• बाल साहित्य
  • असर – श्रद्धा थवाईत

    बच्चोँ के साहित्य का दायरा इतना तंग नहीँ होता कि वे बड़ोँ की चिन्ताएँ न समझ सके। श्रद्धा थवाईत की कहानी ‘असर’ 9 साल से बड़े बच्चोँ के लिए है। जानकीपुल पर अपनी टिप्पणी ज़रूर दर्ज करेँ- मॉडरेटर 

    ********************

    उस शाम रिया ऑफिस से थकी-हारी घर पहुँची। उसने पाया कि बैठक की खिड़की में, नेटलॉन की जाली और रॉड के बीच कुछ मोटे-मोटे तिनके जमा हैं। घर के आस-पास पड़की, कबूतर और गौरेया बहुत थे। जिस अनगढ़ तरीके से वे तिनके पड़े थे, यह किसी पड़की का ही काम हो सकता था। रिया उत्साहित हो उठी। कुछ पल जीवन में सावन की बरखा से बरसते हैं। उसने जल्दी से अपने तीन साल के बेटे मन को बुला कर अधबना घोंसला दिखाया।

    “देखो मन! यहाँ एक चिड़िया घोंसला बनाने की कोशिश कर रही है।”

    “घोंसला” मन उत्सुकता से चहका।

    “फिर चिड़िया उसमे अंडा देगी, उससे चूजे निकलेंगे मम्मी?” मन के प्रश्नों की कतार अभी शुरू ही हुई थी।

    “चिड़िया चूजों को फिर दाना खिलाएगी?”

    “हां बेटू!”

    “लेकिन चिड़िया कहाँ है?”

    वाकई में चिड़िया नहीं थी सिर्फ तिनके ही थे।

    “चिड़िया अपने लिए दाना लेने गयी होगी बेटू।” रिया ने अपने मन के संशय को मन में ही रख लिया। तभी आदित आ गए और मन का ध्यान घोंसले से हट गया। वरना प्रश्नों की कतार का अगला प्रश्न होता-

    “मम्मी! रात को दाना लेने?”

    रविवार जिंदगी की गाड़ी के लिए पेट्रोल पंप होता है। रिया,आदित और मन आराम से उठकर दूध-चाय पीते बैठे, गप्पें मारते रहे। मन की नन्हीं दुनिया की कल्पनाओं में खोते रहे, उसकी जिज्ञासाओं के समुद्र में तैरते रहे। पड़की जोड़े की घोंसला बनाने की कोशिशें जारी थी। मन भी मम्मी-पापा के साथ उत्सुकता से चिड़ियों को बार बार तिनका लेकर आते, तिनका जमाते और उड़ते देख रहा था।

    यूँ तो छत पर, बालकनी में या खिड़की में बैठी चिड़िया को देखते ही उसे उड़ाने के लिए दौड़ना मन का पसंदीदा खेल था लेकिन उसने इस पड़की दंपती को उड़ाने की जिद एक बार भी नहीं की बल्कि बैठक में जाते ही वह सहज संवेदना भरी चुप्पी जरुर साध लेता कि उसकी किसी हरकत से चिड़ियों को कोई परेशानी न हो।

    उन पड़की दम्पती ने घोंसला निर्माण का कोई विज्ञान तो नहीं ही पढ़ा था शायद उन्होंने अपने पूर्वजों से सही प्रशिक्षण भी नहीं लिया था। वे खिड़की के रॉड और जाली के बीच, बिना किसी आधार के तिनके अटकाने का प्रयास कर रहे थे। पड़की अपना घोंसला पंद्रह-बीस तिनकों से ही बना लेती है,  लेकिन जैसे ही घोंसले के लायक पर्याप्त तिनके जमा करने का अहसास कर, मम्मा पड़की उस पर बैठती, तो उसके बोझ से घोंसला नीचे धसकने लगता। दोनों पड़की फिर उड़ जाते और तिनके लाने।

    रविवार की सुबह की चाय ख़त्म हो गई। हफ्ते भर की गप्पें मार लीं, रिया खरगोश मम्मा बन ली, मन बन गया चीकू खरगोश फिर वह बना टीनू का मैगी पपी और रिया बनी मम्मी और मम्मा की बेटी टीनू। कई खेल, खेल लिए गए, नाश्ता बन गया.. हो गया। तब भी चिड़ियों का किस्सा वहीँ का वहीँ अटका रहा। इस बार घोंसले मे बैठने के प्रयास में घोंसला फिर धंसका। दोनों फाख्ता फिर तिनके लाने उड़ गए। तब रिया ने इस परिदृश्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की ठानी। उसने घर भर में घोंसले के आधार के लिए कोई उपयुक्त चीज खोजी। उसे मन के वाटर कलर के ऊपर का प्लास्टिक का पतला ढक्कन मिला। वह आशा के पंखों पर सवार घोंसले के लिए मदद के तिनके बिनने लगी।

