उर्दू के प्रसिद्ध शायर राजेंद्र नाथ रहबर की आज जन्मतिथि है। ‘तेरे ख़ुशबू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे’ जैसी प्रसिद्ध नज़्म उनकी ही लिखी हुई है, जिसको जगजीत सिंह ने गाया था और ‘अर्थ’ फ़िल्म में इस नज़्म को शामिल भी किया गया था। उनकी शायरी पर यह लेख लिखा है युवा लेखक अभिषेक कुमार अम्बर ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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अविभाजित पंजाब के गुरदासपुर ज़िले की शकरगढ़ तहसील में 05 नवम्बर 1931 को जन्मे राजेन्द्र नाथ रहबर उर्दू के मशहूर और मारूफ़ उस्ताद शायर थे। उनके पिता का नाम श्री तिलोकचंद शर्मा तथा माता का नाम लक्ष्मी देवी था। पिता पेशे से वकील थे और शकरगढ़ में ही वकालत किया करते थे। रहबर साहब ने अपनी शुरुआती तालीम शकरगढ़ में ही हासिल की, वह दसवीं के इम्तिहान दे रहे थे कि उस वक़्त दुनिया की तारीख़ में एक बेहद दर्दनाक सानेहा पेश आया, जिसने हिंदुस्तान के लाखों लोगों की ज़िन्दगी को रंजो-ग़म से भर दिया, जिसका असर रहबर साहब और उनके परिवार पर भी हुआ, और यह सानेहा था भारत की तक़सीम। रहबर साहब को भी महज़ 16 साल की उम्र में परिवार के साथ अपना घर-बार छोड़ कर हिन्दुस्तान आना पड़ा। कई दिनों तक पैदल क़ाफ़िले के साथ चलकर वो जम्मू कश्मीर के रास्ते विभाजित भारत में दाखिल हुए। और कुछ दिन इधर-उधर रहने के बाद पठानकोट में बस गए, और ता-उम्र वहीं रहे।
रहबर साहब ने अपनी शुरुआती तालीम के बाद, बी.ए. हिन्दू कॉलेज अमृतसर से किया। कॉलेज में मुशायरे होते जिनमें जोश मल्सियानी, सरदार पूरन सिंह हुनर, अर्श मल्सियानी, तिलोकचंद महरूम को सुनने का मौक़ा मिला। इस अदबी माहौल का असर ही था कि शेर कहने की कोशिश करने लगे। इस शौक को परवाज़ बड़े भाई ईश्वरदत्त अंजुम से मिली।’अंजुम’ (जो आगे जाकर ख़ुद भी शायर हुए) उस वक़्त के कई अदबी रिसाले और अख़बार घर लाया करते और उनमें शाया हुए अशआर को वह तरन्नुम में गुनगुनाया करते। रहबर साहब भी इन रिसालों के ज़रीये अदब में दिलचस्पी लेने लगे। एक बार ‘हिन्द समाचार’ (जालंधर) अखबार में तरही मिसरा दिया गया,
‘तस्वीर हो गया तेरी तस्वीर देख कर’
जिसपे रहबर साहब ने भी तबअ आज़माई की, और कुछ अशआर लिखकर अखबार के मुदीर (संपादक) को भेज दिए। और क्या देखते हैं कि अख़बार की अगली किश्त में बाक़ी शायरों के साथ उनके भी दो अशआर शाया हुए हैं। वह अशआर थे –
तूने लिखा है भूल जा गुज़रे हुए वो दिन
हैरान हो गया हूँ मैं तहरीर देख कर।
सब पूछने लगे मेरे दिल की हक़ीक़तें
हर वक़्त तेरी याद में गंभीर देख कर।
मार्च 1949 के तरही मिसरे से शुरू हुआ ग़ज़लगोई का यह सिलसिला ता-उम्र जारी रहा। कुछ वक्त बाद पठानकोट के ही एक सीनियर शायर दरबारी लाल ‘मासूम’ के मशवरे पर पंडित रतन पंडोरवी से इस्लाह करने लगे, जो अमीर मीनाई के चहेते शागिर्द ‘दिल’ शाहजहाँपुरी के शागिर्द थे। रतन पंडोरवी हरगोविंदपुर में व्यास नदी के किनारे जंगल में स्थापित शिव मंदिर में रहते थे। रहबर ने उसी वीराने में रतन साहब से शायरी के गुर सीखे। रहबर और उनके कलाम में दरवेशी देखने को मिलती है वो रतन पंडोरवी की सुहबत की देन है बकौल रहबर –
