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  • मनोहर श्याम जोशी के अप्रकाशित उपन्यास का अंश

    प्रसिद्ध लेखक मनोहर श्याम जोशी अगर जीवित होते तो आज 80 साल के हो जाते. 9 अगस्त 1933 को पैदा हुए इस लेखक ने जिस विधा में भी लेखन में हाथ आजमाया उसमें अपनी विशिष्ट पहचान बनाई. आज उनके जन्मदिन के मौके पर जानकी पुल उनकी स्मृति को प्रणाम करता है और आपके लिए उनके पहले उपन्यास ‘किस्सा पौने चार यार’ का एक अंश प्रस्तुत कर रहा है. जोशी जी ने 1960 के दशक इस उपन्यास को लिखना शुरू किया था लेकिन दुर्भाग्य से यह अधूरा ही रह गया. उसका एक  रोचक अंश- मॉडरेटर.
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    किस्सा तीसरा यार

    नायक नंबर तीन कुछ इस कदर गुम्मे और गमखोर शख्स हुए की उनसे बयान ले पाना लेखक को कतई नामुमकिन मालूम होने लगा. कोशिश अपनी तरफ से उसेने काफी की. पत्रकारिता और मुस्कान मित्रता का हर नुस्खा टोटका अपनाया मगर अफ़सोस. रोज सुबह शाम उसने एक नेक पड़ोसी की तरह दुआ-सलाम करना शुरू किया तो वह कुछ इस तरह उसकी और देखने लगा मानो वह इंसान नहीं, कोई अदना-सा कीड़ा-मकोड़ा है. फिर नमस्कार-वमस्कार छोड़कर लेखक ने अपनी पंजाबी आजमाई- “की हाल ए?” जवाब में उन्होंने अंग्रेज वाले तेवर दिखाए, “मैंनू पूछ्या जै?” अब आप ही बताइए लेखक आगे क्या कहता? यह की जी हाँ आप से ही हालचाल पूछ रहा हूँ. बेसाख्ता उनके मुंह से यही निकला—तो पूछा कीजिये.

    खैर साहब नया साहित्य कुछ कहता रहे, संयोग सदा बलवान. गोया तीसरे यार के किस्से के मारे लेखक की गाड़ी अटकी हुई थी की तभी उसका कॉलेज के दिनों का एक पुराना साथी और भारत की अक मशहूर उपभोक्ता सामग्री का सेल्स एक्जीक्यूटिव मन्मथ मिश्र काम के सिलसिले में दिल्ली आ पहुंचा. मन्मथ को ऊंचे जाने में महारत पहले से ही थी और अब तो कुछ न पूछिए. गरज यह कि दिल्ली के सभी प्रमुख व्यवसायियों, अधिकारीयों और नेताओं के बेटे उसके हमनिवाले बने हुए थे. इस मंडली में लेखक को मन्मथ ने बहैसियत विदूषक शामिल कर दिया. गोया जब और जहाँ बोरियत बढती नजर आये लेखक की ओर से फरमाइशी फोहश चुटकुला हाजिर. लेखक की दूसरी ड्यूटी यह कि अजीब ढंग से अंग्रेजी बोलने वाली बालिकाओं के यहाँ अंग्रेजी में किंचित कमजोर बालकों की नुमाइंदगी करें. लिहाजा जब किसी नाइट क्लब या दुसरे अड्डे या, हाय जैसी अंग्रेजी बोलने वाली कोई नई ‘चीज’ आती, लेखक उतनी ही हाय-वाय करके उसे आशिक मंडली के पास लिवा लाता और बातचीत करवा देता. ये आशिक बच्चे अमूमन इन आंग्लवत कन्याओं से नाली के नीर में बहती भाखा बोलते थे. गोरी मेम से बाजारू पंजाबी या हिंदी में गन्दी-गन्दी बातें कर सकना इनके लिए चहेता शगल ही नहीं, देश की आजादी का अन्यतम सबूत भी था. पैसा कुछ भी बोले उसमें मधुर खनक ही सुनाई पड़ती है. लिहाजा गोरी-गोरी बांकी छोरी मुस्कुराती ही रहतीं.

