आप मुझे देख सकते हैं? मुझे लगा मैं इनविज़िबल हूँ!

आज पढ़िए प्रसिद्ध लेखिका सुजाता का लेख, जिसमें ‘कला’ फ़िल्म को आधार बनाते हुए उन्होंने स्त्रियों को लेकर समाज के स्टीरियोटाइप्स के बारे में लिखा है। सुचिंतित और शोधपरक लेख। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

========================

सिगमण्ड फ्रॉयड और मर्दाना दुनिया में (प्रतिभाशाली) औरतों की अदृश्यता: फिल्म क़ला के संदर्भ में

  • सुजाता

एक लड़की झल्लाई हुई पेड़ पर चढने की कोशिश कर रही थी. कभी उसका फ्रॉक कहीं अटक जाता था. कभी उसकी रिबन खुल जाती और आँखें बालों से ढँक जाती. नीचे खड़े लड़के उसकी पैंटी का रंग देखकर चिल्ला रहे थे- “हमने कहा था, लड़की हो तुमसे यह नहीं होगा” वह अड़ी रही और निबौरियाँ तोड़-तोड़कर लड़कों पर फेंकने लगी. लड़के और हँसने लगे. निबौरी से चोट तो क्या लगनी थी, बस लड़की की खीझ और नाराज़गी ज़ाहिर हो रही थी. लेकिन, वह चढ गई. शाम को घर पर माँ ने भाई के शिकायत करने पर कहा “लड़कियाँ पेड़ पर नहीं चढतीं! आगे से मत करना.”

न, कहानी नहीं लिख रही हूँ. उस मनोविकार की बात कर रही हूँ जिसे मनोविश्लेषणवाद के जनक सिगमण्ड फ्रॉयड ने ‘पेनिस एन्वी’ कहा. कोई लड़की पेड़ पर इसलिए नहीं चढना चाहती कि उसकी इच्छा है, बल्कि लड़के ऐसा करते हैं, उन्हें यह सब करने की आज़ादी है, बस इसलिए स्पर्धा में, ईर्ष्या से लड़की ऐसा करना चाहती है. सिमोन द बुवा जैसी फ्रेंच फेमिनिस्ट ने बाद में पेनिस एन्वी की ढंग से आलोचना की और समझाया भी कि लड़की पेड़ पर चढती है क्योंकि वह पेड़ पर चढना चाहती है, इसलिए नहीं कि लड़के पेड़ पर चढते हैं और उसे उनसे एक होड़ है. परेशान वह इसलिए है कि उसकी स्वाभाविक इच्छा को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है, बुरा कहा जा रहा है, होड़ माना जा रहा है और लड़के की स्वाभाविक इच्छा को स्वाभाविक माना जा रहा है. लड़की में बचपन में कुछ ईर्ष्या होती भी है तो उसकी वजह है लड़कों की मज़बूत सामाजिक स्थिति! न कि पेनिस का अभाव. शायद ही लड़के-लड़कियों को पाँच-सात साल की उम्र तक एक दूसरे के जननांग के बारे में ठीक से मालूम होता है. लेकिन लड़कों को हमेशा मुख्य और महत्वपूर्ण की तरह देखा जाता है, आज़ादी और पॉवर मिलती है यह सबको दिखाई देता है. घर में बहन अपनी स्थिति को बेहद कमज़ोर पाती है. अंतर तलाशती है तो बस एक दिखाई देता है कि दोनों अलग तरीके से टॉयलेट में निवृत्त होते हैं. लड़के के पास कुछ ऐसा है जो उसके पास नहीं है कि वह भी खड़े होकर मूत्र विसर्जन कर सके. समाज इसे अभाव की तरह लड़की के भीतर रोपता है. यह शिश्न न होने की जलन नहीं है, किसी लड़की के भीतर यह ख़ुद को किसी लड़के के मुक़ाबले कमज़ोर स्थिति में पाने की चिढन या खीझ है जिसका हर कारण पितृसत्तात्मक व्यवस्था में है न कि स्त्री-देह के भीतर. फ्रॉयड ने औरत में लिंग न होना हमेशा एक अभाव की तरह ही देखा. यानी कहा जा सकता है कि फ्रॉयड के हिसाब से एक स्त्री तभी पूर्ण स्त्री बनती है जब वह अंतत: स्वीकार कर ले कि उसकी सामाजिक अवस्थिति मर्द से कमतर है. उस स्त्री की यौनिकता और अस्तित्व दिक्कत में आ जाते हैं जो यह सच स्वीकार नहीं कर पाती.

