• समीक्षा
  • स्मिता सिन्हा की कविताओं की वेदना और संवेदना

    आज पढ़िए समकालीन हिन्दी कविताओं की प्रमुख हस्ताक्षरों में स्मिता सिन्हा के कविता संग्रह ‘रुंधे कंठ की अभ्यर्थना’ की समीक्षा। स्मिता सिन्हा का यह संग्रह इसी वर्ष सेतु प्रकाशन से प्रकाशित हुआ और आलोचकों पाठकों से इसको अच्छी सराहना मिल रही है। यह उनका दूसरा कविता संग्रह है और इसकी समीक्षा लिखी है जाने-माने कवि आनंद गुप्ता ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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    नयी सदी के आस-पास का समय कविता की दुनिया में एक क्रांतिकारी बदलाव का साक्षी बना। स्त्रियों ने पूरे आत्मविश्वास, नये तेवर और मुखरता के साथ कविता में अपनी बात रखनी आरंभ की। अपने जीवन के सुख-दुख, सपने, प्रेम, संघर्ष आदि को उन्होंने खुले मन के साथ अभिव्यक्त करना आरंभ किया। पिछले पच्चीस तीस सालों की कविता में स्त्रियों ने लगातार जरूरी हस्तक्षेप किये हैं जो अब भी जारी है। कविता के वर्तमान परिदृश्य में एक साथ कई महत्वपूर्ण स्त्री कवियों ने अपने अनुभव और संवेदना को शब्द देकर स्त्री विमर्श को नया आयाम दिया है।

    जहां वह एक ओर कविता के पुराने पड़ चुके प्रतिमानों को तोड़ती हुई कथ्य, संवेदना, विषय-वस्तु, भाषा, शिल्प आदि के स्तर तक ताज़गी का बोध कराती हैं वहीं दूसरी ओर वे स्त्रियों के जीवन में आने वाली चुनौतियों और संघर्षों के साथ हमेशा खड़ी रहती हुई उनसे जुड़ी विडंबनाओं, विसंगतियों, त्रासदी और शोषण को बेहद संवेदनशीलता और तार्किकता के साथ कलमबद्ध करती हैं। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों की अस्मिता और पहचान के जो संकट वर्षों से तैयार किए गए हैं उन असमानताओं और रूढ़ियों के विरुद्ध इनकी कविता प्रतिरोध का स्वर बन उभरती है।

    अपने पहले कविता संग्रह ‘बोलो न दरवेश’ से पाठकों, काव्य अध्येताओं और आलोचकों का ध्यान आकृष्ट करने वाली युवा कवयित्री स्मिता सिन्हा के दूसरे कविता संग्रह ‘रुंधे कंठ की अभ्यर्थना’ की कविताओं से गुजरते हुए हमारा परिचय एक ऐसी कवयित्री से होता है जो स्त्री की स्वतंत्रता और उनके अधिकारों के प्रति बेहद सजग है। प्रेम और स्त्री विमर्श इस संग्रह के केंद्र में है पर कवयित्री इन दोनों विषयों के सामाजिक पक्ष की भी गहरी छानबीन करती हैं। इन कविताओं की एक बड़ी विशिष्टता यह है कि प्रेम का विमर्श कब स्त्री विमर्श की सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए एक दूसरे के साथ जुड़ जाता है यह पता ही नहीं चलता। अपनी कविताओं के माध्यम से वह उस व्यवस्था पर चोट करती हैं जो स्त्रियों के आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को कुचल कर अपने सांचे में ढालते हुए अनुगामी बनाए रखने को तैयार रहती है। जहां उसकी स्वतंत्र चेतना और सोच का निषेध है। “याद नहीं / कब और कैसे/ इतनी अनुशासित होती गयी/ मेरी नींद, सपने, दिन, रात, प्रेम, पीड़ा/ और ये इन्द्रधनुष सी तितलियाँ/ जबकि अनुशासनहीनता का मोह अब भी बाकी है जीवन में।”

    स्त्रियों को अपने जीवन में एक साथ कई मोर्चों पर संघर्षों से गुजरना पड़ता है। यह संघर्ष जितना देहरी के बाहर चलता है उससे कहीं ज्यादा देहरी के अंदर। और सबसे ज्यादा वह अपने भीतर चल रहे संघर्ष से बेचैन रहती हैं। जीवन की जटिलताओं में घिरा स्त्री मन तमाम अंतर्द्वंद्व से गुजरता हुआ खुद की पड़ताल करता रहता है। कुछ सपने समय के साथ छूटते चले जाते हैं… और कुछ टूटते…

