• कथा-कहानी
  • संजय छेल की कहानी ‘पोस्टर’

    आज पढ़िए संजय छेल की कहानी। संजय छेल का परिचय लिखने में बहुत समय लग जाएगा। इतना बता दूँ कि 1990 के दशक में उनकी लिखी अंक फ़िल्मों ने हिन्दी सिनेमा का मुहावरा बदल दिया। जैसे, रंगीला, यस बॉस, फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी, कच्चे धागे, पार्टनर, दौड़। यह लिस्ट बहुत लंबी हो जाएगी। उन्होंने अनेक फ़िल्मों का निर्देशन किया, जिसमें 1999 की फ़िल्म ‘खूबसूरत’ बहुत लोगों को याद होगी। उन्होंने गाने भी लिखे और टीवी के लिए एक से एक हिट शो लिखे, जिसमें तारक मेहता का उल्टा चश्मा भी शामिल है। आज भी वे फ़िल्मों, टीवी, वेब सीरिज़, गाने लिखने में उतने ही व्यस्त हैं और सफल भी। लेकिन संजय छेल संवेदनशील कथाकार हैं और 1990 के दशक में उनकी कई कहानियाँ ‘हंस’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में भी छपी। उनमें से एक कहानी ‘पोस्टर’ है, जो ‘हंस’ में 1991 के सितंबर अंक में छपी थी और जिसे पढ़कर मैंने उनको पत्र लिखा था। तब से उनके लेखन को मैं देखता-पढ़ता रहा। वे गुजराती के स्थापित लेखक हैं और उनके कहानी संग्रह को गुजराती साहित्य अकादमी से सम्मान भी प्राप्त है। ख़ैर, इस परिचय के बाद उनकी कहानी पढ़िए, जो तब मुझे अलग तरह की कहानी लगी थी- मॉडरेटर

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    मेहनत के फ़रिश्ते फिल्म का यह चौथा सप्ताह चल रहा था. धरमपुर में कोई भी फिल्म तीन हफ़्ते से ज़्यादा चले, तो उसे सुपरहिट ही कहना चाहिए. तब मैनेजर के घर खाने-पीने का कार्यक्रम रखा जाता था और थिएटर में ख़ास रोशनी की जाती थी. 20-25 हज़ार लोगों वाले क़स्बे में एकाध फिल्म आती और सब लोग मुग्ध होकर पहले ही दिन देख लेते. रेवड़ी, मूंगफली, कोला और तंबाकू की पुड़िया के साथ, थिएटर की छत पर हिलते-डुलते पंखों के नीचे पसीने से लथपथ, शर्ट के ऊपरी बटन खोल कर मर्द हेलन या बिंदु का तड़कता-भड़कता बदन या मधुबाला के नख़रों पर सीटी मार देते. पान की वजह से लाल-पीले दांत वाले उनके मुंह खुले रह जाते और उनकी आंखों में ऐसा भाव छा जाता, मानो कोई अजीब सी चीज़ देख ली हो.

    जैसे ही म्यूज़िक शुरू होता और डांसर की देह में बिजली चमकती, सारे मर्द अपने आस-पास देखते, ताली देते और कहते, ‘मैं कहता था ना, मज़ा आएगा.’ पसीने से लथपथ मर्दों के शरीर में अजब सी हलचल पैदा हो जाती. ऊपरवाले जनाना वर्ग यानी बालकनी में घूंघट में ढंकी, बुर्केवाली या फिर स्कर्ट-ब्लाउज़ पहने हुई महिलाएं भी फिल्म देखने आतीं. मुंह पर पाउडर और आइब्रो पर पेंसिल लगाकर ‘चलो, चलो, लेट हो जाएगा और लेट होगा तो समझ में नहीं आएगा.’ कहते हुए सब दौड़ी चली आतीं. धर्मेंद्र की फाइटिंग पर पास बैठी महिला का हाथ पकड़ लेतीं और भारत भूषण के चेहरे को देखकर ‘बेचारा कितने दिनों से दुखी है.’ कह कर आंसू छलकातीं.