विरासत कैसे आगे बढेगी?: अब फ्रॉयड और स्त्रीवादियों के मतों को समझने का सबसे अच्छा तरीका है कि फिल्म ‘क़ला’ पर बात कर ली जाए. क़ला अपने जुड़वा भाई के साथ एक संगीतज्ञ के परिवार में पैदा होती है, माँ उर्मिला देवी भी कमाल की गायिका है लेकिन पिता तो पंडित थे. जुड़वाँ बच्चों के जन्म से पहले उनकी मृत्यु हो चुकी है. क़ला का जुड़वा भाई जन्मते ही मर जाता है. लेकिन, क़ला की उर्मिला देवी  के भीतर ज़हर रोप जाता है डॉक्टर का यह वाक्य कि ‘कभी-कभी ज़्यादा मज़बूत बच्चा दूसरे का पोषण भी ले लेता है’ इसलिए जुड़वा में से एक बच नहीं पाता. अब क्या करे? जिसे गँवा दिया वह लड़का था! यह जानना फिर से फ्रॉयड की उसी थियरी की तरफ ले जाता है जिसमें वह कहते हैं कि एक औरत जीवन भर पेनिस के अभाव से जूझती है और जब बेटे की माँ बनती है तो उसे लगता है उसे शिश्न वापस मिल गया. यह उसके अभाव को ख़त्म करता है और पूर्णता से भर देता है. इसी असर में क़ला की माँ का दिमाग़ दो-फाड़ हो गया है. बेटी है तो क्या, संगीत की शिक्षा उसे दी जा सकती है. लड़का जीता रहता और क़ला मर जाती तो? उसे संगीत सिखाया जाता, घराना चलता रहता, पंडित के बाद एक और पंडित तैयार हो जाता.

क़ला की संगीत शिक्षा शुरु होती है. माँ सख़्त गुरु है. उसे मालूम है कला को हासिल करने के लिए बेहद कठोर साधना करनी होगी. वह निर्मम हो जाती है क़ला के साथ. लेकिन क़ला क्या चाहती है? किसी ने उससे पूछा? उसे ख़ुद यह लगता है कि यह बेहद ग़ैर-ज़रूरी सवाल है कि वह क्या चाहती है, ज़रूरी यह है कि माँ क्या चाहती है. आख़िर माँ के पास बेटा होता तो वह उसे सिखा कर पंडित बना देती. उस जगह को भरने के लिए जो बेटे से ख़ाली है, मुझे दोगुनी कोशिश करनी होगी. यह कोशिश संगीत सीखने के ज़्यादा माँ की उम्मीदों पर ख़रा उतरने की कोशिश में घटित होती है, माँ का प्यार पाने का एक ही तरीक़ा है कि उसे उस बेटे की कमी न ख़ले जिसे उसने अपने ख़यालों में पाना चाहा और जो उसका जीवन सार्थक कर सकता था. माँ की कुंठा बेटी क़ला में एक और तरह की कुंठा भरती जाती है जहाँ वह माँ की नज़र में ज़रा सा महत्व पाने के लिए ख़ुद को दबाती चली जाती है. और एक दिन एक संगीत स्पर्धा में मिल जाता है मानो वह खोया हुआ बेटा. एक अनाथ लड़का जगन जो गुरुद्वारे में पला लेकिन कमाल का गायक है. माँ उसे घर ले आती है संगीत की विरासत का उत्तराधिकारी बनाने के लिए. उत्तराधिकारी तो लड़का ही हो सकता है, पितृसत्तात्मक सोच को सिद्ध करने की ज़रूरत नहीं.

