• लेख
  • उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन की बिखरती ज़मीन

    आज पढ़िए उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति की वर्तमान दशा-दिशा युवा राजनीति विश्लेषक प्रांजल सिंह का यह लेख पढ़िए। दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र के प्राध्यापक प्रांजल ने इस लेख में इस बात का तर्कपूर्ण विश्लेषण किया है कि किसान आंदोलन की धरती रही उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन दिशाहीन कैसे हो गई है। प्रांजल सिंह ने प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्री पार्था चैटर्जी की पुस्तक ‘The Politics of the Governed: Popular Politics in Most of the World’ का हिन्दी अनुवाद किया है ‘शासितों की राजनीति’ शीर्षक से, जो इसी साल वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। आप इनका यह लेख पढ़िए- मॉडरेटर

    ======================

    9 अगस्त 2020 से 11 सितम्बर 2021 तक चले किसान आन्दोलन को लगभग चार साल बीत चुके है, किसान आन्दोलन की तरुणाई अपने-अपने इलाकों में अपनी सामाजिक और राजनीति थकान उतार चुकी है, वैश्वीकृत भारत में यह पहला ऐसा आन्दोलन था, जहाँ किसानों ने न केवल अपने सांगठनिक सूझबूझ का परिचय दिया बल्कि एक लंबे समय से चल रही सत्ता पक्ष के आत्मविश्वास को लोकतांत्रिक चुनौती भी दी और तीन कृषक कानूनों की वापसी कराते हुए अपनी सफलता भी दर्ज़ की।

    इस पूरे आन्दोलन में पश्चिमी उत्तर प्रदेश को बड़े राजनीतिक परिवर्तन करने वाले किरदार के रूप में देखा जा रहा था। बहुत ज़माने के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश अपने किसानी राजनीतिक तेवर के साथ सत्ता पक्ष के ख़िलाफ़ खड़ा था। मुज़फ़्फ़रनगर और सहारनपुर में हुए सांप्रदायिक दंगों की वज़ह से क्षेत्र की किसान राजनीति वाली छवि खोती जा रही थी। लेकिन केंद्र सरकार के द्वारा बनाये गए तीन कृषक कानूनों के ख़िलाफ़ किसानों ने लामबंद होकर अपनी पहचान और राजनीतिक महत्व को लेकर दिल्ली के बॉर्डर पर धावा बोल दिया। यह आन्दोलन लगभग एक साल चला। इस आन्दोलन से यह भी क़यास लगाये जाने स्वभाविक थे कि कुछ राजनीतिक परिवर्तन और जनता के प्रयोग भी समाने आयेंगे। नयी सामाजिक राजनीतिक एकताएँ उभरेगी। सांप्रदायिकता के दबाव में टूट चुकी पुरानी एकता की वापसी और नयी बहसों की शुरुआत होगी। आंदोलित किसान राजनीति; जातिगत राजनीति और धार्मिक उन्मादों की जगह लेकर सूबे की राजनीति को ज़रूरतों और अस्मिता की राजनीति की ओर मोड़ देगी।

    लेकिन यह सभी परिकल्पनाएँ अपने केन्द्रीय सवाल की ओर टकटकी लगाये देखती रह गयी। वे राजनीतिक दल जिनका वजूद ही किसान राजनीति से निकाला था वह भी इन सवालों को अपना राजनीतिक आधार नहीं बना पाये। सपा किसानों के साथ खड़े होने का दम तो भरती रही लेकिन उन्हें मुख्यधारा कि राजनीति से नहीं जोड़ पायी। यह सपा के लिए ऐसा मौका था जो लोहिया के उस राजनीतिक वाक्य को वास्तविकता दे पाता कि सत्ता कि रोटी को हमेशा पलटना चाहिए नहीं तो एक तरफ वह जल जाएगी। उत्तर प्रदेश का राजनीतिक इतिहास इस बात की गवाही देता है कि यह प्रदेश किसान राजनीति का गढ़ रहा है। यह वह दौर था जब सत्ता की बुनियाद गाँव के खेत-खलिहानों में रखी जाती थी और किसानों के सवाल सीधे-सीधे राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनते थे। 1969 में स्थापित लोकदल इस किसान राजनीति की पराकाष्ठा का प्रतीक था। यह दल चरण सिंह जैसे प्रखर किसान नेता के नेतृत्व में उभरा, जिन्होंने कांग्रेस से अलग होकर उत्तर प्रदेश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनाई। लोकदल ने न सिर्फ़ किसानों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को राजनीतिक प्रश्न बनाया, बल्कि उसने तथाकथित पिछड़ी और मध्यवर्ती कृषक जातियों को सत्ता के केंद्र में लाने का प्रयास किया। यह वही सामाजिक वर्ग था जो लंबे समय तक राजनीति के हाशिए पर था।  जिसने भूमि सुधार, किसानी संकट और श्रम आधारित अस्मिता के सवालों के ज़रिए राजनीतिक पहचान स्थापित की।

