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  •  आलोचना और बेबाकपन का रिश्ता

     वेंकटेश कुमार की किताब ‘आलोचना के विविध रंग’ पर यह टिप्पणी पढ़िए। लिखा है अनुरंजनी ने। अनुरंजनी दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय, गया की शोधार्थी हैं और जानकी पुल की संपादक हैं। आप उनकी यह सारगर्भित टिप्पणी पढ़िए- मॉडरेटर

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    आलोचना क्या है? जब भी यह सवाल हमारे सामने आता है तो प्राय: सबसे पहले हम यही कहते हैं कि आलोचना यानी वह जिसमें गुण-दोष दोनों को समान रूप से विवेचित किया जाए लेकिन वर्तमान में आलोचना क्या अपनी मूल स्थिति में है? क्या अब आलोचना को केवल निंदा से जोड़कर नहीं देखा जाने लगा है? यदि किसी रचना की तारीफ़ कर दी जाए तो आलोचक(?) और रचनाकार के संबंध सुमधुर बने रहेंगे और यदि रचना की गड़बड़ियों की ओर ध्यान दिलाया जाए तो जो संबंध सुमधुर हो सकता था वह कटुता में बदल जाता है। इन निराशाजनक परिस्थितियों में यदि कोई सच में आलोचना के मूल-धर्म; गुण-दोष का सम्यक विवेचन करने का प्रयास करे तो उम्मीद की किरण दिखती है। ऐसी ही एक किताब इस वर्ष ‘कौटिल्य बुक्स’ से प्रकाशित हुई है ‘आलोचना के विविध रंग’। लेखक हैं वेंटकेश कुमार । यह किताब किसी एक खास विषय पर केंद्रित ना होकर विभिन्न लेखकों, हिन्दी संस्थानों आदि पर लिखे गए लेखों का संकलन है। मूलत: यह किताब हिन्दी आलोचना की शुरुआत से अब तक क्या-क्या हुआ है उसकी एक रूप-रेखा प्रस्तुत करती है जिसमें ऐसे लोग भी शामिल हैं जो आलोचना की मुख्यधारा से उपेक्षित रह गए। इसके शुरुआती तीन लेख रीतिकाव्य को केंद्र में रखकर लिखे गए हैं। रीतिकाव्य पर यूँ तो बहुत सी आलोचनाएँ लिखी गई हैं जिसमें एक सवाल निरंतर बना रहता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि जो काव्य लगभग दो सौ सालों तक हिन्दी साहित्य में बना रहा उसे अचानक से खराब माना जाने लगा! लेकिन क्या साहित्य में कुछ भी अचानक से होता है? दरअसल इसकी प्रक्रिया भी लंबे समय से चली आ रही थी लेकिन द्विवेदी-युग में इसका विरोध स्पष्ट रूप में सामने आने लगा। इसके पीछे महावीर प्रसाद द्विवेदी को बहुत हद तक दोषी माना जाता है कि उन्होंने रीतिकाव्य का विरोध करना शुरू किया इसलिए उसकी निंदा होने लगी। आजतक यही माना जाता रहा है लेकिन इस पुस्तक में वेंकटेश रीतिकाव्य की निंदा की वजहों पर नए सिरे से विचार करते हैं। वे यह प्रस्तावित करते हैं कि इसका कारण महावीर प्रसाद द्विवेदी का लेख नहीं बल्कि इसके मूल में अंग्रेज़ी राज का आना और नई शिक्षा नीति का लागू होना था। इसके साथ ही वे महावीर प्रसाद द्विवेदी पर लगे आरोपों का भी खंडन उन्हीं के लेख ‘नायिका-भेद’ के आधार पर करते हैं – “द्विवेदी जी के इस पूरे लेख से गुजरने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि उनका गुस्सा रीतिकालीन कविता पर उतना नहीं है, जितना इस बात पर है कि लोग आज भी रीतिकालीन कवियों की तरह ही कविता लिख रहे हैं। यदि द्विवेदीजी रीतिकालीन कविता को प्रतिबंधित करने के पक्ष में होते तो मतिराम ग्रंथावली की समीक्षा न करते और अपनी पत्रिका सरस्वती में रीतिकालीन कविता से बहसों को लगातार जगह न देते।”