प्रतिभाओं की तुलना : माँ पिता की खड़ाऊ सिंहासन पर रखकर शासन कर रही है. वह स्वयं एक प्रतिभावान स्त्री है लेकिन स्त्री-द्वेष को आत्मसात कर चुकी है. जिस आयोजन में क़ला और वह अनाथ लड़का गाने आता है वहाँ माँ के उस्ताद कहते हैं- लड़की की आवाज़ में मिसरी खुली है, ठुमरी तो वैसे भी तुम्हारी विरासत है. उर्मिला देवी कहती है, ना, मेरी नहीं, पिता की विरासत चाहिए, पंडित नहीं हो सकती यह.

कजरी, ठुमरी जैसे स्त्रियों के गायन और लोकगीतों को तथाकथित सभ्य समाजों ने अच्छी निगाह से कब देखा है? मुझे याद आता है जब रामनरेश त्रिपाठी ने जब ‘चाँद’ पत्रिका में विज्ञापन के ज़रिए स्त्रियों से उनके प्राचीन गीत मंगाए संकलन तैयार करने के लिए तो स्त्रियों ने उन्हें दादरा, ठुमरी, ग़ज़ल भेजी. इसके बारे में उन्होंने लिखा कि ‘मुझे दुख है कि कैसे निम्न स्तर के गीत भेजे गए हैं मुझे’ ज़ाहिर है कि उन्हें हटाना पड़ा होगा. आधुनिक साहित्य के बारे में लेखन की शुरुआत स्त्रियों के गीतों के इस ‘शुद्धिकरण’ के प्रोसेस से भी जुड़ी है. ऐसा शुद्धिकरण जिसमें स्त्रियों का रचा बहुत कुछ भद्दा, डाउनमार्केट और अश्लील समझकर मिटा दिया गया. उसे सहेजा नहीं जा सका. प्रतिभा और स्तर दोनों का नियामक मेनस्ट्रीम है जिसपर कुलीन पुरुष का वर्चस्व हमेशा से रहा.

उस्ताद कहते हैं- दोनों अलग हैं, दोनों की तुलना क्यों करती हो?

लेकिन तुलना तो होती आई है, प्रतिभा का मतलब पुरुष की प्रतिभा. ख़ुद को साबित करना है तो उससे मुक़ाबला करना होगा. या प्रतिभाहीन समझ कर ख़ुद को संतुष्ट रखना होगा सबॉर्डिनेट की भूमिका से. क्या क़ला तैयार थी?

विदड्रावल सिम्पटम्स : पेट्रियार्क माँ का इंफ्लुएंस क़ला पर इतना तगड़ा है कि क़ला का पूरा अस्तित्व ही माँ से वैलिडेशन हासिल करके ज़िंदा रह पाता है. उसकी आत्म-छवि बेहद कमज़ोर है, और जैसे-तैसे माँ को ख़ुश करते रहकर उसका जीवन कट रहा है कि अचानक यह भाई गोद ले लिया जाता है और अब शुरु होती है क़ला के भीतर के कलाकार के अस्तित्व की बेचैनी और संकट. जो लड़की अभी तक खोये बेटे का कम्पंसेशन थी अब अचानक बेटी के परम्परागत रोल में क़ैद कर दी जाती है. वह अब गाएगी नहीं, जगन के खाने-पीने का ध्यान रखेगी, उसे लड़के वाले देखने आएंगे और वह ‘अपने घर’ जाएगी.

