
आज पढ़िए युवा लेखक प्रचण्ड प्रवीर का अनूठा लेख: कृतज्ञता पर। हमेशा अलग अलग तरह के विषयों पर लिखने वाले प्रचण्ड प्रवीर की अब तक सत्रह पुस्तकें प्रकाशित हैँ। सन् २०२६ मेँ उनकी पाँच पुस्तकेँ प्रकाशित हुई हैँ – १. वर्णोच्चार विधान २. ऋतम्भरा ३. कोमल ऋषभ ४. कोमल गान्धार ५. कल की बात : मध्यम। ये पुस्तकेँ ध्वनि-तत्त्व-शास्त्र और हिन्दी कथा साहित्य तथा व्यङ्ग्य मेँ गम्भीर विमर्श की माँग करती है। आइये लेख पढ़ते हैं- मॉडरेटर
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[१] कृतज्ञता की समसामयिक समझ और समस्याएँ
कुछ दिन पहले की बात है। बातोँ के क्रम मेँ मैँने किसी हिन्दी सम्पादक-साहित्यकार की आलोचना या सुविधा के लिये यह कहेँ कि निन्दा कर दी। हमारे श्रोता मित्र ने यह आक्षेप किया कि इस तरह की आलोचना कैसे की जा सकती है? उत्तर यह था कि प्रसङ्गवश गुण-दोषोँ का यथावत् प्रकट करना किसी भी संवाद के सत्यनिष्ठ होने की कसौटी है। तदुनसार हमारे श्रोता मित्र का आक्षेप था कि तथाकथित सम्पादक-साहित्यकार ने मुझे प्रकाशित किया है, अतः मुझे उनका कृतज्ञ ही होना चाहिये। मेरे द्वारा की गयी तथाकथित आलोचना/निन्दा कृतघ्नता की श्रेणी मेँ आती है। कृतज्ञता से ही रामत्व आता है और वही वरेण्य है।
मेरे श्रोता मित्र के उपरोक्त विचारोँ मेँ कृतज्ञता का आशय कृतज्ञताबोध के संवहन पर आधारित सामाजिक विनिमय का सिद्धान्त है। यह ऐसा है कि हमने आपके हित मेँ कोई काम किया (याचित या अयाचित), अतः आपको मेरे प्रति कृतज्ञ होना चाहिये (बौद्धिक रूप से, ऐच्छिक रूप से, भावात्मक रूप से)। इस कृतज्ञता का प्रतिफलन आपको मेरे द्वारा किये पूर्वोक्त कर्म को अनुमोदित कर्म का संज्ञान में रखते हुए मेरे प्रति सम्मान व्यक्त करके, या मेरे द्वारा याचित या अयाचित किन्तु किसी अपेक्षित कार्य को सम्पन्न करके, या मेरे किये गये उचित तथा अनुचित कार्योँ का अनुमोदन/स्वीकृति/सहायता करके करना चाहिये।
इस अवधारणा का साधारण उदाहरण हम लोकतन्त्र मेँ देखते हैँ कि चुनाव से पहले पैसे बँटवा कर राजनेता वोट खरीदते हैँ या राजनेता अपने द्वारा किये गये कार्योँ के प्रतिदान के रूप मेँ वोट माँगते हैँ। बहुधा हमेँ यह सिखाया जाता है कि हमेँ अपने राजनयिकोँ, राजनेताओँ तथा अभिनेताओँ के प्रति कृतज्ञ होना चाहिये। यही कृतज्ञता का विनिमयात्मक स्वरूप है, जिसमेँ कृतज्ञ व्यक्ति कृतज्ञताबोध का संवहन करते हुए किसी तरह उसका प्रतिकार करे।
कृतज्ञता का पारलौकिक और अधिप्राकृतिक स्वरूप हटा देँ (जो कि किसी पन्थ के धार्मिक स्वरूप के नियामक हैँ), यानी हम ईश्वर, देवता, प्रकृति के घटक (वायु, पृथिवी, नदी, अग्नि, वनस्पति आदि) के प्रति कृतज्ञता हटा कर केवल मानवीय और सामाजिक सम्बन्धोँ मेँ विचार करेँ जो कि समाज-शास्त्र तथा आधुनिक दर्शन (या कहेँ समकालीन नास्तिक दर्शन जैसे कि अस्तित्ववाद, संरचनावाद, भातिवाद, विखण्डनवाद, उत्तर आधुनिकवाद आदि, आदि) का विषय है, इसमेँ कई विचित्रताएँ प्रकट होती हैँ।
कृतज्ञता की अवधारणा को पाश्चात्त्य जगत मेँ ‘ग्रेटफुलनेस’ या ‘थैंकफुलनेस’ से समीकृत किया जाता है। प्राचीन ग्रीस मेँ दार्शनिक और राजनयिक सिसरो ने ‘ग्रेटफुलनेस’ को सभी मूल्योँ का पिता कहा था। “O judges, while I wish to be adorned with every virtue, yet there is nothing which I can esteem more highly than being and appearing grateful. For this one virtue is not only the greatest but is also the parent of all the other virtues.”
जर्मन दार्शनिक महर्षि इम्मेनुअल काण्ट ने अपनी पुस्तक ‘मेटाफिजिक्स ऑफ मोरल्स’ (१७९७) मेँ कृतज्ञता को कर्त्तव्य से समीकृत किया है। “Gratitude is a duty. It is not merely a prudential maxim of encouraging the other to show me further beneficence by acknowledging my obligation to him for a favor he has done, for I would then be using my acknowledgment merely as a means to my further purpose.”
कृतज्ञता को सामान्यतया ‘कृतघ्नता’ के विलोम मेँ या उसके सापेक्ष मेँ ही समझा जाता है और कृतज्ञता का सामान्य अर्थ उपकृत होने की स्वीकार्यता मेँ लिया जाता है। इसे नीति का मुख्य तत्त्व भी माना जाता है।
मेरा कहना है कि कृतज्ञ शब्द के विभिन्न अर्थोँ और आयामोँ से यह कहा जा सकता है कि जिस उपरोक्त अर्थ (उपकृत होने की अभिस्वीकृति के साथ प्रतिकार के लिये तत्परता का संवहन) मेँ आज इसे ग्रहण किया जाता है, वह सम्भवतया प्राचीन भारत के मूलगामी ग्रन्थोँ मेँ था ही नहीँ। इतना ही नहीँ, कृतज्ञता प्राचीन भारतीय नैतिक मूल्योँ मेँ कभी रही नहीँ। भरतमुनि कृत नाट्यशास्त्र मेँ कृतज्ञता को किसी भाव मेँ गिना भी नहीँ जाता है। कुल ४९ भावोँ मेँ कृतज्ञता ना तो स्थायिभाव है, ना सात्त्विक भाव और ना ही सञ्चारी भाव।
सविनय निवेदन यह है कि ईसाइयत के मौलिक मूल्य, यथा — १. प्रेम (लव) २.कृतज्ञता (ग्रैटिट्यूड) ३. क्षमा (फॉरगिवनेस) ४. दीनता (ह्युमिलिटी) ५. करुणा (कम्पैशन) ६. न्याय (जस्टिस) ७. शुचिता (इन्टिग्रिटी) आदि मेँ से ‘क्षमा’ और ‘शुचिता’ को छोड़ कर शेष सभी भारतीय दर्शन के मूलगामी प्रत्यय नहीँ हैँ। ऐसा नहीँ है कि ये तत्त्व भारतीय दर्शन मेँ नहीँ हैँ, पर उनका अस्तित्व आधारभूत प्रत्ययोँ मेँ कदाचित् ही आता है। यह भारतीय दृष्टि जीवन की मूल धारणा ही बदल देती है। यहाँ पाश्चात्त्य और प्राच्य — वेस्टर्न और ओरिएण्टल — का मौलिक भेद है। मैँ यहाँ जोड़ना चाहूँगा कि नैतिक दृष्टि, दार्शनिक रूप से भेदाभेद की दृष्टि रही है।
जिस अर्थ मेँ हम आज कृतज्ञता को ग्रहण करते हैँ, वस्तुतः नैतिकता का वह स्वरूप प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्रियोँ द्वारा कदाचित् ही स्वीकार्य हो। इतना ही नहीँ, कृतज्ञता के संवहन का सिद्धान्त पाश्चात्त्य दार्शनिकोँ को भी कदाचित् ही स्वीकार्य है।
यदि कृतज्ञता का अर्थ उपकृत होने का स्वीकार ही होता, क्या ‘उपकृतज्ञ’ शब्द अधिक सम्यक नहीँ होना चाहिये। उपकार का अर्थ किसी अन्य पर ऐसा व्यवहार करना जिसका प्रतिकार करने वह समर्थ न हो तथा साथ ही उसके प्रतिकार की आशा भी न की गयी हो। यदि उपकार मेँ किसी तरह के धन/व्यवहार आदि की अपेक्षा हो, क्या वह उपकार होगा?
इस आलेख के केन्द्र मेँ मुख्य विमर्श बिन्दु इस प्रकार हैँ: —
- क्या किसी कलाकार/लेखक-कवि को मञ्च प्रदान करने वाले या सम्पादक-प्रकाशक के प्रति किसी तरह कृतज्ञ होना चाहिये? यदि हाँ तो कृतज्ञता का मौलिक स्वरूप क्या है?
- क्या लेखक-पदज्ञ को मिलने वाली प्रशंसा प्रोत्साहन के अतिरिक्त भी कुछ है? यदि हाँ, तो क्या लेखक-पदज्ञ समाज या आलोचकोँ के प्रति कैसे कृतज्ञ है?
- क्या कवि-कर्म कर्मफलवाद के क्षेत्र मेँ विचार किया गया है या नहीँ? क्या कर्मोँ का प्रयोजन ही उसके फल को प्राप्त होता है?
[२] शब्दकोश मेँ अर्थ
कृतज्ञः (कृतम् उपकृतं जानाति स्वीकारोति यः। ज्ञा+ क:। )
– यथा मनुस्मृति। ७।२०९-२१०
अनुत्तमो दुराधर्ष: कृतज्ञ: कृतिरात्मवान्॥
– महाभारते १३।१४९।२२ (विष्णु सहस्त्रनाम)
(सन्दर्भ: राजा राधाकान्त देव कृत शब्दकल्पद्रुम (सन् १८२८-१८५८), पृष्ठ १७५, शब्दकल्पद्रुम)
कृतज्ञ की अर्थच्छाया ‘किये हुए को जानने वाला’ से ‘उपकार को स्वीकार करने वाला’ तक फैली हुयी है। क्या कृतज्ञता भारतीय दर्शन मेँ धर्म के लक्षणोँ मेँ गिनी जाती है?
