• स्मरण
  • भवाली सैनिटोरियम में बादलों के घेरे

    आज हिन्दी की अप्रतिम लेखिका कृष्णा सोबती की पुण्यतिथि है। इस अवसर पर उनकी कहानी ‘बादलों के घेरे’ पर यह टिप्पणी पढ़िए। युवा लेखक अभिषेक कुमार अम्बर ने रचनाओं को उनके भौगोलिक परिवेश के साथ गूँथते हुए लेखन की एक नई शैली विकसित की है। इस कहानी पर टिप्पणी लिखते हुए उन्होंने भवाली सैनिटोरियम के परिवेश को भी बहुत अच्छे से रखा है। आप भी पढ़िए- मॉडरेटर 

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    नैनीताल की सुरमई शाम के धुंधलके में, मैं नाव पर सवार शहर के रूप को निहार रहा हूँ। शहर पर पड़ते ढलती शाम के साए मौसम में उदासी घोल रहे हैं। सूर्य की रश्मियाँ अब सड़कों और होटलों में लगी बत्तियों में क़ैद हैं। बोट क्लब से दूर जाते देखता हूँ कि नैना देवी मंदिर के प्रांगण में जलते दीए झील के पानी में हिलोर ले रहे हैं। उधर नज़र टिकी तो बस जैसे टिकी ही रह गई। ज़हन में एक ऐसे शख़्स की याद ने डेरा डाल लिया जिससे मैं कभी मिला नहीं, न मिल ही सकता था। फिर भी जब-जब उसकी याद आई तो घंटों उदासियों के महासागर में गोते लगाता रहा। कई बार तो उस का नमकीन जल मेरी आँखों की कोरों में आकर ठिठक गया। 

    मन्नो, मैं तुम्हें कभी नहीं भुला सकता, कभी नहीं और न कभी रवि को। तुम्हारे प्रति जिसका निश्छल प्रेम देखकर मैंने जाना कि किसी के लिए जीना ही नहीं मरना भी प्रेम होता है। आज जब मैं तुम दोनों के, तुम्हारी कहानी के इतने क़रीब हूँ तो तुम्हें महसूस किए बिना, तुमको जिए बिना मैं नहीं जाने वाला अगली सुबह मैं ख़ुद को भवाली के चौराहे पर खड़ा पाता हूँ। बस मुझे उतार कर धुआँ छोड़ती हुई अपनी राह पकड़ चुकी है, और मैं गुनगुनी धूप और बारिश की नमी साथ लिए बहती हवा में अपनी आज की मंज़िल का रस्ता तलाश रहा हूँ। मेरी आज की मंज़िल है कृष्णा सोबती की कहानी ‘बादलों के घेरे’।

    कहानी की नायिका मन्नो दो दिनों के लिए अपनी चाची के घर नैनीताल आती है। लेकिन टीबी की बीमारी के कारण अपनी चाची के बदले व्यवहार को देख, बिना कुछ कहे एक ही दिन में भवाली स्थित अपने कॉटेज लौट जाती है। वहीं मन्नो के प्रति अपनी बुआ की निष्ठुरता को देख रवि, मन्नो के मोहपाश में बँधा हुआ भवाली जा पहुँचता है। और आज मुझे भी जाने कौन सा नेह का धागा खींच कर इस शहर ले आया।

    कहानी में एक सुराग़ मिला। “चौराहे से होकर पोस्ट-ऑफ़िस पहुँचा। कॉटेज का पता लगा लिया और छोटे से पहाड़ी बाजार में होता हुआ ‘पाइंस’ की और हो लिया। खुली-चौड़ी सड़क के मोड़ से अच्छी-सी पतली राह ऊपर जा रही थी।” चौराहे पर खड़ा मैं चारों तरफ़ देखता हूँ कोई पोस्ट ऑफ़िस नज़र नहीं आता। पास में फल-सब्ज़ियाँ बेचते एक बुज़ुर्ग से  पूछा, “अंकल जी, भवाली में पोस्ट-ऑफ़िस कहाँ होगा?”

