बच्चों में साहित्य के प्रति रुचि विकसित करने का एक बेहतरीन जरिया कथाएँ हैं जिसमें निरंतर यह जिज्ञासा बनी रहती है कि आगे क्या हुआ? इसी तरह की एक बाल-कथा योगेश कुमार ध्यानी ने लिखी है ‘धूप का आयत’ जिसमें भरपूर रोचकता, कल्पना और लगातार उत्सुकता बनी हुई है – अनुरंजनी
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धूप का आयत
ठंड के दिन थे। बड़े दिनों के बाद अच्छी धूप निकली थी सो सभी लोग अच्छी धूप में बैठना चाहते थे। अभी सुबह का समय था और धूप शिवप्रसाद जी के घर के फाटक पर गिर रही थी। शिवप्रसाद जी ने फाटक खोला और अपनी कुर्सी फर्श पर बनते धूप के आयत के ठीक केन्द्र पर रख दी और अखबार खोलकर कुर्सी पर बैठ गये। धूप में बैठकर उन्हें बहुत अच्छा लगा। कई दिनों से बदन में घुसी ठंड गर्म रोओं से बाहर निकलने लगी। कुछ समय बाद जब शिवप्रसाद जी अख़बार के तीसरे पन्ने पर थे तो उन्हें कुछ अजीब लगा। उन्होंने अखबार हटा कर देखा । धूप का आयत उनकी कुर्सी के नीचे से खिसक कर फाटक के बाहर सड़क के किनारे चला गया था। शिवप्रसाद जी ने अपनी कुर्सी उठाई और धूप के नये बने आयत के केन्द्र में रख दी। उन्हें फिर से धूप में आने पर अच्छा लगा लेकिन कुछ समय बाद शिवप्रसाद जी ने पाया कि धूप का आयत फिर से खिसक कर दूर चला गया था। उन्होंने फिर से अपनी कुर्सी को धूप की नई जगह में लगाया। धूप धीरे-धीरे खिसकती जा रही थी और धूप के साथ-साथ शिवप्रसाद जी की कुर्सी भी। खिसकते-खिसकते शिवप्रसाद जी ने पाया कि वे शहर के आखिरी छोर पर आ गये हैं।
शहर के आखिरी छोर के बाद एक नदी बह रही थी और अब धूप का आयत नदी के भीतर ही नदी के एक किनारे पर था। शिवप्रसाद जी ने बाँस के चार डंडों के ऊपर लकड़ी के पल्लों को बांधकर एक मचान बनाया और मचान के ऊपर अपनी कुर्सी लगाकर बैठ गये। अभी उन्हें बैठे हुए कुछ ही समय हुआ था कि धूप अब उस मचान से हटकर नदी के बीच में कहीं चली गई। उनकी मचान के पास एक नाव वाला आया। उसने उनसे पूछा, “कहीं ले चलूं आपको नाव में ?”
“धूप के पास” शिवप्रसाद जी ने कहा।
उसके बाद शिवप्रसाद जी नाव पर बैठ गये और नाव वाला नाव को नदी के बीच उस जगह ले गया जहाँ धूप का आयत बन रहा था। धीरे-धीरे नदी में धूप खिसकती जा रही थी लेकिन अब शिवप्रसाद जी को अपनी कुर्सी हटाने की ज़रूरत नहीं थी क्योंकि उनकी कुर्सी नाव पर रखी थी और नाव वाला नाव को धूप के साथ खिसकाता जा रहा था।
धूप में चलते-चलते नाव को बहुत देर हो गई थी। शिवप्रसाद जी ने देखा उनके पास से एक बड़ा जहाज गुज़र रहा था। इसका मतलब वो लोग धूप का पीछा करते-करते समुद्र तक पहुंच गये थे।
नाव वाले ने जहाज के डेक पर खड़े एक आदमी से पूछा “ये तुम्हारा जहाज कहाँ जा रहा है ?”
“नार्वे” वो वहीं से चिल्लाया।
शिवप्रसाद जी ने जैसे ही नार्वे सुना, उन्हें स्कूल में पढ़ी हुई भूगोल की किताब की वो बात याद आ गई जिसमें लिखा था,”नार्वे का एक बड़ा हिस्सा आर्कटिक सर्कल के अंदर आता है। आर्कटिक सर्कल में होने के कारण नार्वे के कुछ हिस्से गर्मियों में कई हफ्तों या महीनों तक लगातार सूर्य के प्रकाश में रहते हैं और सूरज कभी पूरी तरह से नीचे नहीं जाता जिससे रात में भी रोशनी रहती है।
एक बार को शिवप्रसाद जी के मन में ख्याल आया कि उसी जहाज पर बैठकर नार्वे चले जाएँ जहाँ दिन और रात दोनों में धूप मिलेगी। लेकिन फिर उन्हें याद आया कि सोने के लिये उन्हें घुप्प अंधेरे की जरूरत पड़ती है तो ऐसे में लगातार जागते हुए वो कैसे रह पायेंगे?
धूप अब उस जहाज पर पड़ रही थी लेकिन शिवप्रसाद जी ने नार्वे जाने का इरादा त्यागते हुए नाव से वापस शहर की तरफ चलने को कहा। वो आज दिन भर बहुत थक चुके थे और अब उन्हें नींद आ रही थी।

