कोरियन भाषा संस्कृति की विशेषज्ञ कुमारी रोहिणी ने कुछ समय पहले ‘द वायर’ पर कोरियन संस्कृति के उभार के ऊपर एक लेख लिखा था जिसमें उसके ख़तरों के बारे में भी बताया था। इस लेख की याद आई जब पिछले दिनों ग़ाज़ियाबाद में एक ही परिवार की तीन बच्चियों के एक साथ आत्महत्या की खबर आई थी और उसे कोरियाई गेमिंग ऐप से जोड़कर दिखाया और बताया गया था। कोरियाई वेव हाल्यू के इस चमकदार विस्तार-प्रसार के पीछे का एक स्याह पक्ष भी है। इस लेख में उसी स्याह पक्ष पर रोशनी डाली गई है। पढ़िए ‘द वायर’ से साभार- मॉडरेटर
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आज के-पॉप या किमची या फिर के-ड्रामा घरेलू विशेषण बन चुके हैं. भारत के शहरों और गाँवों में कोरियन ड्रामा की धूम है. यह कब और कैसे शुरू हुआ इसकी पड़ताल लंबे समय से की जा रही है. इस क्षेत्र के शोधार्थियों के पास इसका एक तार्किक जवाब भी है. दरअसल, आज भारत में कोरियन ड्रामा, कोरियन फ़ैशन, मेकअप और अन्य चीजों की लोकप्रियता की बड़ी वजह है. इसके लिए वहां के लोगों और उससे भी बढ़कर वहां की सरकार ने बहुत समय और संसाधन खर्च किया है.
इस पूरी परिघटना को ग्लोबल स्तर पर हाल्यू का नाम दिया गया है. हाल्यू शब्दयुग्म है हान और ल्यू (जिसे कोरियाई में 류 लिखा जाता है). हान का मतलब है कोरिया, वहीं 류 का मतलब हुआ लहर यानी तरंग. इस तरह हाल्यू का मतलब हुआ कोरियाई लहर. मूलतः चीनी भाषा से आई इस शब्दावली का उपयोग कोरियाई संस्कृति और लोकप्रिय संस्कृति के अभूतपूर्व विकास के संदर्भ में किया जाता है. इसमें फिल्म, ड्रामा, खानपान, फ़ैशन, ऑनलाइन गेम, मेकअप, संगीत सब कुछ शामिल है.
लेकिन इस हाल्यू को दुनिया ने कब और कैसे जाना?
साल 2012 में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने दक्षिण कोरिया के अपने तीसरे दौरे में हाल्यू का ज़िक्र किया था. जिसके बाद पूरी दुनिया का ध्यान इस ओर गया. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि दक्षिण कोरिया की सरकार की प्राथमिकता सूची में हाल्यू बहुत ऊपर था.
दुनिया में दक्षिण कोरिया उन चुनिंदा देशों में से है जो पॉपुलर कल्चर को बढ़ावा देता है और उसके निर्यात में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है. इस कथन की पुष्टि वर्तमान में दुनिया भर में कोरियाई पॉपुलर कल्चर की प्रसिद्धि और विस्तृत दायरे को देखकर की जा सकती है. हाल्यू के माध्यम से कोरियाई पॉपुलर कल्चर को बढ़ावा देना दक्षिण कोरिया के ‘सॉफ्ट पॉवर’ को बढ़ाने का एक प्रभावी तरीक़ा है.
सबसे पहले चीन और जापान में अपने पैर जमाने वाले हाल्यू को बाद में दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों ने अपनाया और उसके बाद पूरी दुनिया इस कोरियन फ़ीवर का शिकार हो गई. भारत के पूर्वी प्रदेशों में कोरियाई संस्कृति का असर इक्कीसवीं शताब्दी के शुरू से ही दिखने लगा था लेकिन मध्य और उत्तरी भारत में आते-आते कुछ समय लगा.