    “देर तक करती रहेंगी बहस/ अपने ही पक्ष और प्रतिपक्ष में /ओस के फाहे देते रहेंगे थपकी इनकी थकी आँखों को/ और लगती रहेगी गर्म पानी की सेंक/ इनकी पीठों पर आज फिर देर तक / आज ये फिर से छोड़ देंगी अपनी किसी कविता को/ अधूरी हमेशा के लिए…”

    इस अधूरेपन में ही पूर्णता की तलाश की जीवंत कथा बनकर जी रही हैं असंख्य स्त्रियां। अपनी अस्मिता और आत्मसम्मान की लंबी लड़ाई में पितृसत्ता उसे बार-बार तोड़ने की कोशिश करती है। कभी देह से… कभी मन से… कभी प्रेम में… कभी घरों में… कभी सड़कों पर…. कभी कार्यस्थलों पर। इस संग्रह की स्त्रियां इन्हीं संघर्षों के बीच हर बार उठ खड़ी होती हैं और प्रतिरोध दर्ज करती हैं। यह कविता में एक नयी स्त्री का उद्घोष है। वह हर चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है।

    “इस प्रतिरोध में/ धरती, सागर, और पहाड़/सिर्फ अवरोध नहीं, /बल्कि लड़ाई के मैदान हैं।/ यह टूटेगा, हराया जाएगा,/लेकिन हर बार अपनी राख से/ फिर उठेगा, बनकर/ एक नयी धार,/एक नयी चीख,/जो तुम्हारे मौन को चीर देगी।”

    एक जगह और वह लिखती हैं –

    “उसे नहीं पता कि/ उससे पहले प्रेम छूटा/ या ईश्वर/ हाँ वो बेगरज/ खड़ी रह सकती है/ दोनों के सामने/ आँखों में आँखें डाले…” ये पंक्तियां प्रतिरोध का एक सशक्त उद्धरण है। प्रेम और ईश्वर दोनों के प्रति स्त्रियों के मन में सामान्यतः कोमल भावनाएं होती हैं। पर यह एक बड़ा सच है कि प्रेम और ईश्वर दोनों के नाम पर वह सबसे ज्यादा बार छलीं गई हैं। इस संग्रह की स्त्री भरोसा टूटने पर दोनों के सामने खड़ी हो कर सवाल करती हैं।

    पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों के प्रति बढ़ती हिंसा और भेदभाव का प्रतिकार इस संग्रह की कई कविताओं में मौजूद है। न्याय व्यवस्था भी हमेशा स्त्रियों के विपक्ष में ही रही है। वह आह्वान करती हैं कि कब पीड़ित स्त्रियों के पक्ष में आवाज उठाई जाएगी। उसकी अनसुनी आवाजें कब सुनीं जाएगी। “कि वे अब तक मुंह बाये देख रहीं/ हमको तुमको सुन रहीं अपने होने, नहीं होने का/ अपने जीने, अपने मरने का हिसाब/ कि वे अब तक सहेज रहीं/ कालखण्ड के मोड़ों पर बिखरे/ अपने तमाम असबाबों को/ अपनी टूटी गर्दन और पैरों को/ अपनी खींची गयी जुबानों को/ अपनी मसली गयी छातियों को/ अपनी क्षत विक्षत योनियों को/वे अब तक कर रहीं इन्तजार/ कि जाने कब आ जाए उनके पक्ष में आवाज/ कि लो तुम्हारे मुजरिम हाजिर हैं!!”

    यह सुखद है कि इस कविता संग्रह की कविताओं में मौजूद स्त्रियां परंपरा के बने बनाए ढांचों को तोड़ती हुई स्वयं अपने लिए नये प्रतिमान गढ़ती हैं। ये अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं। वे उन वर्चस्ववादी ताकतों के खिलाफ मुखर हैं जो स्त्री को एक गुलाम से अधिक कुछ नहीं समझता। वे संघर्ष से घबराती नहीं। वह आगाह करती हैं- “तुम तो बस संभालना/ उस वक्त/ जब लुढ़केंगी/ अपेक्षित सी हमारी असहमतियां / तुम्हारी सहमतियों की ढलान पर।”