    “बेटा पोस्ट-ऑफ़िस तो श्यामखेत की तरफ़ हुआ। यहाँ से 1-2 किलोमीटर दूर ठहरा। कुछ काम है क्या?”, अंकल ने जवाब के साथ-साथ सवाल भी दाग़ा।

    अब अंकल को क्या बताऊँ कि मैं कहानियों का आशिक़, एक कहानी का दीवाना होकर इस शहर में ख़ाक-नशीनी के लिए आया हूँ। मैंने पूछा, “क्या कभी इस चौराहे के आस-पास भी पोस्ट-ऑफ़िस हुआ करता था।”

    माज़ी के झरोखों से झाँकते हुए उन्होंने कहा, “किसी वक़्त में होता था बेटा, सड़क पार वो जो नया बना बस स्टैंड देख रहे हो ना वहीं होता था। तब से तो शहर का नक़्शा बदल गया।” उनके जवाब से एक उम्मीद बँधी की शायद मैं बादलों के घेरे तक पहुँच जाऊँगा। लेकिन तभी मन के किसी कोने से वही पंक्ति कुलाँचे मार रही थी जो कभी रवि की बुआ  ने उससे कही थी, मानो बुआ आज मुझसे कह रही हों, “अभिषेक, कुछ हाथ नहीं लगेगा, जिसके लिए सब राह रुकी हों, उसके लिए भटको नहीं।” लेकिन रवि ने भी कौन-सी बात मानी थी जो मैं मान जाता। 

    चौराहा पार कर के बस स्टैंड पहुँचा, जहाँ कभी पोस्ट ऑफ़िस हुआ करता था। उसके बराबर में एक पुरानी दुकान थी, उसमें एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति बैठा सामान बेच रहा था और बाहर खड़ा था उसका सम-वयस्क ख़रीदार। उसी दुकान के बराबर से एक पतला सीढ़ी-नुमा रास्ता जा रहा था। मैंने दुकानदार से पूछा, “क्या यह रास्ता ऊपर पाइंस अथवा सैनिटोरियम जाता है?”

    “हाँ जी, सैनिटोरियम जाता है। आप पैदल हैं या गाड़ी से?”

    “मैं तो पैदल ही हूँ।”

    “जाने को तो यह सड़क भी सैनिटोरियम जाती है लेकिन आप पैदल हैं तो यह रास्ता ही आपके लिए बेहतर होगा। आगे जाकर….” बीच में ही मेरे साथ खड़े ख़रीदार ने उन्हें टोक दिया “अरे, सेठ जी! आप चिंता मत कीजिये मैं उधर ही जा रहा हूँ मैं भैजी को रास्ता दिखा दूँगा।” मैंने पहली बार उस व्यक्ति को ग़ौर से देखा। छरहरा बदन, भीतर को गड़ी आँखें, सुतवाँ नाक, 30-31 वर्ष का नेपाली नौजवान था। लेकिन कुमाऊँनी भी पूरी ठसक के साथ बोल रहा था।

    रास्ते की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसने मुझसे पूछा – “कहाँ से आए हैं आप भैजी? यहाँ के तो नहीं दिखते?”

    “मैं दिल्ली से हूँ, लेकिन इन्हीं पहाड़ों में घूमता रहता हूँ यहीं का रहवासी समझो। और आप कहाँ से हुए?”

    “यूँ तो हम नेपाल से हैं भैजी, पर बाप-दादा कुमाऊँ में आकर बस गए। तो अब हम भी कुमाऊँनी ही ठहरे।”

    मेरे किसी जवाब की प्रतीक्षा किये बिना ही वह लगातार बोले जा रहा था। “मैं भी पहले मुम्बई काम करता था, होटल में था। कोरोना आया तो सब छोड़छाड़ कर गाँव चला आया। वो देख रहे हैं आप…वो ऊपर पहाड़ पर, वही गाँव हुआ मेरा।” रामगढ़  के पहाड़ों की तरफ़ उँगलियों से इशारा कर के मुझे दिखाने की कोशिश करने लगा। “वो तो काफ़ी दूर है, रोज़ तो कहाँ जा पाते होगे?” 