प्रसङ्गवश अँग्रेजी मेँ कृतज्ञता के लिये ‘ग्रैटिट्यूड’ (gratitude) शब्द लैटिन शब्द ‘ग्रासिया’ (gratia = कृपा) और ‘ग्रेटस’ (gratus = अनुकूल, प्रसन्न करने वाला) से बना है। ग्रैटिट्यूड का सामान्य अर्थ है अच्छे कृत्य की अभिस्वीकृति (ऐकनॉलेजमेण्ट)।
हमेँ कृपा शब्द पर भी विचारना चाहिये। ‘कृपा’ शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत भाषा की ‘कृप्’ धातु से हुई है जिसका अर्थ ‘दया करना’, ‘प्रसन्न होना’ या ‘अनुकूल होना’ होता है। यह लैटिन शब्द ‘ग्रासिया’ के समीप है। साधारणतया कृपा का अर्थ शक्तिमान (= देवता, राजा, धनवान) के द्वारा विना किसी प्रतिकार के अनुकूल स्थिति उत्पन्न करने से है।
[२.१] सम्बन्धित शब्दोँ की व्युत्पत्तिपरक व्याख्या
कृत + ङस् + ज्ञा + क => कृतं जानातीति कृतज्ञः।
व्युत्पत्ति: कृत (किये हुए को) + ज्ञा (जानना) + क (प्रत्यय) = कृतज्ञ।
उपकार = उप (उपसर्ग) + कृ (धातु) + घञ् (प्रत्यय)
उप (उपसर्ग): समीप, निकट, या गौण (सहायक अर्थ में)।
कृ (धातु): करना (कार्य)।
उपकार का अर्थ यही है ना कि कृत्य वस्तुतः किसी परम सत्ता द्वारा की गयी और लौकिक कर्ता सहायक मात्र या निमित्र मात्र है।
जर्मन दार्शनिक मार्टिन हाइडेगर (१८८९-१९७६) ने कृतज्ञता को जर्मन शब्दोँ की व्युत्पत्ति के आधार पर समीकृत करते हुए कहा था Denken (सोचना) ist Danken (थैंकफुलनेस)”— to think is to thank (विचार करना ही कृतज्ञता है)। इस वाक्य का अर्थ इसमेँ निहित है कि हाइडेगर चिन्तन, मनन, गुणन, प्रतिफलन से बढ़कर विचार करने को आध्यात्मिक स्तर पर रखते थे।
[३] भारतीय दर्शन मेँ धर्म का मौलिक स्वरूप
मनुस्मृति के उपलब्ध पाठ मेँ धर्म के १० लक्षण बताये गये हैँ: —
धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
– मनुस्मृति ६।९२
धृति (धैर्य), क्षमा (अपना अपकार करने वाले का भी उपकार करना), दम (हमेशा संयम से धर्म में लगे रहना), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (भीतर और बाहर की पवित्रता), इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रियों को हमेशा धर्माचरण में लगाना), धी (सत्कर्मों से बुद्धि को बढ़ाना), विद्या (यथार्थ ज्ञान लेना). सत्यम् (हमेशा सत्य का आचरण करना) और अक्रोध (क्रोध को छोड़कर हमेशा शान्त रहना)।
याज्ञवल्क्यस्मृति मेँ ने धर्म के नौ लक्षण इस तरह बताये गये हैँ: —
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
दानं दमो दया शान्ति: सर्वेषां धर्मसाधनम् ॥
– याज्ञवल्क्य स्मृति १।१२२
अहिंसा, सत्य, चोरी न करना (अस्तेय), शौच (स्वच्छता), इन्द्रिय-निग्रह (इन्द्रियों को वश में रखना), दान, संयम (दम), दया एवं शान्ति
यहाँ रेखाङ्कित किया जा सकता है कि उपरोक्त लक्षणोँ मेँ अधिकांश व्यक्ति के विवेक हेतु निषेधात्मक (अ-हिंसा, अ-स्तेय, दम, अ-क्रोध, इन्द्रिय-निग्रह) आदेश है जोकि गर्हित कर्मोँ के नियंत्रण हेतु हैँ।
पद्मपुराण मेँ धर्म की तात्त्विक दृष्टि इस प्रकार है: —
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ॥
— पद्मपुराण, सृष्टि १९।३५७-३५८
धर्म का सर्वस्व क्या है, सुनो ! और सुनकर इसका अनुगमन करो। जो आचरण स्वयं के प्रतिकूल हो, वैसा आचरण दूसरोँ के साथ नहीँ करना चाहिये।
लगभग ऐसी ही दृष्टि महाभारत के निम्न श्लोक मेँ भी मिलती है।
न तत्परस्य संदद्यात्प्रतिकूलं यदात्मनः ।
एष सङ्क्षेपतो धर्मः कामादन्यः प्रवर्तते ॥
— महाभारत १३।११४।८
इसके अतिरिक्त कौटिल्य के अर्थशास्त्र १।२ मेँ वर्णाश्रम धर्म, विदुरनीति ३।५६ मेँ क्षमा को धर्म का महत्त्वपूर्ण अंग बताया गया है।
स्मृतियोँ मेँ वर्णित धर्म के लक्षण को विस्तार देते हुए श्रीमद् भागवतपुराण ७।११।८-१२ मेँ धर्म के तीस लक्षण (सत्य, दया, तपस्या, शौच, तितिक्षा, उचित-अनुचितका विचार, मनका संयम, इन्द्रियोंका संयम, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, त्याग, स्वाध्याय, सरलता, सन्तोष, समदर्शी महात्माओँ की सेवा, धीरे-धीरे सांसारिक भोगोंकी चेष्टासे निवृत्ति, मनुष्य के अभिमान पूर्ण प्रयत्नों का फल उलटा ही होता है – ऐसा विचार, मौन, आत्मचिन्तन, प्राणियों को अन्न आदि का यथायोग्य विभाजन, उनमें और विशेष करके मनुष्यों में अपने आत्मा तथा इष्टदेव का भाव, संतो के परम आश्रय भगवान् श्रीकृष्णके नामगुण-लीला आदिका श्रवण, कीर्तन, स्मरण, उनकी सेवा, पूजा और नमस्कार; उनके प्रति दास्य, सख्य और आत्मसमर्पण) कहे गये हैँ।
तैत्तिरीय उपनिषद् के शिक्षावल्ली के ग्यारहवेँ अनुवाक् मेँ जिस धर्म के स्वरूप का उपदेश उसमेँ भी कृतज्ञता कहीँ नहीँ है।
कृतज्ञता व्यवहार का मुख्य प्रस्थान बिन्दु है, किन्तु यह नीति का केन्द्रीय कथ्य नहीँ है। यदि नीति धर्म का मुख्य वरेण्य घटक है, उस स्थिति मेँ यह विचारणीय है कि नीति का मूल स्वरूप क्या है? पद्मपुराण के उपरोक्त श्लोक की लगभग पुनरावृत्ति प्रत्येक भारतीय दर्शन मेँ मिलती है जिसे समकालीन भारतविद् नीति कहना पसन्द करते हैँ, दूसरे शब्दोँ मेँ जो अपने लिए अनुकूल न हो, वैसा व्यवहार दूसरों के लिए न करना यही नीति का मौलिक स्वरूप है।
उपरोक्त लक्षणोँ मेँ कृतज्ञता कहीँ भी मौलिक प्रत्यय के रूप मेँ नहीँ है। हालाँकि पुराणोँ तथा इतिहास (रामायण और महाभारत) मेँ इसका उल्लेख मिलता है।
[३.१] समसामयिक अर्थोँ मेँ कृतज्ञता का प्रतिदर्श : महाभारत मेँ कर्ण का चरित्र
कृतज्ञता का स्वरूप क्या है? शब्दकल्पद्रुम मेँ प्रयुक्त व्युत्पत्ति की दृष्टि से कृतज्ञता का अर्थ उपकार किये जाने को जानना या उसकी अभिस्वीकृति देना या अँग्रेजी मेँ कहेँ तो ऐक्नॉलेज करना। कृतज्ञता भारतीय वाङ्मय मेँ महती भूमिका निभाती है। यह महाभारत मेँ कर्ण का दुर्योधन के प्रति समर्थन का आधार है। लगभग इसी आधार को महत्त्वपूर्ण बनाते हुए रामधारी सिंह दिनकर ने ‘रश्मिरथी’ मेँ, केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’ ने ‘कर्ण’ और उन दोनोँ से प्रेरित होकर शिवाजी सांवत ने ‘मृत्युञ्जय’ मेँ महाभारत के घोषित खलपात्र को अपने काव्य-कौशल से नायक बनाकर जनसामान्य के समक्ष प्रकट किया। दुःख इस बात का है कि उन्होँने कर्ण के महाभारत मेँ वर्णित स्याह और कायर पक्ष को छिपा दिया और कृतज्ञता के संवहन को व्यक्ति के नियामक मूल्योँ मेँ प्रतिष्ठित-सा किया।
ईश्वर तथा पूर्वजोँ के प्रति कृतज्ञता ईसाइयोँ के लिये वरेण्य मूल्य है। क्या आधुनिक नास्तिक दर्शन इसे मूल्य के रूप मेँ कभी स्वीकार कर सकता है?
आदिपर्व के एक सौ पैँतीसवेँ अध्याय मेँ जब कर्ण सभा मेँ अर्जुन को द्वन्द्वयुद्ध की चुनौती देता है, तब कृपाचार्य उसके कुल का परिचय तथा राजवंश का परिचय पूछते हैँ क्योँकि उनके अनुसार राजकुमार नीच कुल और हीन आचार-विचार वाले लोग के साथ युद्ध नहीँ करते। तब दुर्योधन ने राजा धृतराष्ट्र और भीष्म की आज्ञा से कर्ण को अङ्गदेश के राज्य से अभिषिक्त किया। कर्ण राज्य प्रदान के अनुरूप दुर्योधन को कुछ भेँट करना चाहता है, तब दुर्योधन उससे ऐसी मित्रता माँगता है जिसका कभी अन्त न हो।
हमें सभा पर्व मेँ द्रौपदी के चीर-हरण के प्रसङ्ग का विचार करना चाहिये। यदि कर्ण उस समय दुर्योधन का साथ नहीँ देता और दुर्योधन के सौतेले भाई युयुत्सु की तरह पाण्डवोँ के साथ हो जाता, क्या उसे कृतघ्न नहीँ कहा जाता? हाँ, हम युयुत्सु को कृतघ्न नहीँ कहके विवेकी कहेँगे क्योँकि युयुत्सु किसी तरह से भी दुर्योधन से उपकृत नहीँ था।
अगर कृतज्ञता उपकार, अनुकम्पा आदि का अनुमोदन है, उस स्थिति मेँ हमेँ यह तय करना चाहिये कि कृतज्ञता क्या नहीँ है?