हमको दरवेशी की दौलत भी मिली है फ़न के साथ
हम रतन पंडोरवी के सीनियर शागिर्द हैं
आगे की तालीम ख़ालसा कॉलेज से हासिल की, यहाँ से उन्होंने परास्नातक (अर्थशास्त्र) की उपाधि प्राप्त की तथा उसके बाद पंजाब यूनिवर्सिटी से एल.एल.बी की डिग्री हासिल की और एकाउंटैंट जनरल शिमला के ऑफ़िस में नौकरी करने लगे। और लंबे अरसे तक शिमला में मुक़ीम रहे। शिमला उस समय शायरों की पसंदीदा जगहों में से एक होता था और बहुत से शायर वहाँ बसे हुए थे। यहाँ रहबर ने कुछ शायरों के साथ मिलकर ‘बज़्म-ए-अदब शिमला’ नाम से एक इदारे की शुरुआत की। और यह इदारा शिमला में बहुत से मुशायरे मुनअक़्क़िद करता था। जिनमें देश भर से मक़बूल शायरों को बुलाया जाता था। इसमें शामिल होने वाले शायरों में जोश मलसियानी, पण्डित मेला राम वफ़ा, जगन्नाथ आज़ाद आदि शामिल थे। रहबर साहब ने 1961 में हिमाचल प्रदेश के 22 शायरों का एक साझा संकलन ‘आगोश-ए-गुल’ नाम से भी संपादित किया था। और उसके अगले ही साल 1962 में उनका पहला शे’री मजमूआ ‘कलस’ नाम से शाया हुआ जिसने काफ़ी शुहरत हासिल की।
शिमला में एक अच्छा-खासा अरसा गुज़ारने के बाद रहबर चंडीगढ़ आ गए, यहाँ उनके दोस्त मशहूर शायर प्रेम वारबर्टनी रहते थे, जिन्होंने बॉलीवुड में भी बहुत से गीत लिखे थे। रहबर ने अपनी मशहूर-ए-ज़माना नज़्म ‘तेरे ख़ुशबू में बसे ख़त’ जनवरी 1972 में लिखी । उन्होंने तीन साल तक यह नज़्म न कहीं छपवाने के लिए भेजी और न ही कहीं सुनाई। यह नज़्म पहली बार उनके शे’री मजमूए मल्हार (1975) में शामिल हुई।
रहबर ने प्रेम वारबर्टनी को अपनी नज़्म ‘तेरे ख़ुशबू में बसे ख़त’ सुनाई तो उनको यह नज़्म बेहद पसन्द आई और उन्होंने रहबर से कहा कि जगजीत सिंह इस नज़्म को ज़रूर गाना पसन्द करेंगे। प्रेम और जगजीत बहुत अच्छे दोस्त थे तो उनको जगजीत की पसंद मालूम थी। रहबर ने इस नज़्म के ख़ासा मशहूर पाँच मिसरे भेज दिए।
“तेरे ख़ुशबू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे
प्यार में डूबे हुये ख़त मैं जलाता कैसे
तेरे हाथों के लिखे ख़त मैं जलाता कैसे
तेरे ख़त आज में गंगा में बहा आया हूँ
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ।”
जगजीत ने इन मिसरों को अपनी महफ़िलों में गाना शुरू किया उनकी विदेश की एक एल्बम में यह शामिल थी तो रहबर ने पूरी नज़्म उनको भेज दी, जिसके बाद जगजीत सिंह ने उनको फोन करके नज़्म की तारीफ़ की। यह नज़्म जगजीत की कई एलबम्स में शामिल है। यह नज़्म उस चुनिंदा कलाम में से है जिसने जगजीत को जगजीत बनाया। महेश भट्ट की फ़िल्म ‘अर्थ’ (1982) में भी यह नज़्म शामिल है जिसमें इसे शबाना आज़मी पर फिल्माया गया है। जगजीत ने उनकी एक ग़ज़ल ‘आइना सामने रक्खोगे तो याद आऊँगा’ को भी अपनी मखमली आवाज़ में गाया है।