    “रोज़ जाता हूँ भैजी। सड़क से तो बहुत दूर ठहरा। शॉर्टकट से एक घंटे से भी कम समय लगने वाला हुआ।”

    “यहाँ भी किसी होटल में काम करते हो…” मेरे वाक्य पूरा करने से पहले ही वह बताने लगा।

    “भैजी कोरोना के बाद अपना ही काम शुरू किया मैंने। एक छोटी सी दुकान है सैनिटोरियम के पास चाय-मैगी की। उसी का सामान लेने बाज़ार गया था। लीजिए बातों-बातों में पता ही नहीं चला हम सैनिटोरियम पहुँच भी गए।”

    नैनीताल की ओर जाती बल खाती सड़क के दाईं ओर बड़े से गेट पर धुली सी सियाही से लिखा है भवाली सैनिटोरियम। 1912 ई. में किंग जॉर्ज एडवर्ड सप्तम द्वारा बनवाया गया यह सैनिटोरियम भारत का पहला टीबी सैनिटोरियम है। नैनीताल से महज़ 11 किलोमीटर दूर भवाली में, रामपुर के नवाब द्वारा दान की गई 225 एकड़ ज़मीन पर फैले इस सैनिटोरियम का अपना एक भूगोल ही नहीं इतिहास भी है।

    एक समय था जब ट्यूबरक्लोसिस यानी टीबी एक लाइलाज बीमारी थी, किसी एक को होती तो अपने साथ कई लोगों की जान लेकर जाती। धीमे ज़हर की तरह आदमी को तड़पा-तड़पा कर मारती। ऐसी वबा से बचने के लिए सिर्फ़ प्रकृति प्रदत्त उपचार ही एकमात्र उपाय था। वही रोगी को जीवनदान देता या फिर उसके जीने की अवधि को कुछ बढ़ा देता। 

    भवाली की पहचान सम्पूर्ण भारत में ऐसी ही जीवनदायनी भूमि के रूप में थी। यहाँ चीड़ों के जंगलों से छनकर आती हवा से टीबी जैसी भयंकर बीमारी की पकड़ भी कमज़ोर हो जाती। लोगों के तन में जीवन-रस का संचार होता। ज़र्द चेहरों पर बसंत न सही लेकिन हेमंत के निशान ज़रूर उभरने लगते। और जिन लोगों के लिए यहाँ की जीवनदायिनी हवा भी कुछ न कर पाती। वह इसी सैनिटोरियम के किराए के बंगलों और कॉटेजों में प्रतिपल मृत्यु की बाट जोहते। 

    क्या पता इसी सैनिटोरियम के किसी बंगले या कॉटेज के हरियाए आँगन में बैठी मन्नो कोई स्वेटर बुन रही हो और पलट-पलट कर उसे निहारता रवि इसी रहगुज़र में मुझसे टकरा जाए। रवि और मन्नो ही क्यों, निगम और माया भी तो फ़ोटोग्राफ़ी करते मिल सकते हैं। अब आप सोच रहे होंगे यह निगम और माया ‘बादलों के घेरे’ में कहाँ से आ गए?, कहीं ये…जी हाँ जनाब! आप सही सोच रहे हैं ये यशपाल की कहानी ‘तुमने क्यों कहा था, मैं सुंदर हूँ’ से हैं। यह सिर्फ़ कहानी का नाम नहीं बल्कि यह माया का सवाल है, जिसकी गूँज आज भी भवाली के बंगलों की दीवारों से चोट खाकर छलनी हो जाती होगी लेकिन फिर भी निगम से बारहा पूछती होगी ‘तुमने क्यों कहा था, मैं सुंदर हूँ…!’ 