माँ के प्यार और तारीफ़ के लिए तरसती हुई क़ला का जीवन पलट गया है. क़ला कहती है कि उसे माँ के पास ही रहना है और शादी ज़रूरी है तो जगन से ही शादी कर लेती हूँ ताकि इसी घर में रह जाऊँ. ‘भाई से शादी!’ कितना भ्रष्ट दिमाग़ है लड़की का! खोए बेटे को पाकर उर्मिला देवी की ममता सम्पूर्ण हो चुकी है लेकिन क़ला को तो न सिर्फ विरासत से वंचित किया जा रहा है, बल्कि घर से भी और उस ममता से भी जो मिली नहीं लेकिन जिसके मिलने की आस उसका सहारा है. `

क्या मैं आपको दिख रही हूँ? : जगन जब उर्मिला देवी के साथ घर आता है तो उर्मिला देवी कहती है अब यह यहीं रहेगा, इसके लिए दूध ले आओ. दिल कचोटता है लेकिन छन से टूटता है जब जगन कहता है- तुम गाती हो न, उर्मिला देवी कह रही थीं? क़ला पूछना चाहती है कि माँ ने और क्या बताया उसके बारे में तो जगन जवाब देता है- यही कि तुम गाती हो और मेरा साथ दोगी तानपूरे पर.

क़ला धीरे-धीरे मानो सबको दिखना बंद हो जाती है. जगन के लिए संगीत की सभा का आयोजन किया जाता है. जगन को ही फिल्म इंडस्ट्री में सेट करने की कोशिश चल रही है. यहीं वह कमाल का दृश्य है जो मुझे बेहद कलात्मक लगा. जैसे किसी उपन्यास के भीतर चली आई हूँ जो पात्र के अवचेतन में लिए जा रहा है मुझे. फिल्म इंडस्ट्री के महत्वपूर्ण लोग आए हैं, संगीत सभा का दृश्य है, जगन का परफॉर्मंस होने वाला है, सब उसके बारे में बात कर रहे हैं, उसे ही पूछ रहे हैं, वह आने वाला है, क़ला सुंदर गाती है लेकिन संगीत वालों की इस दुनिया में हर कोई उससे बेखबर है. उर्मिला देवी कान में फुसफुसाती है- जगन की परफॉर्मंस शुरु होने वाली है, तुम यहाँ क्या कर रही हो? जाओ उसके लिए दूध ले आओ! आस-पास की दुनिया उसे कुछ और दिख रही है, लोग उसे खुराफाती, रहस्यमयी और घुन्ने दिख रहे हैं, उसका अवचेतन उसपर हावी हो रहा है, काले पंख हाथ में लहराती लड़कियाँ उसके करीब आ गई हैं, काली स्याही उसके इर्द-गिर्द फैल रही है, वह अपनी चेतना और अवचेतन के बीच मानो सभी बांध तोड़ रही है, वह किसी भाव के वशीभूत हो रही है जो बचपन के दमन से उपजा है. दूध लेकर नीम अंधियारे गलियारे में चल रही है तो एक सफल प्लेबैक गायक पूछता है- कैसी हो? क़ला कहती है- “आप मुझे देख सकते हो? आई थॉट आई वाज़ इनविज़िबल” वह पलट कर कहता है- “ तुम्हें कोई कैसे भूल सकता है!” क़ला मासूमियत से कहती है “मैं भी गाती हूँ पता है!”और बढकर उसके होंठ चूम लेती है. उसने रात ही को माँ को उसके करीब होते देखा था, जिसका साफ़ मकसद था जगन के लिए एक लॉन्चिंग पैड तैयार करना. वह गायक धीरे से क़ला को पीछे हटाता है एक अस्वीकरण के भाव के साथ. जो देख सकता है उसके पास भी मेरे लिए अस्वीकार है, क्या जगन की वजह से? वह मुझे आसानी से मेरी ही माँ के जीवन में रिप्लेस कर सकता है. न कोई पूछता है उसे, न देखता है, न पहचानता है जगन की वजह से. यह भाव क़ला को ईर्ष्या से भर देता है. इसी कमज़ोर पल में वह जगन के दूध में थर्मामीटर का पारा मिला देती है. क़ला तानपूरे पर है और गाते-गाते जगन अचानक खाँसने लगता है, बुखार में तप रहा है, अधूरी महफिल को अपने गीत से आगे बढाती है क़ला. यह भी उर्मिला देवी को नागवार गुज़रता है.