    एक दिन वीनस का फ्लोर शो देखा जा रहा था, जहाँ हाल ही में एक ताजा ऑस्ट्रेलियाई सनसनी आयात की गई थी. यह गोरी ‘ओइन्क-टोइंक, ओई, फोई माई अंग्रेजी बोलती थी. बमुश्किल उससे किसी तरह सौदे की बात की जा रही थी की तभी बालक गुलाबमल ने अपने चचाजाद भाई प्रेमराम से पंजाबी में कहा की इस महिला विशेष की आँखों का पानी पिलाहट लिए है और इसकी आँखों के नीचे कालिमा विशेष परिलक्षित होती है. अतएव इससे कैसा भी संसर्ग स्वास्थ्य की दृष्टि से कुछ चिन्ताप्रद हो सकता है. क्यों न उठकर घर चला जाए? इसकी प्रतिक्रिया में बालक प्रेमराम ने केवल इतना कहना पर्याप्त समझा कि घर वे जाएँ जो अपनी बीवी से डरने लगे हों. अनंतर सनसनी के ब्लाउज पर से एक सर्वथा कल्पनाजन्य तिनका झाड़ते हुए प्रेमराज ने यह स्थापना भी की कि बढ़िया माल को टकिया बीमारी का होना असंभव प्राय है. इस पर मन्मथ ने वातावरण कम बोझिल करने के लिए नींबू नुस्खा आजमाने की सलाह दी. एक जोरदार ठहाका लगा, जिसमें ऑस्ट्रेलियाई सनसनी कुछ न समझते हुए भी शामिल हुई. किन्तु गुलाबमल बहुत ही नाटकीय और निर्णायक ढंग से उठे और एक हरा नोट सनसनी के हवाले करके बोले, “मोर टॉक टुमॉरो”, सनसनी बोली, “ओके हन्नी”.

    बाहर आकर गुलाब मॉल ने जिज्ञासा की ‘की कैंदी सी?’ लेखक ने बताया, ‘ वह कहती थी कि ठीक है. गुलाबमल बोले, “ठीक किधर से? समझ नहीं आता इन सड़ीया गलिया गोरियां मैमाँ में रखा क्या है जो प्रेमराम इन्हें ही सूंघता फिरता है?

    मन्मथ ने, जो कॉलेज में युवा नेता हुआ करता था, ‘स्वदेशी जिंदाबाद’ का नारा बुलंद किया और हाल ही में खुले एक हाई क्लास देसी अड्डे पर चलने का सुझाव दिया. नया अड्डा एक रेस्तरां था. यहाँ-वहां कुछ टेबलों पर अकेली-दुकेली बैठी हुई लड़कियां कोल्ड ड्रिंक को शदार्लियों से गरमा रही थीं. मन्मथ ने बैरे से कहा ‘तीसरा टेबल’. बैरे ने तीसरी रेबल वाली से कुछ कहा और वह बड़ी अदा से हमारी टेबल की तरफ बढती नजर आई.

    गुलाब राम को देखकर वह कुछ ठिठकी और गुलाब राम ने पूर्व-परिचय की सुचना देते हुए मंडली का ज्ञानवर्धन किया, ‘कि बालिका विशेष एक हमाल गिराने वाली दाई की कन्या है और दमखम की दृष्टि से न्यूनतम मानकों से भी न्यून ठहरती है.

    टेबल के करीब आकर धातृ दुहिता कुकी, हैलो दियार्स व्हाट ए सरप्राइज़. व्हेन डीड यु कम टू टाउन?’ यह और इसके पर्यायवाची वाक्य, ऐसे अड्डों में शरीफ ग्राहकों और नैतिकता के मारे कानूनी कारिंदों के आश्वासन के लिए कहे जाते हैं. लिहाजा मंडली ने इस चहक का स्वागत उबासियों से किया. धातृ दुहिता ने ‘शॉर्ट टाइम और होल नाइट की दरें बताईं और गुलाब मल की और देखते हुए उसने घोषणा की कि अगर यह साहब भी होंगे तो डेढ़ सौ क्या डेढ़ लाख पर भी होल नाइट नहीं जाउंगी. पिछले अनुभव के आधार पर उसने इन साहब की कुछ अन्तरंग आकांक्षाओं को नितांत आपत्तिजनक ठहराया. उसने सुझाव दिया की इन आकांक्षाओं की पूर्ती के लिए ये साहब कोई तीतर बटेर देखें.

    इस टिप्पणी से प्रेमराम प्रसन्न हुए, गुलाबमल गुस्सा.

