आज कल सोशल मीडिया पर कहानियों की चर्चा खूब हो रही है। पिछले दिनों दो कहानियों को लेकर फ़ेसबुक पर बहस चल रही थी, तो उसी बहस के क्रम में श्री नवनीत पांडेय ने त्रिभुवन की कहानी ‘बहावलपुर की आख़िरी ट्रेन’ का ज़िक्र किया। बाद में कथा-आलोचक राकेश बिहारी ने भी इस कहानी के बारे में बताया। फिर लगा कि ‘कथादेश’ में प्रकाशित इस कहानी को साभार आप लोगों के लिए प्रस्तुत करना चाहिए। लीजिए त्रिभुवन की यह कहानी पढ़िए। त्रिभुवन जी वरिष्ठ पत्रकार हैं, और शायद यह उनकी पहली प्रकाशित कहानी है। आप भी पढ़ियेगा- मॉडरेटर
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कर्वी क़ौसर ने फ़्रंट पेज पर पहली ही ख़बर पढ़ने के बाद अख़बार को एक तरफ़ सरका दिया। अख़बारों से अब उसकी दोस्ती पहले जैसी नहीं रही थी। कभी-कभी तो वह उन्हें उलटी तरफ़ से पढ़ने लगती, ताकि ख़बरों का भयावह सच उसके सामने देर से आए। लेकिन सच क्या वाक़ई सच रहा? झूठ के रंग अब इतने पक्के हो गए थे कि धूप में भी नहीं उड़ते थे।
घर के बाहर सप्तपर्णी के दो पेड़ों पर सेवन सिस्टर्स की चहचहाहट थी, मगर उनके सुरों में मानो कोई गहरी विकल व्यथा घुली हुई थी। दो गिलहरियाँ फुर्ती से इधर-उधर भाग रही थीं; लेकिन उनकी चपलता में एक अजीब-सी बेचैनी थी। हवा में तैरते धूप के सुनहरे टुकड़े क़ौसर की आत्मा के उन कोनों तक पहुँच रहे थे, जहाँ गहरी उद्वेलित उदासियाँ घर कर चुकी थीं।
काली कॉफी का एक घूँट लेकर कर्वी कौसर ने आँखें मूँद लीं और वह जाने कहीं खो गई। उसके अंतर की कथा उसके हृदय से निकल कर उसकी आँखों पर गिरी पलकों को सिंचित करती हुई दिगंत में लुप्त हो गई।
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मैं कर्वी क़ौसर। मेरे पति ईश्वर नायर, सीमा सुरक्षा बल में असिस्टेंट कमांडर थे। कश्मीर की एक बर्फ़ीली सुबह, जब सूरज भी पहाड़ों के पीछे सहमा खड़ा था, एक बम धमाके ने उन्हें मुझसे छीन लिया। ज़िंदगी एक स्याह कोहरे में लिपटी रह गई। दु:ख केवल शोक नहीं लाया था; वह अनगिनत वेदनाएँ, अंतहीन पीड़ाएँ और हर पल रिसते घाव लेकर आया था। मेरी दुनिया का हर रंग बेरंग हो गया था। अब दिन सुबह सूरज देखती हूँ तो धूप में अंधेरा घुला रहता है और रात को आकाश में झांकती हूँ तो मेरा ध्रुवतारा जैसे वीतराग चेतन को खोजते कहीं खो गया है।
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लगता था, ज़िंदगी ने अपनी उंगलियाँ ख़ूने-दिल में डुबो ली हैं। ज़िंदगी से सारी रोशनी जैसे निकल गई और एक तीरगी उमड़ कर चली आई। घर के भीतर-बाहर, आंगन के पार-द्वार।
सुबह देखो, चाहे शाम। दिन हो या रात। सघन अँधेरी रातों का तो बहुत ही बुरा हाल था। रात की रग-रग से आँसू फूट रहे थे। सिसकियों से लबरेज़ लम्हे भीग-भीगकर गिरते जाते थे।
नब्ज़ बस चल रही थी और साँस की डोर जैसे हिचकोले ही खाती रहती थी। आँसू रात के गर्म लहू बनकर बहते रहते और जिस सुबह के गालों पर लाली दिखाई देती थी, उस पर अब सिसकियों के फुटप्रिंट्स साफ़ दिखते थे। जो दिले-बेताब रात को लंबा करने की चाहनाओं से लबालब रहता था, अब वहाँ छोटी रात की बड़ी लंबाई बहुत निरंकुश और डरावनी थी। रात के जिस साज़ के पर्दों से सुख छनकता था, वहाँ अब दु:ख सिसकियों से नैराश्य में डूबी कालिमा का शीराज़ा बुनता रहता था।
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आर्मी क्वार्टर से अपने शहर लौटने की कवायद में उनके सामान और असबाब के बीच मुझे वह थैला मिला, जिस पर उर्दू इबारतें थीं।
यह वही थैला था, जिसके बारे में ईश्वर अक़्सर बातें करते थे। वे तब राजस्थान के हिंदूमलकोट में तैनात थे।