    इस क़स्बे में सिनेमा देखने आने वाले लोग थिएटर में प्रवेश करते ही दूसरी दुनिया में पहुंच जाते. मैनेजर प्राणजीवन के तेवर पूरे गांव में सबसे अलग. वह चालू शो में छड़ी लेकर थिएटर में घूमता. लोग विलेन से भी ज़्यादा उससे डरते. मैनेजर को फिल्म में कोई इंटरेस्ट नहीं था. फिल्म देखना वह धर्म के ख़िलाफ़ मानता था, मगर यह तो एक धंधा है. किसी फिल्म के सुपरहिट गाने में पैसे फेंके जाते, तो प्राणजीवन का लड़का भोपा उसे आगे जाकर इकट्ठा कर लाता. प्राणजीवन वो पैसे थिएटर में ही रहने वाले मंगल पेंटर को दे देता. एक तरह का एप्रिसिएशन. मंगल अपने रंग के दाग़ वाले हाथ से सलाम करता और कहता ‘साब, माताजी आपका सदा भला करें.’ तब तक शो पूरा होने का टाइम हो जाता. प्राणजीवन ट्रैफिक कंट्रोल करने निकलता.

    अंधेरे हॉल में तरह-तरह के आकार-चेहरे देखकर, निकलते हुए लोग आपस में बातें करते. आसमान की ओर देखकर गाने गाते. पान की पिचकारी मारते, लड़ते-झगड़ते, गांव की गलियों में खो जाते. सब के चले जाने के बाद थिएटर का कुत्ता पोस्टर के सामने भोंक देता. फिर आख़िरी शो के बाद श्मशान सी ख़ामोशी. फिर मंगल बिना दूधवाली काली चाय पी लेता. दाढ़ी खुजला कर पेंसिल उठाता और काम में लग जाता.

    पूरे क़स्बे में जगह-जगह पर मंगल के बनाए पेंटर के पोस्टर लग जाते. गुरुवार सुबह को एग्ज़ाम के रिज़ल्ट की तरह लोग उन पोस्टरों को देखते. मंगल के पोस्टरों में हीरो, हीरोइन, विलेन, बंदूक, घोड़ा, तोप, मोटर, कश्मीर, पहाड़, नदियां, पूरी दुनिया का असबाब बना हुआ होता था. जैसे ही पोस्टर लगता, आसपास लोगों की भीड़ जमा हो जाती. लोग टिप्पणियां करते, ‘इसकी मां की… इस बार तो दिलीप कुमार की फिल्म है, हाईक्लास.’ और कोई ‘वहां देखा? पर्वत पर सुरंग फूट रही है, बहुत खर्चा किया होगा शूटिंग में.’ कहते हुए फिल्म के अर्थशास्त्र के बारे में सोचने लगते.

    रामजी दर्ज़ी का ब्याह नहीं हुआ था. उसका गुनाह इतना था कि वह पोस्टर को घूर-घूर कर देखता था. तब कोई नटखट तंज़ कस देता, ‘क्या रामजी, ऐसा घूर के क्या देख रहे हो? वह तो नरगिस है, नरगिस. वह तुम्हारे पास कपड़े की सिलाई करवाने नहीं आएगी. देखना है उसे तो थिएटर में पहुंच जाना. यहां क्या देखते हो?’ रामजी लजाकर चला जाता. मंगल दूर खड़े-खड़े ये सब बातें, ये प्रतिभाव सुनता, मुस्कराता, खुद के पोस्टर पर ख़ुश होता और खुद को कहताः वाह!

    क़स्बे में मंगल पेंटर का एकतरफ़ा राज था. 45 साल के, चेचक के दाग़ वाले, बदसूरत और अविवाहित मंगल के आगे-पीछे कोई न था. वह थिएटर में रहता था. उसके साज़-असबाब थे रंग के डिब्बे. वह कुर्ता-पज़ामा पहनता था. थोड़े मैले और रंग के दाग़ वाले कपड़ों में साइकिल पर घूमता रहता था. सारा गांव उसे पहचानता था. किसी की दुकान पर, किसी मंदिर या फिर किसी पाठशाला को वह निर्देश लिखकर देता था. कई सालों से गांव की दीवारों पर उसके सुंदर अक्षरों से निर्देश लिखे हुए थे. सारा गांव उसके रंग-बिरंगे अक्षरों का सम्मान करता आया था.

