• कथा-कहानी
  • जयशंकर की कहानी ‘रोशनियों की ओर’

    आज पढ़िए वरिष्ठ लेखक जयशंकर की नई कहानी। जयशंकर जी की कहानियों में साधारण जीवन, रोज़मर्रापन होता है, जो बाहर सहजता से आता है लेकिन साधारणता का ऐसा सम्मोहन बहुत कम लेखकों में होता है। जैसे यही कहानी देखिए- रोशनियों की ओर- मॉडरेटर

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    “आप अकेले आये हैं?” मैंने पूछा

    “जी मैं अकेला ही रहता हूँ…” उस अध्यापक ने कहा

    “यहां पहली बार आये हैं?”

    “बहुत पहले अपनी अम्मा के साथ आया था।”

    “कैसा लग रहा है?”

    “इतने सारे लोगों के साथ घूमने का पहला मौका है… हम्पी और विजयनगर साम्राज्य के बारे में पढ़ा बहुत है। मैंने इतिहास में ही एम.ए. किया है।”

    “मैंने श्याम बेनेगल की नेहरू की किताब पर बने सीरियल में इस जगह के बारे में जाना था… मेरा पढ़ाने का विषय फिजिक्स रहा था… कॉलेज में पढ़ाता था।”

    “आप कहां से आ रहे हैं?”

    “मैं और मेरी बेटी बैंगलोर में रहते हैं।”

    “आपकी बेटी क्या करती है?”

    “वह पेंटर है… पेंटिंग पढ़ाती भी है।”

    हम पिछले सात दिनों से एक कंडक्टेड दूर पैकेज में कर्नाटक के उत्तर के कुछ इलाकों में घूम हैं। फिलहाल हम हम्पी में घूम रहे हैं। पिछले दो दिनों से। हर सुबह किसी न किसी शहर की किसी होटल से हम सैलानियों का जत्था लक्जरी बस से निकलता है। हम अपने गाइड के साथ मंदिरों, खंडहरों, ऐतिहासिक इमारतों, मस्जिदों, गिरजाघरों को देखते रहते हैं। दुपहर में किसी रेस्तरां में खाना खाते हैं। हम लगभग चालीस लोग होंगे। हर उम्र के। भारत के अलग-अलग इलाकों से आये हुए। मध्यप्रदेश से आये इस अध्यापक से मेरी और मेरी बेटी की बातचीत होती रहती है।

    “आपके घर में और कौन-कौन हैं?” अध्यापक ने पूछा है।

    “मैं अकेला ही रहता हूँ…. थोड़ी दूरी पर मेरी इस बेटी का मकान है… हम दोनों का मुहल्ला एक ही है।”

    “आपकी पत्नी और दूसरे बच्चे कहां रह रहे हैं?”

    “मेरी पत्नी पांच साल पहले नहीं रही… यह मेरी इकलौती संतान है।”

    “और इनका परिवार?”

    “इसका नाम गौरी है… चार साल से अपने पति से अलग रह रही है… इसको कोई बच्चा नहीं हुआ… यह भी अकेले ही रह रही है।”

    मेरी इस बात से अध्यापक के चेहरे पर एक किस्म का खींचाव और तनाव उभरा था। उसने यह भी सोचा होगा कि मैं ऐसी बातें उसके सामने इतनी आसानी से कैसे कह रहा हूँ। मैं तीन दिनों से इस अध्यापक की गौरी में बढ़ती हुई दिलचस्पी को महसूस कर रहा हूँ। यह भी जान रहा हूँ कि वह मेरे पास बार-बार गौरी की खातिर ही आता रहा है।

    दुपहर का वक्त है। हम लोग एक प्राचीन और विशालकाय शिव मंदिर के सामने एक ओपन एयर रेस्तरां में अपना दोपहर का खाना खा रहे हैं। गौरी एक मलयाली और युवा दम्पति के साथ एक अलग मेज पर बैठी हुई है। उसकी निगाहें हम दोनों की मेज पर उतरती रहती है।

    “मैंने नंदी की इतनी बड़ी और काले पत्थर की प्रतिमा को पहली बार देखा है।”

    “यह इलाका शैव सम्प्रदाय का गढ़ रहा था… यहां शिव के ऐसे बहुत सारे मंदिर मिलेंगे… हम्पी में सर्दियों में दो दिनों का नंदी उत्सव रहता है।”

    “आप पूजा-पाठ करते हैं… मेरा मतलब आपका कर्मकांड़ों पर विश्वास रहा है?”

