• स्मरण
  • धर्मेंद्र पा’जी आप तो मोहब्बत का सबसे खूबसूरत नाम थे

    1970-80 के दशक में जो लोग बड़े हो रहे थे धर्मेंद्र उनकी यादों में तरह-तरह से बसे हैं। इसी तरह अपने बचपन की स्मृतियों में बसे धर्मेंद्र को याद किया है शायर और पुलिस अधिकारी सुहैब अहमद फ़ारूक़ी ने। आइये पढ़ते हैं- मॉडरेटर

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    “मैं तो अपनी ख़ूबियों में भी ख़ामियाँ तलाश करता रहता हूँ… कि कहीं चाहने वालों का मुक़ाम न खो दूँ।”

    हज़रात! कल से ज़ेहन को लगातार कुरेद रहा हूँ कि मुझमें नक़्श धर्मेंद्र की पहली याद कौन-सी है और कब से है। अब तक नाकामयाब हूँ। वजह यह है कि जितनी मेरी ज़िंदगी है, लगभग उतनी ही इस लेजेंड की फ़िल्मी उम्र भी है। कहने का मतलब यह कि सांसों का हिसाब कैसे रखा जाए—पहली कौन-सी है और दूसरी कौन-सी? धर्मेंद्र साहब मेरे जैसे बॉलीवुडीय खाद्य-सामग्री पर जीने वाले जीवों के रक्त में ऑक्सीजन की तरह विद्यमान हैं और रहेंगे।

    कलाकार के रूप में मुझे धर्मेंद्र की पहली फ़िल्म ‘आस-पास’ याद है, जिसने 11–12 वर्ष के, शुरू होती किशोरावस्था वाले ज़माने में मुझे स्त्री–पुरुष के बीच की इमोशनल बॉन्डिंग पहली बार समझाई थी। इससे पहले मेरे लिए फ़िल्म देखने का मतलब हीरो–हीरोइन द्वारा बागों में गाना–नाचना, बीच-बीच में कॉमेडियनों की हरकतों पर लोटपोट होकर हँसना, विलेन के आते ही डरकर किसी बड़े के पास सिमट जाना, और क्लाइमैक्स में हीरो के साथ तन्मय होकर ‘ढिशुम-ढिशुम’ करते रहना था—जब तक पुलिस आकर विलेन को पकड़ न ले। फिर शादी के फ्रेम के साथ हैप्पी एंडिंग का ‘The End’।

    1981 की सर्दियों में यह फ़िल्म देहरादून के कनक टॉकीज़ में सपरिवार देखी थी। पापा के साथ हमारी स्थापित मासिक चर्या फ़िल्म देखना थी। मेरी कोशिश रहती थी कि पापा के पास बैठूँ, लेकिन दोनों छोटे भाई–बहनों और अम्मी के कारण यह सीटिंग प्लान अक्सर संभव नहीं हो पाता था। मगर उस दिन देर से पहुँचने पर अंधेरे हॉल में मनचाही सीट किसी को नहीं मिल सकी और मुझे पापा की बाईं ओर की सीट मिल गई। पहली बार किसी फ़िल्म को पापा के नज़रिए से देखा।

    फ़िल्म भी अपनी पहली तिहाई तक रूटीन हिंदी फिल्मों की तरह हँसने–हँसाने और गाने–नाचने तक ही चली। लेकिन धर्मेंद्र के जीजा प्रेम चोपड़ा की नीयत जब हेमा मालिनी पर पड़ी तो मुझे पहली बार असहजता महसूस हुई। पहली बार जीजा का रिश्ता अपवित्रता की ओर बढ़ता देखा। हँसते-खेलते पारिवारिक रिश्तों की परिधि में धर्मेंद्र को पहली बार विवश देखा—जब उसे पता चलता है कि हेमा मालिनी की मौत यूँ ही नहीं हुई, बल्कि उसकी बहन के सुहाग, उसके सगे जीजा—जिसके साथ उसने परिवार का हर सुख बाँटा, जो घर का बड़ा सदस्य था—के द्वारा ढाए गए शारीरिक और मानसिक अत्याचारों के कारण हुई है। धर्मेंद्र के चेहरे पर ग़ुस्सा तो देखा, लेकिन यह ‘शोले’ या ‘राम–बलराम’ वाला गरज–बरस का ग़ुस्सा नहीं था; यह भीतर की वह आग थी जो इंसान को चुपचाप भीतर से जलाती है—क्योंकि अपराधी कोई और नहीं, उसका अपना जीजा है… परिवार के भीतर छुपा राक्षस।