जाने यह कैसी जगह थी, जहाँ के एक से एक अनोखे किस्से वह मुझे सुनाया करते थे। अब जो वे नहीं हैं तो वे किस्से ही मेरे ज़ेहन में बिजली की तरह कौंधते हैं और फिर यकायक ग़ायब होने लगते हैं।
दु:ख स्मृतियों और विस्मृतियों दोनों को खुला आमंत्रण देते हैं। कुछ बहुत तीव्रता से याद आता है और सघन होता चला जाता है। कुछ अकारण ही धूमिल हो जाता है और फिर अचानक भीतर ही भीतर विलीन होकर घुल और धुल जाता है।
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यौवन के तीर पर जब ईश्वर पहली बार आए थे तो उनके वर्णन करने के ढंग ने मेरे भीतर एक कलरव सुख रच दिया था। वे जो भी सुनाते, मेरे भीतर एक सौंदर्य का स्रोत रच देते। मेरे हृदय के तानतरल कंपन पर उनका एक-एक शब्द ठहरता जाता। वह हर चीज़ का वर्णन ऐसे ही करते थे कि मेरे मन पर सौंदर्य और स्मृति की एक प्रतिमा ही बनती जाती।
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सुजावलपुर बॉर्डर से लौटे ईश्वर के किस्सों में पेड़, फूल, पंछी, पशु, हिरन, तीतर-बटेर, खरगोश, सरसों के पीले फूलों, गन्ने के रसे से निकलते गरम गुड़ की महक और तरह-तरह के लोगों की चर्चा होती थीं।
वह अक्सर एक विशाल पीपल के बारे में बताया करते थे, जो बहुत सारे पक्षियों और आने-जाने वालों का ठिकाना था।
पास ही एक बहुत ऊँचे सूखे से पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर एक चील का घोसला था। उसी में वह अंडे दिया करती थी। बॉर्डर के उस पार ज़ीरोलाइन से कुछ ही दूर एक बहुत ख़ूबसूरत मस्जिद थी, जहाँ लोगों का आना-जाना लगा रहता था।
ईश्वर उस मस्जिद का अद्भुत वर्णन किया करते थे। धर्म, वास्तुशास्त्र और पड़ोसी मुल्क़ के बारे में उनकी जानकारियाँ हत्प्रभ करती थीं।
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वह एक अद्भुत मस्जिद थी, जो इस्लामी वास्तुकला का बेजोड़ नमूना थी। इसका मुख्य ढांचा ईरानी वास्तुशिल्प के प्रभावों से प्रेरित था और हर कोने में सादगी और भव्यता का अनूठा संगम।
मस्जिद के पाँच बड़े गुलाबी गुंबद उगते सूरज की तरह चमकते थे। आठ छोटे आसमानी गुंबद थे, जो आकाश के साथ सामंजस्य बिठाते थे। तीन सुनहरे गुंबद, जो मस्जिद के आँगन के ऊपर राजसी छवि प्रस्तुत करते थे और दिन की रोशनी में दमकते थे। तीन सफ़ेद और छह नीली मीनारें थीं, जो मस्जिद को आसमान तक उठाती प्रतीत होती थीं।
भीतर प्रवेश करते ही गुलाबी और फ़ारसी नक़्क़ाशी सजी दीवारें और छतें आत्मा को सुकून देती थीं। हर नक़्क़ाशी में महीन कारीगरी झलकती थी, जो फ़ारसी कलाकारों के अद्वितीय कौशल का प्रमाण थी। दीवारों और खिड़कियों पर रंग-बिरंगे शीशे जड़े हुए थे, जिनसे छनकर आती रोशनी मस्जिद के भीतर अलौकिक आभा बिखेरती थी।
मस्जिद के मुख्य कक्ष में फ़र्श को गुलाबी महीन फुलकारियों वाले कालीन से ढका गया था, जो उस पवित्र स्थान की गरिमा बढ़ाता था। छतों से लटकता-लहकता हर फ़ानूस साइप्रस से मंगाया गया था और उसकी चमक से मस्जिद का हर कोना जगमगाता था।
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ख़ुदा की इस पवित्र जगह पर हर वस्तु सुंदर और संतुलित थी। यह मस्जिद सिर्फ़ प्रार्थना का स्थान नहीं थी, आत्मा की शांति और रूहानी प्रेरणा का शाश्वत स्रोत थी। फ़र्श पर गुलाबी महीन रेशमी कालीनों और उस महकते वातावरण का तो कहना ही क्या। आख़िर ख़ुदा इस ख़ूबसूरत जगह को छोड़कर कहाँ जाते भला! ख़ुदा ही नहीं, और भी बहुत से थे, जो इसे छोड़कर कहाँ जाते!
वे बताते थे कि इस जगह एक नहीं, ऐसी तीन मस्जिदें लगातार बनी हुई थीं और उसकी एक ख़ास वजह थी।
मैं पूछती, वजह? तो वे कहते, अब तुम छोड़ो। यह बहुत पेचीदा मामला है।
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बॉर्डर की ज़ीरोलाइन के एक तरफ़ अगर मस्जिदें थीं तो दूसरी तरफ़ क्या मंदिर थे?