    एक जगह वे लिखती हैं – “कुछ बेटियां/ जीवन में पहली आवाज/ उठाती हैं/ अपनी माँ के पक्ष में/ अपने पिता के विरुद्ध/ हर बेटी/ पापा की पारी नहीं होती/ कुछ बेटियां सिर्फ एक स्त्री होती हैं /कुछ पिता सिर्फ एक पुरुष….” पितृसत्ता की जड़ें जहां से आरंभ होती है, ये पंक्तियां उस पर गहरी चोट करती हैं।

    आज की स्त्री कविता में जहां स्त्री विमर्श ही प्रमुख विषय बन कर रह गया है, स्मिता सिर्फ स्त्री विमर्श तक खुद को सीमित नहीं रखतीं बल्कि साम्प्रदायिकता, जातिवाद, पर्यावरण संकट, सामाजिक- आर्थिक असंतुलन, युद्धोन्माद जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाती हैं एवं स्त्रियों पर पड़ने वाले इनके प्रभावों की भी गहरी पड़ताल करती हैं साथ ही इनके अंतर्संबंधों की भी समीक्षा करती हैं। कवयित्री की काव्ययात्रा यहां निजता से सार्वभैमिकता की तरफ उन्मुख होती है। ‘क्षत-विक्षत देह समेटती स्त्री’ शीर्षक कविता युद्ध से पीड़ित स्त्रियों की व्यथा को उजागर करती मार्मिक कविता है। “यहाँ हैं खून में सनी औरतें/ जबरन गर्भवती होती औरतें/ जिबह होती औरतें/जो घसीटी जा रही हैं टॉयलेट में/ तहखानों और छावनियों में/ जो धकेली जा रही सरहदों के पार/ बेची-खरीदी जा रही हैं जानवरों की तरह/औरतें जो वहशियों से खुद को/ बचाने के लिए नदी में डूब रही हैं/ जमीन में कब्र बनाकर छिप रही हैं/ औरतें जो हर युद्ध में/ किसी बन्दूक की/ गोली की तरह चल रही हैं/ तो कभी इस्तेमाल हो रही हैं/ किसी बम में बारूद की तरह…।” युद्ध की विभिषिका और त्रासदी पर लिखी गई हिंदी की महत्वपूर्ण कविताओं में इसकी गिनती की जा सकती है।

    ‘प्यास का बंटवारा’ शीर्षक कविता देश के विभिन्न हिस्सों में फैले जातिवाद पर चोट करती एक मार्मिक कविता है। यह चिंताजनक है कि आजादी के इतने साल बीत जाने के बावजूद जातिवाद की जड़ें अब भी समाज में इतनी गहरी फैली हुई हैं कि सवर्णों के मटके से पानी पीने के कारण एक छात्र की हत्या कर दी जाती है। आधुनिकता के तमाम दावे यहां मुंह चिढ़ाते नज़र आते हैं। “तुम्हारी तरह/ उस मटकी को भी नहीं पता होगा कि/ सवर्णों के ही होते हैं मटके/ मटके में भरा पानी/ पानी से बुझने वाली प्यास/ दोष तुम्हारा नहीं/ हमारा है/ जो हम आज तक/ निकाल नहीं पाये तुम्हें/ इस जातिवाद के बाड़े से बाहर/ रोक नहीं पाये तुम्हारी हत्या को/ इस निर्लज्ज नृशंस समाज के हाथों होने से”

    स्मिता सिन्हा की कविताएं गहन मानवीय सरोकारों से युक्त हैं। आज जबकि मनुष्यता सबसे अधिक निशाने पर है, भावनाओं में कोमलता नष्ट हो रही हैं, मूल्यों का ह्रास हो रहा है, स्मिता अपने बच्चों को मनुष्यता और पशुता के बीच के अंतर को समझा कर संवेदनशील होने की सीख देती हैं। “मैंने उन्हें कभी भी/ उनके अधिकार नहीं समझाये, /समझायी तो उन्हें उनकी हदें… (हाँ, मैं एक मर्द को पोषित नहीं करना चाहती)” यह समय की जरूरत है कि हम अपने बच्चों को लैंगिक संवेदनशीलता की सीख दें।