[1] वे स्पष्ट रूप से लिखते हैं कि “हिंदी आलोचना के इस कालखण्ड में रीतिकालीन कविता के प्रति महावीर प्रसाद द्विवेदी के स्वर को जिस तरह से विषमवादी स्वर घोषित किया जाता है, वैसा हक़ीक़त में है नहीं।”[2] अपनी बात कहते हुए वे पूर्व-आलोचकों से डरते नहीं हैं बल्कि निर्भीकता और तटस्थता से अपनी बात रखते हैं और रीतिकाव्य के संबंध में वह सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान दिलाते हैं कि रीतिकाल के साथ जो अनर्थकारी घटना घटी, उसकी वजह वह प्रवृत्ति है जिसमें हम बिना कविता पढ़े रीतिकाल को खारिज कर देते हैं। आज भी रीतिकाव्य का नाम सुनते ही सबसे पहले लोग यही कहना शुरू करते हैं कि यह दरबारी काव्य था, इसमें अश्लीलता थी, चमत्कार था, यह राजाओं-महारजाओं को प्रसन्न करने के लिए लिखा जाता था और कमोबेश यहीं उनकी बात समाप्त भी हो जाती है। यह स्वयं में अचंभित करने वाली बात है कि दो सौ सालों के काव्य को दो पंक्तियों में निपटा दिया जाता है अन्यथा जो गंभीरता से इसपर काम करते हैं उन्हें दो शब्दों; रूढ़िवादी, पुराने विचारों का कह कर निपटा दिया जाता है। हमें आज लगता है कि मध्यकाल पर काम करने से लोग तुरंत आपको परंपरावादी, रूढ़िवादी, पुराने विचारों वाली/वाला समझ लेते हैं लेकिन इस किताब से मालूम होता है कि यह आज से नहीं बल्कि सालों पहले शुरू हो चुका था, शायद द्विवेदी युग से ही। विश्वनाथ प्रसाद मिश्र एक ऐसा नाम है जिन्होंने शायद सबसे अधिक रीतिकवियों की ग्रंथावलियों का सम्पादन किया, उनका मूल्यांकन किया लेकिन वे ही इस आरोप से नहीं बच सके – “हिंदी के आलोचकों ने मिश्रजी के इस समर्पण को उनकी सीमा में बदल दिया। आलोचकों ने यह कहना शुरू किया कि जिस व्यक्ति ने रीतिकाल की अश्लील और दरबारी कविता के मूल्यांकन में अपनी ज़िंदगी का अधिकांश समय बिता दिया उसकी मानसिकता आधुनिक कैसे हो सकती है! आख़िर रीतिकाल में ऐसा है ही क्या जिस पर हजारों पृष्ठ ख़र्च किया जाए।”[3] इसी तरह का आरोप मिश्रबंधु और डॉ. नगेन्द्र पर भी लगता रहा। ताज्जुब है कि रीतिकाल या मध्यकाल को लेकर इतनी हास्यास्पद स्थिति आलोचना में ही है। यहाँ रांगेय राघव की रचना-प्रक्रिया का उल्लेख करना ज़रूरी लगता है। “वे अपने लेखकीय रूप को माँजने के लिए प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास रूपी समुद्र में गोता लगाना ज़रूरी समझते हैं।”[4] “रांगेय राघव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अतीत की ओर उसका महिमामंडन करने के लिए नहीं जाते। उन्हें भारतीय परंपरा में जो चीज मृत्य और अप्रासंगिक लगती है उस पर वे कठोर आलोचनात्मक रुख अपनाते हैं।”[5] क्या हिंदी आलोचना वाक़ई ऐसा मानती है कि जो पुराना विषय पढ़ते-लिखते हैं वे आधुनिक नहीं होते? अगर ऐसा है तो यह किस प्रक्रिया के तहत प्रचलित हुआ है इसपर सोचना अनिवार्य लगता है।