    भवाली सैनिटोरियम एक मात्र ऐसी इमारत है जिसके ऊपर हिन्दी साहित्य के दो मूर्धन्य लेखकों ने अपनी कलम चलाई, चलाई क्या दो कालजयी कहानियाँ लिख दीं। वह दो साहित्यकार हैं कृष्ण सोबती जिन्होंने ‘बादलों के घेरे’ लिखी और यशपाल जिन्होंने लिखी ‘तुमने क्यों कहा था, मैं सुंदर हूँ’। 

    मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही दो रास्ते एक-दूसरे के बर-अक्स जाते दिखाई दिए। चौकीदार से पूछा तो उसने बताया कि “बाईं तरफ़ जाइए, सेनिटोरियम अभी ऊपर है।” मैं सड़क पर कुछ दूर ही चला होऊँगा। देखा कि लंगूरों का झुंड कहीं रास्ते में बैठ, कहीं पेड़ों की शाख़ों पर बैठ पत्तों की दावत उड़ा रहे थे। रास्ता भी क्या दिल-फ़रेब था धीरे-धीरे बढ़ती चढ़ाई और दोनों तरफ़ बाँज और चीड़ के बड़े-बड़े, घने-घने तनों पर काई जमे दरख़्त। एक दूसरे में ऐसे गुथे जैसे गले मिल रहे हों। और उनके गले मिलने का फ़ायदा उठाते सड़क के इस तरफ़ से उस तरफ़ तनों पर टहलते लंगूर।

    चढ़ाई क्या बढ़ती गई अंग्रेजों के ज़माने की इमारतें नज़र आने लगीं। ख़ूबसूरत और कुछ जर्जर बंगले। कभी एक के ऊपर एक , कभी बराबर-बराबर। ऐसे ही एक बंगले के आगे आकर मेरे क़दम रुक गए। मैं गेट खोल अंदर चला आया। बरामदे में इधर-उधर घूमा भी। पर हैफ़ कोई नज़र न आया। 

    बंगले को निहारता न जाने मैं कौन-से ख़्वाब में खो गया। महसूस हुआ जैसे शायद अभी मन्नो पीछे से घोड़े पर सवार होकर आए और उतरते हुए मुझसे मुख़ातिब होकर पूछे, “क्या बहुत देर तो नहीं हुई?”

    और मैं यकायक कहूँ, “नहीं, बिल्कुल नहीं, उल्टा मैं ने बहुत देर कर दी आने में, उसके लिए माज़रत।” और ज़र्द पड़ते गुलाब के फूल जैसे गात वाली मन्नो एक नज़र भर मुझे देखे और थकान से चूर बदन लिए कुर्सी पर जा पसरे। अंदर से नौकरानी आकर कहे , “आए थे तो इत्तेला देते बीबी साहब का कुछ सामान मंगवा लेते।” 

    और मैं मन्नो की कही पंक्ति ही दोहरा दूँ। ‘यहाँ न कुछ लाना ही ठीक है और ना कुछ ले जाना’… पर देखो ना, मैं बेवकूफ़ दिल में तुमसे मिलने की ख़्वाहिश लिए कितनी दूर से आया हूँ, साथ ले जाने के लिए तुम्हारी यादें।’ यादें ले जाने में तो कोई नुक़सान नहीं ना मन्नो…!

    इन बंगलों के बीच, भवाली सेनिटोरियम की मुख्य इमारत है। जिससे अस्पताल का काम लिया जाता है।  चारों तरफ़ दरख़्तों से घिरी हुई और पीछे की तरफ़ अंतहीन जंगल। और आँख मिचौली खेलते सफ़ेद, कभी सियाह बादलों के घेरे। क्या ग़ज़ब जगह है भवाली भी, पल में बादलों का जत्था आता है और पूरे शहर को अपने क़ब्ज़े में ले लेता है, सड़कों पर, दरख़्तों पर जैसे कोई अपनी ज़ुल्फ़ें बिखेर दे। आज भी अस्पताल में तक़रीबन डेढ़ सौ टीबी के मरीज़ दाख़िल हैं। जो जल्द से जल्द भवाली की जीवनदायिनी वायु से अपने फेफड़ों को ठीक कर घर जाना चाहते हैं। लौटना कौन नहीं चाहता लेकिन क्या सभी लौट पाते हैं?