    मंगल रातभर सफ़ेद कपड़े पर फिल्मी सितारों के चित्र बनाता रहता. सुबह जब वह पोस्टर पूरा करके बीड़ी जलाता था, तब मस्जिद की अज़ान सुनाई देती थी. सुबह के हलके उजाले में उसका पोस्टर ऐसा चमकता, जैसे किसी फोटो स्टूडियो में नया फोटोग्राफ बनकर आया हो. उसके पोस्टरों में हीरोइन के चमकीले बदन के नशीले कटाव में और ख़लनायक के डरावने चेहरे की रेखाओं में वह असर था, जिस से लोग थिएटर में खिंचे चले आते थे. मंगल की रातभर की मेहनत और लोगों का विस्मय भाव… लोग पोस्टर देखकर फिल्म देखने का निर्णय करते थे.

    पोस्टर पहला अंक था और फिल्म दूसरा अंक.

    बड़े घरों की स्त्रियां सिनेमा देखने नहीं जाती थीं. कभी रात को उनके पति उन्हें स्टोरी सुनाते, तो वे भोलेपन से कहतीं, ‘उसमें क्या देखना? तुम भी उसका मोह क्यों रखते हो? वो सब सच नहीं होता. है ना?’ पति भी उसे हां कह कर बात पूरी कर देता. मगर कुछ घर में फिल्म देखने की इजाज़त मिल जाती, इसलिए स्त्रियां भी जब घड़े लेकर पानी भरने जातीं, तब निग़ाहें उठा कर पोस्टर देख लेतीं. राजेंद्र कुमार को, राजेश खन्ना को, जितेंद्र को और भीगी साड़ी में ज़ीनत अमान को. फिर शर्माते हुए अगली गली में मुड़ जातीं. जनाना विभाग में मंगल पेंटर ने दीवार पर निर्देश लिखा था, ‘चालू शो में बातें करना मना है.’ फिल्म देखना, पोस्टर देखना, मंगल पेंटर के साथ चाय पीना या प्राणजीवन के साथ हाथ मिलाना ये सब गांववालों के लिए एक मनोरंजन ही था. जैसे आधी रजवाड़ी चाय पीने का मज़ा, इसकी मां का…

    जनाना विभाग में हफ़्ते में चार दिन राबिया नाम की लड़की फिल्म देखने आती थी. मंगल पेंटर बहुत दिनों से इस पर ग़ौर कर रहा था. शो शुरू होने से पहले वह गेट के पास से रेवड़ी लेती और मंगल के पास आकर खड़ी हो जाती. मंगल उसे देखकर हंसता, मगर उसकी हंसी में कोई रंग नहीं होता था.

    राबिया पूछती, ‘इसके बाद कौन सी फिल्म लगने वाली है?’

    मंगल कहता, ‘पता नहीं’

    राबिया मुंह बना कर कहती, ‘तुम फिल्म वालों के नखरे बहुत हैं.’

    मंगल उसकी इस बात पर हंस देता. तीसरी घंटी की आवाज़ आती. राबिया दौड़कर चली जाती. झूठमूठ का गुस्सा करने वाली राबिया मंगल को अच्छी लगती थी और राबिया को फिल्में अच्छी लगती थीं.

    अब मंगल रोज राबिया का इंतज़ार करने लगा. पोस्टर पर आधा चेहरा बनाकर वह अचानक रुक जाता. उसे राबिया याद आती. कश्मीर के बरसों पुराने फिल्मी सीन चित्र में उतारते वक़्त उसमें दौड़ती हुई राबिया दिखाई देती. मंगल को कम बोलने की आदत थी, इसलिए वह किसी से यह बात कह नहीं पाता था. उसे राबिया के ज्यादा ख़याल आने लगते, तो वह दीवारों पर रंग से टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएं खींचने लगता. एक बार उसने राबिया के बारे में भोपा से पूछा. भोपा ने इतनी हिंदी फिल्में देखी थीं कि उसका दिमाग़ विलेन की तरह चलता था. मंगल की मजबूरी वह जान गया. भोपा ने मौक़े को परख कर कहा, ‘मंगल भाई, आज आख़िरी शो में ‘झुमका गिरा रे’ गाने में लोग पैसे उछालेंगे. मैनेजर तो वो सब तुम्हें ही देगा. उसमें से आधा पैसा मेरा. बताओ, मंजूर है?’