वह कहते, नहीं। मंदिर तो नहीं; लेकिन गुरुद्वारे ज़रूर थे।
जो चील इधर अंडे देती थी, वह अपना खाना-पीना इन मस्जिदों के आसपास से ही जुटाती और ज़ीरोलाइन के आरपार उड़ती रहती।
वह एक नहीं थी। ऐसी चीलें और गिद्ध बहुत ऊँचे उड़ते रहते थे। सिर्फ़ वही थे, जो एक चीज़ को देखा करते थे। यह इन्सान के बस की बात नहीं थी।
कौनसी? मैं पूछती।
वे गहरे ख़यालों में डूब जाते।
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वे बहुत ही हैरानियों और आह्लादों से भरे अंदाज़ में बताते कि ज़ीरोलाइन के इधर भी फतूही गाँव है और उधर भी। कोठा और पक्की गाँव इधर भी हैं और उधर भी। ईस्टर्न सादकी कैनाल के उधर भी जोड़कियां है और इसी नाम का गाँव इधर भी है। खीची इधर रहते हैं और खीचीवाला उधर है। सुच्चासिंह इधर हैं और ढाब सुच्चासिंह उधर। सुलेमानकी हैड इधर भी है और उधर भी। गाँव मिर्जे-का उधर है तो मिर्जेवाला इधर। इधर के लोग भी सतलुज का पानी पीते हैं और उधर के लोग भी। फ़ीरोज़पुर इधर है तो फ़ीरोज़पुर चिश्तियाँ उधर है। अक्कांवाली, बारेकां, महियांवाली, चूनावढ़, गणेशगढ़, मौजगढ़ ऐसे गाँव हैं, जो दोनों तरफ़ हैं। सुजावलपुर और बहावलनगर के बीच इतना कुछ साम्य है कि नहर इधर है तो उसके पानी से ट्यूबवेल उधर की बारानी ज़मीनों में फ़सलें सींचते हैं।
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मैं प्रश्न करती तो वे ख़यालों में डूब जाते और अगम गहन अलंघ्य धरा के हृदय को खोलने लगते।
वे समझाते : मनुष्य जहाँ सरहदें खींचता है, प्रकृति उस पर मुस्कुराती है। कभी-कभी मुझे लगता है, नहरें भी स्मृतियों की तरह होती हैं। हम उन्हें अपने हिस्से की धरती में अपने देश की रक्षा के लिए खोदते हैं, लेकिन उनका जल उसकी प्यास बुझाता और भूख मिटाता है, जिसे हम दुश्मन मानते हैं। एक देश अपनी सीमा के भीतर पानी रोकने की कला सीखता है और दूसरा उसी पानी से अपनी रेतीली ज़मीन को हरा-भरा कर लेता है। मिट्टी के कणों में न तो भेदभाव होते हैं, न बैरभाव। वे तो बस जल को सोखते हैं। जैसे कोई पुरानी प्रेमिका अपने पहले प्रेमी के पहले पत्र की स्याही को सूंघकर आत्मविस्मृत होती रहे। चुपचाप, बिना किसी फुसफुसाहट के। हम सरहदें खींचते हैं मानचित्रों पर, भाषाओं में, झंडों के रंगों में; लेकिन जल की दिशा कौन तय करता है? या बादलों को कौन समझाता है कि किस आकाश से धरती के किस टुकड़े पर नहीं बरसना। धरती के भीतर कोई सरहद नहीं होती और ऊपर आकाश में सब कुछ एक-सा नीला है। केवल मनुष्य है, जो हर बूंद को राष्ट्रगान और हर कण को राष्ट्रवाद सिखाना चाहता है।
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ईश्वर बताते थे कि पैंसठ के वॉर से पहले ज़ीरोलाइन पर इतनी सिक्योरिटी नहीं थी। दो मुल्क़ों के किसान ज़ीरोलाइन के इधर और उधर हल चलाते या निराई-गुड़ाई करते बतियाते रहते थे।
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वह बूढ़ी अम्मा अनसूइया, जो अक़्सर पीपल के नीचे अपने पोते-पोती के साथ गाँव जाते हुए सुस्ताने बैठती थी, कितना ख़ुश होकर बताती थी कि वह जिस समय इधर कपास चुनने आती थी तो उधर पंजाबी मुसलमान घरों से आने वाली समीना, मासूमा, महक आदि जाने कितनी सहेलियाँ कपास चुनतीं तो राजस्थानी में घंटों बतियाती रहतीं। अनसूइया राजस्थानी थी और वह उर्दू मिश्रित पंजाबी में अविरल बोलती रहतीं। समीना, मासूमा और महक की मुहावरेदार राजस्थानी तो अब राजस्थान में ही कहीं सुनाई नहीं देती!
अनूसइया कहती, बेटा सिपाइयो, अब सियासत में सदाक़त कोनी रई! उस अम्मां को मैंने नहीं देखा; लेकिन उनका चेहरा जैसे मेरी आँखों में जीवंत हो उठता है।
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कई बार दूर-दूर कोई नहीं दिखता। ऐसी काली-पीली आंधियाँ चलतीं। या तो हम बॉर्डर सिक्योरिटी वाले सरहद पर पहरा देते रहते या फिर एक चील पूरे इलाके का विहगावलोकन करती घूमती रहती।
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यही चील एक दिन जाने कहाँ से एक थैला पंजों में दबाकर ले आई। उस थैले में किसी भले मानुस का खाना था, जिसे उदरस्थ के बाद उसने नीचे गिरा दिया था। उस दिन बॉर्डर सिक्योरिटी के एक सूबेदार मेजर ने बहुत ही सावधानी से उस थैले की जाँच-पड़ताल की और फिर उसे परे फेंककर चला गया।
लेकिन ईश्वर को जाने क्या सूझी कि उन्होंने इस ख़ूबसूरत थैले को मंगवाकर अपने पास रख लिया।
उस थैले में एक डायरी थी, जिसमें उर्दू में बहुत सारी बातें लिखी हुई थीं।
मुझे उर्दू नहीं आती। मैंने अपने मोबाइल के गूगल कैम से उसे ट्रांस्लेट करने की कोशिश की। और इस तरह लफ़्ज़ों, लाइनों और पन्नों को जोड़-जोड़कर पढ़ती रही। हर्फ़-हर्फ़ जुड़े। मैं कभी बर्फ़-बर्फ़ होती तो कभी अंगार-अंगार होती चली जाती। और इस तरह एक हत्प्रभ करती कथा में प्रवेश करती चली गई।
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इस डायरी में कोई अफ़साना-वफ़ासाना नहीं था कि जिसमें रंग, गंध, फूल, बीज और फलों की नमी आदि भर का ही ज़िक्र हो, यह ऐसे अलाव की लपट था, जिसकी कुहनियों पर आने वाला ज़माना टिका हुआ था।
डायरी में हर्फ़ बेहद ख़ूबसूरत नस्तालीक़ (उर्दू लिखावट) में थे।
डायरी में जो लिखा गया था, वह बहुत टूटा-फूटा सा था। बहुत से हर्फ़ मिटे-मिटे से थे तो कुछ पन्ने कटे-फटे भी। लेकिन इनके पढ़ने से नक़्शे-माज़ी बहुत अच्छी तरह उभर रहे थे। और अब जब मैंने डायरी के पन्नों को, पन्नों की लाइनों को और लाइनों के हर्फ़-हर्फ़ को अच्छी तरह जोड़ लिया तो मानो हर्फ़बारी हो उठी!
