तर्कवादी कबीर को पुनः खोजना होगा 

कल इंडियन एक्सप्रेस में  डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में एसोसिएट प्रोफेसर   व DAPSA ( दलित आदिवासी प्रोफेसर्स और स्कॉलर्स संगठन) की संस्थापक अदिति नारायणी पासवान का एक लेख प्रकाशित हुआ जो कबीर के संबंध में था। जिसमें उन्होंने कबीर को फिर से खोजने के वकालत की है, खासतौर से ऐसे समय में जब भारतीय ज्ञान परंपरा को लेकर  अकादमिक जगत में  तीखी बहस चल रही है। इसका अनुवाद किया है दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी महेंद्र सिंह ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर 

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हाल ही में भारतीय ज्ञान परंपरा में फिर से दिलचस्पी बढ़ी है। जब कोई भारतीय ज्ञान परंपरा की बात करता है तो अचानक संस्कृत के शास्त्रीय (क्लासिकल) ग्रंथों का ख्याल आता है ।  इन परंपराओं के महत्व से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन भारतीय ज्ञान परंपरा कि हमारी समझ में उस साहित्य को भी शामिल होना चाहिए जिसे हाशिए पर पड़े समुदायों के लोगों द्वारा लिखा गया है।  अन्यथा हम भारतीय दर्शन कि उस शाखा को समझने का अवसर खो देंगे जो आनुभविक  और कहीं अधिक जन-केंद्रित तथा लोकतांत्रिक है। इस शाखा का निर्माण अकादमिक अभिजात द्वारा नहीं बल्कि 15वीं सदी  के वाराणसी के कबीर दास ने किया था  जो जुलाहा नामक मेहनतकश समुदाय से आते थे।

भारत के बौद्धिक इतिहास में एक प्रभावशाली शक्ति रखने वाले कबीर ने पूर्ण अद्वैतवाद को प्राचीन योग की व्यावहारिकता के साथ एकाकार किया। उन्होंने निर्गुण भक्ति के द्वारा ज्ञान की खोज को लोकतांत्रिक बनाया। उनकी जिंदगी और साहित्य इस बात के अकाट्य प्रमाण हैं कि भारतीय ज्ञान परंपरा को रोज़मर्रा की जिंदगी में कैसे लागू किया जा सकता है।

भारतीय चिंतन में कबीर का योगदान प्रमाण के प्रति उनका दृष्टिकोण था। प्रमाण वैध सबूतों और प्राधिकार की एक दार्शनिक अवधारणा है। प्राचीन काल से ही पुरातनपंथी शब्द-प्रमाण से चिपके रहे थे जो शास्त्रों की प्रमाणिकता और उनमें महारत हासिल करने को ही सत्य तक पहुँचने का एकमात्र ज़रिया मानते थे।कबीर ने इस बाधा को शास्त्रीय अनुपालन की जगह अनुभूति को महत्व देकर तोड़ दिया था।इसने ज्ञान की समझ के धरातल पर एक युगांतरकारी परिवर्तन का सूत्रपात किया।कबीर के लिए ज्ञान न तो जन्म से मिलने वाली कोई विरासत थी, न ही कोई ऐसी चीज़ जिसे रटा जाए या किसी खास   समुदाय तक सीमित रखा जाए।यह एक ऐसी सच्चाई थी जिसे सक्रिय रूप से आज़माया जाना था, जिया जाना था और सभी के लिए सुलभ बनाया जाना था।

विद्वान पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपनी पुस्तक ‘अकथ कहानी प्रेम की’ में यह प्रतिपादित किया है कि कबीर का ‘जुलाहा’ रूप एक सुदृढ़ ‘देशज आधुनिकता’  और ‘आध्यात्मिक सार्वभौमिकता’  के संगम का प्रतिनिधित्व करता है। कबीर एक  क्रियाशील और चिंतनशील सामाजिक चेतना  की आवाज़ का प्रतिनिधित्व करते हैं। कबीर की आवाज़ अनोखी है: वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता देते हैं, और खोखले संस्थागत लेबलों (धार्मिक या सामाजिक पहचानों) के ऊपर नैतिकता को स्थान देते हैं।

कबीर का एक प्रसिद्ध पद है- झीनी झीनी बीनी चदरिया ,

काहे कै ताना काहे कै भरनी,

कौन तार से बीनी चदरिया।

इन पंक्तियों में, वे शारीरिक श्रम को ब्रह्मांडीय (या आध्यात्मिक) जिज्ञासा के एक पवित्र कार्य में बदल देते हैं। यह पद उपनिषदों के पूर्ण अद्वैतवाद तथा नाथ संप्रदाय व हठयोग के व्यवहारिक, शारीरिक प्रशिक्षण का  संगम है।

मानवता के प्रति कबीर का लोकतांत्रिक दृष्टिकोण उनके इस विचार में दिखता है कि लिंग और पंथ से परे प्रत्येक मनुष्य की शारीरिक और आंतरिक संरचना समान है। इस सत्य को लोगों तक पहुंचाने के लिए उन्होंने सधुककडी को चुना। साधुकड़ी क्षेत्रीय बोलियों का अनगढ़ और जीवंत मिश्रण है। कबीर लोगों को चकित करने तथा उन्हें तंद्रा से जगाने के लिए उलटबांसी का भी अक्सर प्रयोग करते थे। उलटबांसी उल्टे या विरोधाभासी पद होते थे। माया की अवधारणात्मक कोटि लगातार उनके निशाने पर रही ‌। माया को वे इंसानी समझ को विकृत करने वाला एक बड़ा भ्रम मानते थे।

ठोस व्यावहारिक अनुभव और आमूल-चूल समानता के प्रति जुनून का कबीर का यह संयोजन ही यह स्पष्ट करता है कि क्यों आधुनिक सुधारकों, विशेष रूप से बी.आर. आंबेडकर ने उन्हें अपने प्राथमिक बौद्धिक गुरुओं में से एक माना। आंबेडकर ने यह स्वीकार किया कि भारतीय परंपरा के भीतर एक गहरे तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण  को प्रमुखता से सामने लाने में कबीर की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

कबीर की रचनाओं के मर्म को समझने के बाद, यह बोध होता है कि सच्चा ज्ञान एक वैश्विक ताना-बाना  है, और इसकी क्षमता इस बात में निहित है कि यह एक गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करने के लिए तात्विक समानता, भोगे हुए यथार्थ (जीवंत सत्यों) और सभी जीवों के प्रति आमूल-चूल समानुभूति को कितनी खूबी से एक सूत्र में बांधता है।

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