    “नहीं… लेकिन दक्षिण के मंदिरों ने मुझे हमेशा से ही प्रभावित किया है… बरसों से मध्यप्रदेश में रह रहा हूँ… उत्तर और मध्य भारत के मंदिरों का भोंडापन, शोरगुल और दिखावा यहां इतना नजर नहीं आता है… यहां भीड़ जरूर रहती है लेकिन गंदगी, शोरगुल और दिखावा नजर नहीं आ रहा है।”

    “आपको इतने दिनों की छुट्टियां मिल गयी?”

    “क्रिसमस की छुट्टियां लगी हैं… मैं यहां शांति निकेतन से आया हूँ।”

    “वहां कैसे जाना हुआ?”

    “स्कूल की ट्रीप थी… हाईस्कूल के छात्रों के साथ गया था… रवि बाबू को पसंद करता आया हूँ।”

    “मैंने कन्नड़ में आयी उनकी कुछ किताबों को पढ़ा है… उनकी “गीतांजलि” मेरी पत्नी की पसंदीदा किताब थी… गौरी ने उनको अंग्रेजी में पढ़ा है।”

    “माफ करियेगा… मुझे आपसे यह कहना नहीं चाहिए… इस उम्र में आपको एकदम अकेले नहीं रहना चाहिये।”

    “मेरी बेटी पड़ोस में ही रहती है… उसको पढ़ाने के लिए बड़ी जगह लगती है।”

    “लेकिन साथ में तो नहीं रहती… आप दोनों का साथ-साथ रहना दोनों के ही हित में रहेगा… मेरी माँ अकेले ही मरी थी… यह बात मुझे सालती रही है।”

    “मैं समझता हूँ… गौरी अब अकेले ही रहना चाहती है… वह बचपन से ही अंतर्मुखी रही… वह शादी के लिए भी तैयार नहीं हो रही थी।”

    गाइड हम दोनों को बुलाने लगा था। रात के पहले कृष्णा नदी के करीब के एक तीर्थ स्थल पर पहुंचना है। गौरी भी हमारे बीच आ गयी है। हमारे सहयात्रियों में दिल्ली से आये हुए एक युवा दम्पति के बारे में बता रही है। मैंने और गौरी ने लगभग दो बरस दिल्ली में बिताये थे। मेरे रिटायर होने के बाद। बस में अपनी सीट पर बैठने के कुछ देर बाद गौरी ने वैन गॉग की चिट्ठियों की किताब को पढ़ना शुरू कर दिया था। मन में आया कि उस अध्यापक के बाजू चला जाऊं लेकिन वहां एक बूढ़ी, पंजाबी औरत बैठी हुई थी। उनकी सीट के सामने उनके बेटे और बहू। सरदारजी के हाथ में कैडबरी चाकलेट थी, जिसका एक टुकड़ा वह अपनी माँ की तरफ बढ़ा रहे थे।

    अध्यापक से अपनी दुपहर में हुई बातचीत के बाद मैंने गौरी के बारे में सोचना शुरू कर दिया था। वह अपनी तेरह-चौदह बरस की उम्र से ही अलग-सी रहती आयी थी। घर हो या मुहल्ला, स्कूल हो या घर में आये हुए मेहमान, वह सबसे अलग-थलग, अपने कमरे में बैठी हुई पढ़ती रहती… ड्राइंग बनाती रहती या रेडियो सुनती रहती थी। वह खेलने-कूदने से दूर रहने लगी। उसका मुझसे बात करना भी कम होता गया। उसकी माँ उसे जरा-सा भी बर्दाश्त नहीं कर पाती थी। वह उसी स्कूल में पढ़ रही थी जहां उसकी माँ बरसों से पढ़ाती आयी थी। ये गौरी के मंथली पीरियड शुरू होने के बाद के दिन रहे। डॉक्टर का कहना था कि धीरे-धीरे सब नार्मल हो जायेगा लेकिन मेरी पत्नी के दिमाग में अधीरता बहुत ज्यादा थी और अक्ल बहुत कम।

    गौरी की मैट्रीक तक की पढ़ाई, बेलगाम के सरस्वती विद्यालय में हुई। तब मैं बेलगाम से चालीस किलोमीटर दूर के कॉलेज में पढ़ा रहा था। बीच-बीच में मुझे उस स्कूल की प्रिंसिपल से मिलने जाना पड़ता। मैं प्रिंसिपल के केबिन से अपनी पत्नी के साथ बाहर निकलता और वह मुझे गौरी के पक्ष में बोलने को लेकर बातें सुनाने लगती।

    “क्लास में और भी तो लड़कियां हैं… उनकी शिकायतें क्यों नहीं रहती है?”