हाल्यू की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों का कहना है कि साल 1999 में रिलीज़ होने वाली जासूसी कोरियाई फिल्म ‘स्वीरी’ इस परिघटना का तात्कालिक कारण बनी. यह फिल्म दक्षिण पूर्व के देशों में बहुत अधिक लोकप्रिय हुई. इसके तुरंत बाद साल 2000 में रिलीज़ होने वाले कोरियाई ड्रामा ‘खाउल दोंगह्वा (ऑटम इन माय हार्ट)’ को भी स्वीरी जितना ही दर्शकों का प्यार मिला. बाद के दिनों में विंटर सोनाटा, माय सैसी गर्ल जैसे ड्रामा ने चीन, जापान, हांगकाँग, ताइवान और वियतनाम के दर्शोकों को अपना दीवाना बना लिया. इन सभी ड्रामा और फिल्मों की अभूतपूर्व सफलता के कारण कोरियाई संस्कृति की तेज़ी से बढ़ रही लोकप्रियता और स्वीकार्यता की तरफ़ दुनिया भर के लोगों का ध्यान गया.
हाल्यू के माध्यम से कोरियाई संस्कृति के वैश्विक विस्तार की इस पहल को न केवल सरकार ने बल्कि दक्षिण कोरिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों और पूंजीपति संस्थाओं का भी साथ और सहारा मिला. सैमसंग, एलजी, हुंडई, हानह्वा, किया, एसके ग्रुप जैसी कंपनियों ने मदद की और कोरियाई संस्कृति के प्रचार-प्रसार में अपना पूरा योगदान दिया.

इसके अलावा लंबे समय से चले आ रहे सेंसरशिप क़ानून को हटाये जाने से भी इस परिघटना को मदद मिली. दरअसल 1996 के पहले तक कोरियाई सेंसरशिप कानूनों ने फिल्म निर्माताओं और अन्य कलाकारों को विवादास्पद माने जाने वाले विषयों पर काम करने की अनुमति नहीं दी थी. लेकिन साल 1996 में कोरियन कांस्टीट्यूशनल कोर्ट ने इस पाबंदी को हटा दिया. रचनात्मकता को सीमित करने का तर्क देते हुए कोर्ट ने सेंसरशिप क़ानून को प्रतिबंधित किया और कलाकारों और फिल्म-निर्माता निर्देशकों को सभी प्रकार के विषयों पर काम करने की अनुमति दी. कहते हैं कि कोरियाई ड्रामा और फिल्मों के वैश्विक विस्तार और लोकप्रियता के विस्तृत दायरे के पीछे इस प्रतिबन्ध का बहुत बड़ा योगदान है.
आज हाल्यू अपनी लोकप्रियता के शीर्ष पर है. लेकिन यह लोकप्रियता कितने लंबे समय तक की है? लगभग पच्चीस वर्षों की सफलता की अपनी इस यात्रा को हाल्यू आगे किस ओर ले जाएगा?
दरअसल हाल्यू की अपनी चुनौतियां हैं और इन बाधाओं को देखते हुए लगता है कि इसका भविष्य चुनौतीपूर्ण होने वाला है. दुनिया भर में इसकी सफलता का एक मुख्य कारण इसका नयापन और लोगों के लिए कोरियाई संस्कृति के तमाम पहलुओं से अनजान होना था. कोरियाई ड्रामा और फिल्मों के दायरे को देख कर लगता है कि फिल्म-निर्माताओं ने इंसानी भावनाओं के तमाम पहलुओं पर काम किया लेकिन भावनाओं के प्रकार और उनकी प्रवृति सीमित है और ऐसे में हाल्यू के सामने लगातार यह चुनौती है कि अपने नयेपन को वह कैसे बनाए रखे.
इसके अलावा, संस्कृति से जुड़े उत्पादों में नवाचार की ज़रूरत महसूस होने लगी है. ऐसे क्षेत्रों में जहां हाल्यू देर से पहुंचा वहां लोगों में एक तरह का उत्साह है, क्योंकि उनके लिए अब भी कई सारी चीजें नई हैं. लेकिन दक्षिण पूर्वी देशों के दर्शकों के लिए अब हाल्यू पुराना पड़ने लगा है, अब वहां के दर्शकों को कुछ नये की दरकार है.
दुनिया भर में हाल्यू की सफलता के पीछे दक्षिण कोरिया के मनोरंजन उद्योग से जुड़े लोगों की अथक मेहनत और श्रम है. बीटीएस, ब्लैक पिंक जैसे विश्व प्रसिद्ध बैनर के तले काम करने वाले कलाकारों के ऊपर सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन का दबाव रहता है. ली मीन हो, किम सू ह्यूं, जून जी ह्यू, किम सै रोन जैसे कोरियाई स्टार हाल्यू की सफलता के मुख्य सितारों में से हैं. फिल्मी जगत की इन हस्तियों ने बहुत कम समय में अपना नाम बनाया और न केवल कोरियाई कंपनियां बल्कि अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भी इन्हें अपने उत्पादों के ब्रांड एंबेसडर बनाने लगी हैं. लेकिन ऐसा नहीं है कि हाल्यू का केवल सकारात्मक प्रभाव ही हो रहा है.