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वह बहावलपुर की सर्द शाम थी। मुहब्बत में नहाए हुए दो मन आज एकांत खोजते हुए पुरानी हवेली के बाग़ीचे में पहुँच गए थे। झील के किनारे बाग़ीचे और बाग़ीचे में इक़बाल और सबा।
वह रौशनी की लहर सी लचकती और वह शिरीष के फूल सा टूट-बिखर उठता। वह कली-कली बोलती, वह फूल-फूल चटकता। वह पराग-पराग चलती, वह पंखुरी-पंखुरी बन उसके पाँवों तले मचलता। वह रेशम-रेशम हँसती, वह आरज़ू के सहरा से उसे निहारता।
झील की देह पर चाँदनी अठखेलियाँ और बाग़ीचे के गुलाबों की मदमाती गंध के बीच इक़बाल ने सबा के गरम हाथ को अपने मचलते हाथ में लिया और कहा, “सबा, मैं आज लाहौर जा रहा हूँ। तुम्हीं मेरा दिल और तुम्हीं मेरी रूह हो। मेरे दिल का ख़याल रखना। मेरी रूह की हिफ़ाज़त करना। दिल मज़बूत करके रहना। बस जाकर आता हूँ…।”
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प्रेम की लिपि में कुछ अक्षरों की दूरियां उदासियों का उफान ले आती हैं और कुछ ही लम्हों का बिछोह अपने भीतर बेचैन सुलगाहट बुनने लगता है। और फिर से रूबरू होने के लिए एक ख़ामोश अरदास चराग़ जलाने लगती है।
इक़बाल ने सबा की मेंहदी से महकती हथेलियों को चूम लिया और बहुत देर तक सूंघता रहा।
सबा ने आँखें बंद कीं और ऐसे फुसफुसाई मानो नमाज़ पढ़ रही हो : “मेरे ख़्वाबों पर तुम्हारी मुसल्लत सल्तनत है। और अब मेरे इर्द-गिर्द एक ख़ला मुसलसल तुम्हारी मुन्तज़िर बेचैनी में मुब्तिला रहेगा। …लेकिन तुम जल्द…”
उस शाम की बातचीत और भावनाओं का इक़बाल के मन पर गहरा असर पड़ा। अगले दिन अलसुबह इक़बाल लाहौर निकल गया।
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सबा की यादें उसके दिल पर गहरी छपी थीं। किसी प्राचीन पांडुलिपि के अक्षरों सी।
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इक़बाल अनूठा गायक था, जो भारतीय उप महाद्वीप के शायरों और कवियों की रचनाएं अपने कंठ से गाता था। वह जिस ख़ूबसूरती से उूर्द ग़ज़लें और नज़्में गाता, उसी अंदाज़ से वह बंगाली, पश्तो या पंजाबी के गीत भी गाया करता था। हिन्दी की बहुत सारी कविताओं का वह बहुत अनूठे तरीक़े से पाठ करता था। उसके इसी अंदाज़े बयां ने सबा की ताप झेलती आत्मा के भीतर कुछ निचोड़ दिया था।
लाहौर में एक दिन इक़बाल कोई हिन्दी गाना गा रहा था तो उसे पुलिस वालों ने उसे गिरफ़्तार कर लिया।
वह जनरल ज़िया उल हक़ का वक़्त था। इक़बाल कोई बड़ा आदमी तो था नहीं कि उसकी रिहाई के लिए कोई कोशिश करता। उन दिनों सोशल मीडिया भी न था कि उसकी गिरफ़्तारी की बात लोगों तक पहुँचती। वह एक तिनका था और सामने समंदर। उसने अपनी डायरी में फै़ज़ अहमद फै़ज़ की एक लाइन भी लिख रखी थी, जिस तरह तीतरी कुहसार पे यलग़ार करे। उसकी छटपटाहट एक तितरी की यलग़ार ही थी एक कुहसार पर।
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इक़बाल के सिख होने और सबा के साथ मुहब्बत में मुब्तिला होने के कारण सबा के एक मौलवी पड़ोसी ने उसकी शिकायत पुलिस को कर दी और इसी वजह से उसे जेल में डाल दिया गया। यह इशारा भी इसी डायरी के किसी पन्ने पर था।
अख़बारों को आप जानते ही हैं, जब तक कोई मशहूर न हो, उसका दर्द दर्द बन ही नहीं पाता। अख़बारे चाहे पाक़िस्तान के हों या हिंदुस्तान के। अख़बारों का एक अपना अंदाज़ है।