रहबर ने अपनी शायरी के ज़रिये उर्दू अदब में अपना एक ख़ास मक़ाम बनाया, जहाँ रहबर के कलाम की मश्शाक़ी और उस्तादाना रवानी के कायल शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी जैसे नक़्क़ाद भी थे तो वहीं उनकी साफ़-सुथरी, मुहावरेदार और रोज़-मर्रा से आरास्ता दिलकश और दिलावेज़ ज़बान की तारीफ़ अली सरदार जाफ़री और कालिदास गुप्ता रिज़ा अपने ख़तों में करते हैं। रहबर ने यूँ तो कई असनाफ़ में हाथ आज़माया लेकिन जब उनकी ग़ज़लों और नज़्मों की बात होती है तो प्रेम वारबर्टनी जैसे शायर को भी यह फ़ैसला करने में दुश्वारी पेश आती है कि रहबर की ग़ज़लें ज़ियादा ख़ूबसूरत हैं या नज़्में।
रहबर की शायरी जदीद और रवायती ग़ज़ल के बीच से अपना रास्ता निकालती हुई आगे बढ़ती है। उन्होंने किसी तहरीक से जुड़कर अपनी सोच के ज़ाविये को सीमित नहीं किया बल्कि अपने दिल के एहसास को सादगी से बयान किया है उनके यहाँ आपको इंसानी रिश्तों, ज़िन्दगी के मसाइल, कुदरत, हुब्ब-उल-वतनी आदि पहलुओं पर शेर मिल जाएंगे। बकौल प्रेम वारबर्टनी “रहबर ब-हैसियत सिर्फ़ रंगारंग मोतियों के शायर नहीं बल्कि उन के दामन में कंकर भी हैं, चंद ऐसे नोकीले और निराले कंकर जिन की दिल-नवाज़ चुभन पर मोतियों की आबो-ताब और उनका सारा लम्स न्योछावर किया जा सकता है। ” मुलाहिज़ा हो उनके कुछ अशआर-
नतीजा कुछ न निकला हाले-दिल उनको सुनाने का
वो बल देते रहे आँचल को बल खाता रहा आँचल
देखा उसे जो एक सदी बाद तो ‘रहबर’
छालों की तरह फूट पड़े प्यार पुराने
मिल गए जब तुम तो कैसा काम फिर
घर से हम निकले थे यूँ तो काम से
कहीं ज़मीं से तअल्लुक़ न ख़त्म हो जाये
बहुत न ख़ुद को हवा में उछालिए साहिब
अभी न गुलशने-उर्दू को बे-चराग़ कहो
खिले हुए हैं अभी चंद फूल शाख़ों पर
लिपट के जिससे तेरे दर्दमंद रो लेते
वही दरख़्त सरे-रहगुज़र नहीं आया
काश कुशादा दिल भी रखता
जिस घर की दहलीज़ बड़ी है
शिकस्त खा के मोहब्बत में यूँ उदास न हो
ये हार जीत से बेहतर है हारने वाले
भूल जाना मुझे आसान नहीं है इतना
जब मुझे भूलना चाहोगे तो याद आऊँगा
रहबर ने सात दशकों से ज़ियादा तक उर्दू अदब की ख़िदमत की और 10 से ज़ियादा किताबें अदब को दीं और उनका बहुत सा लेखन अभी भी अप्रकाशित है। रहबर की प्रकाशित किताबों में आगोशे-गुल (1961) कलस (1962), मल्हार (1975), और शाम ढल गई (1978), जेबे-सुख़न (1997), तेरे खुशबू में बसे ख़त (2003), याद आऊँगा (2006), उर्दू नज़्म में पंजाब का हिस्सा (2017), तेरे खुशबू में बसे ख़त (2017) (द्वितीय संस्करण), शायर हमारे (2020) और नायाब शेर (2021) शामिल हैं।
रहबर एक कुहना-मश्क़ उस्ताद शायर की हैसियत रखते थे। रहबर ने सिर्फ़ पठानकोट ही नहीं बल्कि देश भर में सैंकड़ों शायरों को शायरी का फ़न सिखाया है। उनकी रहनुमाई का ही असर है कि उनके कई शागिर्द आज के मशहूर शायरों में शुमार होते हैं। सुरेश चंद्र शौक़, पूरन एहसान, महावीर सिंह दुखी, श्यामसुंदर नंदा नूर, दर्शन दयाल परवाज़ नुरमहली, अनु जसरोटिया, नरेश निसार, अभिषेक कुमार अम्बर, कुसुम ख़ुशबू, रविकांत अनमोल, नासिर युसुफ़ज़ई आदि शामिल हैं। रविकांत अनमोल को रहबर के साहित्य पर शोध के लिए एम.फ़िल. की उपाधि भी प्रदान की गई है। जगजीत सिंह के अलावा रहबर की ग़ज़लों, नज़्मों को दर्जनों गायकों ने अपनी आवाज़ दी है इनमें जगजीत सिंह, अनुराधा पौडवाल, सुरेश वाडेकर, ग़ज़ल श्रीनिवास, घनश्याम वासवानी, तौसीफ़ अख़्तर और संजय वत्सल आदि मुख्य हैं।