         हिंदी साहित्य के विकास में जिन लोगों के महत्त्व को नज़रअंदाज़ कर दिया गया उन पर भी यह किताब बात करती है। ऐसे ही एक व्यक्ति थे बाबू रामदीन सिंह जिन्होंने पटना के बांकीपुर मुहल्ले में सं 1880 ई. में खड्गविलास छापाखाना की स्थापना की। जिसका कारण सिर्फ़ इतना था कि स्कूल में शिक्षक की भूमिका निभाते हुए रामदीन सिंह का ध्यान हिंदी में पाठ्यपुस्तकों के अभाव की ओर गया जिसके बाद वे अपने दो मित्रों और मामा के सहयोग से हिंदी के विकास के लिए प्रकाशन खोलने की योजना बनाई जो सफल भी हुई। यह आज हमें आश्चर्यचकित करता है कि क्या अब ऐसा संभव है कि कोई व्यक्ति, भले ही वह शिक्षक ही क्यों न हो, जिसे समाज का आदर्श समझा जाता है वह निजी हित को छोड़ कर व्यापक हित के लिए अपना जीवन समर्पित करे? शायद नहीं। समय के साथ जिस तरह सामाजिक संरचना बदली, जिस तरह से पूंजीवाद हर जगह व्याप्त हो गया उसने व्यक्ति को सबसे ज़्यादा आत्मकेंद्रित ही बनाया।

         हिंदी साहित्य में रांगेय राघव एक बड़ा नाम है लेकिन उनके साथ भी हिंदी आलोचना में हुए दुर्व्यवहार को वेंकटेश रेखांकित करते हैं। इस किताब में सबसे लंबा निबंध संभवत: रांगेय राघव पर ही है – ‘आलोचक और विचारक: रांगेय राघव’। यह निबंध उनके बनने की, उनके संघर्षों की, विभिन्न आलोचकों द्वारा किये गए व्यवहारों की गहरी पड़ताल करता है। जो भी पाठक रांगेय राघव के लेखन की व्यापकता से रूबरू होता है तो आश्चर्य से भर जाता है कि इतनी कम उम्र में इतना सारा लेखन, इसे जान वह अमूमन खुश ही होता है लेकिन जब उसे पता चले कि उनके व्यापक लेखन के कारण ही उन्हें कोई खारिज कर दे तो? इसी ओर लेखक हमारा ध्यान ले जाते हैं – “रांगेय राघव को अपने लिखे का गुमान नहीं था। उनके लेखन पर बहुत लोगों ने नकारात्मक टिप्पणी की है। सबसे ज़्यादा निशाना तो उनके विपुल लेखन को ही बनाया गया। क्या यह छोटी सी बात रांगेय राघव नहीं समझ रहे थे कि बहुत ज़्यादा लिखने से लेखन की गुणवत्ता प्रभावित होती है। लेकिन हिंदी आलोचना में उनके लेखन के मूल्यांकन के लिए एक तर्क गढ़ लिया गया – चूँकि उन्होंने बहुत ज़्यादा लिखा है, इसलिए बहुत खराब लिखा है।”[6] यहीं एक और नाम है शिवानी का, जिनके बारे में वे विस्तार से यह बताते हैं कि हिंदी आलोचना ने कैसे उनके साथ भी अन्याय किया है जिसका मुख्य बिन्दु लोकप्रिय साहित्य बनाम गंभीर साहित्य है। वेंकटेश अपने तर्कों से शिवानी को ‘नई कहानी आंदोलन’ के सभी रचनाकारों से वरिष्ठ ठहराते हैं। इसका कारण वे महज 12 वर्ष की उम्र में, 1935 में उनकी पहली कहानी का प्रकाशन बताते हैं। यहाँ भी वे पूरी तटस्थता व निर्भीकता से कहते हैं कि “इतिहास के एक निश्चित कालखंड में शिवानी के लेखन ने जो सामाजिक और सांस्कृतिक दायित्व निभाया है, उसका श्रेय उन्हें न देना साहित्यिक अपराध ही नहीं, बदमाशी भी है। गुलशन नंदा, कुशवाहा कांत और वेदप्रकाश शर्मा के साथ जो शिवानी का नाम ले, समझ जाइए कि उसने शिवानी का लिखा एक पंक्ति भी नहीं पढ़ा है।”[7] शिवानी के कथा-साहित्य को जो चीज लोकप्रिय-साहित्य के साँचे में बैठने से रोकती है, वे इसका श्रेय उनकी भाषा को देते हैं।