    आज तो तब भी अधिकतर लोग वापस लौट जाते हैं। एक समय था जब इस बीमारी की भेंट चढ़े लोग यहीं मिट्टी में मिल जाते थे। घर वाले भी बीमारी के डर से अपने परिजन की लाश नहीं ले जाते थे। 

    अस्पताल के पास ही एक पंक्ति में छोटे-छोटे कॉटेज बने हैं। और हर कॉटेज में दो बिस्तर। जिन पर दूर-दूर से आए मरीज़ लेटे हैं। कुछ बरामदे में बैठे धूप का आनंद ले रहे हैं इसे आनंद लेना कहूँ या अकेले पत्थर जैसे समय को काटना। समझ नहीं आता। तभी सामने से मुझे एक नर्स आती दिखाई देती हैं। वो अपने केबिन की तरफ़ जा रही हैं। मुझे देख कर पूछती हैं, “कहिए, आपको किस्से मिलना है?”

    “क्या कहूँ? मन्नो से, रवि से, निगम से या माया से?”

    “मैं कहता हूँ मुझे किसी से नहीं मिलना। मैं तो ऐसे ही घूमने आया हूँ।” एक पल को उन्होंने मुझे ऐसे देखा जैसे पूछ रही हों टीबी सैनिटोरियम में कौन घूमने आता है?

    ‘घूमिए, उधर भी कुछ अच्छे बंगले और कॉटेज हैं? हॉस्पिटल की दूसरी तरफ़ इशारा करके उन्होंने कहा।

    “क्या आप मुझे इस सैनिटोरियम के बारे में कुछ बता सकती हैं?” मैंने पूछा।

    “यह सैनिटोरियम बहुत पुराना है। अंग्रेज़ों के ज़माने का। यहाँ काफ़ी बड़े-बड़े लोग बीमारी का इलाज कराने के लिए रह चुके हैं। अब तो यहाँ इलाज काफ़ी हद तक मुफ़्त ही है।” उन्होंने बताया।

    “क्या अब भी यहाँ मरीज़ पहले की तरह आते हैं या कुछ कम हुए हैं?”

    “टीबी ला-इलाज भी नहीं रही तो मरीज़ भी कम ही आते हैं। लेकिन एक समय था जब यह सैनिटोरियम भरा रहता था। पूरे देश से लोग यहाँ आते थे। अमीरों और ज़मींदारों के लिए अलग से बँगले बने थे, वह महँगा किराया चुका कर कई बार यहाँ अपना अंतिम समय टीबी से लड़ते काटते थे।” उन्होंने कहा।

    “और ग़रीबों के लिए?”

    “ग़रीबों के लिए, यह कॉटेज देख रहे हैं ना आप। इन्हीं का सस्ती दरों का किराया देकर लोग इलाज कराते थे”

    “और अगर किसी पर किराया देने के लिए पैसे ही न हों?” अचानक से मैं कह गया।

    “बिना पैसे के आज भी क्या होता है, जो पहले कुछ होता। उन्हें कॉटेज की सुविधा भी नहीं मिल पाती थी।”

    आज जो आप भवाली को देख रहे हैं वह हमेशा से ऐसी नहीं थी, पहले ऐसी रौनक़ कहाँ थी। आपकी तरह टूरिस्ट भी कहाँ आते थे। उस समय लोगों में टीबी का इतना ख़ौफ़ था कि बाज़ार में गाड़ियाँ तक नहीं रोकी जाती थीं।”

    उनके केबिन से थोड़ा नीचे कुछ बंगलों के अवशेष दिखाई दे रहे थे। मैंने उनसे पूछा, “क्या मैं यहाँ घूम सकता हूँ?”