    “वह किसी को तंग नहीं करती है… अकेले रहना उसका अधिकार है” मैं कहता।

    “आपको यह नहीं दिखता कि वह किसी से भी नार्मल व्यवहार नहीं रखती है… मुझसे भी नहीं।”

    “उसका मन नहीं होता होगा… तुम लोग उसे जज करते रहते हो… हमारा समाज ही ऐसा है…

    “और समाज झूठ और फरेब है…।” पत्नी ने कहा था।

    मैं अपनी पत्नी को समझाने की कोशिशें करता रहा था कि आदमी का अपना मन भी उतनी ही बड़ी बात है जितना समाज का अपना आचार-विचार। धीरे-धीरे वह समाज में शामिल होने लगेगी। किसी को भी जबरदस्ती से समाज का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता है।

     “तुम उसका भविष्य बरबाद कर रहे हो।”

    पत्नी के इस वाक्य के बाद मैं चुप हो जाता। गौरी के स्वभाव में मुझे कुछ भी ऐसा न तब महसूस होता था और न अब ही महसूस होता है कि वह किसी और का जीवन तबाह कर रही है। वह अपने में रहना चाहती थी। कुछ लोग होते हैं। भीड़ के साथ नहीं चलते हैं। अपना जीवन जीते हैं। अपनी शर्तों पर जीते हैं। गौरी इस तरह के लोगों में रही। शांत। एकान्तप्रिय। गंभीर।

    हमारी बस बीजापुर की तरफ बढ़ रही है। गौरी अपनी किताब में डूबी हुई। वह अध्यापक भी कोई किताब पढ़ रहा है। सुबह-सुबह जाग उठे, कुछ सैलानी सो रहे हैं। सामने की सीट पर बैठा हुआ युवा गाइड इस इलाके का इतिहास, यहां की लड़ाइयों, विजेताओं की खूबियों के बारे में पड़ोस में बैठे सैलानियों को बता रहा है।

    “हमें इस टूर में नहीं आना था… कहीं भी इत्मीनान से ठहरना नहीं हो रहा… भागदौड़ ही मची रहती है।”

    “कंडक्टेड टूर इसी तरह के होते हैं… सैलानी भी मौज-मस्ती ही पसंद करते हैं।”

    “मैं अक्का महादेवी की उस जगह पर रुकना चाह रही थी… गाइड की जरा-सी भी दिलचस्पी नहीं थी… मुझे घड़ी बताकर पूरा प्रोग्राम समझाने लगा था।”

    “इस टूर का पूरा प्लान तुमने बनाया था…।”

    “मुझसे ही भूल हो गयी।”

    यहां गौरी अपनी माँ से बिल्कुल अलग नजर आती है। अपनी भूल स्वीकार कर लेती है। वह अपनी किसी बात को लेकर अड़ नहीं जाती। अपनी गल्तियों पर बहस नहीं करती है। उसका कहीं पर भी बहुत ज्यादा न उलझना, कहीं पर भी देर तक नहीं अटकना, उसकी अपनी तकलीफों, मुसीबतों का कारण बना रहा है। उसके मन को कोई समझ ही नहीं पाता है।

    “तुम बहुत जल्दी हार मान लेती हो… लोग इसका  लाभ उठाने लगते हैं… कोई तुम्हारी तकलीफ समझ ही नहीं पाता है।”

    “जहां हमने भूल की है वहां यही एक अच्छा रास्ता है… सबको सब कुछ समझाया भी नहीं जा सकता है।”

    “क्या अरुण को तुम्हारा ऐसा होना अच्छा लगता था… वह हमेशा तम्हें दोषी ठहराता था… तुम खुद को दोषी मान भी लेती थी।“