    अंत में, जब फ़िल्म फ्लैशबैक से बाहर आती है, धर्मेंद्र के चेहरे पर जो इमोशंस थे, वे स्पीचलेस थे। ट्रेडिशनल ‘The End’ की जगह आए “People die, love never dies” कैप्शन के साथ पापा के मुख से निकले शब्द—“What an ill-fated man!”—मुझे आज तक याद हैं।

    धर्मेंद्र साहब के जन्म, परवरिश, पढ़ाई, संघर्ष, फिल्मोग्राफी, रोमांस, शादी(यों)—इन सबका ज़िक्र मैं नहीं करना चाहता। ये विवरण तो आप लोगों ने कल से अब तक विभिन्न एक्सक्लूसिव और खोजपरक लेखों में, खोजकर्ताओं के कॉपीराइट टैग्स के साथ पढ़ ही लिए होंगे।

    देहरादून से स्योहारा (बिजनौर) आकर बसने पर मैंने धर्मेंद्र की बहुत-सी फ़िल्में टीवी और सिनेमा हॉल में देखीं। उन दिनों स्योहारा में एक ही टॉकीज़ ‘मयूर’ था। याद पड़ता है कि नई फ़िल्म को छोड़कर कोई भी दूसरी फ़िल्म पूरे हफ्ते नहीं चल पाती थी। अगले शुक्रवार तक बीच के दिनों में अक्सर धर्मेंद्र की पुरानी फ़िल्मों के प्रिंट्स ही पिक्चर हॉल की नैया पार लगाते थे। शायद ही कोई महीना ऐसा जाता हो जब धर्मेंद्र की तीन फ़िल्में न लगें।

    उच्च शिक्षा के लिए दस पिक्चर हॉल वाले शहर मुरादाबाद में पहुंचने पर, अपने जेब-खर्च और उदार सीनियर्स की मेहरबानी से, धर्मेंद्र की खूब फ़िल्में देखीं। मुझे अच्छी लगने वाली फ़िल्मों में सल्तनत, हुकूमत, ग़ुलामी और बंटवारा शामिल थीं। हमारे यानी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धर्मेंद्र का अलग ही जलवा था। जिम-विहीन उन दिनों में हर गबरू जवान को धर्मेंद्र की उपमा दी जाती थी।

    मैंने कहीं पढ़ा था कि धर्मेंद्र मज़ाक में कहते थे—“मेरी बॉडी जिम की नहीं, गाँव की साइकिल और खेतों की है। दूध बेचने की साइकिल ने मुझे ही-मैन बना दिया!”

    और अब, जब यह ख़ामोश पहाड़ भी दुनिया से रुख़्सत हो गया, तो एहसास होता है कि हमारे बचपन, हमारी युवावस्था और हमारे सपनों को थामे रखने वाला एक युग सचमुच ढल गया है। धर्मेंद्र के जाने के साथ जैसे भारतीय सिनेमा की आकाशगंगा से सबसे उज्ज्वल तारा टूटकर गिर गया।

    लुधियाना का जट्ट—जो कद–काठी और आत्मविश्वास लेकर मुंबई आया, हुस्न का देवता बना, ड्रीम गर्ल को जीता, अरबों दिलों पर राज किया। जो कहते रहते थे, “मैं तो अपनी खूबियों में भी खामियाँ तलाश करता रहता हूँ… कि कहीं चाहने वालों का मुक़ाम न खो दूँ।” अब यह वाक्य अमर हो गया है।

    लोग चले जाते हैं… मोहब्बत नहीं।
    और धर्मेंद्र पा’जी आप तो उस मोहब्बत का सबसे खूबसूरत नाम थे, हो… और रहोगे।
    अलविदा।
    और क्या अहदे वफा होते हैं…
    लोग मिलते हैं जुदा होते हैं।।

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