• रपट
  • नामवर जी की आलोचना पर शीत-युद्ध का प्रभाव रहा- प्रो० रामेश्वर राय

    नामवर सिंह की जन्मशताब्दी पर हिंदू कॉलेज में राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया। इस रपट लिखी है शोध छात्र मुशर्रफ परवेज़ ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर 
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    कुछ एक दिन पहले अचानक से फेसबुक स्क्रॉल करते हुए आदरणीय काशीनाथ सिंह जी को सुना जिसमें वे कह रहे थे कि हिंदू कॉलेज के हिंदी विभाग द्वारा नामवर सिंह की जन्मशताब्दी पर देश का पहला राष्ट्रीय सेमिनार होने जा रहा है।
    अब आप प्लीज़ ये मत पूछिएगा कि काशीनाथ सिंह कौन हैं? इतना बताता चलूं आप यदि ‘लाल किले का बाज’ कहानी पढ़ेंगे तो आप जान जाएंगे।
    काशीनाथ जी की बात बिल्कुल ठीक निकली क्योंकि हिंदू कॉलेज के सुशीला देवी सभागार में 27 और 28 जनवरी को “हिंदी के नामवर” से दो-दिवसीय सेमिनार का आयोजन होना तय था। दिल्ली व अन्य विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों के व्हाट्सएप समूहों पर पोस्टर भी पहुंच चुका था। 
    मैं पहले दिन की बात बिल्कुल भी नहीं करूंगा क्योंकि मैं मौजूद था नहीं। खैर, लोगों ने बताया कि काफ़ी अच्छे सत्र रहे।
    28 जनवरी की सुबह थी। धूप के निकलने का कोई नामो-निशान नहीं था। वैसे धूप आई भी नहीं। साढ़े दस से ग्यारह के बीच का समय रहा होगा। सभागार की एक-एक कुर्सियां भरी थीं। आयोजन समिति के छात्र पूरे मशक्कत से तैयारियों में लगे हुए थे। मैं भी एक पन्ना और पेन उधार लेकर एकदम आगे वाली सीट पर बैठ गया। अब सुनने आए हैं तो कुछ न कुछ तो लिखना पड़ेगा न!
    इतने में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर, डॉ० धर्मेंद्र प्रताप सिंह पोडियम पर आ गए। उन्होंने सभी का अभिवादन किया। बताया कि इस सत्र का नाम है “20वीं सदी की वैचारिकी और नामवर सिंह” तत्पश्चात आयोजन समिति ने सत्र के तीनों वक्ताओं को पुष्प और अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया। यही प्रारूप बाक़ी सत्रों में भी चलता रहा।
    पहले वक्ता के रूप में आए डॉ० वैभव सिंह। उनका पहला वाक्य था “मैंने आलोचना का ककहरा उनसे सीखा” उनसे यानी नामवर सिंह। आधुनिकता पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि इस दौर ने अनेकों आलोचक पैदा किए। नामवर जी उनमें प्रमुख थे। कला व साहित्य का कैसे नामवर जी ने समन्वय किया उसको सलीके से बताया। छायावाद में नयापन के पहचान पर भी बातें रखीं। एक बात जो उन्होंने कही वो नई बात लगी कि “प्रतीक्षा का रूपक कहानियों में वे लाये”। वैसे डॉ० वैभव सिंह ने ऐसी कोई नई बात नहीं बताई जो हमारे ज्ञान में इज़ाफ़ा करे। वही बातें जो सब बताते हैं।
    दूसरे वक्ता आए प्रो० संजीव कुमार जो वर्तमान में आलोचना पत्रिका के संपादक हैं। आते के साथ वे बोल पड़े कि रामेश्वर सर को सुनना बड़ा लोभ है। फ़िर उन्होंने कहा कि अपनी तैयारी उतनी अच्छी नहीं है। ये स्वीकारना बड़ी बात है वरना इन दिनों संगोष्ठियों में बड़ा विषयांतर हो रहा है। 20वीं सदी का उल्लेख करते हुए उन्होंने घटनाओं व विचारों की बातें की। मार्क्सवादी विचारधाराओं की बातें भी उन्होंने रखीं। उन्होंने नामवर जी में कितनी असंगतता थी उसको बताते हुए कहा कि “असंगत लोग बहुत ख़तरनाक होते हैं”।  फ़िर कैसे भाषा की मध्यस्थता वास्तविकता के साथ होती है उसपर भी ध्यान आकृष्ट कराया।
    इस सत्र के दोनों विद्वानों ने नामवर जी के अवदानों की चर्चा की लेकिन उन्होंने किन-किन पहलुओं को नहीं छुआ उसको बताया तीसरे वक्ता और समकालीन हिंदी साहित्य वरिष्ठ आलोचक प्रो० रामेश्वर राय ने। सर ने ख़ूब बातें की लेकिन कुछ एक महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख आवश्यक हो जाता है।