जेल के भीतर इक़बाल का प्रेमी मन एक वियोगी हृदय के विलाप करता रहा; लेकिन किसी ने इसे कभी नहीं सुना। वह बस बहुत से लोगों को अच्छा लगता; लेकिन कोई उसका कुछ न कर पाता। इक़बाल जेल में कभी सबा के साथ नूरमहल में बिताए लम्हों को याद करता तो कभी वह गुलज़ार महल की मुलाकातों की यादों में खो जाता। उसके ज़ेहन में कभी दरबार महल तो कभी फ़रीदगेट की यादें तरोताज़ा हो जातीं।
कभी वह सेंट्रल लाइब्रेरी में गुज़ारे लमहात के बारे में सोचता रहता। यादें उसे कभी सरोश से भर देतीं तो कभी रंज-ओ-ग़म से तड़पा डालतीं।
वह अपनी अजीब दास्तान पर हैरान होता और ख़यालों में डूबा रहता कि जो क़दम-क़दम पर उसके साथ था, आज उसी से न राज़-ए-दिल कह सकता है और न दाग़-ए-दिल दिखाने की हालत में है। उसके तमाम जज़्बात जैसे किसी घनी, तारीक रात के सख़्त और सियाह सीने में पैवस्त हो गए थे। और इस सीने में हर जानिब बस ज़ख़्म ही ज़ख़्म महसूस होते थे।
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एक शाम, जब जेल के किसी कोने से नूरजहाँ की आवाज़ झरती हुई आई तो वह लम्हों की सरहद लांघकर नूरमहल की बरसों पुरानी, सुलगती दोपहर में लौट गया। सबा कह रही थी: “हमारे बहावलपुर का नूरमहल संगमरमर में ढला एक सपना है। इस सपने की गलियों में तारीख़ की फुसफुसाहटें झूमरों की रोशनी पहनकर रक़्स करती हैं। इसके हर ज़र्रे में गुज़िश्ता अहद की हुस्न-ओ-शबाब की गूँज दफ़्न है।”
उसकी आँखें महल की छतों और दीवारों पर ठहर गईं, जहाँ दुर्लभ भित्तिचित्रों में मोहब्बत और शुजाअत के अफसाने उकेरे गए थे। सबा ने कहा, “हमारे क़दमों के नीचे बिछा संगमरमर जाने कितने आशिक़ों की पायलों की झंकार समेटे हुए है, कितनी हिज्र की रातों के आँसुओं से धुला हुआ है।”
वह कभी बुल्लेशाह के कलाम में उसे डुबो देती तो कभी बाबा फ़रीद, जामी, रूमी, लालन फ़क़ीर, सुलतान बाहू, शीराज़ी और हाफ़िज़ के अशआर हवाओं में बिखेर देती। जैसे नूरमहल की दीवारें भी उन अशआर को सुनकर अपने रूहानी नशे में झूम उठतीं।
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उस दिन वह कह रही थी: “इक़बाल, देखो-देखो! इन मेहराबों की शान देखो, इन हरे-भरे बाग़ों की रौनक़ देखो। वो देखो, मोर कैसे बादशाहों के से वक़ार के साथ टहल रहे हैं!”
इक़बाल नूरमहल कितनी ही बार आ चुका था, मगर उस दिन उसे लगा जैसे वह पहली बार यहाँ आया हो। जैसे महल की हर ईंट, हर दीवार उसके सामने पहली दफ़ा खुल रही हो। और सबसे ज़्यादा, वह हैरान था सबा पर—हमेशा स्कूल में साथ रहने वाली सबा के अंदर इतना गहरा हुस्न-ओ-शऊर भरा है, यह उसे पहले कभी महसूस ही नहीं हुआ था। सबा, जो एक आम-सी दीवार के पीछे छिपी असाधारण ख़ूबसूरती दिखा रही थी, और वह, जो सिर्फ़ देखता जा रहा था, हैरतज़दा।
“वो देखो, इक़बाल!” सबा ने हल्के से उसका हाथ दबाया। “सुनहरी जाली देखो, कैसे सूरज की रौशनी को छानकर नर्म कर देती है। देखो-देखो! दीवारों पर नक़्श-ओ-निगार कैसे रेशम की तरह बुने हुए हैं, जैसे हवा भी रेशम में लिपटी हुई हो!”
इक़बाल के लिए यह सब नया था, जैसे शब्द पहली बार किसी हक़ीक़त में बदल रहे थे।
“देखो न, इक़बाल! सूरज ने जाली को सोने में तब्दील कर दिया है। देखो, कैसे रोशनी छन-छनकर उतर रही है, जैसे कोई अल्हड़ शाइरा अपने शेरों को अपने ही लहू से लिख रही हो। दीवारें, गोया, शायरी कर रही हों, और नूरमहल—यह तो जैसे एक नग़मा है, एक सिम्फनी, जहाँ हर कोना अपनी कालातीत ख़ूबसूरती की नज़्म गा रहा है!”