    “शुरू-शुरू में वह मुझसे सहमत रहा करता था… लेकिन बाद में ऐसा नहीं रहा… वह हर बात के लिए मुझे ही जिम्मेवार ठहराने लगा… वह बहस करने के लिए आतुर बन जाता था… मैं चुप हो जाती थी… हार मान लेती थी।”

    मुझे उन दिनों की गौरी की कुछ बातें याद आती हैं। गौरी के कुछ ऐसे सवालों की भी जिन्हें वह खुद से पूछती रही थी। अरुण से अलग होने के पहले उसने एक मकान किराये से लिया। उसी मकान में बच्चों के लिए पेंटिंग की क्लासेस लेने लगी। मुझसे थोड़ा-सा कर्ज लिया और उस कर्ज को मासिक किश्तों में चुका भी दिया। उसने अरुण को अच्छी तरह से समझाया-बुझाया था। वे पारस्परिक सहमति और समझौते के आधार पर कोर्ट के सामने एक-दूसरे से अलग भी हो गये। एक बरस के बाद अरुण ने दूसरा विवाह कर लिया। गौरी मुझे उस विवाह में अपने साथ ले गयी थी। यह सब चार बरस पहले घटा था। तब गौरी छत्तीस की रही होगी। उसकी अपनी दाम्पत्य जिंदगी छह बरस की भी नहीं रही लेकिन जब तक रही तब तक शांति, समझदारी और सहानुभूति लिए रही।

    मुझे लग रहा है कि हमारे इस प्रवास में वह कभी-कभार अपने आपको खोल रही है। मैं उसकी तमन्नाओं को बाहर आते हुए महसूस कर रहा हूँ। वह खुश नजर आ रही है। अच्छी तरह से सज और संवर रही है।

    “मुझे अपने साथ कुछ सूती साड़ियां रखनी थीं।”

    “यात्रा में परेशानी होती।”

    “मंदिरों में सभी औरतें साड़ियां पहनकर आती हैं।”

    “वे सब लोकल हैं।”

    “सचमुच साड़ी जैसा कोई परिधान नहीं हो सकता है… यहां की औरतें फूलों का भी कितना अच्छा इस्तेमाल करती हैं।”

    मुझे गौरी से इस तरह का कुछ सुनना अच्छा लग रहा है। उसका युवा लोगों से मिलना भी। पता नहीं मैं ठीक सोच रहा हूँ या नहीं लेकिन मैंने यह भी महसूस किया है कि वह अध्यापक गौरी में दिलचस्पी रख रहा है। मुझसे उसके बारे में पूछता रहा है।

    “आपकी बेटी के चित्रों की प्रदर्शनी कहीं लगी है?”

    “अब तक तीन जगहों पर हुई है… धारवाड़ की प्रदर्शनी में मैं गया था।”

    “क्या दिल्ली-मुम्बई में करने का कोई इरादा है उनका?”

    “शायद नहीं… आप उससे सीधे क्यों नहीं पूछ लेते हैं… आप अच्छी तरह समझ सकोगे… मैं विज्ञान का आदमी हूँ।”

    “मैंने बदामी में उनसे पूछा था… वे अपने आपको पेंटर नहीं समझती हैं।”

    “क्या कह रही थी?…. पूरा घर उसकी बनायी पेंटिंग्स से भरा हुआ है।”

    “कह रही थीं कि अभी मैं तैयार नहीं हूँ… अगर तैयार होती हूँ तो पहले बैंगलोर में करूंगी… यह भी पक्का नहीं है।”

    “आपको क्या लगता है?”

    मेरे सवाल के जवाब में उस अध्यापक ने गौरी के उत्तर को एक सच्चे कलाकार का उत्तर बताया था। उसे गौरी की खुद को तैयार करने की आकांक्षा ने छुआ था। मैं बीच-बीच में उन दोनों को बातचीत करते हुए देख रहा हूँ। हम तीनों भी एक साथ खाने की मेज पर बैठ रहे हैं। अध्यापक ने मुझे अपने पास रखा हुआ नया मफलर दे दिया है। बस की खुली खिड़कियों से आती हवाओं के कारण मेरे पास का सूती मफलर काम नहीं आ रहा था। मैंने बहुत मना किया। गौरी ने भी। तब उसने कहा था कि मैं उसके भी पिता के समान हूँ। तभी उसने पहली बार अपने अनाथ होने का भी जिक्र किया था। अपने निपट अकेले होने का भी।