साधारण अर्थोँ मेँ हम ईश्वर, देवी-देवता के प्रति कृतज्ञ नहीँ हो सकते क्योँकि वह उपकार की अपेक्षा वरदान या अनुग्रह है। कृतज्ञता लौकिक आचरण मेँ विशेष परिस्थिति है जो कि लौकिक व्यवहार से भिन्न है। इस तरह यदि हम बैंक से धन राशि जमा करते हैँ या निकासी करते हैँ तो वह व्यवहार किसी तरह की कृतज्ञता नहीँ है। हाँ, हम यह कह सकते हैँ कि सुविधापूर्ण व्यवहार के लिये हम कर्मचारी या कर्मचारी ग्राहक से प्रसन्न हो सकते हैँ। जिस व्यवहार मेँ दोनोँ पक्षोँ की पारस्परिकता हो, वहाँ कृतज्ञता का प्रश्न नहीँ उठता।
प्रसङ्गवश, धन्यवाद शब्द का प्रादुर्भाव अर्वाचीन भारत की देन है। यह प्राचीन संस्कृत वाङ्मय मेँ नहीँ मिलता।
[३.२] स्मृतिग्रन्थोँ मेँ कृतज्ञता का स्वरूप: राजधर्म का नियामक मूल्य
भारतीय वाङ्मय मेँ रामायण, महाभारत और स्मृति ग्रन्थ (जैसे धर्मसूत्र, मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति आदि) स्मृति के अन्तर्गत समझे जाते हैँ। धर्मसूत्र और सम्बन्धित स्मृति ग्रन्थोँ मेँ मनुष्य के आचरण, वर्णाश्रम धर्म, राजधर्म इत्यादि सम्बन्धी नियामक सूत्र हैँ। इनकी बहुलता और विविधता भारतीय वाङ्मय की दैशिक और कालिक भिन्नता की ओर इंगित करता है और यदि एक ही स्मृति ग्रन्थ सर्वमान्य होता, उस स्थिति मेँ बहुलता नहीँ होती। या फिर इन स्मृति ग्रन्थोँ मेँ किसी तरह की अवधारणात्मक एकरूपता न होती तो भी यह विचित्र होता। जयन्त भट्ट की ‘न्याय मञ्जरी’ (दसवीं शताब्दी) और वाचस्पति मिश्र द्वारा न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका मेँ यह टिप्पणी की गयी है कि सौगतोँ (बौद्ध) तथा अर्हतोँ (जैन) द्वारा सामाजिक व्यवस्था या वर्ण व्यवस्था मेँ कोई हस्तक्षेप नहीँ है बल्कि वे वैदिक व्यवस्था का ही अनुमोदन करते हैँ। हमेँ यह ध्यान मेँ रखना चाहिये कि सौगतोँ तथा अर्हतोँ का आस्तिक मतावलम्बियोँ से मुख्य मतभेद परमार्थ को लेकर है तथा उनके चिन्तन का मुख्य विषय निर्वाण और कैवल्य जैसे मोक्ष सदृश अवधारणाएँ हैँ। अतः भारतीय दर्शन मेँ धर्म के नैतिक पक्ष हेतु, जो कि परमार्थिक और लौकिक दोनोँ पक्षोँ का सन्तोषजनक समन्वय करे, हमेँ स्मृति ग्रन्थोँ के अतिरिक्त विकल्प नहीँ है। यह और बात है कि श्री पाण्डुरंग वामन काणे ने हमारे समक्ष सौ से अधिक स्मृति ग्रन्थोँ का उल्लेख कर रखा है।
कृतज्ञता का बखान हमेँ गौतम धर्मसूत्र, आपस्तम्ब धर्मसूत्र जैसे धर्मशास्त्रोँ मेँ ठीक उसी तरह नहीँ मिलता जिस तरह अब्राहमिक पंथोँ द्वारा सम्मत न्याय की अभीप्सा भारतीय दर्शन के आधारभूत मूल्योँ से अदृश्य है। ऐसा नहीँ है कि भारत मेँ न्याय की अवधारणा नहीँ रही है, पर वह लौकिक न्याय की व्यवस्था राजा/ राज्य द्वारा समर्थित दण्ड और पुरस्कार की विधि मेँ ही विश्रान्ति पाती है। अतः प्रतिशोध को न्याय नहीँ माना जाता।
रामचरित मानस के लङ्का काण्ड मेँ संजीवनी बूटी द्वारा लक्ष्मण की मूर्च्छा दूर होने पर तुलसीदास जी की चौपाई मेँ कृतज्ञता का वर्णन है: —
हरषि राम भेंटेउ हनुमाना। अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना॥
तुरत बैद तब कीन्ह उपाई। उठि बैठे लछिमन हरषाई॥
किन्तु वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड मेँ इसी संजीवनी बूटी के प्रसंग मेँ श्रीरामचन्द्र कहीँ कृतज्ञ नहीँ दिखाये गये हैँ। लक्ष्मण जी के मूर्छित होते ही श्री राम शोक से विलाप करने लगते हैँ। इसके बाद एक बार फिर वानर वैद्य सुषेण के कहने पर महावीर हनुमान जी हिमालय जाते हैँ और वही संजीवनी बूटी लेकर आते हैँ। इसके बाद लक्ष्मण जी की मूर्छा टूट जाती है और वो फिर से युद्ध के लिए तैयार हो जाते हैँ।
किन्तु किष्किन्धाकाण्ड मेँ लक्ष्मण सुग्रीव श्रीरामचन्द्र जी को पूर्व मेँ दिये गये वचनानुसार सहायता न करने पर फटकारते हुए कहते हैँ: —
पूर्वं कृतार्थो मित्राणां न तत्प्रतिकरोति यः।
कृतघ्नः सर्वभूतानां स वध्यः प्लवगेश्वर ॥
– वाल्मीकि रामायणम् ४।३४।१०
हे वानरराज! प्रथम मित्र से उपकार प्राप्त कर, पीछे जो उसे उपकार का बदला नहीँ चुकाता, वह पुरुष कृतघ्न कहलाता है और समस्त प्राणियोँ द्वारा मार डालने योग्य है।
किन्तु यहाँ कृतज्ञता नहीँ, बल्कि कृतघ्नता या वचनभङ्ग होने की स्थिति को दर्शाया गया है, जहाँ पारस्परिकता का वचन पूर्व मेँ लिया गया था। राम और सुग्रीव ने अग्नि की परिक्रमा करके मैत्री स्थापित की थी। कर्ण की तरह महाभारत मेँ पाण्डवोँ मेँ किसी तरह की कृतज्ञ भावना का निदर्शन मिलता हो, ऐसा ध्यान मेँ नहीँ आता।
यहाँ ध्यान देना चाहिये कि सुग्रीव से कृतज्ञता की अपेक्षा का स्वरूप वचनबद्धता को लेकर है। श्रीरामचन्द्र का वनवास भी लोकमर्यादा को निभाने के लिये, राजा दशरथ के वचन झूठा न हो जाय, इस हेतु ही है। यहाँ सुग्रीव से कृतज्ञता का जो स्वरूप है, वह इस तरह का है कि मैँने तुम्हारा अमुक काम किया, बदले मेँ तुम मेरा अमुक काम करोगे। यह विनिमयता का स्वरूप बदलकर अर्थव्यवस्था मेँ मुद्रा के नियम मेँ आ जाता है कि समुराई ने फलाना बदमाश का नाश करने के लिये सुपारी ली और अपना काम कर दिया। लेकिन काम पूरा होने के बाद मुद्रा का भुगतान नहीँ हुआ तो वीर समुराई सुपारी देने वाले को ही मार डालेगा।
भारतवर्ष मेँ कई बड़े उद्योगपति अपने आप को समाजसेवी घोषित करते हैँ। उनका कहना है कि किसान, धोबी, मोची, व्यापारी, सभी कार्मिक समाज-सेवा मेँ ही रत हैँ भले ही उनको उनके किये गये काम के एवज मेँ पैसे मिल रहे हैँ। उनका कहने का आशय है कि आप किराने की दुकान पर जाकर पैसे देकर साबुन खरीदते हैँ, उस स्थिति मेँ आपको दुकानदार का, साबुन लाने वाले मालवाहक ट्रक का, साबुन बनाने वाले का, माँग-आपूर्ति की शृङ्खला मेँ सभी व्यक्ति का कृतज्ञ होना है, क्योँकि उनके बिना आपको आपका इच्छित साबुन नहीँ मिलता। इसपर अविलम्ब आपत्ति की जा सकती है कि किसी सोद्देश्य तन्त्र (सिस्टम) में, जिसका घोषित लक्ष्य धनोपार्जन करना हो,वहां कोई भी व्यक्ति प्रतिस्थापनीय (किसी अन्य से बदला जा सकता) है। सम्बन्धित व्यक्ति तन्त्र के द्वारा निर्देशित कार्योँ का अभिकर्मक हे। यदि कृतज्ञता ज्ञापित भी करनी हो तो हम तन्त्र के प्रति कृतज्ञ हो सकते हैँ, व्यक्ति के प्रति नहीँ। किसी हम इस विषय पर आगे विचार करेँगे।
बड़ी विचित्र बात यह है कि याज्ञवल्क्य स्मृति मेँ कृतज्ञता राजा के लक्षणोँ मेँ गिना गया है: —
महोत्साहः स्थूललक्षः कृतज्ञो वृद्धसेवकः।
विनीतः सत्त्वसंपन्नः कुलीनः सत्यवाक्शुचिः॥
— याज्ञवल्क्यस्मृति (आचाराध्याय, राजधर्मप्रकरण – १।३०९)
राजधर्म के सम्बन्ध मेँ यही बात मनुस्मृति के सातवेँ अध्याय मेँ कही गयी है, जहाँ राजा को कैसा मित्र या कैसा शत्रु बनाना चाहिये (सन्दर्भ से, जो एक दूसरा राजा ही हो): —
धर्मज्ञं च कृतज्ञं च तुष्टप्रकृतिमेव च।
अनुरक्तं स्थिरारम्भं लघुमित्रं प्रशस्यते॥
प्राज्ञं कुलीनं शूरं च दक्षं दातारमेव च।
कृतज्ञं धृतिमन्तं च कष्टमाहुररिं बुधाः॥
— मनुस्मृति ७।२०९-२१०
धर्म का जानने वाला तथा किये हुए उपकार का जानने वाला और जिसकी प्रकृति स्वभाव संतोषयुक्त हो ऐसा और प्रीति करने वाला और जिनके आरम्भ स्थिर हैँ ऐसे कामोँ को करने वाला मित्र प्रशस्त उत्तम है। विद्वान कुलीन चतुर दाता, किये का जानने वाला और धीरज वाला अर्थात् सुख दुःख मेँ एकरूप ऐसे शत्रु को पण्डित दुरुच्छेद (दुःख से उखाड़ने योग्य) कहते हैँ, वैसे शत्रु से मिलाप करना चाहिये।
अतः वाल्मीकि रामायण मेँ जहाँ-जहाँ कृतज्ञता को श्रीरामचन्द्र के चारित्रिक मूल्य के रूप मेँ दर्शाया गया है, वह लोक व्यवहार तथा राजा के आदर्श के रूप मेँ ही दर्शाया गया है।
तं पद्मदलपत्राक्षं सिंहविक्रान्तगामिनम्। धन्याः पश्यन्ति मे नाथं कृतज्ञं प्रियवादिनम् ॥
— सुन्दरकाण्ड, वाल्मीकि रामायण, ५।२९।१७
(सीता जी कहती हैँ) धन्य हैँ, जो मेरे नाथ (श्री राम) को देखते हैँ, जिनके नेत्र कमल की पंखुड़ियों के समान हैँ, जो सिंह के समान पराक्रमी चाल वाले हैँ, जो कृतज्ञ हैँ और जो प्रिय बोलने वाले हैँ।
जब वानरराज सुग्रीव को वालि के वध के बाद अपने भविष्य और श्री राम के इरादों पर थोड़ी चिंता या भय होने लगता है, तब तारा उन्हें आश्वस्त करते हुए कहती हैँ:—
न च कार्यो विषादस्ते राघवं प्रति मत्कृते।
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च कथं पापं करिष्यति ॥
— किष्किन्धाकाण्ड, वाल्मीकि रामायण, ४।१६।५
श्री राम के विषय में तुम्हारे मन में जो विषाद या चिंता है, उसे बिल्कुल त्याग दो। जो स्वयं धर्म के ज्ञाता हैँ और कृतज्ञ हैँ, वे भला पाप (अधर्म या छल) कैसे कर सकते हैँ?”