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हर जगह वह उसे ले जाती, जहाँ वह पहले ही जाने कितनी ही मर्तबा जा चुका था; लेकिन सबा उसे दरबार महल, फ़रीद गेट या गुलज़ार महल के बारे में बताती तो उसे लगता कि वह ये सब पहली बार देख रहा है।
जेल में इक़बाल को न तो कभी रौशनी की तलब रही और न ही कभी किसी ने उसमें हौसलों में कमी देखी। वजह ये कि वह हर रात सबा के नाम के ही चराग़ जलाता रहा। वह हर रात अपने भीतर रात के अँधेरे में सुबह की धड़कनों को सुन लिया करता। उसे कभी सबा की सदा आती और कभी सदा जैसी सबा।
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आख़िर, जनरल ज़िया के मरने के बाद ही वह जेल की सलाख़ों से आज़ाद हो सका।
बाहर आते ही, सबसे पहले इक़बाल ने लाहौर को पीछे छोड़ा और बहावलपुर के लिए रवाना हो गया। मगर बहावलपुर पहुँचकर भी, उसका दिल सिर्फ़ एक ही नाम पुकार रहा था—सबा।
वह जानता था, लौटकर सबा से माफ़ी माँगना और अपने अतीत से रूबरू होना ही उसका पहला और सबसे सही फ़ैसला होगा।
आख़िर, इन्सान की ज़िंदगी में अतीत ही तो वह उद्यान है, जहाँ स्मृतियाँ मुरझाए गुलाबों की तरह किसी अनदेखी मगर पहचान ली जाने वाली ख़ुशबू के साथ बनी रहती हैं। अतीत से ही रूह को वह नरमी, महक और आकार मिलता है, जो उसे खिलने, मिलने और मुकम्मल होने का एहसास देता है।
जब इक़बाल की ट्रेन बहावलपुर स्टेशन पर पहुँची तो उसके क़दम अनायास ही उन जानी-पहचानी गलियों की ओर बढ़ने लगे, जहाँ उसका अतीत अब भी किसी पुराने नग़्मे की तरह साँसें ले रहा था।
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शाम उतर आई थी और अँधेरा छाने लगा था।
वह सबा के मुलतान रोड वाले पुराने घर की ओर बढ़ा, जो अब एकदम सुस्त और जर्जर हो चुका था।
उसने जैसे ही दरवाज़ा खटखटाया, एक किशोर बाहर निकला। उसकी आँखों में एक अनोखा नूर था। उसके चेहरे पर जैसे किसी ने हुस्नो-मुहब्बत की हिकायात लिख दी थीं। उसे देखते ही इक़बाल का रोम-रोम विचलित सा हो गया।
किशोर ने कहा, “बताएं आपको क्या काम है?”
इक़बाल ने जवाब दिया, “मैं इक़बाल …स..ब…आ…सबा से मिलने आया हूँ। बहुत वक्त बीत गया …।”
वह किशोर अचानक गंभीर हो उठा, “आप शायद बहुत दु:खी होंगे; लेकिन वे अब हमारे बीच नहीं हैं। बस अब तो उनकी रूह ही है इस घर में।”
तरुण ने इक़बाल को भीतर आने का इशारा किया।
इक़बाल ने विस्मय और दु:ख के साथ घर में प्रवेश किया। दोनों के बीच काफी देर तक बातचीत होती रही।
कभी किशोर की आँखों में उदासी थी तो कभी इक़बाल के सीने में जलन। इक़बाल को एकबारगी लगा कि उसके भीतर आँसुओं का आबशार फूट पड़ेगा। लेकिन वह उसे रोके रहा। कहाँ तो वह बहार की तलाश में निकला था और कहाँ उसे महकते वक़्त का ऐवान इस अंदाज़ में मिला है।
इक़बाल ने अपने दोनों हाथों में उस किशोर के चेहरे को लिया तो उसकी गरम और गीली हथेलियों की हरारत में उसके भीतर जैसे कुछ पिघलने लगा।
दोनों के बीच बहुत देर चुप्पी अपने बदन को तलाशती रही। चुप्पी ने ही बहुत चुप से इक़बाल के सीने में कुछ फुसफुसाकर कहा, तेरा ही अक़्स है इन अजनबी बहारों में, जो तेरे लब, तेरे बाज़ू, तेरा कनार नहीं।
इक़बाल के दिल को अचानक गुमाँ हुआ कि उसके हाथों में जो गरमी अब भी है, वह सबा के हाथों की नरमी से बनी हुई है।
…
वह किशोर को एकटक निहारता रहा।
किशोर ने उसे एक कमरे में ले जाकर पुराने दस्तावेज़ और सबा की तस्वीरें दिखाईं। इक़बाल ने चुपचाप सब कुछ देखा। उसकी आँखें झार-झार होने को थीं। एक पतली झिल्ली से जैसे यह प्रवाह रुका रहा।
अचानक किशोर ने कहा, “मेरे पास बीबी का आख़िरी ख़त है, जो उन्होंने आप ही के लिए लिखा था। लेकिन उनके पास आपका पता नहीं था।”
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इक़बाल ने कांपते हाथों से ख़त को खोला। किशोर भीतर इक़बाल के खाने और पिलाने के लिए कुछ लाने भीतर गया था।
ख़त को पढ़ते ही इक़बाल को एहसास हुआ कि सबा ने अपनी यादों में उसके यानी इक़बाल के और अपने बेटे के बीच एक गहरी कड़ी का निर्माण किया था। ये कड़ियां जैसे खून, आँसू, दर्द, सांसों, टिश्यूज और कोशिकाओं से बनी थीं। पत्र में लिखा था: “मेरे इक़बाल, मैंने तुम्हारे बिना जीवन जीने की कोशिश की; लेकिन तुम मेरे दिल और रूह में हर लम्हा रहे। बेटे को मेरा प्यार और तुम्हारी यादें विरासत में मिली हैं। उसे कभी न बताना कि उसमें मेरी और तुम्हारी रूहें मिलकर एक हुई हैं। बस उसे अपने तरीके से जीने देना।”
