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  • बाल कहानी ‘ट्रेन का सफ़र’

    आज पढ़िए योगेश कुमार ध्यानी की एक बाल कहानी ‘ट्रेन का सफ़र’ – अनुरंजनी

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    ट्रेन का सफ़र

    ट्रेन ने चलना शुरु किया। पहले धीरे-धीरे छुक-छुक की आवाज़ करती ट्रेन स्टेशन के प्लैटफॉर्म से बाहर निकली। स्टेशन की चीजें जैसे प्लैटफॉर्म, खाने की दुकान, कुली, पानी वाला नल, एक प्लैटफॉर्म से दूसरे प्लैटफॉर्म जाने वाली सीढ़ियाँ सब पीछे छूटते जा रहे थे। ट्रेन की स्पीड धीरे-धीरे बढ़ती हुई अब बहुत तेज़ हो चुकी थी। इतनी तेज़ कि अब जो चीजें ट्रेन के पास से गुज़र रही थीं, वो साफ-साफ पहचान में नहीं आ रही थी। जैसे बिजली का खंभा, झुग्गी या चाय की दुकान..। जो चीजें पास थीं वो बहुत तेज़ी से पीछे जा रही थीं और चलती ट्रेन में ये देखना मुमकिन नहीं था कि खंभे पर लगे पोस्टर पर किस स्कूल का विज्ञापन है या चाय की दुकान में कौन से चिप्स का पैकेट लटका है।

    ट्रेन से तो दूर की चीजें भी पीछे जा रही थीं पर उन्हें थोड़ी दूर तक देखा जा सकता था। जैसे खेत के बीच में खड़े हुए बिजूके को कुछ देर तक देखा जा सकता था और पता लगाया जा सकता था कि उसके मटके से बने सिर के ऊपर कोई कौआ बैठा है या नहीं। या दूर खड़े आम के पेड़ को ध्यान से देखने पर उसकी छांव में बातें करते कुछ लोगों के होने का अन्दाज़ लगाया जा सकता था। पीछे छूटती हुई चीजों को देखते हुए पीहू ये सोच रही थी कि आखिर ऐसा क्यों है कि बहुत पास की चीजें बहुत तेज़ी से पीछे छूट रही हैं जबकि दूर की थोड़ा धीमे।

    पीहू लगातार खिड़की से बाहर देखती जा रही थी। उसे दूर एक दीवार दिखी। काले रंग की दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में एक स्कूल का नाम लिखा था- ‘पूर्णचन्द्र विद्यानिकेतन स्कूल’। ये नाम पढ़ते ही पीहू के चेहरे पर स्माइल आ गयी।आखिर ये उसके स्कूल का नाम जो था। और सिर्फ उसका ही नहीं बल्कि ये तो उसकी छोटी बहन सम्मो का भी स्कूल था। जैसे ही उसे ये बात याद आई वो सम्मो को अपने स्कूल का नाम दिखाने के लिए पीछे मुड़ी और बोली, ‘सम्मो, ये देख…’। लेकिन ये क्या सम्मो तो वहाँ थी ही नहीं। तो सम्मो कहाँ रह गई? उसे याद आया कि ट्रेन में बैठने की खुशी में वो सम्मो को अपने साथ लाना तो भूल ही गयी।

    पहले तो पीहू सम्मो को न पाकर परेशान हुई लेकिन फिर तुरन्त ही सामान्य हो गई। पीहू को पता था कि उसे क्या करना है। पीहू ने ट्रेन के इंजन की तरफ बढ़ना शुरु किया। पीहू ट्रेन के जिस डिब्बे में थी, उसके और इंजन के बीच बहुत सारे और डिब्बे थे। सारे डिब्बे आपस में इस तरह जुड़े थे कि चलती ट्रेन में एक डिब्बे से दूसरे में जाया जा सकता था। पीहू जब अपने डिब्बे से इंजन की तरफ जा रही थी तो उसने देखा कि ट्रेन में उसकी जान-पहचान के बहुत सारे लोग बैठे थे। जैसे उसके डिब्बे के आगे वाले डिब्बे में उसके दोस्त इनाया, आश्वी और मायरा बैठे थे। उसके आगे वाले डिब्बे में उसकी फेवरिट म्यूज़िक टीचर कुछ और टीचर्स के साथ बैठी थी। उसके आगे वाले डिब्बे में मामा, मामी और नानी बैठे थे। जब उसने उसके आगे वाले डिब्बे में देखा तो उसे यकीन नहीं हुआ। उसमें पीहू का फेवरिट हीरो वरुण धवन बैठा था। पीहू का मन हुआ कि रुककर उससे बात करे लेकिन वो सम्मो को लेने का इंतजाम करने जा रही थी।

    जैसे-जैसे वो डिब्बों से गुज़र रही थी तो सब लोग उससे पूछ रहे थे, ‘कहाँ जा रही हो पीहू?’