सत्त्वाभिजनसंपन्नः सानुक्रोशो जितेन्द्रियः।
कृतज्ञः सत्यवादी च राजा लोके महीयते ॥
— किष्किन्धाकाण्ड, वाल्मीकि रामायण, ४।३३।७
सत्त्व-अभिजान-सम्पन्नः (पराक्रमी और उत्तम कुल में उत्पन्न) स-अनुक्रोशः (दयालु) जित-इन्द्रियः (इन्द्रियों को वश में रखने वाला) कृतज्ञः सत्यवादी च (और सत्य बोलने वाला) राजा लोके (संसार में) महीयते (सम्मानित होता है / पूजा जाता है)।
वाल्मीकि रामायण के किष्किन्धाकाण्ड मेँ जब हनुमान जी ने किष्किन्धा मेँ पम्पा सरोवर के पास राम और लक्ष्मण को देखा, तब उन्होंने लक्ष्मण से उनका परिचय पूछा। हनुमान जी के पूछने पर लक्ष्मण ने श्री राम का परिचय देते हुए यह श्लोक कहा: —
अहमस्यावरो भ्राता गुणैर्दास्यमुपागतः। कृतज्ञस्य बहुज्ञस्य लक्ष्मणो नाम नामतः ॥
— किष्किन्धाकाण्ड, वाल्मीकि रामायण, ४।४।१२
मैं इनका (श्री राम का) छोटा भाई हूँ, मेरा नाम लक्ष्मण है। मैं इनके गुणों से वशीभूत होकर इनका दास (सेवक) बन गया हूँ। ये कृतज्ञ और बहुज्ञ (बहुज्ञ/सर्वज्ञ) हैँ।
स्मृतियोँ, रामायण और महाभारत के सन्दर्भोँ से यही निगमित किया जा सकता है कि कृतज्ञता लोकव्यवहार के लिये महत्त्वपूर्ण मूल्य है। राजा के लिये यह वाञ्छित या आवश्यक गुणोँ मेँ हैँ। किन्तु इसका स्वरूप उपयोगी या विनिमयात्मक ही है, जिस तरह श्रीराम और वानरराज सुग्रीव की मित्रता थी कि रामचन्द्र वालि का वध करके सुग्रीव को राज सौँप देँगे बदले मेँ सुग्रीव सीता माता को ढूँढने मेँ यथाशक्य सहायता ही देगा।
लेकिन हमेँ यहाँ कृतज्ञता के दो अर्थोँ पर ध्यान देना चाहिये। मनुस्मृति तथा याज्ञवल्क्य स्मृति मेँ जो राजा के लिये कृतज्ञता का अर्थ है वह ‘किये हुए को जानने वाला’ है। यह कृतज्ञता का प्राचीन अर्थ है, जिसमेँ राजा को अपने राज्य मेँ प्रजा के अच्छे तथा बुरे कर्मोँ को संज्ञान मेँ लेना है। यही राजधर्म है कि वह अच्छे कर्मोँ के लिये पुरस्कृत करेँ तथा बुरे कर्मोँ के लिये दण्ड का नियमन करेँ। रामायण मेँ श्रीरामचन्द्र की महिमा राजा तथा योद्धा के रूप मेँ हैँ।
कृतज्ञ के उपरोक्त अर्थ के सम्बन्ध मेँ एक अन्य उदाहरण मत्स्य पुराण मेँ राजा के सम्बन्ध मेँ मिलता है: —
कृताकृतज्ञो भृत्यानां ज्ञेयः स्याद्देशरक्षिता।
आयव्ययज्ञो लोकज्ञो देशोत्पत्तिविशारदः॥
– मत्स्य पुराण, २१५.१७
देश की रक्षा करने वाले (शासक या अधिकारी) को कर्मचारियोँ या सेवकोँ द्वारा किए गए और न किए गए कार्यों (उनकी अच्छाइयों-बुराइयों) का ज्ञाता होना चाहिए। उसे आय और व्यय का हिसाब, लोक-व्यवहार, और उस देश की उत्पत्ति/सम्पदा का विशेषज्ञ होना चाहिये।
[३.३] महाभारत मेँ कृतज्ञता का स्वरूप : शान्तिपर्व मेँ मनुष्य के लिये उपकृत होने अभिस्वीकृति
कृतज्ञता को ‘कृतोपकारज्ञाता’ के रूप मेँ धर्म मानने का महत्त्वपूर्ण सङ्केत हमेँ वाल्मीकि रामायण मेँ मिलता है, किन्तु यह नियामक मूल्य है ऐसा निश्चित रूप से नहीँ कहा जा सकता।
कृते च प्रतिकर्तव्यमेष धर्मः सनातनः।
“उपकार के बदले उपकार (या भलाई के बदले भलाई) करना ही सनातन धर्म है।”
— वाल्मीकीय-रामायण, समीक्षित-पाठ ५।१।१००
उपरोक्त श्लोक की मूलभावना लौकिक व्यवहार मेँ प्रतिकर्त्तव्य की धारणा से है, किन्तु यही कृतज्ञता है यह नहीँ कहा गया है। इस धारणा से कोई विरोध नहीँ है। यह सामाजिक मूल्य है कि जहाँ मनुष्य कई प्रकार के खतरोँ या कठिनाइयोँ से जूझ रहा हो, वहीँ किसी अन्य द्वारा किये गये हितकारी कर्म का प्रतिकार करना मानवीय स्वभाव कर अङ्ग है।
महाभारत के शान्तिपर्व के निम्न श्लोक मेँ ज्ञानी के उत्तम गुणोँ का वर्णन इस तरह है: —
शेषान्नभोक्ता वचनानुकूलो हितार्जवोत्कृष्टकृताकृतज्ञः ।
अवैरकृद्भूतहिते नियुक्तो गङ्गाह्रदाम्भोऽभिजनोपपन्नः ॥
– महाभारतम्, १२।३४३।११
शेषान्नभोक्ता (शेष + अन्न + भोक्ता)– जो पहले अतिथियों और आश्रितों को भोजन कराता है तथा अंत में बचे हुए (शेष) अन्न का ही भोजन करता है। वचनानुकूल (वचन + अनुकूल) – जो सदैव प्रिय, मधुर और दूसरों के अनुकूल (सहायक) वचन बोलने वाला हो। हितार्जवोत्कृष्ट (हित + आर्जव + उत्कृष्ट)– जो सदाचार/सरलता (आर्जव) में श्रेष्ठ हो और सदैव दूसरों का हित चाहने वाला हो। कृताकृतज्ञः (कृत + अकृत + ज्ञ)– जो किए हुए उपकार को याद रखने वाला (कृतज्ञ) हो और अपने द्वारा किए गए या न किए गए कार्यों का पूरा ज्ञान/हिसाब रखने वाला हो। अवैरकृत् (अवैर + कृत्) – जो किसी के साथ भी कभी बैर (शत्रुता या द्वेष) का भाव न रखने वाला हो। भूतहिते नियुक्तः (भूत + हिते + नियुक्त) – जो हमेशा सभी प्राणियों के कल्याण और भलाई के कार्यों में लगा रहता हो।गङ्गाह्रदाम्भोऽभिजनोपपन्नः (गङ्गाह्रद + अम्भः + अभिजन + उपपन्नः) – जो गंगाजी के जल के समान अत्यंत पवित्र और श्रेष्ठ कुल (वंश) में उत्पन्न हुआ हो।
किन्तु महाभारत के आदि पर्व मेँ (अध्याय १६०।१५) मेँ कृतज्ञ का अर्थ, राजधर्म के प्राचीन अर्थ मेँ ही लिया गया है। यहाँ हमेँ ध्यान रखना चाहिये कि महाभारत के उपलब्ध पाठ मेँ मनुस्मृति के २६० श्लोक (समग्र ग्रन्थ का लगभग दशमांश) महाभारत के तीसरे (आरण्यक पर्व), बारहवेँ (शान्ति पर्व) तथा तेरहवेँ पर्वोँ (अनुशासन पर्व) मेँ पाये जाते हैँ। महाभारत के शान्ति पर्व तथा अनुशासन पर्व मेँ ‘कृतज्ञ’ के अर्थ का विस्तार (वर्तमान मेँ ग्राह्य उपकृत होने का भाव) कुछ श्लोकोँ मेँ आता है।