“मेरे रूह मेरे अदब, मेरे गुस्ताख़ दिल की सुंदर सी ख़बर! जीना वह भी तुम्हारे बिना। आसान तो नहीं है। मैं तुम ही तुम हूँ। क्या है मुझमें, जिसमें तुम नहीं हो? दिल, रूह आह आयत दुआ इश्क़ सब तुम ही तो हो। जो भी हमारी रगों के लहू और हमारी रूहों की चाहों से बने इस बच्चे में राहत की चीज़ है, सब तुम्हारी ही तो रूह का क़माल है। जो मैंने उसे दिया, वह भी तो तुम्हारा दिया इश्क़ है। मिलना ज़रूर उससे। जो मिलना हो तो बताना नहीं कि हमारी तुम्हारी रूह की ऐंट-फैंट से कोई फूल खिला है। जीने दो उसे अपनी तहज़ीब से। सफ़र नया है। किस्से पुराने रख लेना कलेजे में बंद करके।”
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इक़बाल ने झर पड़ने को बेताब आँखों के साथ अब गले से फूटने को आतुर सिसकियों को संभालना मुश्किल काम था।
वह सुंदर लड़का उसके सामने ट्रे लेकर खड़ा था।
इक़बाल ने उसे देखा और महसूस किया कि अगर उसकी ज़िंदगी की ताक़ वीरान है तो क्या, कहीं कुछ चरागाँ तो है।
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वह रुख़सत होने को था। वह किशोर क्या था, जैसे कोई बुज़ुर्ग हो दादा नाना हो।
किशोर ने उसी बड़प्पन से भरे अंदाज़ से इक़बाल की पीठ थपथपाई और कहा, “चलिए अंकल मेरी माँ की रूह को सुकून मिला। इससे क्या बड़ी बात होगी कि किसी मरते इन्सान का आख़िरी ख़त जिस इन्सान के नाम लिखा हो, उसे सही-सलामत मिल जाए और ख़त भी वह जिस पर पता तक नहीं लिखा हो।”
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कम उम्र में भी कुछ उदास अँधियारे किस तरह पुरखे सा परिपक्व कर देते हैं और ज़िंदगी को एक नई दहलीज़ पर छोड़ देते हैं।
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इक़बाल ने घर से बाहर आकर गहरी सांस ली और वह झुके हुए शहतूत से जाकर लिपट गया, जिसके नीचे वे कभी एक-दूसरे के सबसे क़रीब आए थे। उसके सारे नग़्मों की तनाबें टूट चुकी थीं और उसके सारे सपनों के खेमे राख़ हुए पड़े थे। अब मौसमे-गुल दर्दे-जिगर का नाम था। पेड़ का पत्ता-पत्ता आह-ओ-बुका (आर्त्तनाद) की लरज़िश में थरथरा उठा था, जैसे कोई अनकहा ग़म हवा की हर लहर के साथ सिसक रहा हो।
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वह लंबे समय बाद एक क़फ़स से निकला था और अब एक नए क़फ़स में चला आया था, जहाँ उसे सदा के लिए रहना था। वह यह भी नहीं सोच पाया था कि ज़िंदगी के चमन में आतिशे-गुल के निखार का मौसम किसी के बस में नहीं।
उसने पूरी रात इसी शहतूत के नीचे बिता दी। उसकी आँखें तब खुलीं जब सुबह चिड़ियाएँ चहचहाने लगी थीं और उसके बदन पर बहुत से मकोड़े उसे मानो पेड़ का ही हिस्सा मानकर दौड़ने लगे थे। इसके बावजूद उसे इस पेड़ से लिपटने का सुकून इतना था, मानो उसने वे सब हवाएं इकट्ठा कर ली हैं, जो सबा के लिबास से निकलकर आई हैं।
उसने देखा, सुबह की पहली किरणें बहावलपुर के आकाश में चमक रही थीं। फ़ज़ा एक नए पैरहन में थी। लेकिन यह वह सुबह नहीं थी, जिसकी उसे तलाश थी। वह शहतूत को देखता रहा, जहां माज़ी और हाल का मिलन हो रहा था, और उसने आख़िरकार अपनी तमाम कैफ़ियात इसी शहतूत के वसीले से सबा तक पहुँचा दीं।
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शहतूत में शहतूत कम, मैं और सबा ज़्यादा हुआ करते थे। शहतूत खाकर पेट कौन भरता था? मन भरने की तरक़ीब था शहतूत….शहतूत एक गीत था मीठा। एक ऐसा गीत जिसे हम दोनों एक साथ गुनगुनाया करते थे।
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वह उस जगह से निकलता हुआ जेल रोड पहुँचा और जेल रोड से मुलतान रोड पर निकल गया।
अचानक उसे जाने क्या सूझी की कि वह इस सड़क पर चलता ही गया और उसने एक लोकल बस पकड़ी।
अब वह बस्ती मलूक के उस स्कूल के सामने था, जहाँ सबा और वो पाँचवीं तक एक साथ पढ़े थे। इसके बाद वह मुलतान गया और उस स्कूल में बहुत देर तक घूमता रहा, जहाँ सबा और उसने स्कूलिंग पूरी की थी।
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वह पहला लम्स, वह पहली ख़ुशबू, वे बेला के फूल, वह फुफकारता साँप, वह सौंधी मकई की रोटी और वह सरसों का साग और गुड़ की भेलियाँ। वह दही, वह छाछ। वह लुक़्मा, वह पसीना। वह हँसी, वह उम्मीद। वह जुस्तजू, वह सच्चाई। वह मीठी आँच, वह मीठा-मीठा दर्द। वह कुंआरी बेचैनियाँ और वह उंगलियाँ… अनगिनत दास्तानें घेरकर खड़ी हो गईं। गिट्टे, कुरांडंडा, आँखमिचौली, झूले, पतंग, घो घो रानी कितना पानी। कितना कुछ। कितने खेल और कितनी बातें। कितनी शामें और कितनी सुबहें। कितनी रातें और कितनी जगमग रोशनियों जैसे ख़ूबसूरत रेशमी अंधेरे।
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वह रोता गया। सूरज ढलता गया। वह जैसे गलता गया। ज़िंदगी के इस धुँधलके में जैसे वह कुछ तलाश रहा था।
शाम उतर आई थी।
अब वह मुलतान के रेलवे स्टेशन पर था।
एक बार फिर वह कहाँ जा रहा था? वह स्टेशन क्यों आया है?
