• रपट
  • झूठ के महावृत्तांत की काट है यह पुस्तक!

    कल शाम इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के खचाखच भरे ऑडिटोरियम में पुरूषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक ‘मज़बूती का नाम महात्मा गांधी’ का लोकार्पण हुआ। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक के लोकार्पण समारोह की रपट लिखी है जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के शोध छात्र मुशर्रफ परवेज़ ने- मॉडरेटर 

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    ठंड की शाम और हल्की-फुल्की बूंदा-बूंदी। ऊपर से विद्वानों का जमघट सी डी देशमुख ऑडिटोरियम में। कहीं से किसी व्हाट्सएप ग्रुप में पिछले दिनों एक पोस्टर दिखा। जिसमें लिखा था “मजबूती का नाम महात्मा गांधी”, लेखक प्रो० पुरुषोत्तम अग्रवाल। उद्घाटन भाषण हेतु वर्चुअली आए हुए थे राजमोहन गांधी। अपन ने पहले कभी राजमोहन जी को सुना नहीं था। इसीलिए एक कोने में दुबककर बैठ गया ताकि विद्वानों की वाणी में स्नान कर सकूं।
    खैर, अपनी नज़र जिधर घूमती उधर कोई न कोई लेखक, कथाकार, आलोचक व प्रवृत्ति विद्वान दिख हीं जाते। जब महात्मा गांधी से संबंधित पुस्तक का लोकार्पण हो तो इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं कि विद्वत जनों का मेला लगा हो। क्योंकि गांधी सबके हैं, उनके भी हैं जो कुबूलना नहीं चाहते। भारतवर्ष की मिट्टी के कण-कण में गांधी हैं। 
    जैसे ही चाय-नाश्ते से फारिग हुआ और जगह पकड़ी। ठीक पास वाली सीट पर अशोक वाजपेयी अपने किसी मित्र के साथ बैठे थे। इतने में उनके दूसरे मित्र पास आए और कहा-  “पीछे क्यों बैठे हैं सर, आज आप अपने आप को सुनने आए हैं क्या?” सुनते ही हँसी फूट पड़ी।
    कार्यक्रम की विधिवत शुरुआत होने का संकेत मिलने लगा जब अशोक माहेश्वरी अपने कदमों को पोडियम की तरफ़ ले जाने लगे। आप समझ गए होंगे कि संचालन राजकमल वाले अशोक जी ही कर रहे थे। उन्होंने आते ही एक वाक्य कहा जो मारके की थी। कहते हैं- “यह किताब हमें मनुष्यता की तरफ़ ले जाती है।” आगे कहा कि “झूठ के महावृत्तांत की काट है ये पुस्तक।” संचालक के दोनों वाक्यों ने सभागार में बैठे लोगों को मजबूर कर दिया तालियां बजाने के लिए।
    मैं इस लोकार्पण समारोह को तीन सेगमेंट में बाँटकर जो कुछ अनुभव किया उसको प्रेषित करने की कोशिश करूंगा। अपने ज्ञान का दायरा एकदम छोटा है इसीलिए जो जहां तक समझ बन पाई पूरे दो घंटे में रखने की भरसक कोशिश करूंगा।
    पहला सेगमेंट वाकई में खूबसूरत था। इसलिए नहीं कि कोई रंगारंग कार्यक्रम था बल्कि भजन गायन था। शिवांगिनी जी से अपना परिचय आज पहली बार हुआ। उनकी आवाज़ इतनी सुरीली थी कि पता भी नहीं चला कब और कैसे 30 मिनट बीता। खैर वे जिनसे शिक्षा ले रही हैं उन्हें कौन नहीं जानता। क्या आप शुभा मुद्गल को नहीं जानते हैं?
    तबले पर उनका साथ दे रहे थे नीरज व हारमोनियम पर मुकेश भारद्वाज। शिवांगिनी जी ने आते के साथ ही अपनी गुरु को नमन किया। यही तो भारत की मिट्टी की तासीर है कि शिष्य के लिए गुरु सर्वोपरि हैं। गांधी जी को नमन करते हुए उन्होंने गुरु अमरदास जी के सबद को गाया। कबीर के तीन पदों का गायन भी बख़ूबी हुआ। जैसे ही मीरा के “या बदनामी लागै मीठी” गाना शुरू किया कि सभी की उंगलियां थिरकने लगीं। मानो सभागार का एक-एक पत्थर भजन को सुन रहा हो और तालियां बजा रहा है।
    दूसरा सेगमेंट राजमोहन गांधी जी के वक्तव्य का था। काफ़ी तथ्यपरक और स्पष्टता के साथ उन्होंने वर्चुअली अपने बात की शुरुआत की। सभागार को अंधेरा कर दिया गया ताकि दर्शक उनको देखें और सुनें भी। उन्होंने लोकतंत्र पर हो रहे हमलों का उल्लेख किया। फ़िर हिंदू-मुस्लिम एकता, दलित व महिलाओं पर हो रहे हमलों का भी ज़िक्र किया।  बात को आगे बढ़ाते हुए 3 बड़े झूठ जो इन दिनों लोगों के समक्ष परोसे जा रहे हैं उसका वर्णन भी किया। झूठ इस प्रकार हैं- 
    1. बड़े पैमाने पर विदेशी मुसलमान भारत में घुसे,
    2. बड़ी संख्या में धर्मांतरण हो रहा है,