महाभारत के मौलिक स्वरूप के सम्बन्ध श्रद्धेय वासुदेवशरण अग्रवाल जी एक महत्त्वपूर्ण सूत्र अपनी विलक्षण पुस्तक भारत-सावित्री मेँ देते हैँ कि आदिपर्व १।१०२-१५८ मेँ ही धृतराष्ट्र के मनोभाव की झाँकी मेँ ही परिलक्षित है। शेष उपाख्यान, गाथा और अन्य धार्मिक विश्वास आदि महाभारत मेँ अतिप्राचीन वीरगाथा-काव्य के ऊपर छाजन की तरह छाये हुए हैँ। महाभारत के विषय मेँ आचार्य वासुदेव शरण अग्रवाल ने अपनी पुस्तक ‘भारत सावित्री’ मेँ लिखा है — काश्मीर से प्राप्त शारदा लिपि मेँ लिखी हुयी महाभारत की प्रतियाँ पाठ की दृष्टि से सबसे अधिक प्रामाणिक हैँ। उनके पाठ प्राचीन एवं मूल के अधिकतम निकट हैँ और अन्य संस्करणोँ की अपेक्षा श्लोक-सङ्ख्या भी उनमेँ कम हैँ। दक्षिण भारत के संस्करणो मेँ सबसे अधिक मिलावट है, जो सभा पर्व, विराट पर्व, अनुशासन पर्व, आश्वमेधिक पर्व और आश्रमवासिकपर्व मेँ पायी जाती है। कुल मिलाकर उनमेँ १३,४५० श्लोक काश्मीरी प्रतियोँ की अपेक्षा अधिक है।
अतः महाभारत के सन्दर्भ के लिये काश्मीरी पाठ को अपनाना चाहिये।
कृतज्ञ का दूसरा अर्थ, और परम्परा मेँ स्वीकृत अपेक्षाकृत नवीन अर्थ ‘किये गये उपकार का जानना/मानना’ का उल्लेख हमेँ महाभारत मेँ शान्तिपर्व मेँ मिलता है, जहाँ गृहस्थोँ के लिये उपदेश है: –
स्वदारतुष्ट ऋतुकालगामी नियोगसेवी नशठो नजिह्मः।
मिताशनो देवपरः कृतज्ञः सत्यो मृदुश्चानृशंसः क्षमावान्॥
– शान्तिपर्व, महाभारत १२।६१।११
स्वदारतुष्ट – जो पुरुष केवल अपनी पत्नी में ही संतुष्ट रहने वाला हो। ऋतुकालगामी – जो धर्मानुसार केवल ऋतुकाल में ही पत्नी के पास जाने वाला हो। नियोगसेवी – जो सदाचार का पालन करने वाला और बड़ों की आज्ञा का सेवन करने वाला हो। नशठो नजिह्मः – जो कपट (धोखे) से रहित और सरल हृदय वाला हो (कुटिल न हो)। मिताशन – जो आवश्यकता के अनुसार संतुलित (नपा-तुला) भोजन करने वाला हो। देवपरः – जो ईश्वर की भक्ति में लीन रहने वाला हो। कृतज्ञः – जो किए गए उपकार को मानने वाला हो। सत्यो – जो सदैव सत्य बोलने वाला हो। मृदुश्चानृशंसः – जो स्वभाव से अत्यंत कोमल (विनम्र) और किसी भी प्राणी को कष्ट न देने वाला (दयालु) हो। क्षमावान्: – जो क्षमा करने के गुण से युक्त हो।
[३.४] कृतघ्नता : महापाप
यह निर्विवाद है कि कृतघ्नता महापाप है। स्मृति ग्रन्थोँ, पुराणोँ, महाभारत आदि लगभग सभी जगह इसकी निन्दा की गयी है।
पिशुनानृतिनोश्चान्नं क्रतुविक्रयिणस्तथा।
शैलूषतुन्नवायान्नं कृतघ्नस्यान्नं एव च॥
– मनुस्मृति, ४.२१४[२१५]
पिशुन (जो पीठ पीछे दूसरे की बुराई करता हो), बहुत झूठ बोलता हो, झूठी गवाही देता हो, क्रतुविक्रयी (यज्ञ का फल तुम्हारा हो ऐसे कहकर जो धन लेता है) का, नट का, दर्जी का और कृतघ्न (जो उपकार करने वाले का भी बुराई करे) उसका अन्न नहीँ खाना चाहिये।
बालघ्नांश्च कृतघ्नांश्च विशुद्धानपि धर्मतः।
शरणागतहन्तॄंश्च स्त्रीहन्तॄंश्च न संवसेत्॥
– मनुस्मृति, ११.१९०[१८९]॥
जिसने बालक की हत्या की हो और जो कृतघ्न (किये हुए उपकार को अपकार करने से नाश किया) हो और शरणागत (प्राणोँ की रक्षा के लिये आये हुए को) और स्त्री की हत्या की हो, इनको यथायोग्य प्रायश्चित करने पर भी समीप न बसने देँ।
जर्मन दार्शनिक महर्षि काण्ट भी इसे समस्त पापोँ का मूल मानते हैँ। “Ingratitude is among the vices that are the essence of vileness and wickedness.”
परन्तु कृतघ्नता का स्वरूप क्या है?
कल्पना कीजिये कि कोई व्यक्ति प्रतिदिन आपके दरवाजे पर इमली की ढेरी रख जाय। ऐसा करने के दस दिन बाद वह यह कहे कि उसने आपको दस दिन तक इमली पहुँचायी है इसलिये आपको उसका काम करना होगा, नहीँ तो आप कृतघ्न हैँ। यहाँ पर दो स्थितियाँ उत्पन्न होती हैँ। पहली कि आपने अयाचित इमली का सेवन किया। दूसरी कि इमली अयाचित तो थी ही, साथ ही अवाञ्छित भी थी इसलिये आपने इमली को कूड़े मेँ फेँक दिया। क्या दूसरी स्थिति मेँ आप कृतघ्न कहलायेँगे? निश्चित तौर पर नहीँ क्योँकि आप उसके कृत्य को जानते हैँ किन्तु आप उसकी स्वीकृति नहीँ देते।
पहली स्थिति मेँ आप इमली देने वाले के कृत्य को जानते हैँ कि वह ऐसा कर रहा है, साथ ही आप उसकी मौन स्वीकृति देकर भोग भी कर रहे हैँ। लेकिन आप उसके कृत्य की प्रशंसा नहीँ कर रहे हैँ। आपका कहना हो सकता है कि इमली को व्यर्थ कूड़े मेँ फेँकने से अच्छा है कि उसकी चटनी बना कर खा लिया जाय। लेकिन यहाँ पर आप उसके इमली देने या नहीँ देने की प्रशंसा नहीँ करते। इसके बाद यदि इमली देने वाला आपको कृतघ्न कहेँ, उस स्थिति मेँ आपका क्या उत्तर होगा?
दूसरे शब्दोँ मेँ अयाचित और अवाञ्छित कृत्य की प्रशंसारहित स्वीकृति कृतघ्नता है या नहीँ, यह विचारणीय है। इसे आगे देखेँगे।
[४] कृतज्ञता और कर्मफल
विष्णुशर्मा के पञ्चतन्त्र से कृतज्ञता के बारे मेँ भारतीय परम्परा का महत्त्वपूर्ण सूत्र मिलता है।
उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः।
अपकारिषु यः साधुः स साधुः सद्भिरुच्यते॥
अर्थ: जो उपकार करने वालों (भलाई करने वालों) के साथ अच्छा व्यवहार करता है, उसकी सज्जनता में क्या विशेष गुण है (वह तो सामान्य बात है)? लेकिन, जो अपकार करने वालों (नुकसान पहुँचाने वालों) के साथ भी अच्छा व्यवहार करता है, वास्तव में वही सच्चा साधु (सज्जन) श्रेष्ठ लोगों द्वारा कहा गया है।
यहाँ उपकार का भाव कुल्लूक भट्ट द्वारा मनुस्मृति मेँ धर्म के लक्षण मेँ दिये गये (६.९२) ‘क्षमा’ (=अपना अपकार करने वाले का भी उपकार करना) का विस्तार है। कुल्लूक भट्ट ने क्षमा का अर्थ अपराध को स्मृति मेँ ना रखना या संज्ञान मेँ न लेना, के अर्थ मेँ नहीँ लिया है।
कृतज्ञता के द्वितीय तथा प्रचलित अर्थ उपकृत होने के भाव मेँ जो महत्त्वपूर्ण घटक है वह है किये गये कर्म का फलीभूत होना। क्या निष्फल कर्म से भी कोई कृतज्ञ हो सकता है? यदि हनुमान जी गंधमादन पर्वत उखाड़ कर लाते और उसमेँ संजीवनी बूटी ही नहीँ होती, तो क्या उस दशा मेँ श्रीरामचन्द्र हनुमान जी से उपकृत होते?