    दिसम्बर के दिनों की ठंड है। अध्यापक से मिले ऊनी मफलर का रंग नीला है। ऊपर खड़े आसमान के रंग से मिलता-जुलता। प्रकृति कभी-कभी अपने सौंदर्य की ऊंचाइयों पर खड़ी हो जाती है। बस से नजर आते जंगलों, पहाड़ों, नदियों, खेतों-खलिहानों और लोगों को देखकर जीने की, और अच्छी तरह जीने की लालसा जागने लगती है।

    इधर मुझे अपने बचपन के कस्बे की याद आती रही है। अपने घर के करीब की कैथेड्रल स्ट्रीट की जहां सालों पुराने पेड़ थे, जिनके बीच छोटा-सा तालाब खड़ा रहता था। तालाब के किनारे के पेड़ों पर परिन्दे बैठे रहते थे।…. उसी कस्बे से कॉलेज की पढ़ाई के लिए धारवाड़ आया था। वहां के कॉलेज के वातावरण में मेरा मन पढ़ने की तरफ झुकता गया। मैं धारवाड़ की पब्लिक लाइब्रेरी से जुड़ गया था। मेरी दुनिया भर की किताबों में दिलचस्पी जागने लगी थी। बढ़ने लगी थी। शायद मेरा पढ़ने के लिए लगाव और अनुराग भी रहा होगा कि गौरी की भी शुरू से ही किताबों में दिलचस्पी बनी रही।

    “तुम्हारी अम्मा पहले ऐसी नहीं थी कितना कुछ पढ़ती रहती थी।”

    “मैंने उन्हे बचपन से ही दकियानूसी पाया था… स्कूल के चपरासी से उनका व्यवहार बुरा रहता था… वह छोटी जाति का था… उनको गनी अंकल का मुसलमान होना भी अखरता था।”

    “हमारी शादी के पहले वह बैडमिंटन की प्रसिद्ध खिलाड़ी थीं… उसको अध्यापन की नौकरी बैडमिंटन की ही खिलाड़ी होने से मिली थी।”

    “इससे क्या हो जाता है… अरुण भी लेखक था… उसने दो-दो उपन्यास लिख रखे थे… लेकिन मेरे निसंतान होने के कारणों में जादू-टोना देखता रहा था… मेरे लिए डाक से ताबीज मंगवाता रहा था… डॉक्टरों की जगह वह मुझे पीर-फकीरों के पास ले जाता था।”

    “शुरू-शुरू में वह भी ऐसा नहीं था… उसका पहना उपन्यास कमाल का था।”

    “वह शुरू से ही वैसा था… हम उसे समझने में भूल कर बैठे… आप तो उसकी रसेल की फिलासफी की समझ की तारीफ करते हुए थकते नहीं थे।”

    हमारे साथ यात्रा कर रहा यह अध्यापक भी काफी-कुछ पढ़ चुका है। बहुत ही कम कहना है। सुनता रहता है। पर कभी-कभार कहे गये उसके एकाध वाक्य से भी उसकी गहरी समझ का अनुमान मिल जाता है। इस यात्रा में शामिल हुए बूढ़ों के लिए उसके आदर और अनुराग को मैंने अच्छी तरह परखा और पहचाना है। वह यात्रा में शामिल बूढ़ों का बराबर ध्यान रख रहा है।

    “बुढ़ापा यूंहि नहीं आ जाता है… एक लम्बी जिंदगी को झेलने और सहने के बाद आता है।”

    “तुम्हारी अपनी उम्र क्या होगी?”

    “चालीस का हो जाऊंगा।”

    “तुम्हारा विवाह हो चुका है?”

    “नहीं कर सका… दो छोटी बहनें थीं… उनके विवाह बहुत देरी से हुए… उनके लिए रुकना था… उनके विवाह होने… होने तक मैं अड़तीस का हो चुका था…।”

    “अड़तीस में कर लेते… यह कोई बहुत ज्यादा उम्र तो नही थी।”

    मुझसे भूल हुई। मैंने इस दिशा में बढ़ना ही नहीं था। वह खामोश ही बना रहा।

    “मुझे माफ करना!”