    “देखिए घूम तो लीजिए, पर आजकल बरसात का मौसम है बहुत से जंगली जानवर ख़ासकर साँपों की भरमार है यहाँ”

    “फिर मैं बस थोड़ा ही आगे जाकर देख लेता हूँ। जहाँ तक घास कुछ कम है।”

    नरम मखमली घास को रौंदता हुआ मैं उस बंगले के कुछ क़रीब पहुँचा। रवि तुम्हें शिकवा था ना…”बरसों से दरवाज़े और खिड़कियों पर लदे पर्दों में हलचल पैदा करने, उनको लहराने के लिए कोई नहीं आता।” देखो…आज मैं आया हूँ! लेकिन दर-ओ-दरवाज़े में अब कोई भेद नहीं रहा। हर तरफ़ हरी घास और जंगली पौधों का अतिक्रमण है या कहूँ तो उन्होंने धरती पर अपना क़ब्ज़ा वापस ले लिया है, जैसे तुमने मिट्टी पर। तुम कहीं नहीं हो लेकिन फिर भी इस जगह मैं तुम्हें महसूस कर सकता हूँ। तुम कण-कण में समाए हो, हवा में तुम्हारा लम्स है। दरख़्तों पर जमी काई तुम्हारे इंतज़ार का प्रत्यक्ष प्रमाण है। 

    खंडहर हो चुके बँगले को देखता हूँ कि सब कुछ मिट्टी हो चुका है और मिट्टी से उभरे रस को पीकर कुदरत पर फिर जोबन आया है। फिर कुछ अरसे बाद सब मिट्टी हो जाएगा, ये खंडहर भी और फिर एक बार किसी ठूँठ से कोंपल फूटती दिखाई देगी। फिर पहाड़ पर बसंत आएगा। फिर फूल खिलेंगे, फिर शाख़ों पर परिंदे चहचहायेंगे। यही तो जीवन चक्र है।  

    रवि, तुम एक बार प्रेम से मुँह मोड़ कर गए थे ना, देखा वही प्रेम तुम्हें फिर यहाँ खींचे ले आया। कितना याद करती थी मन्नो तुम्हें और तुम, मिलना तो दूर एक चिट्ठी भी न लिख पाए। दुनिया गोल है रवि सब हमारे आगे आता है। आज जब तुम इक छोटे से कमरे में पड़े अपने बच्चों को , अपनी बीवी को गले लगाना चाहते हो, उनको यहीं रख लेना चाहते हो। पर वह तुमको छोड़ जल्दी जल्दी सर्पाकार सड़क से उतरते जा रहे हैं। देखने के अलावा तुम कर भी क्या सकते हो, याद है मन्नो भी तुमको ऐसे ही देखती रही थी, वह भी…देखने के अलावा कर क्या सकती थी।

    तुमने कहा था “जो प्यार तन में जगता है, तन से उपजता है, वही देह पाकर दुनिया में जी भी जाता है।” लेकिन मैं कहता हूँ रवि, तन का प्रेम नश्वर होता है। जो प्रेम मन में जगता है, मन से उपजता है वह अमर हो जाता है। तुम्हारा प्रेम मन से था वह अमर था, अमर है, अमर रहेगा। 

    दोपहर ढलने लगी है। रामगढ़ से आती शीतल हवा के झोंके पेड़ों पर अपना सर पटक रहे हैं, ज़र्द पत्तों की झड़ी लगी है। ऊपर नज़र उठा कर देखता हूँ। सावन के महीने में दो विशालकाय वृक्षों पर पतझार के चिह्न दिखाई देने लगे हैं उन्हीं की ओट में एक खंडहर-नुमा पीला बंगला अपनी आख़िरी साँसें गिन रहा है। जिसे देखकर मुझे माया याद आती है।