यह कुछ कुछ भौतिकी मेँ कार्य या वर्क (Work) की परिभाषा जैसी है कि : वर्क = फोर्स * डिस्प्लेसमेंट
यदि कोई व्यक्ति बल लगा कर दीवार को हिलाने के लिये उद्धत होता है, लेकिन जब तक दीवार अपने मूल स्थान से ना हिले, तब तक कोई कार्य नहीँ समझा जा सकता। उसी तरह जब तक कोई कार्य फलीभूत ना हो, तब तक कोई कर्म कैसे कर्म कहा जाय? जब तक ज्ञान भी अविसंवादिफलप्रवृत्तिजनक न हो, तब तक वह ज्ञान नहीँ है। कर्म को समझने के लिये हमारे पास कोई अन्य उपकरण नहीँ है।
अब इस पर आपत्ति की जा सकती है कि कर्म के तीन स्तर हैँ — १. मानसिक २. वाचिक ३. कायिक। जब हम कर्म का स्वरूप उसके फलीभूत होने से समझेँगे, उस स्थिति मेँ मानसिक तथा वाचिक कर्म के क्या फल होँगे? इसका उत्तर है वाचिक कर्म का फल वाक् के स्तर पर ही है कि हम किसी की गाली देते हैँ तब वह वाक् की प्रक्रिया से ग्रहण करता है और उसका मानसिक संताप ही फल है। यदि कोई कहे कि फलाना ने अमुक को गाली दी और अमुक पर कोई प्रभाव नहीँ पड़ा। यहाँ अमुक की चारित्रिक विशिष्टता से वाचिक कर्म निष्फल हुआ। यह वैसा ही है कि किसी ने अमुक को मारने की गोली चलायी, पर अमुक झुक कर गोली से बच गया। यहाँ पर गोली चलाने वाले कर्म हत्या का कर्म न होकर, हत्या के प्रयास का कर्म है। दोनोँ विकर्मोँ के लिये दण्ड-प्रावधान भी भिन्न हैँ।
अब आते हैँ मानसिक कर्म पर। यदि हम किसी को मन ही मन बुरा-भला कहते हैँ या सोचते हैँ, क्या उसका कोई फल है? तन्त्रशास्त्र कहेगा कि ‘है’। मन्त्रोँ का मौलिक स्वरूप इच्छारूप है और उसका फल किसी के बुरे होने से हो सकता है और इस तरह के बुरा चाहने के अपने दण्ड या कर्मफल विधान हैँ। कर्मफल का वैचित्र्य दशरथ द्वारा श्रवण कुमार की हत्या मेँ भी है। महाराजा दशरथ का यह कर्म इच्छित तो नहीँ था, किन्तु फल से ही उस कर्म की विशिष्टता तय की जाती है। अतः यह निगमित किया जा सकता है कि कर्म अपने फलीभूत होने से विच्छिन्न नहीँ है।
सम्बन्धित प्रश्न श्रीमद्भगवद्गीता के प्रसिद्ध श्लोक से उठ सकता है कि भगवान् श्रीकृष्ण ने तो स्पष्टतया कर्म और फल को भिन्न माना है।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
– श्रीमद्बगवद्गीता॥ २।४७
कर्म पर ही आपका अधिकार है और फल पर कभी नहीँ। कभी कर्म के फल के प्रयोजन वाले मत बनो और ना ही अकर्मण्य हो।
इसपर मेरा कहना इतना मात्र है कि यही भारतीय दृष्टि की मौलिकता है जो कि स्मृति ग्रन्थोँ मेँ निर्देशित धर्म के मौलिक स्वरूप मेँ उपकृत होने के भाव को नहीँ देखती। उसका कारण इतना है कि हमारी क्षुद्रदृष्टि सभी कर्मोँ का देश-काल मेँ निरन्तर फल देखना चाहती है, किन्तु ऐसा भौतिक या जड़ आयामोँ मेँ अधिक होता है चैतन्य मेँ कम। इसका बहुत छोटा-सा उदाहरण है कि भीमसेन सभापर्व मेँ हुए द्रौपदी के अपमान का प्रतिशोध कर्ण पर्व मेँ दुःशासन की नृशंस वध से लेते हैँ। दुःशासन के गर्हित कर्मोँ का फल कालान्तर मेँ मिला। इसी तरह बहुत से कर्मोँ का प्रतिदान व प्रतिफल या उऋण होने की प्रक्रिया कालान्त मेँ होती है। भारतीय दर्शन मेँ कर्मफल इसी तरह धर्म की मौलिक अवधारणा है जिसका साम्य दुनिया किसी अन्य सभ्यता, संस्कृति या महाकाव्य मेँ नहीँ मिलता। कर्मफल की सूक्ष्मता और धर्म की सूक्ष्मता ही धर्म को शास्त्र का विषय बनाती है, या आगम का विषय बनाती है कि जिसके अनुसार हम सभी कर्मों का फल एक जीवन काल मेँ देख ही नहीँ सकते। दरअसल कर्मफल के इस जाल को ही बौद्ध दर्शन मेँ मछली के जाल की तरह बताया गया है कि जिससे निकलने के लिये द्वादश निदान चक्र की अवधारणा है।
[५] कृतज्ञता के सम्बन्ध मेँ पाश्चात्त्य दार्शनिक
नीत्शे ने ‘ह्युमन ऑल टू ह्युमन’ मेँ इस सम्बन्ध मेँ अपने विचार व्यक्त किये कि शक्तिशाली मनुष्य मेँ किसी तरह की भी कृपादृष्टि (favor) स्वाभाविक रूप से उसमेँ दायित्वबोध का उन्मेष करती है, जो अन्यथा सम्भव थी ही नहीँ। शक्तिशाली मनुष्य मेँ उत्पन्न कृतज्ञताबोध को नीत्शे उसके प्रतिशोध का मद्धम आरूप मानते हैँ। “The powerful man feels gratitude for the following reason: through his good deed, his benefactor has, as it were, violated the powerful man’s sphere and penetrated it. Now through his act of gratitude the powerful man requites himself by violating the sphere of the benefactor. It is a milder form of revenge. Without the satisfaction of gratitude, the powerful man would have shown himself to be unpowerful and henceforth would be considered such. For that reason, every society of good men (that is, originally, of powerful men) places gratitude among its first duties.”
किन्तु इसके साथ ही नीत्शे कृतज्ञ व्यक्तियोँ के सम्बन्ध मेँ एक विचित्र बात रखते हैँ कि उत्तम प्रकार के व्यक्ति कृतज्ञता बन्धन मेँ बिना किसी विशेष कठिनाई स्वीकार करते हैँ तथा उस दायित्वबोध से मुक्ति पाने के लिये बड़े प्रयत्नशील नहीँ होते। वहीँ अपरिपक्व व्यक्ति उपकृत होने का विरोध करते हैँ और साथ ही बड़े उद्विग्न हो कर उऋण होने का प्रयत्न करते हैँ। निम्न प्रकार के व्यक्ति या शोषित व्यक्ति किसी तरह की कृपादृष्टि को करुणा का चमत्कार मानते हैँ। “Noble soul will be happy to feel itself bound in gratitude and will not try anxiously to avoid the occasions when it may be so bound; it will likewise be at ease later in expressing gratitude; while cruder souls resist being bound in any way, or are later excessive and much too eager in expressing their gratitude. This last, by the way, also occurs in people of low origin or oppressed station: they think a favor shown to them is a miracle of mercy.”
नीत्शे का यह भी मानना है कि बहुत बड़े परिमाण की कृपा का बहुधा किसी तरह की कृतज्ञता का प्रतिदान नहीँ मिलता जब उपकृत किसी अवस्था मेँ उसका प्रतिकार नहीं कर सकता। इसी निर्मिति को वह ‘यश’ की अवधारणा मेँ भी देखते हैँ कि जब बहुत लोग की कृतज्ञता विना किसी लज्जा के किसी एक व्यक्ति के प्रति हो जाती है, तब यश होता है। “When the gratitude of many to one throws away all shame, we behold fame.”
जर्मन दार्शनिक मार्टिन हाइडेगर कृतज्ञता के तीन घटक विचारते हैँ: —
१. कृत्य का संज्ञान/ किये हुए को जानना (बौद्धिक घटक)
२. कृत्य की अभिस्वीकृति/ किये हुए को हितकारी या लाभकारी या अनुकूल मानना (ऐच्छिक घटक)
३. किये हुए की प्रशंसा करना (भावात्मक घटक)।
उनके अनुसार इन तीन घटकोँ के विना कृतज्ञता (ग्रैटिट्यूड) पूरा नहीँ होती।
देखा जाय तो मार्टिन हाइडेगर ही कृतज्ञता को समग्रता मेँ उद्गाटित करते हैँ और ध्यान देना चाहिये कि यहाँ ‘कृत्य के संवहन’ का कोई उल्लेख नहीँ है।
मार्शेल मॉस(१८७२-१९५०) अपनी पुस्तक ‘द गिफ्ट’ (The Gift- 1925) मेँ किसी भी उपहार को सामाजिक संरचना मेँ आवश्यक मानते हैँ, जहाँ उपहार का देना, उपहार को स्वीकार करना और उपहार का प्रतिकार करना, ये तीनोँ सामाजिक कर्त्तव्य हैँ। इतना ही नहीँ बल्कि मार्शेल मॉस के अनुसार इनका आध्यात्मिक मूल्य भी है।
ज्याँ पॉल सार्त्र के अस्तित्ववाद की व्याख्या करने वाले कई विचारक जीवन मेँ किसी भी तरह की सहायता या अनुकम्पा का विरोध करते हैँ। मुखर स्वर मेँ उनका कहना है कि व्यक्ति अपनी मौलिक अवधारणा मेँ स्वतन्त्र है और समाज किसी तरह की सहायता देकर उसकी स्वतन्त्रता कम करके उसे बाँधना चाहता है। अस्तित्ववाद मेँ मनुष्य अपने साथ हुए घटनाओँ के लिये स्वयं उत्तरदायी है। यदि वह समाज के किसी बन्धनोँ को मानकर अपनी स्वतन्त्रता कम करता है, उस स्थिति मेँ भी वह ही अपने दोषपूर्ण निर्णय के लिये उत्तरदायी है। सम्भवतः भातिवाद (फेनोमेनोलॉजी) की तरह अस्तित्ववाद (एग्जिस्टेंशियलिज़्म) भी परमार्थिक प्रश्नोँ का न पूछा जाना ही श्रेयस्कर समझता है।