    प्रो० रामेश्वर राय ने माइक पर आते ही नामवर जी के एक कथन को उद्धृत किया। नामवर जी के शब्दों में “मेरे आलोचना कर्म में मार्क्सवाद और आलोचना कर्म की महत्वपूर्ण भूमिका है।”
    नामवर जी बुनियादी तौर पर आलोचक हैं। फ़िर काशीनाथ सिंह और नामवर सिंह के एक प्रसंग का ज़िक्र किया। विषय में 20वीं सदी लगा था इसीलिए उन्होंने भौतिक विज्ञान के आविष्कार, विश्व युद्ध, भारत विभाजन आदि घटनाओं का भी उल्लेख किया। उस समय की फिल्मों पर भी कुछ बातें कहीं जैसे कि दुनिया बदल गई। अपितु दुनिया ने हल्का मनोरंजन पैदा किया। इसी बीच उन्होंने बिमल राय के ‘दो बीघा ज़मीन’ को भी याद किया। निर्मल वर्मा के बारे में एक बात जो नामवर जी ने कही थी कि ‘निर्मल वर्मा के विचारों से सहमत नहीं हूँ लेकिन निर्मल वर्मा एक अच्छे साहित्यकार हैं’, उसको भी बताया। नामवर जी की दृष्टि मैला आँचल, अंधा युग, राग दरबारी और भावनीप्रसाद मिश्र पर नहीं पड़ा इसका भी उल्लेख किया। नामवर जी जब आचार्य रामचंद्र शुक्ल के घर गए उस समय के प्रसंग को भी छेड़ा।
    अब दिन का दूसरा सत्र होना था। सभागार की आधी कुर्सियां खाली थीं। वजह आप जानते ही हैं कि भोजन के लिए रुके लोग रफ़ूचक्कर हो गए। 
    घड़ी की सुई 2 पर आ गई थी। 
    फ़िर से संचालन की भूमिका डॉ० धर्मेंद्र प्रताप सिंह के हाथों थी। सत्र का विषय था “शिक्षक, संपादक और अन्वेषक नामवर सिंह” 
    प्रो० मधुप कुमार पहले वक्ता थे। उन्होंने आमंत्रण व निमंत्रण से लेकर ज्ञान मीमांसा व ज्ञान परंपरा की गुत्थी सुलझाई। थोड़े असहज दिखे।  नामवर जी गालिब का जो शेर अमूमन पढ़ते थे उसको सुनाया। 
    ग़ालिब यूँ कहते हैं- 
    ज़िक्र उस परी-वश का और फिर बयाँ अपना,
    बन गया रक़ीब आख़िर था जो राज़-दाँ अपना।
    मधुप जी ने नामवर जी की अंतिम कक्षा का प्रसंग सुनाया और बताया कि उन्होंने साहित्य नहीं समझ आने के गंभीर कारण हम छात्रों को उसी कक्षा में बताया था।
    अंत में बात को विराम देते हुए उनकी ही पंक्ति कही कि “आलोचक की श्रद्धा भी आलोचनात्मक होती है”।
    सत्र की दूसरी वक्ता प्रो० सुमन केसरी जी ने जेएनयू की बातों का उल्लेख किया। असलम परवेज़ के लेखन पर भी थोड़ी चर्चा की। बहुत ही कम समय में सुमन जी ने संतुलित ढंग से अपनी बातों को रखा। सच पूछें तो बिल्कुल बोर नहीं होने दिया।
    अब प्रो० अनिल राय को सुनने की बारी थी। उन्होंने वक्तव्य में कई बार कहा कि मुझे अफ़सोस है कि मैं उनका छात्र नहीं रहा। मुझे उनसे पढ़ने का मौका बिल्कुल भी नहीं मिला। अपने गुरु, प्रो० विश्वनाथ त्रिपाठी के ज़रिए जो कुछ उन्होंने सुना उन सारी बातों को सभी से साझा किया।
    इसके तुरंत बाद दिन का तीसरा सत्र शुरू हुआ। इस बार डॉ० पल्लव संचालक की भूमिका में थे। “नामवर सिंह का अवदान” सत्र का नाम था। 
    प्रो० महेंद्रपाल शर्मा आए और उन्होंने जेएनयू में छात्र जीवन में बिताए सभी बातों का उल्लेख किया। कैसे वे नामवर जी के शिष्य बने? पान खिलाने वाला किस्सा भी सुनाया। ‘कविता के नए प्रतिमान’ पर भी अच्छी खासी बातें की। कुल मिलाकर प्रो० शर्मा जेएनयू तक ही सीमित रहे।
    ठीक इसके समानांतर सत्र ‘शोध पत्र वाचन’ यानी पर्चा पढ़ने का चल रहा था। कुछ शोधार्थी ऑनलाइन जुड़े थे। कुछ शोधार्थी ऑफलाइन उपस्थित थे। एक बात अर्ज़ करता चलूं कि सभी संगोष्ठियों में शोध पत्र वाचन को मुख्य मंच से नहीं पढ़ाया जाता है। ये हिंदी वाले संगोष्ठियों में ही देखा गया है। बाक़ी विषयों में उसी मंच से होता है जहाँ मुख्य सत्र चल रहा होता।
    दो-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी अपने समापन की ओर बढ़ रही थी। नामवर सिंह जी पर बनी डॉक्यूमेंट्री चलने लगी। थोड़ी लंबी थी पर अच्छी। जब केदारनाथ सिंह बोल रहे थे तो प्रो० रचना सिंह के आँख भर चुकी थीं। कितना गाढ़ा रिश्ता होता है एक पिता व पुत्री का। मैम को शायद लग रहा होगा कि पापा सामने हैं!

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