    प्रेम राम ने कहा की कुछ कहिये लड़की जानदार है. गुलाब मॉल ने कहा कि जानवर है.

    धातृ दुहिता ने निवेदन किया की हुजुर गुस्ताखी मुआफ जानवर तो आप हैं.

    गुलाब मल ने कहां की जवाब देने वाली लड़की हमें पसंद नहीं. प्रेम राम ने कहा की हमें तो वही भाती है जो जवाब दे- हर तरह से.

    संक्षेप में यह की प्रेम राम धातृ कन्या को लेकर चले गए और गुलाब मल ने उनकी माँ यानी अपनी ताई से और भी नजदीकी रिश्ता कायम किया. मन्मथ ने स्थिति सँभालने के लिए जनपथ जाकर उस राह चलती को ढूंडने का प्रस्ताव किया जिसका लक्ष्य जनता की सेवा रहा है और जो सहकारिता की भावना से ओत-प्रोत है. किन्तु गुलाबमल ने विश्वस्त सूत्रों के हवाले से यह सूचना दी कि सहकारिता की यह साक्षात् मूर्ति इन दिनों प्रशंसकों की एक अन्य मंडली के साथ कश्मीर के दौरे पर गई हुई है. निराशा में डूबे हुए स्वर में उन्होंने कहा, ‘घर चलो बदमाशों, एत्थे कुछ नै साड्डे काम दा.’ मन्मथ ने उनके गिरते हुए अहम को खपच्ची लगाना आवश्यक माना और मैनेजर को बुलवाकर बालिकाओं में आम तौर पर और टेबुल नंबर तीन में ख़ास तौर पर लक्ष्य की गई सहयोग भावना की न्यूनता पर ‘मौखिक’ विरोध दर्ज कराया.

    मैनेजर महोदय ने, जो मित्रवत हम लोगों के साथ एक सीट खींचकर बैठ गया था, कॉलेज में पढ़ी-लिखी लड़कियों के नखरों की कड़े शब्दों में निंदा की और स्वयं को उनके आचरण पर लज्जित बताते हुए राय साहब उर्फ़ गुलाब मल जैसे नारी-सौंदर्य के मर्मज्ञ और काम-क्रीड़ा के विशेषज्ञ से क्षमा याचना की. उन्होंने कहा कि राय साहब की सेवा में एक घरेलू लगभग सीलबंद और निहायत ही समझदार चीज प्रस्तुत की जा सकती है, जो बंगवासिनी है.

    जो अब तक लज्जा और संकोच से झुका हुआ था लेखक का वह सिर उठा. लेखक ने मुस्कुरा कर पूछा, ‘बंगालन, कौन सी बंगालन?’

    मैनेजर उर्फ़ नायक नंबर तीन के चेहरे का जन-संपर्क पक्ष आधे सेकेण्ड के लिए विचलित-सा हो गया, लेकिन फ़ौरन स्वस्थ होकर उन्होंने पुनः गुलाबमल को संबोधित कर कहा, ‘है जी, बंगालन, बिलकुल नवा माल है जी.’

    गुलाबमल ने जिज्ञासा की कि क्या यह वही माल है जो उन्होंने उस दिन उन्होंने जन्तर-मंतर में मैनेजर के साथ देखा था? मैनेजर कुछ हिचके और फिर उन्होंने तपाक से ‘हांजी’ भर दी. गुलाब मल ने जानना चाहा कि क्या यह बंग कथा विशेष तत्काल सेवा भाव में लीन कराई जा सकती है. इस पर मैनेजर ने कहा की कतिपय अपरिहार्य कारणों से ऐसा संभव नहीं होगा किन्तु कल निश्चय ही वह राय साहब को अपने फ़्लैट विशेष में रात आठ बजे मिलेगी.

    गुलाब मल जी को घर पर छोड़कर जब हम लौट रहे थे तब मैंने मन्मथ से बताया कि मैनेजर साहब मेरे पड़ोस में अक्सर आते हैं और कहानी लिखने के लिए मैं उनके बारे में कुछ जानना चाहता हूँ. यह भी कि जिस बंगालिन का वह जिक्र कर रहे थे सो भी हमारे पड़ोस में रहती है.

