इब्ने सफी का अफ़साना कुछ यूँ शुरू हुआ

जाने-माने पत्रकार और अनूठे विषयों पर लिखने वाले लेखक यशवंत व्यास की किताब आई है ‘बेगम पुल से दरियागंज’, जिसमें हिन्दी-उर्दू के पल्प फ़िक्शन की दिलचस्प दास्तान कही गई है। हिन्दी में इस विषय पर यह पहली ही किताब है और बहुत शोधपूर्ण किताब है। पेंगुइन स्वदेश से प्रकाशित इस किताब का एक अंश पढ़िए, जो जासूसी उपन्यासों के सरताज लेखक इब्ने सफ़ी से जुड़ा हुआ है- मॉडरेटर

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इब्ने सफी का अफ़साना कुछ यूँ शुरू हुआ ।

1948 में इलाहाबाद से इब्ने सफी के दोस्तों अब्बास हुसैनी और शकील जमाली ने एक रिसाला शुरू किया था ‘निकहत‘ । इब्ने सफी ने पहले इसमें एक कहानी लिखी, फिर हास्य–व्यंग्य पर कलम चलाई- सनकी सोल्जर‘ के नाम से। फिर जब जासूसी छापने की बात आई तो सामने आया – दिलेर मुजरिम । इब्ने सफी ने तब ये राह चुनने के पीछे क्या सोचा होगा?

‘मैं सोचता रहा। आखिरकार इस नतीजे पर पहुँचा कि जब तक आदमी में कानून के एहतराम का सलीका नहीं पैदा होगा यही सब होता रहेगा। मेरा ये मिशन है कि आदमी कानून का एहतराम करना सीखे। जासूसी नाविल की राह मैंने इसीलिए मुंतखिब की थी। थके–हारे जहनों के लिए तफरीह भी मुहैया कराता हूँ और उन्हें कानून का एहतराम करना भी सिखाता हूँ। फरीदी मेरा आइडियल है जो खुद भी कानून का एहतराम करता है, दूसरों से कानून का एहतराम कराने के लिए अपनी ज़िन्दगी तक दांव पर लगा देता है।‘

आगे चलकर साठ के दशक में कई जनप्रिय लेखकों के प्रेरक बने इब्ने सफी ने अपने इस पहले नॉवेल दिलेर मुजरिम (1952) का आइडिया विक्टर गन की कथा ‘आयरन साइड्स लोन हैंड‘ से उधार लिया था।

इब्ने लिखते हैं :

‘दिलेर मुजरिम का प्लॉट मैंने अंग्रेज़ी से लिया था लेकिन फरीदी और हमीद मेरे अपने किरदार थे। मैंने उस कहानी में कुछ ऐसी दिलचस्पियों का इज़ाफा किया था जो मूल प्लॉट में नहीं थीं। इसके अलावा ‘जासूसी दुनिया‘ में ऐसे उपन्यास और भी है जिनके प्लाक मैंने अंग्रेज़ी से लिए थे – मसलन, रहस्यमय अजनबी, नर्तकी का कत्ल, हीरे की खान और खूनी पत्थर। एक हंगामे वाला किरदार प्रोफेसर दुर्रानी, अंग्रेज़ी से आया है। सिर्फ किरदार, कहानी मेरी अपनी है। इसी तरह पहाड़ों की मलिका का बनमानुस और गौरी मलिका भी अंग्रेज़ी से आए है। लेकिन प्लॉट मेरा अपना है। इमरान के सारे उपन्यास बेदाग हैं।‘ (इब्ने सफी, भूमिका, जमीन के बादल)

इब्ने सफी ने एक जगह लिखा तिलिस्मे होशरुबा और राइडर हेगर्ड के प्रभावों ने आपस में गड्डमड्ड होकर मेरे लिए एक अजीब सी जेहनी फिज़ा मुहैया कर दी थी जिसमें मैं हर वक्त डूबा रहता। ऐसे–ऐसे सपने देखता कि बस। (इब्ने सफी, आलमी डाइजेस्ट )