         यह किताब इस मायने में भी महत्त्वपूर्ण लगती है कि इसमें जितने लेखकों पर विचार किया गया है उनपर संपूर्णता से बात कहने की कोशिश की गई है। हालाँकि किसी भी रचनाकार को एक लेख में समेटना पूरी तरह से संभव तो नहीं ही है फिर भी उनकी रचना-प्रक्रिया को विश्लेषित करने के क्रम में उनका एक क्रमिक विकास भी खुलते गया है जिसमें उनके पारिवारिक परिवेश, उनपर किसका प्रभाव है, रुचियाँ क्या बनीं? उनपर कैसे काम किया? कुल मिलाकर उनके लेखकीय रूप की निर्मिति कैसे हुई  तथा उनकी कमियाँ क्या-क्या रहीं? इन सब का उल्लेख मिलता है। इन लेखकों में मिश्रबंधु, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, सुमित्रानंदन पंत, नागार्जुन, राजकमल चौधरी,अमृतलाल नागर, राजेन्द्र यादव, फणीश्वरनाथ रेणु, श्रीपत राय, महाश्वेता देवी आदि शामिल हैं। इन सबके साथ ही वे कुछ आलोचकों के प्रमुख कार्यों पर अपनी सहमति-असहमति प्रकट करते हुए भी बेबाक नज़र आते हैं चाहे वह रामचंद्र शुक्ल हों, नामवर सिंह हों या केदारनाथ सिंह हों या सुधीश पचौरी के साथ और भी आलोचक हों, कहीं भी लेखक अपनी बात कहते हुए भयभीत नहीं होते।

         इन सबसे अतिरिक्त उन्होंने एक लेख आलोचक नंद किशोर नवल जो उनके शिक्षक भी रहे हैं, पर लिखा है। यह लेख नंद किशोर नवल के आलोचक रूप से परिचय तो कराता ही है साथ ही बतौर शिक्षक लेखक पर उनका क्या प्रभाव पड़ा इससे भी हम रूबरू होते हैं।

    शुरुआत में लेखक और आलोचक के जिस सुमधुर या कटु संबंध की बात कही जा रही थी उसका एक नायाब उदाहरण तो इसी पुस्तक में मिलता है। अपनी आलोचना बर्दाश्त करने के मामले में लेखक-समाज कितना सक्षम या असक्षम है इसका पता इस किताब में शामिल एक लेख से ही लग जाता है। लेख है ‘विवाद विष्णु खरे चोली दामन’। इस लेख में उन्होंने उस घटना का उल्लेख किया है जब विष्णु खरे ने भारत भूषण अग्रवाल स्मृति कविता पुरस्कार के तीस वर्ष की यात्रा का विश्लेषण करते हुए एक लेख लिखा था जिसे पढ़कर उक्त कविता पुरस्कार से सम्मानित कुछ कवियों की भावनाएँ इस कदर आहत हुईं कि पुरस्कार लौटाने की घोषणा कर दी गई या ऐसा कर बैठने की धमकी दी जाने लगी थी। नतीजन प्रकाशक ने स्थिति की गंभीरता देखते हुए उक्त किताब बेचने पर पाबंदी लगा दी गई। यह जानना वाकई दुखद है। लेखक जब स्वयं को लोकतंत्र के वाहक समझते हैं और स्वयं की आलोचना से इस कदर परेशान हो जाएँ तो ऐसी स्थिति में क्या कहा जा सकता है? इसलिए ऐसे परिदृश्य में ऐसी किताब का आना जो बेबाकी से अपने विषय के साथ न्याय करती दिखे, राहत देती है।

    संदर्भ-

    1. आलोचना के विविध रंग- वेंकटेश कुमार, कौटिल्य बुक्स, नई दिल्ली, 2026 ई., पृ. 12
    2. वही, पृ. 20
    3. वही, पृ. 24
    4. वही, पृ. 276
    5. वही, पृ. 278
    6. वही, पृ. 268
    7. वही, पृ. 205-206

     

     

     

     

     

     

     

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