अस्तित्ववादी भी कृतज्ञता को मूल्य के रूप मेँ अस्वीकार करते हैँ, किन्तु उपकार के सामाजिक जीवन मेँ महत्ता स्वीकार करते हुए जिसे वह नकारात्मक समझते हैँ।
मोटे तौर से यह कहा जा सकता है कि लगभग सभी भारतीय दार्शनिक सम्प्रदाय कृतज्ञता को लौकिक व्यवहार मेँ स्वीकार तो करते हैँ किन्तु उसे संवाहनात्मक विनिमय दृष्टि को धार्मिक आचार का अवधारणात्मक घटक नहीँ माना गया है, जबकि ऐसा ईसाइयोँ मेँ है [भले ही बाइबिल मेँ ऐसा न कहा गया हो]।
कृतज्ञता के संवहन को लेकर विखण्डनवादी दार्शनिक जाक देरिदा अपनी पुस्तक ‘गिवेन टाइम: काउण्टरफिट मनी’ (Given Time: I. Counterfeit Money- 1994) में कहते हैँ कि दिया गया उपहार एक ना सुलझा सकने वाली विडम्बना (aporia) को जन्म देता है। देरिदा का मानना है कि एक सत्य और शुद्ध उपहार किसी तरह के प्रतिकार की अपेक्षा कर ही नहीँ सकता। किसी भी उपहार का अभिज्ञान मात्र ही व्यक्ति को ऋणी बना देता है और उसे उस उपहार रूपी ऋण से उऋण होने के लिये मानसिक रूप से विवश कर देता है।
अस्तित्ववादी और विखण्डनवादी दृष्टियोँ मेँ अनचाहे ऋण से बचाव ही श्रेयस्कर समझा गया है।
[६] भारतीय दर्शन मेँ धर्म का द्विदलीय स्वरूप – कर्त्तव्य तथा ऋण
भारतीय परम्परा मेँ धर्म की अवधारणा मेँ लौकिक (नैतिक) और परमार्थिक दोनोँ को एकसाथ साध लेने की व्यवस्था की गयी है जो कि अन्ततः पुरुषार्थ मेँ पूरी तरह व्याख्यायित होती है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का पारस्परिक सन्तुलन और निर्विरोध होना जीवन की जटिलताओँ को समग्रता मेँ देखने का मौलिक प्रयास है।
पुरुषार्थ-व्यवस्था मेँ धर्म के दो आरूप हो जाते हैँ:—
१. कर्त्तव्य के अर्थ मेँ
२. ऋण के अर्थ मेँ।
इसका विवेचन हम नृसिंह पुराण मेँ प्रह्लाद और उसके पिता हिरण्यकशिपु के सन्दर्भ मेँ देखते हैँ जहाँ पिता के दुराचारी और अत्याचारी होने के बाद भी प्रह्लाद अपने पिता को पिता होने के कारण आदरणीय मानता है। हालाँकि भक्त प्रह्लाद अपने पिता के विकर्मोँ और अत्याचारोँ का विरोध भी करता है तथा अधर्म पर नहीँ चलता है। अतः धर्मसूत्रोँ मेँ कर्त्तव्य का विधान है, जोकि विना किसी फल की आशा से किया जाना चाहिये। माता-पिता का कर्त्तव्य है कि वह अपने सन्तति का पालन-पोषण करे, भले ही वे उसका प्रतिकार करेँ या न करेँ। उसी तरह सन्तानोँ का धर्म है कि अपने गुरुजनोँ और माता-पिता की सेवा करेँ भले ही उन्होँने पूर्व मेँ उनकी देखभाल की हो या ना की हो। एक प्रश्न यह भी उठ सकता है कि माता-पिता भी सामाजिक व्यवस्था के अभिकर्मक (एजेण्ट) ही तो हैँ। यहाँ ध्यान देना चाहिये कि माता-पिता ‘प्रतिस्थापनीय’ नहीँ हैँ। यह और बात है कि आधुनिक प्राथमिक शिक्षण व्यवस्था मेँ शिक्षक/अध्यापकोँ को प्रतिस्थापनीय बनाने की व्यवस्था की है, जिसे मैँ मूलगामी सामाजिक दोष समझता हूँ।
मनुष्य पैदा होते के साथ ही ऋणी है। यह तीन मूल ऋण, पितृ ऋण, गुरुऋण और देवऋण हैँ। इसके अतिरिक्त महाभारत मेँ पाँच महायज्ञ (भूतयज्ञ, नृयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ (गुरुयज्ञ) बताये गये हैँ जोकि गृहस्थ के कर्त्तव्य (धर्म) हैँ।
माता-पिता, गुरु/ऋषि, देव, भूत-पशु, मानव आदि द्वारा किये गये कल्याणकारी कर्म ऋण मेँ गिने जाते हैँ। भारतीय दर्शन मेँ ऋण से उऋण होने की व्यवस्था है, और उसका मौलिक स्वरूप पुरोगामी विनिमयात्मक न होकर अलक्षित अग्रगामी है। जैसे माता-पिता द्वारा जन्म दिये जाने का ऋण हम उनकी सेवा मात्र कर के नहीँ उऋण नहीँ हो सकते अपितु सन्तान उत्पत्ति तथा उसे सन्मार्ग पर चला करके ही हो सकते हैँ। ऋण से उऋण होने का क्रम पारस्परिक तथा व्यक्तिगत मात्र न होकर, अग्रगामी तथा प्रकृति संचालक होने का विधान किया गया है।
सुग्रीव द्वारा राम को दिये वचन की अनदेखी करना कृतघ्नता है। वहीँ उपकृत कर्ण का सभा मेँ दुर्योधन द्वारा चीर-हरण का समर्थन घोर पाप है। बहुधा लौकिक आचरण मेँ हम इसी कृतज्ञता को लादना चाहते हैँ और अनर्थ कर बैठते हैँ। यदि उपकृत अपने हित मेँ उपकारी द्वारा किये गये कृत्य का संवहन भी करता है तो उसका प्रतिकार भी धर्मसम्मत ही होना चाहिये, अधर्मरूप नहीँ।
कृतज्ञता का संवहन ही ऋण की मूलगामी नैतिक अवधारणा है। ऋण का अनादि स्वरूप सनातन धर्म की आत्मा तथा कर्मफल की मान्यताओँ पर आधारित है। लौकिक व्यवहार के सम्बन्ध मेँ हमारी आपत्ति यह है कि ऋण से उऋण होने का तरीका पारस्परिक और व्यक्तिनिष्ठ हो, यह आवश्यक नहीँ है। उऋण होना पुरोगामी या अग्रगामी हो सकता है किन्तु उसका किसी धर्मानुकूल आचरण मेँ बाधा डालना, उसके कारण निषिद्ध कर्म या विकर्म और अपराध की श्रेणी मेँ ही आयेगा। अतएव कर्ण का दुर्योधन के प्रति उऋण होने का उपक्रम गर्हित है। वह कभी श्रेयस्कर आचरण का मानदण्ड नहीँ बन सकता। इसी तरह अश्वत्थामा द्वारा पाण्डवपुत्रोँ की रात्रि मेँ हत्या करके प्रतिशोध लेने का कर्म उसे पितृऋण या दुर्योधन के मैत्री के ऋण से उऋण नहीँ कर सकता।
[६.१] कृतज्ञता की अवैध अवधारणा का प्रतिफलन – राजकर्मियोँ मेँ उत्कोच (घूस) की अपेक्षा
यदि हर व्यवहार (जैसे कि खरीद-बिक्री, लेन-देन) पर हम कृतज्ञता की अवधारणा लादना चाहेँ तो निश्चय ही यह उत्कोच (घूस, रिश्वत) आदि का अप्रत्यक्ष समर्थन करते हैँ।
उत्कोच की अपेक्षा दो प्रकार के होती है। पहला, जहाँ राजकर्मी या न्यायाधिकारी अनुचित को उचित करने के बदले धन की माँग करते हैँ। दूसरा, जहाँ अधिकारीगण केवल अपना काम करने भर के लिये भी पैसे की माँग रखते हैँ, जैसा कि भारतवर्ष के सरकारी दफ्तरोँ मेँ आसानी से देखा जाता है। यदि धन ना दिया जाय तो न्यायसंगत कार्य भी अधर मेँ लटका दिया जाता है।
यदि कोई उत्कोच देकर किसी से अपना काम करवाना चाहे तो वह उपहार की आड़ मेँ उत्कोच की पेशकश हुई, उत्कोच की अपेक्षा नहीँ।
उपरोक्त दूसरे प्रकार की घूस के लिये या कहेँ अयाचित उपहार स्वरूप उत्कोच को लेकर प्रसिद्ध दार्शनिक व न्यायाधीश फ्रांसिस बेकन को जेल जाना पड़ा, जबकि उन्होँने आरोपित कुल २३ मामलोँ मेँ दो याचिकाओँ मेँ रिश्वत देने वाले के विरुद्ध निर्णय दिया था। अपने बचाव मेँ उनका कहना था कि उपहार लेना एक स्वीकृत परम्परा थी और इस तरह के उपहारोँ ने उनके निर्णय को कभी प्रभावित नहीँ किया, किन्तु उन्होँने अपने व्यवहार के लिये खेद प्रकट किया। अन्त मेँ उन्हेँ जेल मेँ डाल कर और उनकी उपाधियाँ और विशिष्ट अधिकार छीनकर दण्डित किया गया। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के रॉबर्ट क्लाइव ने बङ्गाल के मीर जाफर से मिले धन के लिये कभी खेद तक प्रकट नहीँ किया।
उत्कोच के समर्थन मेँ यह दलील दी जाती है कि कार्य करने के लिये जो वेतन मिलता है उससे आजीविका चलती है, अतः वह अधिकार है और प्राप्य है। इसके अतिरिक्त यदि कोई कार्य किया जा रहा है तो वह अनुकम्पा है, दया है, कृपा है, जिसका प्रतिदान कृतज्ञताबोध के संवहन तथा भविष्य मेँ उसके उऋण होने से ही सम्भव हो सकता है।
कृतज्ञताबोध विनिमयात्मक वस्तु नहीँ है, वह किसी द्रव्य से पूर्ति करने का सिद्धान्त सामाजिक सुविधा के लिये आम समझ मात्र है। अतः पूर्वोक्त आचरण मेँ माँगा गया सुविधा शुल्क भ्रष्ट और निन्दनीय है।
दार्शनिक फ्रांसिस बेकन की स्थिति पर अपोहनात्मक विचार करना चाहिये किन्तु उस घटना के विषय मेँ हमारे पास पर्याप्त प्रमाण नहीँ हैँ कि उनपर लगे आरोप कितने सत्य थे। उस समय उनकी मनःस्थिति क्या थी और समसामयिक स्थिति क्या थी? बहुधा लौकिक घटनाओँ मेँ पूरी परिस्थिति का ज्ञान नहीँ होने के कारण वे दार्शनिक रूप विचारणीय नहीँ होती, बल्कि वहाँ पर हम अटकलेँ मात्र लगाकर अपना निर्णय सुना सकते हैँ। अतएव भारतीय चिन्तन मेँ महाकाव्योँ, शास्त्रोँ और इतिहास को सन्दर्भित करके विमर्श किया जाता है, जहाँ हरेक पक्ष शास्त्रीय ढंग से सुविचारित होता है। इस सन्दर्भ मेँ पूर्व मेँ उठाया प्रश्न हमेँ स्पष्ट रूप से विचारना चाहिये कि क्या अयाचित और अवाञ्छित कृत्य की स्वीकृति किन्तु प्रशंसा का अभाव, किसी को कृतघ्न बनाती है या कृतज्ञ बनाती है?