    ‘दलाल है भुतनी का’, मन्मथ ने कहा, ‘बल्कि भुतनियों का. तू इस साले के चक्कर में मत पडियो, बहुत ही खतरनाक आदमी है. तू तो है चुतियादास, देवदास, समझा न, किसी भोली-भाली अपनी पहाड़ी छोकरी पर कहानी लिख क्या? हाँ, हाँ. तू इस दलाल और उस बंगालन के बारे में बहुत कुछ जानता होगा मगर ये धंधे तुझसे हो न सके लल्लू. समझा. शादी-वादी कर मस्ती छान, क्या? माताजी कैसी हैं? मैं आऊंगा उनसे मिलने, जाने से पहले. और यह बकवास नौकरी तूने पकड़ ली है? बम्बई आना चाहे तो कह, किसी एडवरटाइजिंग एजेंसी में तेरे लिए नौकरी देखें. और यह तूने हिंदी-विंदी में लिखना क्या शुरू किया है? इंग्लिश क्यों छोड़ दी? हिंदी में लिखकर हद से हद राज्यसभा का सदस्य होगा सो भी बुढापे में. उससे तो अंग्रेजी की कॉपीराइटिंग भली. अपना एक यार है वहां बम्बई में अंग्रेजी मैगजीन में इंटरव्यू-विंटरव्यू लिखता है. समझा न. तो भाईजान तुम्हारे हिंदी के सभी बुजुर्ग लिक्खाड़ उसके सामने हाथ जोड़े खड़े होते हैं. वैसे लिख के ही क्या उखाड़ लेगा, और फिर हिंदी में. ये चक्कर छोड़ लुल्लू. और उस दलाल से दूर रह, बहुत खतरनाक है. ज़माना उसकी चालाकी जानता है. तुझ जैसे चुतियादास, हिंदी लेखक को बेच खायेंगे. समझा न?
    कितना खतरनाक है यह तीन दिन बाद मालूम हुआ. लेखक बस के इंतज़ार में बेबस हो चुका था, कि कार पर सवार तीसरा यार उसका कल्याण करने आ पहुंचा. उसे रेस्तरां में ले गया जिसमें संध्या बेला स्टेनोनुमा स्त्रियाँ अफसरनुमा आदमियों की घरवालियाँ बनने के सपने सार्थक आती हैं. नायक ने व्यापारी पुत्रों से लेखक के सम्बन्ध के विषय में जिज्ञासा की. लेखक ने बताया कि मैं उसमें एक दोस्त का दोस्त हूँ, बस. नायक ने कहा कि लेखक रेडियो में नौकरी करता है और वहां काफी लड़कियां आती हैं. गाने गूने ड्रामे द्रूमे के लिए. उसने यह भी कहा कि सोहबत सबसे बड़ा सबूत है जी, और उससे दूसरे अंसान का नेचर मलूम होता है. सिगरेट पेश करते हुए नायक ने जिज्ञासा की कि लेखक कभी कम्युनिस्ट पार्टी में था? लेखक ने कहा कि पार्टी से उसका कभी सम्बन्ध नहीं रहा है. नायक बोला कि जो शख्स कम्युनिस्ट पार्टी को पार्टी कहता है वो जी कम्युनिस्ट रहा होता है कभी न कभी. और जी चलो ख़ास पार्टी में न सही, पी.डब्ल्यू.ए., इप्टा, स्टूडेंट्स फेडरेशन इन सबमें होने से भी तो वही बात हुई न? और जी खतों का यह है कि बंद होने के बाद फिर खुल सकते हैं. तो जी जिनकी दाढ़ी में तिनका हो उनसे संभल कर रहना चाहिए. और जी कोई अंसान क्यों किसी की इतनी जसूसी करे? क्यों अपनी बालकनी पर खड़ा होकर किसी ने देखता रहे? क्यों किसी मसूम लड़की का पीछा करे? उसने परेशान कर डाले? हैं जी? सोचने की बात है. अन्सान ने इतना तो ख्याल है और फिर जो उसकी बुढ़िया मन, दूसरे घर वाले सब भूखों मरेंगे जी.

    लेखक ने माथे का पसीना पोंछा और कहा, ‘कोई गुनाह किया है तब तो.’