    लोकदल की जड़ें भारतीय क्रांति दल (बिकेड़ी) से जुड़ी हुई थीं। जिसे चरण सिंह ने कांग्रेस छोड़ने के बाद 1967 में गठित किया था। 1969 के मध्यावधि चुनावों में बिकेड़ी उत्तर प्रदेश की विधानसभा में कांग्रेस के बाद दूसरा सबसे बड़ा राजनीतिक दल बन गया। यह उस दौर का संकेत था जब गाँव के लोग, विशेषकर छोटे और मध्यम किसान, खुद को सत्ता का निर्माता मानने लगे थे। 1974 में उत्तर प्रदेश और बिहार के उग्र समाजवादी, जिनका आधार पिछड़ा वर्ग था, चरण सिंह के बिकेड़ी से मिले और नया संगठन बना जिसका नाम भारतीय लोक दल पड़ा। यह संगठन 1977 के जनता गठबंधन का हिस्सा बना और कांग्रेस के खिलाफ़ जन असंतोष को संगठित रूप दिया। जनता सरकार में चरण सिंह की भूमिका निर्णायक रही, लेकिन सत्ता की राजनीति और नेतृत्व की महत्वाकांक्षाओं ने इस आंदोलन की नैतिक शक्ति को धीरे-धीरे खोखला कर दिया।

    जनता गठबंधन के टूटने के बाद लोकदल पुनः उभरा, लेकिन उसका चरित्र पहले जैसा किसान-आधारित नहीं रहा। सत्ता की राजनीति में टिके रहने की होड़ में लोकदल का संगठन धीरे-धीरे व्यक्तित्व-केन्द्रित होता गया। 1987 में चरण सिंह की मृत्यु के बाद यह पार्टी उनके पुत्र अजित सिंह के नेतृत्व में दो भागों में बँट गई और अंततः 1989 में वी. पी. सिंह के जनता दल में विलय हो गई। यहीं से किसान राजनीति का वह संगठित स्वप्न बिखर गया जिसने एक समय में गाँवों की आवाज़ को संसद तक पहुँचाया था। लोकदल के टूटने के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय गणित ने किसान एकता को निगल गयी। किसान अब एक वर्ग नहीं, बल्कि जातीय खाँचों में बँटी एक राजनीतिक संख्या बन गए।

    हालाँकि किसान आंदोलन (2020–21) ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसानों में आज भी राजनीतिक ताक़त बनने की क्षमता है। दिल्ली की सीमाओं पर हुए इस आंदोलन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट किसानों को फिर से राजनीति के केंद्र में ला दिया। राकेश टिकैत और भारतीय किसान यूनियन जैसे संगठनों ने एक बार फिर चौधरी चरण सिंह की किसान विरासत की याद दिलाई। आंदोलन ने पश्चिम यूपी में भाजपा के लिए चुनावी चुनौतियाँ खड़ी कीं और किसानों ने यह जताया कि अगर उन्हें नज़रअंदाज़ किया गया तो वे राजनीतिक समीकरण पलट भी सकते हैं। फिर भी, सवाल यही है कि प्रदेश की पार्टियाँ इस ऊर्जा को स्थायी किसान राजनीति में क्यों नहीं बदल पा रहीं।

    इसके मूलतः दो कारण है। एक, किसानों की राजनीतिक ज़मीन बिखर चुकी है। पश्चिम यूपी के गन्ना उत्पादक जाट किसानों की समस्याएँ अलग हैं, पूर्वांचल के धान और गेहूँ उत्पादक किसानों की चुनौतियाँ अलग। इसके अलावा, भूमिहीन मजदूरों और छोटे किसानों का संकट अलग रूप लेता है। दूसरा, जाति और धर्म की रेखाओं ने भी किसान वर्ग को बाँट दिया है। यही कारण है कि कोई भी दल किसानों को एक साझा राजनीतिक पहचान में नहीं जोड़ पा रहा। किसान आंदोलन ने इस जड़ता को हिलाने की कोशिश की, लेकिन आंदोलन की ऊर्जा दलगत राजनीति में स्थायी रूप से तब्दील नहीं हो पाई। उत्तर प्रदेश के किसान, जो कभी राज्य की राजनीति की धुरी हुआ करते थे, आज फिर से अपनी पहचान और राजनीतिक ज़मीन की तलाश में हैं। साथ ही यूपी के दल जातीय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति से बाहर निकलकर किसानों के सवालों को एक साझा मंच पर लाने का साहस नहीं जुटा पा रहे।