    मंगल ने आंखों से हां कह दिया.

    भोपा ने विलेन की तरह दो मिनट सोचा और फिर कहा, ‘ठीक है, शो ख़त्म होने के बाद तुम इसी जगह पर मिलना. तुमको माल मिल जाएगा.’

    भोपा हंसता हुआ चला गया और थिएटर की स्ट्रीट लाइट के पास मंगल यह सोचता हुआ बैठा रहा कि कब ‘झुमका गिरा रे’ गीत पूरा हो और कब मुझे उसके बारे में कुछ पता चले. स्ट्रीट लाइट के पास राह देखते हुए मंगल गीत की लाइन के भरोसे सो गया. कुछ देर बाद उसके कानों में किसी ने आवाज़ दी, ‘ढेनटेनेन…’

    मंगल चौंककर खड़ा हो गया. भोपा उसके सामने बांकी अदा में खड़ा था.

    मंगल ने बोला, ‘क्या?’

    भोपा ने कहा, ‘वह रेवड़ी खानेवाली लड़की का नाम राबिया है. मोचीवाड़ा में रहती है. उसकी मां विधवा है. राबिया ने स्कूल छोड़ दिया है.’ इतना कह कर वह देवानंद की तरह हिलता-डुलता निकल गया.

    मंगल ने अपने पोस्टर की तरफ देखा. पोस्टर के केसरी रंग में सांझ झलकती थी और दो प्रेमी एक-दूसरे के आलिंगन में थे. मंगल पोस्टर के सामने देखकर बोला, ‘वाह, क्या रंग है!’

    दूसरे दिन मंगल साइकिल पर मोचीवाड़ा घूमने निकला. उसे राबिया का घर नहीं मिला. शाम को पहला शो हाउसफुल हो गया. फिल्म थी, ‘दोरंगी दुनिया’. राबिया दौड़ती हुई आई. मंगल के पास आकर खड़ी हो गई.

    ‘मंगल, तुम ये सब चेहरे अपने मन से ही बना देते हो?’

    मंगल को आश्चर्य हुआ कि आज यह क्यों मेरे काम में दिलचस्पी दिखा रही है? उसने कहा, ‘नहीं, हमेशा मन से नहीं. कभी फोटो देखकर भी…’

    ‘मुझे वह फोटो दिखाओ ना!’

    ‘फिर कभी.’

    ‘क्यों? मैं लेकर भाग नहीं जाऊंगी.’

    ‘ऐसा नहीं, मगर अभी मिलना चाहिए ना?’

    ‘कितने हैं?’

    ‘बहुत.’

    ‘बहुत सारे?’

    ‘हां’ मंगल ख़ामोश रहा.

    ‘क्या है कि मुझे एक टिकट चाहिए. आज मैंने यहां आकर देखा, मिल नहीं रही.’

    मंगल उसे एकटक देखता रहा. राबिया शरमा गई, पोस्टर की शर्मिला टैगोर की तरह. मंगल खड़ा हुआ.

    ‘आज लाकर देता हूं, लेकिन रोज़ मत मांगना.’

    ‘क्यों? मैं तो रोज़ मांगूंगी. बोलो, क्या करोगे?’

    ‘क्यों, मेरे बाप का थिएटर है?’

    ‘अरे, तुम्हें कौन मना करेगा? तुम पोस्टर नहीं बनाओगे, तो फिल्म देखने कौन आएगा?’

    ‘तुम.’

    ‘क्यों? मैं ही क्यों आऊंगी?’

    ‘मुझे देखने.’

    राबिया ख़ामोश हो गई.

    मंगल ने जेब से अपना टिकट निकाल कर दे दिया. राबिया हमेशा की तरह दौड़कर चली गई. फिल्म फ्लॉप थी. एक शो के बाद उतार ली गई. शो ख़त्म होने के बाद राबिया कह कर गई, ‘इस फिल्म से तो तुम्हारा पोस्टर अच्छा था.’