    नायक मुस्कुराए, ‘जो तो जी गवाही और सबूत की बात है उसका इंतजाम मुझ पर छोडो. हैं जी? तुम तो यह कहो कौन सी दफा तुम्हारी मनपसंद है, उसके मातहत तुमको भिजवा दें- बड़े घर. हैं जी? पता है अच्छे अन्सान को पहचान क्या है? अच्छा अन्सान जी अपने काम से काम रखता है. क्या जी, अपने काम से काम. समझे जी.’

    लेखक ने खलनायक की तरह समझे कहने की कोशिश की, लेकिन आवाज नायिका के छोटे भाई वाली निकली. कुछ इतनी मरी-मरी सी कि उसके अनुरूप होने के लिए लेखक ने अपने संवाद को नया रूप दिया, समझ गया जी, बिलकुल, नहीं जी, आइंदा आपको कोई शिकायत नहीं होगी.’

    बैरा और लेखक दोनों का हिसाब बेबाक करते हुए नायक मधुर मुस्कुराए और बोले, ‘जो मैं शिकायत नहीं होनी जी तो अपने फैदा भी होना है. ये लाइटर पसंद है, लौ रख लौ, चलो कोई नहीं, मैंने तो ऐसा दूजा मिल जाना है.’

    उस रात कोरे कागजों से भयास्पद साक्षात के बाद लेखक ने नए लाइटर से सिगरेट जो सुलगाई तो उसके दिमाग में. मैं भी बिका हूँ किस्म की कई नै कवितायेँ मंडलाई. बद से बदतर यूँ की माताजी बगल वाले कमरे में गीता पढ़ रही थीं- उनके थके-बूढ़े अटके-अटके स्वर में, अथ वैत्यमिमं ध्मर्य संग्रामं न करिष्यसि’ सुनकर लेकह्क को ‘कीर्ति चापि भूतानि’ का ख्याल आने लगा था. और उसके सामने सस्ती सिगरेट. जासूसी उपन्यास, मन्मथ से प्राप्त लव लवगर्ड्स, कोई भी ख्याल दिल को खुश रखने को अच्छा साबित नहीं हो रहा था. तभी उसको क्षितिज पर एक स्वप्नदृश्य उतराया- लेखक घुटने के बल बैठा है और मन्मथ अपना चमड़े का थैला घुमाते हुए कह रहा है कि इन गल्लां विच रख्या की है? सड़दा क्यूँ है जोशिये? यानी ए बम्बई चल और ऐडवरटाईजमेंट लिख. साहित्य से वही अच्छा, यह आत्मविज्ञापन है और वह विज्ञापन, यह अहंकार है और वह परोपकार.
    लेखक को सहसा हंसी आ गई. माताजी सुखे-दुखे समेकृत्वा को भुलाकर उसके कमरे में यह जिज्ञासा लिए आ पहुंची की क्या हो रहा है. लेखक ने कहा कि कुछ भी तो नहीं. कह कर उसने फैसला किया कि कुछ भी नहीं होगा. यह कहानी नहीं लिखी जाएगी.

    लेकिन, प्यारे पाठकों और उनसे भी ज्यादा प्यारी पत्रिकाओं, ले-कि-न. यानी गतांक से आगे कुछ विचित्र घटनाएं घटित हुई जिन्हें फ़ौरन से पेश्तर आपको बता देना यह लेखक अपना परम कर्त्तव्य समझता है. नायक की नेक सलाह के अनुसार लेखक ने अपने काम से काम रखना शुरू कर दिया था. व्यापारी पुत्रों की मंडली से मेलजोल छोड़ दिया गया था. तभी एक दिन मन्मथ आया और नायक का पता पूछने लगा. नायक घर पर मिले नहीं. मन्मथ ने कहा कि यार यह उल्लू का पट्ठा आ जाए तो उससे इतना भर कह देना कि गुलाबराय से फ़ौरन मिले या टेलीफून पर बात कर ले. लेखिका की जिज्ञासा पर मन्मथ ने बताया कि यह वही बंगालन वाला मामला है, गुलाब राय ने समझा यह बिटिया को भेजेगा, इस साले ने माताजी भिजवा दी. गुलाब राय ने अपना आदमी जो भेजा डांट पिलवाने के लिए तो यह पट्ठा अंडरग्राउंड हो गया. नासमझ है, गुलाब राय जैसे ग्राहक को गुस्सा करेगा तो खायेगा क्या? गुलाब राय समझा न, फौजदारी पर तुला हुआ था, तभी मुझे याद आया कि यह मिस्टर सेठ तो तेरा पड़ोसी है. तो मैंने गुलाब राय से कहा की सेठ को खोज निकालना मिश्रा साहब पर छोडो. समझे न, वह भी मान गया.