    “कैसी बात कर रहे हैं आप….!”

    “मैं तुम्हारी निजी जिंदगी में घुस आया।”

    “आप मेरे पिता जैसे हैं… आप सरलता से पूछ रहे हैं।”

    मैंने रात में हमारी बातचीत के इस प्रसंग का गौरी से जिक्र किया था। उसे भी मेरा यह सब पूछना-कहना ठीक नहीं लगा था। मैं गौरी से क्या ही कहता कि मैं एक तलाकशुदा और इकलौती लड़की का पिता हूँ और पिता की हैसियत से अपनी बेटी के जीवन को सुखी और सुरक्षित देखना चाहता हूँ। उस रात हम उस अध्यापक के बारे में बात करते रहे थे।

    “वह यहां से पहले शांति निकेतन घूमने गया था…” मैंने बताया।

    “उन्होंने मुझे भी बताया है… मुझे वहां खरीदा गया झोला देना चाह रहे थे।”

    “तुमने क्या कहा?”

    “मेरे पास पहले से ही शांति निकेतन के तीन-तीन झोले हैं।”

    “तुमने झूठ बोला।”

    “फिर क्या किसी अजनबी से भेंट ले लेती?”

    “वह सात दिनों से हमारे साथ यात्रा कर रहा है… रोज ही हमसे मिल रहा है।”

    “यह दूसरी बात है… उपहार लेना दूसरी बात है।”

    “तुम्हें मेरी बात बुरी लग सकती है… पर मुझे तुम्हारे लिए यह अध्यापक ठीक-ठाक नजर आ रहा है।”

    “आप पागल होते जा रहे हैं…!”

    “तुम्हें नहीं लगा कि वह पहले ही दिन से हम लोगों से जुड़ने लगा था….?”

    “यात्राओं में ऐसा हो जाता है… कुछ लोग घुलने-मिलने की कोशिशें करते हैं।”

    “यह सिर्फ यात्रा की बात नहीं है।”

    हम लोग होटल की खुली हुई छत पर खड़े हुए बात कर रहे थे। गौरी के बालों पर फूल थे। उन फूलों से बाहर आती गंध थी। उसने हरे रंग का सलवार-कुरता पहन रखा था। उसके दुपट्टे का रंग भी हरा ही था। उसने आँखों में काजल लगा रखा था।

    “मैं आपसे छिपाना चाह रही थी।”

    “क्या?”

    “वे मुझसे अकेले में बात करना चाह रहे हैं… उन्होंने परसों होटल के बिल के पीछे पेंसिल से एक नोट लिखा था कि ‘मैं आपसे अकेले में मिलना चाहता हूँ।”

    “तुमने क्या जवाब दिया?”

    “कोई जवाब नहीं… मैंने उस नोट को फाड़ दिया था… मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा है…. हम दोनों को एक-दूसरे के बारे में कुछ भी पता नहीं है… मैं पहले से ही कम दुखी नहीं हूँ।”

    “इसमें समझना क्या है… मैं खुद उसकी दिलचस्पी को महसूस कर रहा हूँ… मैं तुम्हारे लिए उसके लगाव को महसूस कर रहा हूँ।”

    “आपका दिमाग ठिकाने पर नहीं है… आप मेरा कनफ्यूझन बढ़ा रहे हैं।”

    गौरी का कहना शुरू रहा था। वह खुद बेहद कनफ्यूझड नजर आ रही थी। यह सब स्वाभाविक भी था। सत्ताइस-अठ्ठाइस की रही होगी जब अपने आर्ट कॉलेज के बाद के बरसों में अरुण से मुलाकातें होती रहीं। दोनों परिवारों में असहमतियां थीं इसीलिए तीन-चार बरसों की कॉर्टशिप के बाद दोनों ने कोर्ट में विवाह किया। किसी तरह समझते-बूझते दोनों ने अपने दाम्पत्य जीवन के चार-पांच बरस एक साथ रह कर बिताये थे। फिर परस्पर सहमति से दोनों अलग हुए। गौरी को अपना आर्थिक आधार बनाना पड़ा। पिता से अलग रही। पेंटिंग बेच-बेच कर अपना जीवन चलाती रही। अभी अनाथ आश्रम से अपने लिए बच्चा गोद लेने की सोच ही रही थी कि उसके मामा उसके लिए एक अधेड़ उम्र के विधुर का रिश्ता ले आये थे। मामा को समझाना मुश्किल रहा। वे अपनी बहन की दुहाई देते रहे थे। यह भी है कि गौरी के पिता की संपत्ति पर लोगों की नजर बनी ही हुई है। बैंगलौर में मकान है। बैंक बेलेन्स अलग।