    यही कारण है कि आज उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसान का मुद्दा नारे में तो मौजूद है, पर उसकी असल ज़मीन खो चुकी है। किसान आंदोलन, जो कभी सामाजिक न्याय और आर्थिक स्वायत्तता का प्रतीक था, अब वोट बैंक की रणनीति में सिमट गया है। गन्ने की कीमत, सिंचाई की समस्या, भूमि अधिग्रहण और कर्ज़मुक्ति जैसे मूल प्रश्न अब केवल चुनावी घोषणापत्रों में रह गए हैं। गाँव के खेतों से निकलने वाली राजनीति, जिसने एक समय केंद्र की सत्ता को चुनौती दी थी, अब शहरों के रणनीतिक कक्षों में तय होती है।

    आर्थिक दृष्टि से देखें तो उत्तर प्रदेश का कृषि क्षेत्र राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) में अब केवल 23% योगदान देता है, जबकि राज्य की लगभग 60% आबादी खेती या उससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर है। यह अनुपात किसानों की उत्पादकता और आय, दोनों की दिशा और दशा को अभिव्यक्त करता है। निजीकरण और कॉर्पोरेट-समर्थन वाली नीतियों ने कृषि को बाज़ार की अस्थिरताओं के हवाले कर दिया है । बीज, खाद, बिजली और सिंचाई तक निजी हाथों में जाने से किसान की लागत बढ़ी है, जबकि समर्थन मूल्य और खरीद की गारंटी घटती गई है । परिणामस्वरूप, राजनीति का ग्रामीण अर्थशास्त्र अब किसान की स्थिरता के बजाय निवेशक की लाभ प्राप्ति पर केंद्रित हो गया है। 2024–25 के सरकारी आँकड़ों के अनुसार, प्रदेश में कुल उत्पादित धान का केवल 7.6% और गेहूँ का लगभग 8% ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदा गया। बाकी किसान खुले बाज़ार में अपनी फ़सल औने-पौने दामों पर बेचने को मजबूर रहे। गन्ना किसानों की स्थिति तो और चिंताजनक है, सितंबर 2025 तक प्रदेश के मिलों पर 12,000 करोड़ रुपये से अधिक का बकाया भुगतान दर्ज है। यह आंकड़े केवल आर्थिक संकट नहीं दिखाते, बल्कि यह बताते हैं कि राज्य की नीतियाँ अब किसानों की स्थिरता से ज़्यादा उद्योगपतियों की सुविधा के अनुरूप ढल चुकी हैं।

    इस पूरे आंदोलन और इन आँकड़ों के बीच बने विरोधाभास को स्थायी रूप देने के लिए एक ऐसे व्याकरण को तैयार करना था, जिससे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को एकबारगी रोका जा सके। जिससे उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव में परिवर्तन की राजनीति को दिशा मिल पाती जो धार्मिक ध्रुवीकरण के स्थान पर आर्थिक एकता और उत्पादक वर्ग की चेतना को राजनीतिक आकार दे सकता था। लेकिन किसान राजनीति का संकट यह है कि वर्गीय एकता को जातीय विभाजन से ऊपर नहीं उठा पा रही है। जाट, यादव, कुर्मी, दलित और क्षत्रिय सभी बहुत हद तक खेती से जुड़े हैं। पर उनकी सामाजिक राजनीतिक आकांक्षाएँ अलग अलग हैं। हिन्दुत्व ने इन्ही आकांक्षाओं का लाभ उठाया है। उसने द्विज़ और गैर द्विज़ जातियों को सांस्कृतिक गौरव के साझा मंच पर बाँध दिया। जिसका परिणाम यह हुआ कि बसपा तथा सपा दोनों ही इस साझा मंच को पूरी उर्जा के साथ खारिज करने में हिचकिचाती रही क्योंकि वर्गीय राजनीति उनकी जातीय गणनाओं को चुनौती देती है। दूसरी तरफ हिंदुत्व का विजय रथ केवल सांस्कृतिक नहीं बल्कि आर्थिक समर्थन से भी चलता है।  कॉर्पोरेट पूंजी, मीडिया नियंत्रण और राज्य सत्ता की वैचारिक संगति ने इसे मजबूती दी है। किसान राजनीति के पास इस स्तर का संसाधन, संगठन और वैचारिक एकजुटता न होने के कारण वह आज भी अपनी स्थायी राजनीतिक ज़मीन तलाश रहा है।

    (प्रांजल सिंह , दिल्ली युनिवर्सिटी के पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर है. व्यक्त विचार निजी हैं )   

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    1 mins