रहबर को यूँ तो देश-विदेश की सैकड़ों संस्थानों ने सम्मानित किया है। लेकिन पंजाब सरकार ने रहबर की साहित्य सेवा हेतु अपने सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ‘शिरोमणि उर्दू साहित्यकार पुरस्कार’ से 2009 में सम्मानित किया। इसके अलावा रहबर पंजाब उर्दू अकादमी की गर्वनिंग काउंसिल के भी मेम्बर रहे।
रहबर की 2020 में आई किताब ‘शायर हमारे’ साहित्यप्रेमियों के लिए एक नायाब तोहफ़ा है जिसमें उर्दू के 170 से अधिक शायरों की जीवनी एवं चुनिंदा अशआर हैं। रहबर अपनी ज़िंदगी के आख़िरी समय में भी साहित्य सेवा में लगे थे और अपनी आत्मकथा पर काम कर रहे थे। लेकिन कोरोना के बाद स्वास्थ्य पर पड़े प्रभाव के कारण वह 92 वर्ष की आयु में 13 नवम्बर 2022 को इस जहाने-फ़ानी को अलविदा कह गए। लेकिन जब तक उनकी शायरी रहेगी तब तक वो अपने चाहने वालों के दिलों में ज़िन्दा रहेंगे। पेश हैं उनके कलाम में से कुछ चुनिंदा कलाम!
ग़ज़ल – 1
तुम जन्नते कश्मीर हो तुम ताज महल हो
‘जगजीत` की आवाज़ में ग़ालिब की ग़ज़ल हो
हर पल जो गुज़रता है वो लाता है तिरी याद
जो साथ तुझे लाये कोई ऐसा भी पल हो
होते हैं सफल लोग मुहब्बत में हज़ारों
ऐ काश कभी अपनी मुहब्बत भी सफल हो
उलझे ही चला जाता है उस ज़ुल्फ़ की मानिन्द
ऐ उक़दा-ए-दुशवारे मुहब्बत कभी हल हो
लौटी है नज़र आज तो मायूस हमारी
अल्लह करे दीदार तुम्हारा हमें कल हो
मिल जाओ किसी मोड़ पे इक रोज़ अचानक
गलियों में हमारा ये भटकना भी सफल हो
ग़ज़ल – 2
महताब नहीं निकला सितारे नहीं निकले
देते जो शब-ए-ग़म में सहारे नहीं निकले
कल रात निहत्ता कोई देता था सदाएँ
हम घर से मगर ख़ौफ़ के मारे नहीं निकले
क्या छोड़ के बस्ती को गया तू कि तिरे बा’द
फिर घर से तिरे हिज्र के मारे नहीं निकले
बैठे रहो कुछ देर अभी और मुक़ाबिल
अरमान अभी दिल के हमारे नहीं निकले
निकली तो हैं सज-धज के तिरी याद की परियाँ
ख़्वाबों के मगर राज दुलारे नहीं निकले
कब अहल-ए-वफ़ा जान की बाज़ी नहीं हारे
कब इश्क़ में जानों के ख़सारे नहीं निकले
अंदाज़ कोई डूबने के सीखे तो हम से
हम डूब के दरिया के किनारे नहीं निकले
वो लोग कि थे जिन पे भरोसे हमें क्या क्या
देखा तो वही लोग हमारे नहीं निकले
अशआ’र में दफ़्तर है मआ’नी का भी ‘रहबर’
हम लफ़्ज़ों ही के महज़ सहारे नहीं निकले
ग़ज़ल – 3
ग़ाजे़ हैं नये और हैं रुख्स़ार पुराने
बाज़ार में निकले हैं फुस़ूंकार पुराने
हो जाये सफल अपना भी बाज़ार में जाना
मिल जायें अगर राह में कुछ यार पुराने
हर रोज़ नया क़ौल, नया अह्द, नई बात
इस भीड़ में गुम हो गये इक़रार पुराने
कर देते हैं जो ताज़ा गुलाबों की ज़िया मांद
हैं शहर में कुछ ऐसे भी गुलज़ार पुराने
रखते थे दिलों में न तअस्सुब न कुदूरत