    माया, आगरा के समृद्ध वकील की तीसरी पत्नी। जो टीबी की बीमारी का इलाज करवाने के लिए अपने जेठ जी के साथ भवाली में रह रही है। और याद आता है “जरा और मृत्यु पर जीवन की विजय” का एक चित्र बनाने की चाहत रखने वाला निगम। जो प्राकृतिक वातावरण से शिफ़ा पाने के लिए डॉक्टर की सलाह पर भवाली आया है। वैसे गौरतलब है कि इस कहानी के लेखक यशपाल स्वयं भवाली सेनिटोरियम में रहे हैं कई बार गुमान होता है कि कहानी का निगम, कहीं यशपाल ही तो नहीं। 

    आँखों के आगे दृश्य उभरने लगते हैं। बंगले के इन धराशायी स्तम्भों से लगकर माया अपना फोटो खिंचवाने के लिए पोज़ देकर बैठी है। और निगम एक निरावरण युवती की फोटो दिखा उससे मज़ाक़ कर रहा है कि यही आपकी फोटो है आपने ही तो कहा था कपड़ों की फोटो थोड़ी खिंचवानी है। देखता हूँ माया का मुख लज्जा से लाल हो गया है। 

    माया को उस की सुंदरता के प्रति आश्वस्त करने वाला निगम, उसके मन में फिर से जीवन के प्रति चाह पैदा कर बरसात के भीगे मौसम में बिस्तर पर तन्हा प्यासी बदली के समान छोड़ जाएगा। क्या उसने कभी सपने में भी सोचा था। सच कहती हैं स्त्रियाँ सब पुरुष एक जैसे ही होते हैं। 

    सोचता हूँ अगर इसी सैनिटोरियम में अपने-अपने बंगलों के बाहर कभी मन्नो और माया साथ में बैठी होतीं तो कुछ यूँ बातें करतीं। 

    मन्नो – क्या बात है माया, आज कल बहुत ख़ुश रहने लगी हो। तुम्हें प्रसन्न देखकर मुझे बहुत हर्ष होता है।

    माया – बस ऐसे ही अब यहाँ दिल लगने लगा है।

    मन्नो (माया को छेड़ते हुए) – हाँ, देख रही हूँ। बहुत लंबी-लंबी सैर पर भी जाने लगी हो।

    माया (झेंपते हुए) – वो..वो निगम ज़िद करते हैं कि भाभी दिन भर घर में गुम-सुम सी रहती हो। मेरे साथ ही सैर पर चल दिया करो तुम्हारा ध्यान बँटेगा। आजकल रवि दिखाई नहीं देते?

    मन्नो – (एक लंबी साँस छोड़ कर कुछ देर शांत रही) अब वो यहाँ नहीं रहते। सुना है घर वापस लौट गए हैं। इतना कहकर स्वेटर की बुनाई पर ध्यान देने लगी। 

    माया – उनका जाना बहुत अखरता होगा। उनके रहते कुछ साथ हो जाता था। 

    मन्नो – जब अपनी साँसें भी साथ देने से कतराने लगें तो किसी और से उम्मीदें बाँधना बेमानी है माया। इतना कह कर सामने उठते बादलों के घेरों पर ध्यान लगाए बैठी रही।

    क्या उस दिन मन्नो की बातों का मर्म माया ठीक से समझ पाई होगी? नहीं। लेकिन पीले बंगले के बिस्तर पर पड़ी माया को क्या मन्नो का अंतिम वाक्य याद न आया होगा।

    पीछे से शाने पर एक हाथ रखा पाया तो याद आया कि मैं तक़रीबन 20-25 मिनट से मूर्तिवत इधर खड़ा हूँ और हॉस्पिटल की नर्स और कॉटेजों के बाहर खड़े मरीज़ मुझे तब से उत्सुकता से देख रहे हैं। नर्स ने मुझसे पूछा, “क्या आप ठीक हैं”।

    “जी हाँ, मैं बिल्कुल ठीक हूँ।” 

