि उपनिवेश, भाषा, पहचान और स्त्री-अस्तित्व पर बेहद सूक्ष्म टिप्पणी बन जाती है।

    मुझे इस किताब की एक और बात बहुत दिलचस्प लगी—यह खुद को एक “अनुवाद” की तरह प्रस्तुत करती है। मूल टेक्स्ट, फुटनोट्स, अनुवादक की टिप्पणियाँ, आफ्टरवर्ड, सब मिलकर इसे एक layered reading experience बना देते हैं। कई लोगों ने भी लिखा है कि इस किताब को केवल कहानी की तरह नहीं, बल्कि “translation within translation” की तरह पढ़ा जाना चाहिए।

    मुझे लगता है कि ताइवान ट्रैवलॉग को यह पुरस्कार इसलिए भी मिला क्योंकि यह इतिहास को बड़े युद्धों और शासकों की जगह रोज़मर्रा के जीवन के भीतर पढ़ने की कोशिश करती है, खाने की टेबल, ट्रेन जर्नी, अनुवाद से जुड़ी झिझक और बातचीत में छिपे सत्ता-संबंधों के ज़रिए। शायद आज की दुनिया में ऐसी कहानियाँ इसलिए ज़्यादा महत्वपूर्ण लगने लगी हैं क्योंकि वे इतिहास को मनुष्यों की निजी स्मृतियों और संबंधों के भीतर खोजती हैं।

    एक अनुवादक के नाते इस टेक्स्ट को पढ़ते समय मुझे बार-बार लगा कि इसके अंग्रेज़ी अनुवाद में केवल शब्दों का रूपांतरण नहीं किया गया है। कई सांस्कृतिक संदर्भ, भोजन के नाम, संबोधन और भाषाई लहजे ऐसे हैं जिन्हें दूसरी भाषा में ले जाना केवल तकनीकी काम नहीं रहा होगा। कुछ जगहों पर पढ़ते हुए लगा कि अनुवादक को शब्दों के साथ-साथ पूरे सांस्कृतिक तापमान को दूसरी भाषा में पहुँचाने की कोशिश करनी पड़ी होगी। शायद अनुवाद और अनुवादक का मूल उद्देश्य भी अंततः यही होता है।

    और शायद इस उपन्यास की सबसे बड़ी खूबसूरती भी यही है कि यह बहुत धीरे-धीरे आपको यह महसूस कराता चलता है कि एक समय के बाद भाषा और प्रेम—दोनों ही तय सीमाओं के भीतर नहीं रहते।

    (नोट: किताब तभी पढ़नी शुरू कर दी गई थी जब यह शॉर्टलिस्ट में आई थी। अभी पूरी नहीं हुई है। लेकिन जितनी पढ़ी गई है, उतने से उपजा यह विचार है।)

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    1 mins