    3. गांधी जी ने पार्टीशन का विरोध नहीं किया।
    वसुधैव कुटुंबकम् को सही अर्थों में कैसे अर्जित किया जाए इसपर भी उन्होंने चिंता ज़ाहिर की। एक वाक्य जो उन्होंने कहा शायद आपको अटपटा लग सकता है- “हिंदुत्ववादी भारत की एकता के दुश्मन हैं।” मेरे हिसाब से तो ये एक बड़ी बहस का हिस्सा है। जिसपर बहस होनी चाहिए। गांधी जी के मंत्र को कहते हुए उन्होंने अपने वक्तव्य को अंत किया।
    “डरो मत, डराओ मत, नफ़रत छोड़ दो”
    भाई, गांधी जी यूँ ही गांधी नहीं कहलाते हैं। वास्तव में उनके विचार इस मिट्टी के अंदर निहित हैं।
    तीसरा सेगमेंट, लाजवाब और साहित्यिक रहा क्योंकि संवाद था दो प्रकांड विद्वानों के मध्य। एक तरफ पुरुषोत्तम जी तो दूसरी तरफ़ वाजपेयी जी।
    पुस्तक के लोकार्पण के लिए लाल रंग के पेपर से चढ़ी हुई किताबें लाईं गईं। इतने में पुरुषोत्तम जी ने दिलीप सिमीयन जी का नाम लिया। सभी आगे-पीछे देखने लगे क्योंकि उन्होंने कहा कि लोकार्पण की पहली कॉपी मित्र, दिलीप को जिसने निरंतर साधना की। आप समझ गए होंगे कि दिलीप जी को समर्पित है “मजबूती का नाम महात्मा गांधी”।
    ज्यों ही अशोक वाजपेयी ने कहा “थोड़ी बहुत कविताएँ मैंने लिखी है, थोड़ी बहुत आलोचनाएं इन्होंने लिखीं हैं।” सब ठहाका मारकर हँस पड़े। यही आत्मीय शैली अशोक वाजपेयी को अशोक वाजपेयी बनाता है। हम जो जानते हैं उसको नहीं बल्कि जो नहीं जानते हैं उधर हमारी दृष्टि ले जाना एक अच्छे लेखक का काम है जो पुरुषोत्तम जी ने किया है क्योंकि ये किताब लेखक बुद्धिजीवी की बेचैनी की पुस्तक है।
    पहला प्रश्न जो तमाम लेखकों से किया जाता है। वही प्रश्न अशोक जी ने पुरुषोत्तम जी से किया कि  “आपने पुस्तक क्यों लिखी?”
    उत्तर में पुरुषोत्तम जी ने कहा- अपनी बेचैनी को रूप देने के लिए। फ़िर उन्होंने गांधी व गोरा के संवाद का उल्लेख करते हुए बताया कि इसी संवाद के पश्चात् गांधी जी ने स्वीकारा कि आस्तिक हुए बिना भी नैतिक हुआ जा सकता है। 
    ये ठीक बात भी है कि नैतिकता का आस्तिक और नास्तिक होने से कोई मतलब नहीं।
    दूसरा प्रश्न अशोक जी ने किया “राजनीति में धर्म के हस्तक्षेप का सर्वप्रथम सूत्रपात करने वाले में गांधी जी का नाम क्यों लिया जाता है?”
    उत्तर देते हुए पुरुषोत्तम जी ने बहुत विस्तार से उत्तर दिया।  अंत में उन्होंने एक पंक्ति कही जो प्रश्न के साथ न्यायपूर्ण था। उन्होंने कहा- “गांधी जी के विचार धर्म के बारे में सर्वथा भिन्न हैं।”
    तीसरा प्रश्न, क्या सत्याग्रह का मतलब है अपने घोर विरोधी के सत्य में भी आस्था रखना?
    जवाब देते हुए पुरुषोत्तम जी ने ‘हरिशंकर परसाई’ की किसी कहानी का हवाला दिया। अच्छा तो तब होता जब वे कहानी का नाम बता देते ताकि मुझ जैसा तालिबे-इल्म एक कहानी से दो-चार हो जाता। फ़िर कहा सांप्रदायिकता कोई भी करे वो देश का विरोधी होता है।
    इसके बाद दर्शकों से प्रश्न लेने की बारी आई। इन दिनों एक अजीब सा ट्रेंड्स चल गया है कि प्रश्नकर्ता प्रश्न कम करते हैं और अपनी विद्वता की धाक जमाने हेतु माइक लपक कर पकड़ लेते हैं। कायदे से होना तो ये चाहिए कि आप माइक लीजिए और सीधे प्रश्न करिए न कि हम फलाने हैं, फलाने के शिष्य हैं। उन्हें समझ नहीं आता कि समय कम है औरों को भी पूछना है। माइक पकड़े तो छोड़ने का नाम ही नहीं लेते।
    प्रश्न के दौरान अशोक वाजपेयी ने एक पंक्ति कही और सभी के हाथ अनायास ही खुल गए। उन्होंने कहा- “प्रार्थना सभा के रूप में गांधी जी ने एक नए प्रकार के मंदिर का निर्माण किया।”
    कार्यक्रम अपनी सम्पन्नता की ओर थी। लेखक ने माँ सरस्वती को याद किया। सुभाष चंद्र बोस जी को नमन किया और सभी अपने-अपने आशियाने को निकल पड़े।
    ज़रूरी बात, जितनी भी बातें ऊपर किताब के बारे में वक्ताओं ने कही। वे बातें कितनी ठीक हैं इसका पता तभी चलेगा जब कुछ आलोचनात्मक टिप्पणियां और समीकाएं आएंगी।
    कुल मिलाकर वसंत पंचमी के दिन अच्छा और ज्ञानवर्धक आयोजन रहा।

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