• बाल साहित्य
  • अनवर – प्रभात

    बाल साहित्य मेँ आज हम पढ़ते हैँ सुप्रसिद्ध कवि प्रभात की कहानी ‘अनवर’-

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    अनवर

    ‘अनवर इतनी देर से निशान्त के साथ क्या खुसुर-फुसुर कर रहे हो।’ मास्टर जी ने पूछा।

    ‘पढ़ाई की ही बात कर रहे हैं साब जी, फालतू की बातें करने को तो घर पर ही काफी टैम रहता है।’ अनवर ने मास्टर जी की तरफ झाँकते हुए कहा।

    ‘क्या बात कर रहे हो पढ़ाई की?’ माटसाब रामविलास जी ने कड़क आवाज में पूछा।

    ‘पढ़ाई की बात इतनी जल्दी समझ में आ जाती तो हम रोज-रोज स्कूल क्यों आते साब जी।’ अनवर ने मास्टर जी की तरफ झाँकते हुए कहा।

    ‘मैं पूछ रहा हूँ, पढाई की वह कौनसी बात है जो तुम इतनी देर से कर रहे हो।’ रामविलास जी तो आज अनवर के पीछे ही पड़ गए।

    ‘इतनी देर से यही सलाह मिला रहे थे साब जी कि क्या पढ़ें?’ अनवर ने डाँट की वजह से खड़े होकर जवाब दिया।

    ‘आधे घण्टे से अखबार पढ़ते हुए मेरी तुम पर पूरी नजर थी समझे। बीच-बीच में हीहीही ठीठीठी चल रही थी तुम दोनों की।’ मास्टर जी ने कहा।

    ‘थोड़ी भौत बकरी के बच्चों की भी बात कर रहे थे साब जी। अब वे बड़े हो गए हैं ना।’ अनवर ने कहा तो पूरी कक्षा हँस पड़ी।

    मास्टर जी ने अखबार को समेट कर मेज पर रखा और बोले-‘घर में तुम्हारी चकर-चकर चलती है। स्कूल के रस्ते में तुम्हारी चकर-चकर चलती है। स्कूल के अंदर तुम्हारी चकर-चकर चलती है। मैं सोचता हूँ कि तुम पढ़ते कब हो ?’

    ‘ऐसे ही अनेक दफा मैं भी सोचता हूँ माटसाब जी। निशान्त भी ऐसे ही सोचता है। बेला भी ऐसे ही सोचती है कि स्कूल में पढ़ाई कब होती है। हम बातें ही करते रहते हैं।’ सारे बच्चों को लगा कि अब अनवर पिटेगा।

    माटसाब राम विलास जी के गदबदे गाल लाल हो गए। उन्होंने अनवर की पिटाई नहीं की। वे कक्षा के दरवाजे पर खड़े होकर चंचल बहनजी से बात करने लगे।

    प्रभात    
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    प्रभात

    1972 की बारिशों में राजस्थान में करौली जिले के रायसना गाँव में जन्म। राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर से हिन्दी साहित्य में एमए के बाद शिक्षा के क्षेत्र में तीन वर्ष नियमित काम। 2006 से आज तक शिक्षा और लोक साहित्य के क्षेत्र में स्वतंत्र कार्य।

    कई लोकभाषाओं में स्थानीय स्तर पर समुदायों के साथ काम करते हुए बच्चों के लिए पचास से अधिक किताबों का सम्पादन-पुनर्लेखन।
    एकलव्य, जुगनू, एनबीटी, रूम टू रीड, लोकायत आदि प्रकाशनों से बच्चों के लिए पानियों की गाड़ियों में, बंजारा नमक लाया, कालीबाई, रफ्तार खान का स्कूटर, साइकिल पर था कव्वा, घुमंतुओं का डेरा, अमिया, ऊँट का फूल, कैसा-कैसा खाना, लाइटनिंग, पेड़ों की अम्मां, आओ भाई खिल्लू आदि तीस से अधिक किताबें प्रकाशित।

    ‘अपनों में नहीं रह पाने का गीत’ (कविता संग्रह) साहित्य अकादमी, नई दिल्ली से और ‘जीवन के दिन’ (कविता संग्रह) राजकमल से प्रकाशित। कहानीकार डॉ. सत्यनारायण के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आधारित मोनोग्राफ राजस्थान साहित्य अकादमी से प्रकाशित।
    मैथिली, मराठी, अंग्रेजी आदि भाषाओं में कविताओं के अनुवाद। आकाशवाणी, दूरदर्शन से समय-समय पर कविताएँ प्रसारित। विभिन्न पाठ्यक्रमों में कविताएँ, कहानी और नाटक शामिल।

    युवा कविता समय सम्मान, 2012
    सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार, 2010
    बिग लिटिल बुक अवार्ड, 2019

    सम्पर्क:
    प्रभात,
    205, जनकपुरी, ईदगाह के पीछे,
    नीमली रोड, सवाईमाधोपुर, राजस्थान 322001

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