मैं भी गाती हूँ- सबसे दयनीय क़ला तब लगती है जब ये हालात उसे इतना निराश कर देते हैं कि वह ख़ुद को ऑब्जेक्टिफाई करने की हद तक चली जाती है. हिमाचल में जगन से मिलने आए एक प्रोड्यूसर को रात को रुकवाने की सलाह माँ को देती है, उर्मिला देवी मान जाती है क्योंकि बाहर बर्फबारी हो रही है. इसे क़ला ने मौक़े की तरह लिया. एक गाउन में वह प्रोड्यूसर के पास जाती है और अपने मुँह से सिगरेट का धुआँ वैसे ही उसके मुँह के पास लेजाकर छोड़ती है जैसा करते उसने उर्मिला देवी को देखा था दरवाज़े की दरार से. वह सिडकट्रेस नहीं है, उसके चेहरे पर निपट भोलापन है. एक हिचकिचाहट भी. वह सब न करने की नहीं. इस बात की कि सब ठीक से कर पा रही हूँ न माँ की तरह? और अगर कुछ है तो मानो एक ज़िद है-हाँ, मैं भी गाती हूँ, मुझमें भी प्रतिभा है. बस जगह की वजह से कोई मुझे देख नहीं पाता.

यह डेस्पेरेशन क़ला को पहली रिकॉर्डिंग के लिए कलकत्ता तो ले जाता है, आगे चलकर एक बेहतरीन सफल गायिका भी बनाता है, लेकिन यौन-शोषण के एक जंजाल में भी फँसा देता है जहाँ कुछ पाने के लिए अपनी प्रतिभा के बावजूद उसे कीमत देह से चुकानी पड़ती है. सफलता के उच्चतम पलों में उसका अवचेतन फिर खेल खेलता है उसके साथ. आवाज़ खोकर, निराश जगन ने आत्महत्या कर ली थी. उर्मिला देवी ने दोबारा उस बेटे को गँवा दिया जिसे हासिल किया था. इस बार भी वजह क़ला ही थी. सालों से माँ ने बेटी से बात नहीं की थी. अपनी सफलता में अकेली और अवचेतन में उर्मिला देवी और जगन का यह इल्ज़ाम उठाए कि- जो क़ला ने पाई वह जगन की जगह थी, उसने अनधिकार छीनी है , क़ला अवसाद में रहने लगती है.

कभी भी, जगन की आवाज़ सुनाई देने लगती है कि यह सब मेरा था. आख़िरी बार वह माँ से कुछ मांगना चाहती है, हिम्मत करके फोन मिलाती है- समथिंग इस रॉन्ग विद मी मम्मा, आई थिंक आई नीड हेल्प…हेल्प शब्द सुनने से पहले ही फोन कट जाता है. उर्मिला देवी को कुछ दिन बाद में ख़बर मिलती है क़ला की आत्महत्या की कोशिश की, वह भागती है, लेकिन खो चुकी है बेटी भी. क़ला की भूमिका में तृप्ति डिमरी, उर्मिला देवी की भूमिका में स्वस्तिका मुखर्जी और जगन की भूमिका में बबील खान का अभिनय शानदार है. गीत भी मधुर हैं जो याद रह जाएँ, जिनकी धुन दिमाग़ में बस जाए.