    मंगल उसकी ओर देखता रहा. एक कपड़ा, रंगभरा उसके हाथ में दे दिया. राबिया कुछ समझ नहीं पाई. मंगल ने राबिया को छूकर देखा. जैसे जीता-जागता पोस्टर. बारिश में भीगते हुए पोस्टर की तरह राबिया आहिस्ता-आहिस्ता वहां से चली गई.

    फिर राज कपूर की फिल्मों की सीरीज़ शुरू हुई. हर रोज़ नई फिल्म. प्राणजीवन मैनेजर ने छोटे से क़स्बे में पब्लिसिटी स्टंट शुरू किया. हर सुबह पोस्टर लगता था और रात को शो होता था. किसी को पता नहीं होता कि कल कौन सी फिल्म लगेगी. क़स्बेवालों को भी इस तरह अंधेरे में रहना, रहस्य को झेलना अच्छा लगता था. मंगल को रातभर जागकर पोस्टर बनाने पड़ते. आग, बरसात, बूट पॉलिश से लेकर ज़ीनत अमान की फिल्म तक के रंग बरसाते पोस्टर.

    राबिया को ख़ुश करने के लिए मंगल सुबह साइकिल पर पोस्टर लेकर मोचीवाड़ा से गुज़रता. कौन सी फिल्म लगने वाली है यह ख़बर सबसे पहले राबिया को मिलती. खिड़की में से चेहरा निकाल कर राबिया देख लेती. खुश होकर तालियां बजाती. हलके से उजाले में साइकिल पर सवार मंगल, शैलेंद्र का कोई गाना गुनगुनाता हुआ गली-गली भटकता रहता. उसके पीछे शरारती बच्चे भागते रहते, कुत्ते भौंकते. पर मंगल अपनी मस्ती में रहता. मंगल पेंटर को राज कपूर की दर्द भरी प्रेमी की निग़ाहें अच्छी लगतीं. पोस्टर पर राज कपूर की आंखें बनाते हुए मंगल गुनगुनाता रहता.

    ‘राबिया, तू मुझे अच्छी लगती है.’

    ‘चल, चल. टिकट दे आज का. इतना लिपट मत.’

    ‘देख, तू मुझसे रोज़ मिलती है. बहुत बातें पूछती रहती है. मुझे बहुत अच्छी लगती है.’

    ‘तुम फिल्मवाले बहुत हरामी होते हो.’

    ‘मैं कहां फिल्मवाला हूं? मैं तो पोस्टर बनाता हूं. फिल्म बन जाने के बाद…’

    ‘वो सब एक ही बात है. मैंने उस दिन पढ़ा था कि वो हीरो ने अपनी बीवी को छोड़ दिया.’

    ‘पागल है तू. वह फिल्मवाली बात अलग है और मेरी बात अलग है. मैं तो सिर्फ पेंटर हूं. अच्छा… मुझे बता, मैं तुझे पसंद हूं क्या?’

    ‘मंगल, तुम्हारा स्वभाव बहुत अच्छा है, मगर तुम अपने पोस्टर जितने अच्छे नहीं दिखते.’

    मंगल की नज़रें झुक गईं. उसने मिट्टी में उंगली से अपनी आर्टिस्टिक सिग्नेचर कर डाली.

    ‘तुम्हारे चेहरे को देखकर भी मुझे बहुत डर लगता है. सच कहती हूं. तुम टिकट देते हो, तब भी मुझे डर लगता है.’

    ‘लेकिन…’

    ‘लेकिन तुम्हारे पोस्टर मुझे बहुत अच्छे लगते हैं. तुमने उस दिन देव आनंद का बढ़िया पोस्टर बनाया था, गाइड फिल्म का. उसके बाल की क्या स्टाइल बनाई थी! ए पेंटर, एक बात पूछूं? मेरा भी एक पोस्टर बना कर दोगे?’

    ‘क्या?’ मंगल को समझ में नहीं आया.

    ‘हां. रंगवाला पोस्टर. मेरी फोटो से. जैसे मैं पानी के फव्वारे में नहा रही हूं, वैसा. अब ज़्यादा नहीं बताऊंगी. मुझे शर्म आती है.’