    मैंने उनसे जानना चाहा कि कमला नेहरू कॉटेज इस सैनिटोरियम में  किधर होगा? जी हाँ,जवाहर लाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू का कॉटेज। 1935 में जब उन्हें टीबी हुई थी तो तक़रीबन दो माह वह इस सेनिटोरियम में रही थीं। बाद में उन्हें स्विट्ज़रलैंड भेज दिया गया था जहाँ 1936 में उनका देहांत हो गया। भवाली सैनिटोरियम में वह कॉटेज जिसमें कमला नेहरू रहती थीं, वह उनकी स्मृतियों को समर्पित है। 

    नर्स ने बताया कि सैनिटोरियम की मुख्य बिल्डिंग के दूसरी तरफ़ वह कॉटेज है। हम मुख्य बिल्डिंग से जब सीढ़ियाँ उतर रहे थे तो मोहित नेगी के पैरों के बराबर से साँप का बच्चा निकला। अचानक हमारे आगमन से वह भी डर कर एक तरफ़ को भागा और हम भी दूसरी तरफ़ को ठिठके। 

    कमला नेहरू कॉटेज, एक छोटा सा कमरा था जिसके बाहर उनके नाम का बोर्ड और वहाँ निवास करने का समय लिखा था। कॉटेज ख़स्ता हालत में था। कहते हैं जब कमला नेहरू को 1935 में टीबी हुई तो उस समय जवाहरलाल नैनी जेल में क़ैद थे। कमला इस कॉटेज में आईं तो जवाहरलाल को भी अल्मोड़ा जेल में स्थानांतरित कर दिया गया। जवाहरलाल नेहरू, कमला जी से मिलने अक्सर यहाँ आते थे। 

    कॉटेज के सामने के मंज़र बड़े लुभावने थे बिल्कुल किसी पेंटिंग सरीखे। वैसे भी बरसात का मौसम था। क़ुदरत पर जोबन छाया था ऐसे में पहाड़ पर जिधर देखो उस पेंटर की बनाई पेंटिंग्स ही नज़र आती हैं। बरामदे में बहुत बड़ी-बड़ी घास उगी थी। बराबर में और नीचे दो बंगले ख़स्ता हालत में थे दीवारें टूटी थीं। पत्थर और मिट्टी की बनी दीवारों पर हरियाली उगी थी। जैसे ग़ालिब ने इसी लिए शेर कहा था। 

    उग रहा है दर-ओ-दीवार पे सब्ज़ा ‘ग़ालिब’

    हम बयाबाँ में हैं और घर में बहार आई है

    अब और आगे जाने की हिम्मत कौन करता। सीढ़ियों पर ही नागराज के दर्शन हो गए थे। मैं वहीं से वापस लौट आया और सेनिटोरियम की मुख्य बिल्डिंग के बाहर की सड़क के किनारे बैठ गया।

    शाम ढल रही है। यहाँ से हॉस्पिटल के पीछे फैले जंगल को निहार कर बड़ा सुकून मिल रहा है। सड़क से हॉस्पिटल के ऊपर पहाड़ की चोटी पर बसे अपने गाँव की तरफ़ पैदल ही लोग जा रहे हैं। नीचे हॉस्पिटल के पीछे जंगली हिरनों के जोड़े घास चर रहे हैं और सामने क्षितिज पर बादलों के घेरे अरुणाभ हो गए। सूरज ढलते ही मानो यह कहानी ख़त्म हो जाएगी। बादलों के घेरे फिर भी होंगे पर साफ़ दिखाई न देंगे।  जैसे मन्नो, रवि, माया और निगम सब यहाँ हैं लेकिन हर किसी को दिखाई नहीं देते। दिन निकलते ही वह यहाँ घूमते नज़र आते हैं और शाम ढलते ही बादलों के घेरों में खो जाते हैं और एक दिन मैं और आप भी इन्हीं बादलों के घेरों में ऐसे ही समा जाएँगे।

    अँधेरों के आगे वही फिर सवेरे

    वही फूल पंछी, वही मेघ-घेरे

    इसी ख़ाक से फिर उभर आएँगे हम

    नहीं ख़त्म होंगे ये जोगी से फेरे।

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