    इन सब परिस्थितियों के बीच में से ही, उत्तर कर्नाटक की लम्बी यात्रा का विचार बाहर आया था। गौरी अपने आपसे, अपने वातावरण से दूर जाने का मन बनाने लगी। पिता ने नैतिक समर्थन दिया और समूची यात्रा का खर्च भी। पिता खुद भी अपने अकेलेपन से, अपनी जिंदगी की नीरसता और एकरसता से बाहर निकलना चाह ही रहे थे।

    कभी-कभी ऐसा हो ही जाता है। आदमी किसी और दिशा में जाना चाहता है और जिंदगी उसे किसी और दिशा में ले जाती है। मार्च की हवाओं में पेड़ों से झरते उन पत्तों की तरह, जो गिरते किसी और पेड़ से हैं और पनाह किसी और पेड़ की पाते हैं। यह सब पत्तों की अपनी मर्जी से नहीं, हवाओं की मर्जी से होता होगा, कभी-कभी उन हवाओं के बीच शुरू हो जाते अंधड़ या बारिश की मर्जी भी रहती होगी। इसे ही नियति कहा जाता होगा, इसे ही प्रारब्ध भी।

    “एक बार उससे मिलने में मुझे तो कोई परेशानी नजर नहीं आती… लेकिन मैं इस बात पर जोर नहीं देना चाहूंगा… ऐसी बातों पर खुद ही सोचना पड़ता है… जिंदगी तुम्हारी है… फैसला भी तुम्हारा ही मानी रखता है।”

    “अगर उसने प्रपोज कर दिया तो मुश्किल खड़ी हो जायेगी।”

    “मुश्किल कैसी… तुम मना कर सकती हो… सोचने का समय मांग सकती हो… विस्तार से बात कर सकोगी।”

    “उसे मेरे अतीत का बहुत सारा पता नहीं है… न मैं उसका अतीत जानती हूँ।”

    “हमारे पास और तीन दिन हैं… तुम लोग इन सब बातों पर बात कर सकोगे… हम चाहें तो इस यात्रा पर आगे नहीं जायेंगे… बीजापुर में ही अपना समय बितायेंगे… बैंगलोर तक ही तो जाना है… कोई दूसरी व्यवस्था हो ही जायेगी… पर यह तुम्हारे लिए एक अवसर जरूर है।”

    “फिलहाल तो सोना ही ठीक रहेगा… कल इस पर और विचार करेंगे।”

    हम दोनों अपने-अपने कमरों में लौट आये हैं। नींद दोनों के ही पास नहीं आ रही है। दोनों के ही कमरों में रोशनी है। रात चढ़ रही है। दिसम्बर की सर्दी बढ़ रही है। मुझे लग रहा है कि मुझे नीचे उतरकर बगीचे में कुछ देर टहलना चाहिए। मैं टहलता रहूंगा और मेरे पास कोई नयी बात आ सकेगी। कोई नयी उम्मीद या तरकीब, जिसे सुबह उठते ही मैं गौरी को बता सकूंगा।

    मैं होटल की सीढ़ियों से नीचे उतर आया हूँ। बरबस ही मेरी निगाहें होटल के उस कमरे की तरफ बढ़ी हैं जिसमें वह अध्यापक रुका हुआ है। उस कमरे में भी रोशनी नजर आ रही है। उस कमरे में भी अनिद्रा ने डेरा डाल रखा है। होटल के उस कमरे की हवाओं में भी ठंड़ी के साथ-साथ, कोई लालसा, कोई आशंका, एक तरह की कोई उम्मीद, एक किस्म की कोई तसल्ली सांस ले रही होगी।