उसकी आवाज़ न गई होती तो उस दिन स्टूडियो में वो होता : अवसादपूर्ण अंत तक आप कोई जजमेंट नहीं दे सकते. इन तीनों में कोई पात्र ऐसा नहीं जो सम्वेदना न जगाता हो या जिसे ग़लत कहा जा सकता हो. अगली पीढी की लड़कियों को ठोक-पीट कर परम्परागत रूप से ख़ुद को कमतर समझने के योग्य बनाने वाली पितृसत्ताक माएँ शोषक हैं या शोषित यह तय करना बहुत संकुचित दायरे में समस्या को समझना होगा. जब तक माओं पर यह दबाव रहेगा कि उन्हें अपनी विरासत नहीं, घर के पेट्रियार्क की विरासत को आगे बढाना है, जब तक यह एहसास ही नहीं होगा कि उनकी अपनी भी विरासत है, जब तक उनकी अपनी विरासत ही नहीं होगी तब तक हम फ्रॉयडीय मनोविश्लेषण के आधार पर स्त्री के भीतर की कलात्मक बेचैनी, आज़ादी और अस्तित्व की इच्छा को ‘पेनिस एन्वी’ की तरह देखते रहेंगे. जबकि  फ्रॉयडीय मनोविश्लेषण के आधार पर ही इसे उन बाधाओं की तरह देखना होगा जो पेट्रियार्कल संरचनाओं ने औरत के रास्ते में खड़ी की हैं, जिनकी वजह से उसका यौन-विकास पुरुष की तरह कभी सहज रूप में नहीं हो पाता, जिसकी वजह से वह या तो इस सिस्टम से हमेशा संघर्ष की अवस्था में रहेगी, जो उसे पागल होने की हद तक का स्नायविक तनाव दे सकता है और या फिर सिस्टम में अपना दोयम दर्जा चुपचाप स्वीकार करके एडजस्ट कर लेगी, दुनिया की बाक़ी स्त्रियों को इसी परम्परागत राह पर चलाने के लिए रास्ता बनाती हुई. वरना तो क्या है कि जिस प्रोड्यूसर ने क़ला के डेस्पेरेशन को समझ कर उसका ख़ूब यौन-शोषण किया वह भी एक दिन कह देता है- आज जो कुछ भी तुम्हारे पास है वो कैसे होता अगर मैं नहीं होता, मैं तो जगन के लिए आया था. उसकी आवाज़ न गई होती तो उस दिन स्टूडियो में वो होता क़ला तुम नहीं!

बेहद कमाल के सुंदर दृश्य हैं फिल्म में. एक नीम अंधेरा ज़्यादातर सेट्स पर, नीली रौशनियाँ, बर्फीला मौसम सब-कुछ श्वेत/श्याम करता हुआ, अर्थपूर्ण पॉज़, सम्वाद और अभिनय सब कुछ एक उपन्यास का सा सुख देता है. कुल मिलाकर क़ला एक से ज़्यादा बार देखी जा सकने वाली फिल्म है, उनके लिए ख़ासतौर से जो फिल्म से एक दर्शक बनाने की बजाय एक पाठक बनाने की मांग करते हैं. ऐसा पाठक जो पंक्तियों को पढने के लिए फिर-फिर लौटना चाहता है.

More From Author

एशेज़ के रोमांचक क़िस्से

धर्मेंद्र पा’जी आप तो मोहब्बत का सबसे खूबसूरत नाम थे

One thought on “आप मुझे देख सकते हैं? मुझे लगा मैं इनविज़िबल हूँ!”

  1. कला पर कई दिन से एक अच्छी समीक्षा ढूंढ रही थी। जिसे पढ़कर दोबारा कला देखने जैसा महसूस हो । आज मिली बहुत बेहतरीन लिखा आपने ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

जानकी पुल को सहयोग करें

Jankipul : A Bridge of World's Literature एक नयी शुरुआत! मेरा कॉलम #Jankipul के लिए " जनहित में जारी सब पर भारी" आपकी टिप्पणी की अपेक्षा रहेगी