किस शान के थे लोग मज़ेदार पुराने
तू कृष्ण ही ठहरा तो सुदामा का भी कुछ कर
काम आते हैं मुश्किल में फ़क़त यार पुराने
अब और किसी जादए-उल्फ़त पे चलें क्या
पैरों में खटकते हैं अभी ख़ार पुराने
फ़ाक़ों पे जब आ जाता है फ़नकार हमारा
बेच आता है बाज़ार में अख्ब़ार पुराने
आयेगी किसी रोज़ अजल राहतें ले कर
जीते हैं इसी आस पे बीमार पुराने
देखा जो उन्हें एक सदी बाद तो ‘रहबर’
छालों की तरह फूट पड़े प्यार पुराने
ग़ज़ल – 4
कहानी कह रही है वस्ल की, टूटी हुई चूड़ी
है हमको जां से भी प्यारी तिरी टूटी हुई चूड़ी
मैं कहता हूँ कि दिल है रेज़ा रेज़ा आपके ग़म में
वो कहते हैं कि दिल है या कोई टूटी हुई चूड़ी
कभी रौनक रही होगी किसी कोमल कलाई की
है जिस का नाम आज इक कांच की टूटी हुई चूड़ी
हज़ारों चूड़ियां यूँ तो खनकती है ख़यालों में
मगर कुछ और ही शय है तिरी टूटी हुई चूड़ी
सहर होते ही कोई हो गया रुख़्सत गले मिलकर
फ़साने रात के कहती रही टूटी हुई चूड़ी
पड़ी है बाग़ के इक तीरा-ओ-तारीक गोशे में
ये किस बाज़ू को सूना कर गई टूटी हुई चूड़ी
रवां है ख़ून की धारी किसी गौरी की बाज़ू से
बड़ी बेदर्द है ये कांच की टूटी हुई चूड़ी
तिरे दर पर खड़ा है इक सवाली हाथ फैलाये
कोई लोहे का छल्ला या कोई टूटी हुई चूड़ी
भरा है भेस बंजारों का किस के इश्क़ में ‘रहबर’
बुलाती है तुझे किस शोख़ की टूटी हुई चूड़ी।
ग़ज़ल – 5
बरसती आग से कुछ कम नहीं बरसात सावन की
जला कर ख़ाक कर देती है दिल को रात सावन की
उठी हैं काली काली बदलियां क्या तुम न आओगे
गुज़र जायेगी क्या तन्हा भरी बरसात सावन की
हमारी रात यूँ कटती है सावन के महीने में
इधर बरसात अश्कों की, उधर बरसात सावन की
किसी की याद आई है लिये अश्कों की तुग़्यानी
मिली है झोलियाँ भर कर हमें सौग़ात सावन की
डगर सुन्सान, बिजली की कड़क, पुर-हौल तारीकी
मुसाफ़िर राह से ना-आश्ना, बरसात सावन की
तुम्हारे मुँतज़िर रहते हैं सावन के हसीं झूले
किया करती है तुम को याद ये बरसात सावन की
तही-दस्ती का आलम, जामे-मय, साक़ी न पैमाना
ये किस ने छेड़ दी ऐसे में ‘रहबर` बात सावन की
ग़ज़ल – 6
आईना सामने रक्खोगे तो याद आऊंगा
अपनी ज़ुल्फ़ों को सँवारोगे तो याद आऊंगा
रंग कैसा हो, ये सोचोगे तो याद आऊंगा
जब नया सूट ख़रीदोगे तो याद आऊंगा
भूल जाना मुझे आसान नहीं है इतना
जब मुझे भूलना चाहोगे तो याद आऊंगा
ध्यान हर हाल में जाये गा मिरी ही जानिब
तुम जो पूजा में भी बैठोगे तो याद आऊंगा
एक दिन भीगे थे बरसात में हम तुम दोनों
अब जो बरसात में भीगोगे तो याद आऊंगा
चांदनी रात में, फूलों की सुहानी रुत में
जब कभी सैर को निकलोगे तो याद आऊंगा
जिन में मिल जाते थे हम तुम कभी आते जाते
जब भी उन गलियों से गुज़रोगे तो याद आऊंगा
याद आऊंगा उदासी की जो रुत आयेगी
जब कोई जश्न मनाओगे तो याद आऊंगा
शैल्फ़ में रक्खी हुई अपनी किताबों में से
कोई दीवान उठाओगे तो याद आऊंगा
शम्अ की लौ पे सरे-शाम सुलगते जलते
किसी परवाने को देखोगे तो याद आऊंगा
जब किसी फूल पे ग़श होती हुई बुलबुल को
सह्ने-गुल्ज़ार में देखोगे तो याद आऊंगा