    राबिया दौड़ कर चली गई, हमेशा की तरह. आख़िरी शो के लिए आने वाले दर्शकों की भीड़ जमने लगी. नम आंखें लेकर मंगल को भी उस भीड़ में खो जाना पड़ा. उस रात मंगल ने अपना चेहरा आईने में देखा. उसे लगा कि राबिया की बात सच है. हसीन चेहरे बनाते वक़्त उसे हमेशा आश्चर्य होता था कि इतने हसीन लोग मेकअप क्यों करवाते होंगे? अब समझ में आता है. मेकअप करवा के हसीन बन कर घूमते हैं. मगर असल में… मंगल ने मन ही मन सोचा और बीड़ी जलाई. काली चाय पी ली. राबिया ने जो कहा था, उस पर सोचता रहा और रंग मिलाता रहा.

    राज कपूर के फिल्म फेस्टिवल के डेइली चेंज में कल ‘संगम’ का पोस्टर लगने वाला था. मंगल ने शुरुआत की, एक जुनून से. एक जोश के साथ दो घंटे में उसने चार पोस्टर बना दिए, बिना किसी ब्रेक के. जैसे रंग के छींटे पड़े हों और उसका कैलिडोस्कोप रच गया हो, वैसे उसने इंसानों के, लोकेशन के, दृश्यों के टुकड़े त्वरा से बना डाले. भीगी-भीगी वैजयंती माला, रोता हुआ–ललाट पर शिकन वाला राज कपूर, हेलिकॉप्टर के घूमते हुए पंखे, राजेंद्र कुमार का आटे जैसा फ़ीका चेहरा- सब उसने एक साथ बना डाला. हीरो के चेहरे की इश्क़बाज़ अदा, हीरोइन के सीने पर चिपकी हुई साड़ी, विलेन के होंठों के बीच सिगरेट. सब, सब कुछ. फिर फांसी का अंतिम फैसला सुनाते जज की तरह पोस्टर बनाकर उसने ब्रश तोड़कर फेंक दिया. पोस्टर की नकली दुनिया में उसने असली इंसानों के सुख-दुख भर दिए.

    सुबह में ये सब पोस्टर भादरन क़स्बे की गली-गली में लग गए. लोग इकट्ठा होकर देखने लगे. फिल्म का नाम तो संगम रखा है, मगर वह कौन है? और वह हीरोइन? इसकी मां… यह तो कमाल है. कुछ पढ़ने में ही नहीं आता. लोगों को पोस्टर देखकर हैरानी हुई. कमाल है, यह पोस्टर है या मज़ाक? क्योंकि पोस्टर में हीरो की जगह बदसूरत मंगल के अलग-अलग चेहरे थे.

    सुबह पोस्टर देखकर मंगल को भी पसीना आ गया. वह प्राणजीवन के कमरे में गया.

    ‘ये क्या किया, मंगल? इस पोस्टर में राज कपूर कहां है? उसके तन पर तुम्हारा सिर? तू पागल हो गया है क्या?’

    मंगल ने कहा, ‘नहीं, नहीं. साहब, वो… वो…’

    प्राणजीवन ने पान थूक दिया, ‘अरे क्या वो वो…? यह राज कपूर की जगह तेरा थोबड़ा बना कर मेरी बदनामी करना चाहता है? होश में तो है ना?’

    मंगल कुछ कहे बिना चला गया. उसके ही बनाए पोस्टर्स उसका मज़ाक उड़ा रहे थे. अलग-अलग हावभाव वाले, डरावने चित्र, रंगवाले, बिना रंगवाले, एक-एक मुखोटे जैसे चित्र. मंगल अपने कमरे में जाकर आईने के सामने रोने लगा. उसने खुद को थप्पड़ लगा दिया.

    बाहर पोस्टर को देखकर राबिया जोर-जोर से हंस रही थी. मंगल स्तब्ध होकर उस पोस्टर को देखता रहा. अपना ही हंसता हुआ चेहरा. राबिया उसे देख, हंसते हुए भाग गई. आख़िरी शो में भीड़ कम थी और उसमें से किसी ने कहा. ‘पोस्टर की बात छोड़ो, फिल्म बहुत अच्छी है– मज़ेदार.’

    ………………..

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