उसके अवचेतन से एक करुण पुकार उठी। उसे लग रहा था कि उसे एक बार अपने बेटे का चेहरा ठीक से देख ही लेना चाहिए, जो कि वह उस आकस्मिक घटना प्रवाह में नहीं देख सका था। अब उसे यह भी लग रहा था कि उसका चेहरा उसके उस उम्र के चेहरे से बहुत ही मेल खाता हुआ था, जब वह उसी के उम्र का था। वह इस पूरे घटनाक्रम से इतना अकबका गया कि वह बच्चे का नाम ही पूछना भूल गया। उसका क्या नाम होगा!
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कुछ मिनट में ट्रेन आने वाली थी। स्टेशन पर हलचल तेज़ थी।
खोमचे वाले पैसेंजरों के कोलाहल में भी अविचलित थे। ध्वनियाँ थीं। दृश्य थे। भाग-दौड़ और चीख-पुकार थी। और थे लाल कुर्तों में कुली। भीड़ में चमक उठता था लाल रंग। कुलियों की फुर्ती। उनका पसीना। उनकी थकान और कभी-कभार थककर हाँफते उनके बदन।
सामने इतना कुछ था। इतने दृश्य, इतनी ध्वनियाँ और इतनी सारी बेचैनियां-बेताबियाँ।
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इक़बाल के भीतर जैसे सब कुछ नम हो गया था। लेकिन उसके भीतर की नमी से गरम हवाएं उठ रही थीं। उसके भीतर जैसे पानी वाष्प होकर संघनित हो रहा था। उसके भीतर से लेकर गले तक सब कुछ भारी-भारी था।
जैसे उसके भीतर पानी सा भरता जा रहा था और अब वह आँखों तक आ गया था और आप जानते हैं कि आँखों में जलधारण क्षमता नहीं होती।
आँखें ही तो सच्ची हैं। थामती कुछ नहीं। बह जाने देती हैं सच को। दु:ख से सच्चा कौन सा सच है।
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सिग्नल पर अटकी ट्रेन का इंतज़ार करते इक़बाल ने अपने आपको एक पुरानी सी बेंच पर टिका दिया और गहरे ख़यालों में डूब गया। कभी-कभी किसी ख़याल को ट्रेन की सीटी भंग कर देती। ख़याल टूटे न, यह संभव है भला? टूटे ख़यालों से कैसे टपकती है आशा? टूटे ख़यालों से कैसे बहती हैं स्मृतियाँ। टूटे ख़यालों को किस डोर से बाँधा जाए? कहो कबीर? कहो आंडाल? कहो ललद्यद? कहो बाबा बुल्लेशाह? कहो बाबा फ़रीद, कहो निजामुद्दीन औलिया, कहो कुतुबन!
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मन को रोते देखकर अकसर ही मेघ का कलेजा फटा है। बारिश हुई है और आदमी झार-झार आबशार सा रोया है।
बारिश होने लगी थी।
वह ट्रेन पर चढ़ने के लिए बेंच से उठने को हुआ तो सामने पटरियों पर कुछ नहीं था।
दो पटरियाँ और मीलों की दूरियाँ। प्लेटफॉर्म के एक तरफ़ रंभाती गाय और दूसरी तरफ़ उसका नन्हा बछड़ा।
ट्रेन शायद अभी भी आई नहीं है, यह सोचकर उसने बगल में बैठे एक लड़के से पूछा तो वह बोला, अंकल अभी-अभी तो आपकी आँखों के सामने से बहावलपुर की आख़िरी ट्रेन निकली है।
उम्मीद तो आख़िरी होती है। नाउम्मीदियों के हिस्से में आता है यह आख़िरी शब्द …रब जाने, मेरी आँखों के सामने ये क्या हुआ?
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बारिश थी कि थमने का नाम नहीं ले रही थी। जो भीतर दह गया वह माटी का घरौंदा भर तो नहीं था? बाहर भी कुछ बचा नहीं। यह भीतर-बाहर के बीच मचा द्वंद्व था, जिसमें बारिश थी। आग थी। समय और नियति आग और घी का काम कर रही थी। न आग की लपटें कम हो रही थीं और न बार-बार बिजली का कौंध-कड़क उठना। नियति हँसती थी और समय मौन था। ऐसा मौन, जो बड़ी-बड़ी कहानियाँ पचा जाए। ऐसी हँसी, जो बड़े हाहाकार पर भारी पड़ जाए।
बारिश बहुत तेज़ हो गई थी। एक भयंकर तूफान था। भीतर-बाहर। स्टेशन के शांत कक्षों में किसी घाव पर एक विलाप बनकर बादलों का समूह चहलकदमी कर रहा था।
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कर्वी क़ौसर ने अपने चेहरे को दोनों हाथों से ढक लिया और सुबकने लगीं।
अचानक जाने कहाँ से अचानक दो गिलहरियाँ कर्वी क़ौसर के टेबल पर आईं और अखरोट मुँह में दबाने लगीं।
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कर्वी क़ौसर उठीं। पति की साफ़ तस्वीर को साड़ी के पल्लू से साफ़ किया और बाहर निकलकर सेवन सिस्टर्स को एक साथ अठखेलियाँ करते निहारने लगीं।
एक मुंडेर पर रेंट वेंटेड बुलबुल गा रही थी और दूसरी पर एक नन्हा इंडियन रॉबिन छोटी-छोटी धुनों में लयकारियां कर रहा था।
कर्वी क़ौसर की आत्मा के अनंत विस्तार में उस मेंहदी की महक फैली हुई थी, जो उन्होंने ईश्वर नायर के साथ विवाह सूत्र में बँधने के दिन लगाई थी, और जो उर्दू इबारतों वाले उस थैले की उस डायरी के भीतर से सबा की हथेलियों को छूकर आई थी।
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