    उसने ढक्कन को पड़की के घोंसले के ठीक नीचे रख थोड़ा ऊपर उठाया और फिर सुई से छेद कर ढक्कन को धागे से दो तरफ से रॉड से और दो तरफ से जाली से सिल कर बांध दिया। इस बांधने की प्रक्रिया में प्लास्टिक के ढक्कन का हल्का ढलान नेट की ओर बन गया। इस तरह अंडे के बाहर लुढ़कने का खतरा भी नहीं रहा। रिया ने यह सोच कर नहीं किया था लेकिन जब ऐसा हो गया तो उसके मन में उर्जा की लहरें उठने लगीं कि जब अच्छा करने जाओ तो ईश्वर भी मदद करते हैं। घोंसले को आधार मिल गया।

    पड़की छुआछुत नहीं मानती, यह पता होने के बाद भी अब मन में धुक-धुकी थी कि पड़की ये मदद स्वीकार करेगी या नहीं। कुछ देर बाद दोनों पड़की वापस आ गई, इधर घर के रविवार के काम भी इंतजार में थे। दोनों पड़की को कुछ देर के लिए अकेले छोड़ दिया गया। लगभग घंटे भर बाद घोंसले में एक अंडा पड़ा दिखा। रिया की मदद स्वीकृत ही नहीं फलीभूत भी हो गई। रिया ने ख़ुशी से किलकते हुए मन और आदित को आवाज दे-दे कर बुलाया। बस थाली पीटने की ही कमी रह गई। रिया ने मन को पास से दिखाया। उसे बताया कि अब कुछ दिन बाद इससे चूजा निकलेगा। अंडे की फोटो खींची। जब यह सब हो रहा था- चिड़िया नदारद थी।

    इसके बाद सब नहाये, खाए-पिए। रविवार का आनंद उठाने दोपहर को लम्बी तानी। शाम को उठ कर देखा तो एक और अंडा उस घोंसले में रखा था। कुल जमा दो अंडे लेकिन चिड़िया अब भी नदारद थी।धीरे-धीरे शाम हो गई, रात हो गई लेकिन चिड़िया नहीं आई। रात की ठण्ड में यदि चिड़िया के परों की गर्मी नहीं मिली तो अण्डों का क्या होगा? रिया चिंता के जाले बुनने लगी। सोने से पहले तक चिड़िया नहीं ही दिखी। सुबह उठ कर देखा चिड़िया नहीं थी। अपने-अपने ऑफिस-स्कूल जाने के लिये सब तैयार हो गए, पर चिड़िया को न आना था न वो आई। आखिर यह किस्सा यहीं छोड़कर रिया ऑफिस चली गई।

    देर शाम जब वह घर वापस आई तब भी चिड़िया नहीं थी। रात हो गई लेकिन चिड़िया नहीं आई। अब रिया के चेहरे से चिंता टपकने लगी

     “लगता है चिड़िया अण्डों को छोड़ दी। अब वो नहीं आयेगी। कहीं घोंसले को मेरे छूने के कारण चिड़िया ने घोंसले के साथ अण्डों को भी छोड़ तो नहीं दिया।”

    आदित की शांत आवाज आई,“आ जाएगी,अच्छा सोचो।”

    मन ने उत्सुकता से पूछा, “मम्मी अब चिड़िया नहीं आएगी क्या?”

    मन की बात पर रिया ने उसे टालने के लहजे में कहा, “कल सुबह तक आ जाएगी बेटा!” और उसे खेलने भेज कर आदित से फिर कहा,

    “नहीं! रात को भी नहीं आई। सुबह भी नहीं आई।अब भी नहीं हैं। अब क्या आयेगी? देख लेना अब वो नहीं आएगी।”

    लहरें भी अजीब होती हैं यह ऊपर भी उछालती है तो अन्दर भी खींचती हैं।

    “तुम्हें नहीं लगता कि इतना नकारात्मक नहीं सोचना चाहिए।आ जाएगी सुबह, इन्तजार तो करो।” वापस वही जवाब था आदित का।