    मेरे मन में सिगरेट पीने की जबरदस्त तलब जागी है। पिछले सात दिनों से सिगरेट से दूर रहा हूँ। होटल के किसी कर्मचारी से मांग सकता हूँ। उस ड्राइवर से भी जो बैंगलोर से हमारी बस को चलाते हुए आया है। आदमी अपनी लालसा के सामने लाचार होता है। क्या लालसा कभी भी, कहीं भी लौट आती है? इतनी-सी आकांक्षा लेकिन इतना जबरदस्त बहाव लिए हुए। सिगरेट पीते-पीते पचास से भी ज्यादा वर्ष होने को आये हैं। डॉक्टर की सख्त मनाही नहीं होती तो गौरी भी मुझे सिगरेट से दूर नहीं रख सकती थी।

    इस समय गौरी क्या सोच रही होगी? सोच रही होगी कि सो चुकी होगी? और वह अध्यापक क्या अपने कमरे में चहलकदमी कर रहा होगा, अपनी किसी आधी-अधूरी किताब को पढ़ रहा होगा?

    इस वक्त मैं बीजापुर की एक होटल के सामने के बाग में खड़ा हुआ सिगरेट पीने के लिए तरस रहा हूँ। एक-एक कर होटल के कमरों की बत्तियां बुझती जा रही हैं। रिसेप्शन काउंटर से आती रोशनी में, कतार में खड़े हुए गमले, बजरी की सड़क, केले और नारियल के पेड़ों के तने चमक रहे हैं।

    गौरी के भीतर क्या-क्या गुजर रहा होगा? वह अध्यापक अपने उस नोट के जवाब को लेकर क्या-क्या सोच रहा होगा? आदमी अपने प्रेम के दिनों में क्या-क्या नहीं सोचता होगा? किस-किस उलझन, भ्रम और यथार्थ से नहीं गुजरता होगा?

    अपने स्कूली दिनों में सोलह बरस की उम्र में, मेरा भी अपनी बस्ती की एक लड़की से प्यार हो गया था। हम शाम के अंधेरों में, रात की रोशनी के फैलने की शुरुआत में, पांच-दस मिनट के लिए, इधर-उधर मिल लिया करते थे। हम दोनों के साथ बहुत ज्यादा डर बना रहता। हम प्रेम के बीच नहीं, डर के बीच रह रहे होंगे।

    फिर एक दिन एक दूसरे कस्बे के एक नौकरीपेशा युवक से उस लड़की का विवाह हो गया। मुझे भी आगे की पढ़ाई के लिए धारवाड़ जाना पड़ा। धीरे-धीरे मैं उस लड़की को भूल गया। उसने भी मुझे भुला ही दिया होगा।

    दिसम्बर की रात की रोशनी में, मैं उन बरसों की कस्बाती रोशनियों को याद कर रहा हूँ जिनके बीच हम घड़ी दो घड़ी के लिए एक-दूसरे से मिल लिया करते थे। कितनी अजीब बात है। मैं अपने कमरे से उतरकर उस बाग में गौरी के लिए सोचने आया था और मैं सोच रहा हूँ अपने प्रेम के बारे में जबकि मै अभी तक तय नहीं कर पाया हूँ कि क्या कस्बाती रोशनियों में हमारे बीच जो कुछ पल- दो पल के लिए घटता रहा था, उसे प्रेम कहा जा सकता भी है या नहीं?

    अगर सिगरेट का एक भी कश मिल जाता तो मैं अपनी इस विडम्बना को लेकर कुछ साफ-साफ सोच सकता था। अब रिसेप्शन काउंटर का आदमी भी सोने चला गया है। चौकीदार का बीड़ी-सिगरेट से कभी रिश्ता नहीं रहा। वह भी टॉर्च की रोशनी में बगीचे में घुस आये किसी कुत्ते या बिल्ली को ढूंढता नजर आ रहा है। मैं तीसरी मंजिल के अपने कमरे की सीढ़ियों पर चढ़ रहा हूँ। सीढ़ियों पर रोशनी है। रात के उतर जाने का संकेत और सन्नाटा भी। मैं बाग के अन्धेरे से सीढ़ियों पर उतरती रोशनियों की तरफ बढ़ रहा हूँ।

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           -जयशंकर

           “शकुन्तला”

            33, प्रकाश नगर,

              गोधनी रोड,

              नागपुर-440030

              (महाराष्ट्र)

             मो. 9425670177

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