‘जासूसी दुनिया‘ मैगज़ीन हिंदी और उर्दू दोनों जबानों में आती थी। ‘भयंकर भेडिय़ा‘ और ‘भयंकर जासूस‘ सिर्फ हिंदी में। पश्चिम की हवा से जो चिंगारियाँ यहाँ बनी थीं उनमें इन मैगज़ीनों को गिन लीजिए। एमएल पांडे के उपन्यासों की तब धूम थी। इब्ने सफी ‘जासूसी दुनिया‘ के जरिए उर्दू और हिंदी दोनों में उपलब्ध थे। शरलॉक होम्स और वॉटसन की तरह उनके यहाँ फरीदी और हमीद थे। उर्दू में इंस्पेक्टर फरीदी, हिंदी में कर्नल विनोद हो जाता। उनका सहायक सार्जेंट दोनों में हमीद ही रहता। मजेदार बात यह है कि इब्ने सफी को हार्पर कॉलिंस ने जब दुबारा छापा तो नीलाभ ने भूमिका में उर्दू के मुस्लिम नाम को हिंदी में हिंदू कर देने का पता गंगा–जमुनी तहज़ीब और सांप्रदायिक सद्भाव के खाते में डाल दिया। जबकि यह सीधा सा पाठकीय प्रेषण का मामला था जो हिंदी–उर्दू के पाठकों की हिंदू–मुस्लिम पृष्ठभूमि के मनोविज्ञान से जुड़ा था। जहाँ जो स्वीकार्य हो, वही लोकप्रिय साहित्य की मनभावन गली है।

जब इमरान सीरीज शुरू हुई तो हिंदी में इमरान को राजेश कर दिया जाता था। इब्ने सफी से पहले, पहला उर्दू जासूसी नॉवेल जफर उमर का लिखा मिलता है। जफर उमर ने 1916 में जासूसी उपन्यास लिखा नीली छतरी जो एक फ्रांसीसी उपन्यास का रूपांतरण था। उमराव जान के लेखक मिर्जा हादी रुसवा जैसों ने भी इस इलाके में कोशिश की थी, मगर कामयाब न हो सके। अलबत्ता तीरथराम फीरोजपुरी ने पश्चिम के कई उपन्यासों को उर्दू में अनुवाद करके बाजार  में डाला और ज़बरदस्त नाम कमाया। लोग उनके इतने दीवाने थे कि ये अ भी तीरथराम फीरोजपुरी के नाम से माँगे और खरीदे जाते थे। मूल लेखक से किसी को वास्ता न था। इन्हीं तीरथराम की अगली लोकप्रिय कड़ी में थे इब्ने सफी। उत्तरप्रदेश के नारा में पैदा हुए असरार अहमद नारवी पेशे से टीचर थे। शुरुआत उन्होंने शायरी से की थी, फिर अफ़साने लिखे। सनकी सोल्जर नाम से हास्य–व्यंग्य की फुहारें छोड़ी। 1952 में निकहत पब्लिकेशन ने जब तय किया कि ‘जासूसी दुनिया‘ शुरू की जाए तो बकौल अनिल जनविजय, इलाहाबाद में दो लेखक ऐसे थे जिनका अब्बास हुसैनी के घर पर आना जाना था – असरार अहमद और राही मासूम रजा। दोनों को ही हुसैनी साहब ने जासूसी नॉवेल लिखने को कहा था, इस शर्त के साथ कि सिर्फ सात दिनों में नॉवेल लिखकर दिया जाए। असरार साहब ने कर दिखाया। इसके साथ ही असरार ने नाम नया धारण किया। इब्न यानी बेटा, और पिता सफीउल्लाह से मिलकर बना इब्ने सफी साथ में डिग्री चिपकाई गई और इस तरह हुआ – इब्ने सफी बी.ए. । 1952 में उर्दू जासूसी दुनिया के पहले अंक में दिलेर मुजरिम आया। हिंदी में जासूसी दुनिया का पहला अंक खून की बौछार आया। बाद में ये बंगला में भी छपे।

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