    इतने में माताजी चाय बना लाई. मन्मथ ने चरणान्तल नमस्कार का अच्छा खासा अभिनय किया और माताजी के प्रश्नों के निहायत सधे-बधे उत्तर दे डाले. खुद भी कुछ घरेलू सी जिज्ञासाएं की, प्रमुखतः लेखक की शादी में नौकरी के विषय में. जैसा ज़माना वैसा निशाना वाले सिद्धांत की विवेचना की और कहा यह सब बेवकूफी छोड़ कर बम्बई चले आना चाहिए. माताजी के स्वस्थ्य के विषय में एक बार फिर चिंता व्यक्त करते हुए, टानिक भिजवाने की बात एक बार फिर दोहराते हुए मन्मथ ने विदा ली और जाते जाते कहा कि ठीक है माताजी मनोहर के लिए मैं बम्बई में अच्छी नौकरी ढूंड दूंगा कोई, कहिये तो शादी भी करवा दूँ. एक सिन्धी लड़की है पैसे वाली, देखने सुनने में जरा मामूली है तो अपना मनोहर ही कौन हीरो है.’

    सीढ़ियों से उतरकर स्कूटर की ओर बढ़ते हुए मन्मथ ने कहा, ‘तू उससे सिर्फ इतना ही कहियो कि गुलाब राय से मिल ले. ज्यादा धौंस-पौंस न दीजौ, समझे न. हमें सब से मिलकर चलना है और किन्हीं के आपसी झगड़े से हमें क्या लेना-देना, समझा न, अपना तो वही तटस्थतावाद.’

    लेखक तटस्थतावाद को तिलांजलि दे चुका था. उसका समस्त भावबोध उस बेला प्रतिशोध तक सीमित हो चुका था. यही इंतज़ार था कि कब नायक आये और कब वह कृते व्यापारी पुत्र उसे खरी-खरी बुनी बुनाई सुनाये. लेखक ने अपने आपण के कई मानसिक संस्करण कर डाले. वक्तव्य को लिपिबद्ध करने की बेवकूफी उसे सूझ ही रही थी कि कार की आवाज सुनाई दी. लेखक तेजी से सीढियां उतरा और कार पार्क करके लौटते हुए नायक से मुखातिब हुआ, ‘आपके लिए गुलाब राय ने कुछ कहलवाया है. यही बात करना चाहेंगे या…’

    ‘ये तेवर तुम मैंने तो दिखाओ मत जी.’

    ‘तो जाकर ऊपर बंगाली बाबू को दिखाऊं? वैसे ही ठीक भी है. सीधी बातचीत हमेशा अच्छी तरह की है. बिचौलिए गड़बड़ ही करते हैं.

    नायक चुपचाप अपनी कार की ओर बढ़ गया. लेखक भी पीछे पीछे पहुंचा. नायक ने गाड़ी का दरवाजा खोल स्टीयरिंग संभाला और लेखक को बगल में बैठ जाने का मौन निमंत्रण दिया. कार डेढ़ मील दूर एक पुल के पार शानदार दुमंजिला इमारत के सामने रुक गई. अन्दर पारसी फैशन वाली एक प्रौढ़ा ने नायक और लेखक का मुस्कनाभिनंदन किया और उसके सामने की सोफे सेट पर लेटी हुई नवयुवतियों ने सलाम में जिस हाथ को ऊपर उठाया उसी से अधरास्ते में उबासी को दबाया. प्रौढ़ा ने क्या लेंगे का सवाल किया. तो लेखक ने अपने मजाकिया अंदाजे बयां की बानगी पेश करने की खातिर लड़की की फरमाइश कर दी. अंग्रेजी में यह सवाल जवाब कुछ बहुत लगा भी नहीं मालूम हुआ. प्रौढ़ा ने ठहाका बुलंद किया और एक एल्बम लेखक की ओर बाधा दिया. नायक ने बीच में ही अल्बम छीन लिया और कहा, ग्राहक नहीं वाकफ है मेरा, दोस्त, फ्रेंड.

    5 thoughts on “मनोहर श्याम जोशी के अप्रकाशित उपन्यास का अंश

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