    पड़की सुबह भी नहीं आई। पड़की के घर की खिड़की में घोंसला बनाने की रिया की ख़ुशी काफूर हो गई। मन को अण्डों से बच्चे निकलने, मम्मा पड़की के उनको दाना खिलाने, उनके बड़े होते हुए दिखाने की ललक खो गई। उसकी जगह खेद का रेशा दांतों में अटक गया कि जब इसे नहीं आना था तो इसने घर में अंडे दिए ही क्यों। दो जिंदगी के, खोल में कैद में ही रह जाने और रोज उन्हें देख फिर और फिर से निराश होने की सोच रिया बेहद हताश हो गई।

    “देखा! मैंने कहा था न कि अब चिड़िया नहीं आयेगी। अभी भी नहीं आई।”

    आदित ने शांत आवाज में ही रिया को कहा, “आ जाएगी”

    गृहस्थी में कभी-कभी शांत आवाज भी आग में घी का काम करती है। रिया का मन भड़क उठा।

    ‘कोई दस मंजिल ऊपर से गिर जाए तो भी यह पहली मंजिल तक गिरने तक यही कहेंगे कि अब तक तो कुछ नहीं हुआ। भले इस एक मंजिल के बाद कुछ भी होता रहे। रात भर ठण्ड में अंडे खुले पड़े रहे, अब जाने क्या होगा? इनमें तो कोई भावनाए ही नहीं हैं। कोई चिंता ही नहीं है। कितनी चिंता हो रही है, ये नहीं समझ सकते।’

    बच्चे शब्दों की जगह चहरे के भावों को बेहतर पकड़ते हैं।मन ने फिर पूछा, “अब चिड़िया नहीं आएगी न मम्मी?”

    एक पल को रिया और उसके अन्दर की माँ के बीच हल्का सा संघर्ष हुआ। माँ होना तो धैर्य के शिखर पर होना और उस पर बने रहना होता है। हर छोटी बात का असर परखना होता है। उसने मन को बाँहों में भर कर,उसके बाल सहलाते हुए कहा,  “कल सुबह तक आ जाएगी बेटा,असल में वह दाना लेने गई होगी फिर रास्ता भूल गई होगी।”

    नन्हा मन चिड़िया के रास्ता भूलने फिर सुबह वापस आने की लम्बी कहानी से संतुष्ट हो कर सो गया।

    सुबह भी चिड़िया नहीं दिखी। रिया ने हार मान कर, इंतजार करना ही बंद कर दिया। लेकिन दस बजे के करीब ऑफिस निकलते हुए देखा तो चिड़िया वापस आ गई थी। तब से वह लगातार अंडे को सेती रही। बस बीच बीच में शायद दाना खाने कुछ देर को बाहर जाती। तब इसका जोड़ीदार आकर बैठ जाता। लगभग बीस बाइस दिन बीत गए। पड़की घोंसले में बैठी, माँ बनने की तपस्या करती रही। बस कभी मुँह बाईं ओर होता कभी दायीं ओर। आखिरकार अण्डों से चूजे निकल आये। मम्मा और पापा पड़की रोज कई बार इन्हें दाना खिलाते। दोनों चूजे पहले दाना खाने के लिये लड़ते। मम्मा पड़की के परों में सिमटे बैठे रहते।

    नन्हा मन इन्हें देख कर खुश रहता। दसियों प्रश्न करता। नीचे आँगन में रोज दाने डालता। फेसबुक पर रिया इनका अपडेट डालती।

    वह भी रविवार की दोपहर थी जब रिया उन्हें अपने पंख तौलते देख रही थी और तभी वे दोनों अपने हिस्से का आसमान नापने उड़ गए। उनके पंखों की परवाज देख रिया को अहसास हुआ कि दसवीं मंजिल से  गिरा इंसान, अंतिम वक्त पर गद्दों से भरे ट्रक पर गिर कर बिना किसी चोट के बच सकता है, कि अब युवा हो चुके मन का भी यही विश्वास है कि जीवन के गरजते समुद्र में आशा के एक लट्ठे के सहारे भी जिंदगी की जंग जीती जा सकती है।

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    श्रद्धा थवाईत का के कहानी संग्रह ‘हवा में फड़फड़ाती चिट्ठी’ के लिए ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार 2016 प्राप्त हुआ। इसके अलावा उनका एक अन्य कहानी संग्रह ‘पगडंडी’ सेतु प्रकाशन से प्रकाशित है। उनकी कहानियां हिंदी की महत्त्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में लगातार छपती रही हैं। ये बच्चों के लिए नियमित रूप से लिखती रही हैं। रूम टू रीड के लिए कथेतर कार्ड्स सेट एवं अनबाउंड स्क्रिप्ट से प्रकाशित एक बाल उपन्यास ‘दिल में तित्तू धड़के’ इनके प्रमुख कार्यों में से है। फिलहाल रायपुर में रहती हैं।

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