    शहरीकरण के प्रभाव में आज के बच्चे प्रकृति से लगातार कटते जा रहे हैं। शुद्ध हवा, पानी और धूप जैसी बुनियादी जरूरतें अब शहरवासियों के लिए दुर्लभ होती जा रही है। शहरी आबादी कृत्रिम जिंदगी जीने को अभ्यस्त हो रही है। इसके दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। ‘बच्चों को नहीं पता’ शीर्षक कविता उन विडम्बनाओं से हमारा साक्षात्कार कराती हैं जहां शहरी बच्चों और युवाओं में जीवन के अति सामान्य अनुभव और सूचनाओं की कमी लक्षित की जा सकती है। “हम बहुत ऊँचाई पर रहते हैं/ इतनी ऊँचाई पर कि/ जहाँ से बौने लगते हैं विशाल वृक्ष भी।/ पर धरती और आकाश के बीच की यह दूरी,/ बहुत ही मामूली बात होती है हमारे लिए।/ बहुत ही मामूली सी बात होती है/ कंक्रीट के जंगल में हवा पानी धूप का खोना/ इतनी ही मामूली कि/ हमारे बच्चों को भी नहीं पता होता, / कोयल और कौओं के बीच का फर्क/ और इस फर्क को जानते-समझते भी/ हम पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ता…।” दरअसल यह संवेदना के छीजते चले जाने का दुष्परिणाम है कि हमें अब कोई फर्क नहीं पड़ता।

    इस संग्रह में प्रेम पर ढेर सारी सुंदर और सशक्त कविताएं हैं। प्रेम अपने आप में स्त्री के अधिकार, आत्मनिर्णय एवं स्वतंत्रता का उद्घोष है। प्रेम करती हुई स्त्री सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ती हुई अपने सपनों के लिए जगह बना रही होती हैं। स्मिता की प्रेम कविताएं स्वप्न और यथार्थ के बीच आवाजाही करती हुई हमें स्मृतियों की एक खूबसूरत यात्रा पर ले जाती हैं। यहां प्रेम मात्र देह तक सीमित नहीं है बल्कि यह मन तक पहुंचने का उपक्रम है।

    ‘मौन शिराओं में घुलन’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियां कवयित्री की संवेदना से हमारा परिचय कराती है – “मेरी मुश्किल क्या है/ मैं तुम्हीं से छूटती हूँ/ फिर तुम्हीं में आ मिलती हूँ/ तुम होते तो बताती/ ये धैर्य को गुनगुनाने के दिन थे/ दिन थे आत्मबल के तुष्टीकरण के/ ये सबल चेतनाओं के मौन शिराओं में घुलने के दिन थे ये दिन थे/ स्वप्नों के खण्डन के / विद्रूप आख्यानों के मण्डन के/ ये सुदृढ़ पाषाणों में नागफनी के सृजन के दिन थे/ मैं बस इतने ही दिन तुमसे छुटी/ मैं बस इतने ही दिन खुद से भी रूठी…” स्मिता प्रेम को संकुचित दायरे से बाहर निकालती हुई व्यक्ति प्रेम की सीमाओं से आगे बढ़ कर प्रकृति, जीव-जंतु, राष्ट्र प्रेम तक अपनी कविताओं की पहुंच बनाती हैं।

    स्मिता सिन्हा के पास एक सुदृढ़ काव्य भाषा है। जिसके कारण उनकी कविताओं में ग़ज़ब की सम्प्रेषणीयता है। भाव और शिल्प के स्तर पर कवयित्री बेहद सचेत हैं। विषय वैविध्य के कारण इस संग्रह को पढ़ते हुए कहीं एकरसता का बोध नहीं होता। ये रचनाकार के गंभीर दृष्टिकोण और जनपक्षधरता से भी हमारा परिचय कराती है। बिंबों में ताजगी है जिससे इनकी कविताओं की अपनी अलग पहचान है। इस संग्रह में जीवन के हर रंग का समावेश है… प्रेम, आशा, निराशा, स्मृति, संघर्ष और सामाजिक विडंबनाएँ। कवि की कलम में यह शक्ति है कि वह साधारण से साधारण विषय को भी असाधारण बना देती है। इन कविताओं को पढ़ना एक ऐसे संसार में प्रवेश करना है जहाँ संवेदनाएँ अब भी जीवित हैं और कविता अब भी किसी असंभव-से लगते विश्वास को सम्भव बनाने की कोशिश करती है। यह एक विचारोत्तेजक और हृदयस्पर्शी काव्य संग्रह है जो निश्चित रूप से पाठकों के मानस पर अपनी गहरी छाप छोड़ेगा।

     

    कविता संग्रह – ‘रुंधे कंठ की अभ्यर्थना’

    कवयित्री – स्मिता सिन्हा

    प्रकाशक – सेतु प्रकाशन

    प्रकाशन वर्ष -2025

    मूल्य -249/-

     

    समीक्षक – आनंद गुप्ता

    संपर्क – 9339487500

     

     

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