फ्रांसिस बेकन के विरोध मेँ कहा जा सकता है कि ‘अयाचित’ और ‘अवाञ्छित’ धनराशि/उपहार की ‘स्वीकार्यता’ अधर्म है। मनुस्मृति के अनुसार अर्थशौच सभी शौचोँ मेँ सर्वश्रेष्ठ है, जहाँ शौच धर्म का एक अनिवार्य मूल्य है।
सर्वेषां एव शौचानां अर्थशौचं परं स्मृतम्।
योऽर्थे शुचिर्हि स शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः॥
— मनुस्मृति ५।२०६
सभी प्रकार की पवित्रताओं (शुद्धियों) में धन-सम्बन्धी शुद्धि (अर्थशौच) को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। जो व्यक्ति धन के मामले में शुद्ध (ईमानदार) है, वास्तव में वही पवित्र है, न कि केवल मिट्टी और जल से शरीर साफ करने वाला।
इस पर बेकन का कहना होगा कि उन्होँने अपने समय की रीत के अनुसार उपहार/धनराशि स्वीकार की तो अर्थ के अशौच का प्रश्न कहाँ उठता है? इसके प्रत्युत्तर मेँ कहा जा सकता है कि बेकन का व्यवहार पारदर्शी नहीँ है और मानक नहीँ है। यह अनुकरणीय नहीँ हो सकता, अतः इस संदिग्धता की उपस्थिति के कारण उक्त कर्म को अपवित्र कहा जा रहा है।
कम से कम कृतज्ञता और कृतघ्नता के केन्द्र मेँ जो कर्म है, उसका धर्म और अधर्म होने का विचार आवश्यक है। कृतज्ञ व्यक्ति द्वारा उऋण होने के लिये किये जा रहे प्रतिकर्म का भी धर्म और अधर्म विचार करना चाहिये। शुद्धाद्वैत मेँ वल्लभाचार्य ने अपने ग्रन्थ ‘कृष्णाश्रय’ मेँ धर्म के छह घटक बताते हैँ: — देश, काल, द्रव्य, कर्ता, कर्म तथा मन्त्र। अतः कुछ मायनोँ मेँ कृतज्ञता और कृतघ्नता परिस्थिति सापेक्ष है।
[७] कवि कर्म मेँ कृतज्ञता
बहुत से सम्पादकोँ, प्रकाशकोँ और आलोचकोँ का मानना है कि किसी पदज्ञ (यहाँ कवि या लेखक शब्द का प्रयोग करने की अपेक्षा यह ठीक लगता है क्योँकि संस्कृत परम्परा मेँ कवि का अर्थ क्रान्तदर्शी होता है और जिस अर्थ मेँ हम आज कवि कहते हैँ उसके लिये दीघनिकाय मेँ ‘पदज्ञ’ शब्द व्यवहृत किया गया है) को प्रकाशित करके वे पदज्ञ को उपकृत कर रहे हैँ।
पहला प्रश्न है कि क्या हम यह मानने को प्रस्तुत हैँ कि हम अपने नाई, अपने धोबी, सब्जी वाले, फेरी वाले, चाट-पकौड़ी बेचने वाले, सभी प्रकार के विनम्र व्यक्तियोँ से लेकर अशालीन व चोर-उच्चकोँ तक के कृतज्ञ हैं? ऐसे मेँ यह सहज उत्तर होगा कि नहीँ। हमने अर्थव्यवस्था के अनुसार उनके कर्म के मूल्य का उचित भुगतान किया है, पारिश्रमिक के रूप मेँ। फिर भी कुछ दोस्तोयेवस्की के शिष्य यह चीख-पुकार करेँगे कि हरेक व्यक्ति सभी के प्रति सबकुछ के लिये तथा सम्पूर्णता मेँ उत्तरदायी है। किन्तु यह चिन्तन परमार्थिक चिन्तन ही है, लौकिक चिन्तन नहीँ। यदि हम अर्थव्यवस्था की मूल अवधारणा और मुद्रा पर ही प्रश्न चिह्न लगा कर कहेँ कि यह व्यवहार मात्र है, तात्त्विकता नहीँ, उस स्थिति मेँ हम कुल मिला कर फिर से पुरुषार्थ चतुष्ट्य पर पहुँचेँगे कि जहाँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का पारस्परिक सन्तुलन ही अभीष्ट है।
सम्पादक, प्रकाशक और आलोचक का पदज्ञ से सम्बन्ध परस्परता का है। इसमेँ किसी तरह का अनुग्रह या अनुकम्पा सम्पादकीय या प्रकाशकीय या आलोचकीय विचलन या नैतिक स्खलन ही है कि किसी अयोग्य को प्रतिष्ठा दी गयी।
कवि कर्म का फल क्या है?
यहाँ मैँ बारहवीँ सदी के यशस्वी आचार्य मम्मट को उद्धृत करना चाहूँगा कि काव्य का प्रयोजन यश, धन, व्यवहार ज्ञान, अकल्याण का नाश, शीघ्र परनिर्वृति (परा-आनन्द) और कान्तासम्मित उपदेश है। (कान्ता से ‘प्रेयसी’ अभिधेय है)
काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।
सद्य: परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे॥
— काव्यप्रकाश १.२
यह तो कविकर्म (=काव्य) का प्रयोजन है, जो कि फल मेँ रूपान्तरित हो जाये तो सफल होगा, अन्यथा निष्फल ही है। लौकिक अर्थ मेँ कवि-कर्म से पदज्ञ को क्या फल मिल रहा है? वह यश और धन के अतिरिक्त कुछ है? सम्भवतः नहीँ। पदज्ञ केवल कर्मफल मेँ केवल इन्हीँ दो का भोग कर सकता है, पर वह कब होगा कहा नहीँ जा सकता।
प्रयोजन का स्वरूप कर्ता की इच्छा का मूर्तन व्यापार मात्र है। किन्तु काव्य का प्रयोजन कहने से तात्पर्य सामाजिक दृष्टि से किसी उपक्रम के ऐच्छिक स्वरूप का मूर्तन व्यापार है, जहाँ व्यक्तित्व का विगलन होता है और समाज मेँ प्रतिष्ठित होता है। यदि ऐसा ना हो तो समाज या काल कभी भी किसी काव्य की कसौटी नहीँ बन सकता, जो कि अनिवार्य रूप से होता ही है।
यदि हम कालिदास, बाणभट्ट, भवभूति, तुलसीदास आदि कवियोँ के काव्य से परा-आनन्द, व्यवहार ज्ञान, शिवेतरक्षय और कान्तासम्मित उपदेश पाते हैँ तो हम उनके ऋणी हैँ। इस गुरु/ऋषि ऋण से उऋण होने का उपाय हमेँ ढूँढना होगा। क्या वह कविकर्म से कुछ भिन्न हो सकता है?
साहित्य का समसामयिक तन्त्र ना किसी को अकलुषित यश दे सकता है, ना ही शुचितापूर्ण धन। किसी पदज्ञ को साहित्यिक तन्त्र अधिक से अधिक प्रोत्साहन मात्र दे सकता है। प्रोत्साहन जैसे कर्म से उऋण होना कैसे है, यह विचारणीय है। निश्चय ही यह कृतज्ञता के संवहन का क्षेत्र नहीँ है। यह सामाजिक यज्ञ है, जो एक तरह से ऋषि ऋण या देव ऋण से उऋण होने का विधान है।
[८] कृतज्ञता से सम्बन्धित जीवन के चार आयाम
वस्तुतः कृतज्ञता ऐसा प्रस्थान बिन्दु है जिसके विभिन्न स्तरोँ से जीवन दृष्टि के चार आयाम निकलते हैँ: —
१. आध्यात्मिक – कृत का तात्त्विक संज्ञान – दार्शनिक रूप से यह शुद्ध अभेद दृष्टि का सूचक है। अनन्त देश-काल को पारलौकिकता का प्राकट्य मान कर कृतज्ञ जीवन जीना। यहाँ समस्त कृत्योँ का कारक पारलौकिक सत्ता का संज्ञान मात्र आध्यात्मिकता को प्रशस्त करता है, जहाँ प्रत्येक उपकार भी ईश्वर के द्वारा प्रेरित है। किन्तु यह अवश्य ध्यान देना चाहिये कि एक शुद्ध धार्मिक/आध्यात्मिक मनुष्य पारलौकिकता की आड़ मेँ कभी उपकारी का निषेध नहीँ करता।
२. सामाजिक – कृत की अभिस्वीकृति का प्राधान्य – लेन-देन, उपहार और व्यवहार की सीमा को ध्यान मेँ रखते हुए कृतज्ञता के सामाजिक स्वरूप के बन्धन मेँ जीना। यहाँ कृत की अपेक्षा या कृत्य का संज्ञान अनुपस्थित है, या कहेँ अभीष्ट नहीँ है क्योँकि बहुधा उपहार के लेन-दिन की शृङ्खला विना किसी कारण के प्रारम्भ होती है। परन्तु लेन-देन की अभिस्वीकृति और कृत्य की प्रशंसा/आभार सामाजिक व्यवहार का अनिवार्य घटक है। भारतीय दृष्टि से यह भेदाभेद दृष्टि है।
३. अर्थव्यवस्था – प्रशंसा की अनुपस्थिति/ ऋणात्मकता का निषेध – यहाँ पहले स्तर पर अपेक्षित कृत को कर्म के व्यवहार रूप मेँ संज्ञान लेना आवश्यक है, क्योँकि अपेक्षित तथा समुदाय स्वीकृत पारस्परिक कर्म ही व्यवहार कहलाता है। दूसरे स्तर पर कर्म का प्रतिकर्म मुद्रा/धन मानकर अभिस्वीकृति देना, यह कृतज्ञता के सामाजिक व्यवहार का आर्थिक स्वरूप है। निर्विवाद रूप से यहाँ कृतज्ञता का तीसरा घटक, प्रशंसा/आभार अनुपस्थित होता है। भारतीय विचारसरणी मेँ यह पूर्ण रूप से भेदात्मक दृष्टि है, जहाँ स्वयं और अन्य का पूर्ण विभाजन व्यवहार सम्मत है।
४. नैतिक आचरण – कृतज्ञता के तीनोँ स्तर (संज्ञान, अभिस्वीकृति और प्रशंसा/आभार प्रकट करना) की उपस्थिति – कृतज्ञता के सम्यक अनुबोध के बाद विना किसी पूर्वकारक की बाध्यता से अपना कर्तव्य करना तथा धर्मपूर्वक विधि से ऋण से उऋण होना। मैँ समझता हूँ यही कृतज्ञता का मौलिक स्वरूप है, जो भेदाभद दृष्टि से सञ्चालित है। कृतज्ञता की शेष तीन अवधारणाएँ का बोलचाल की भाषा मेँ उसके मिलते-जुलते स्वरूप हैँ, लौकिक व्यवहार मेँ जिसके अशुद्ध प्रयोग से बचा जा सकता है।
(ज्येष्ठ शुक्ल नवमी, संवत् २०८३)