    पीहू चलते-चलते ही उनको जवाब देती , ‘सम्मो छूट गई है, उसे लेने जा रही हूँ…।’

    आखिरकार पीहू ट्रेन के इंजन में पंहुच गई। वहाँ एक आंटी ड्राइवर सीट पर बैठकर ट्रेन चला रही थी।

    पीहू ने उनसे कहा, ‘आंटी, सम्मो छूट गई है।’

    आंटी ने परेशान होते हुए कहा, ‘अरे तुम्हें उसे साथ रखना चाहिए था न! अब फिर से वापस जाना पड़ेगा।’

    पीहू ने उनसे रिक्वेस्ट की, ‘प्लीज आंटी, सम्मो को लाने चलिए न!’

    आंटी अब मुस्कुराकर बोली, ‘ठीक है पीहू। पर अगली बार से उसे साथ लाना मत भूलना।’

    ऐसा कहते हुए आंटी ने पहले तो ट्रेन रोकी और फिर उसे उल्टी दिशा में चलाना शुरु कर दिया। पीहू ये देखकर हैरान थी कि ये ट्रेन उल्टी दिशा में भी उतनी ही तेजी से चल सकती है। सारे दृश्य वापस से उल्टी दिशा में चलने लगे जैसे किसी पिक्चर को रिवाइंड किया जा रहा हो। पीहू को देखकर बड़ा मज़ा आया। कुछ देर बाद ट्रेन वापस उसी प्लैटफॉर्म पर पहुँच गई जहाँ से चली थी।

    आंटी ने पीहू से कहा, ‘जाओ पीहू, सम्मो को साथ ले आओ।’

    पीहू ने थैंक्यू आंटी कहा और अपनी आँखें खोल लीं। वह अपने बिस्तर पर थी। सम्मो उसके बगल में लेटी थी। सम्मो की आँखे खुली हुई थीं और वह पीहू की तरफ ही देख रही थी।

    सम्मो ने गुस्से से कहा, ‘दीदी मुझे अपने साथ क्यों नहीं ले गई?’

    पीहू प्यार से बोली, ‘सॉरी सम्मो, चलो अब साथ चलते हैं। मेरा हाथ पकड़ लो।’

    सम्मो ने पीहू का हाथ पकड़ लिया।

    पीहू बोली, ‘तैयार हो सम्मो, चलो अब अपनी आँखें बंद करो, थ्री…टू……..।’

    ‘रुको दीदी, एक बात तो बताओ….!’ सम्मो ने पीहू को टोका।

    ‘क्या सम्मो, रोका क्यों?’

    ‘दीदी ये बताओ आज वरुण धवन भी ट्रेन में आया है क्या?’

    ‘हाँ यार, अब तू चुपचाप मेरा हाथ पकड़ ले। ठीक है!’

    ‘हाँ दीदी…।’

    ‘तो ठीक है….मैं शुरु करती हूँ….थ्री…..टू…..वन…..।’

    वन बोलते ही दोनों बहनों ने एक साथ अपनी आँखें बंद कीं। उन्होंने बंद आँखों से देखा, वो उसी प्लैटफॉर्म पर खड़ी थीं। सामने वही ट्रेन थी और उस ट्रेन पर लिखा था ‘सपनों की ट्रेन….’

    आंटी ड्राइवर की साड़ी में उनके नाम का बैच लगा था जिसमें लिखा था ‘नींद आंटी…’

    नींद आंटी ने सम्मो और पीहू को देखकर कहा, ‘आ जाओ बच्चों, सपनों की ट्रेन में तुम्हारा स्वागत है।’

    धीरे-धीरे ट्रेन ने चलना शुरु किया और कुछ ही देर में स्पीड पकड़ ली।

    पीहू और सम्मो, नींद आंटी की सपनों की ट्रेन में रात भर सफर करते रहे।

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