इस सांस्कृतिक क्रांति के अपने दुष्प्रभाव हैं. दुनिया भर में कोरियाई गीत-संगीत, फिल्म, ड्रामा की अपार सफलता और लोकप्रियता का सबसे अधिक प्रभाव इस इंडस्ट्री की नींव यानी कि मनोरंजन जगत के सितारों पर पड़ा है. एक तरफ़ जहां वे वैश्विक स्तर की प्रसिद्धि का लुत्फ़ ले रहे हैं वहीं दूसरी तरह उन पर ‘ओवर-एक्सपोज्ड’ होने का ख़तरा भी मंडरा रहा है. मनोरंजन जगत से जुड़ने वाले कलाकारों को लंबे समय के अनुबंध करने पड़ते हैं, जिनसे उनकी आज़ादी सीमित हो जाती है. वे जिन एजेंसियों के साथ काम करते हैं या अनुबंध करते हैं, वे एजेंसी न केवल उनके पेशेवर जीवन बल्कि निजी जीवन को भी नियंत्रित करने लग जाती हैं. नतीजतन ये कलाकार बहुत अधिक श्रम और बहुत कम निजी समय और स्वतंत्रता के कारण अवसाद की तरफ़ बढ़ते पाए जा रहे हैं.
पिछले कुछ समय में एक के बाद कई सफल एवं प्रसिद्ध कोरियाई कलाकारों की आत्महत्या से इस बात की पुष्टि की जा सकती है. इसके अलावा इन प्रसिद्ध कलाकारों से उम्मीद की जाती है कि वे अपनी संस्कृति और समाज के नियमों का पालन करें और एक आदर्श के रूप में उभर कर सामने आएं.
इसके अलावा कोरियाई समाज में कलाकार और प्रशंसक का समीकरण अपने आप में अनूठा है. हर समूह का अपना प्रशंसक-वर्ग है और उसे बनाए रखने के लिए उन्हें प्रशंसकों की उम्मीदों पर खरा उतरना होता है. अन्यथा उन कलाकारों को अपने ही प्रशंसकों की आलोचना और विरोध का शिकार होना पड़ता है.
स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू यॉर्क में पोस्ट-डॉक्टरेट की फैलो और के-पॉप की विशेषज्ञ स्टीफ़नी चोई कहती हैं कि ‘के-पॉप के फैन्स पूरी प्रोडक्शन प्रक्रिया से गहरे जुड़े होते हैं. इन प्रशंसकों का मानना है कि उनके होने से इन कलाकारों को ताक़त और लोकप्रियता दोनों मिलती है. उनके द्वारा भारी संख्या में ख़रीदे गये एलबमों से इन कलाकारों का प्रचार-प्रसार होता है, ऐसे में कलाकारों की जवाबदेही भी अपने प्रशंसकों के प्रति बनती है.’
संगीत आलोचक लिम-ही यून का कहना है कि कोरियाई कलाकारों और प्रशंसकों के बीच का रिश्ता बड़ा रोमांटिक है. साथ ही वे कहते हैं कि चूंकि दक्षिण कोरिया में इन कलाकारों को व्यक्ति नहीं बल्कि उत्पाद के रूप में देखा जाता है इसलिए उन पर सख़्त नियम लगाए जाते हैं. उन्हें कई तरह के पाबंदियों का सामना करना पड़ता है, जैसे कि वे किसी रिश्ते में नहीं हो सकते, और अगर पहले से कोई रिश्ता है तो उसे गुप्त रखने की शर्त होती है. वे नशीली पदार्थों जैसे कि शराब का सेवन नहीं कर सकते, (2022 में दक्षिण कोरिया में शराब की खपत लगभग 8 लीटर प्रति व्यक्ति थी जिसमें पंद्रह वर्ष की आयु वाले किशोर अधिक थे.), अधिक भीड़-भाड़ वाली जगहों पर नहीं जा सकते हैं.
ऐसे प्रतिबंधों से इन कलाकारों की छवि को उनके प्रशंसकों और दुनिया के सामने बरकरार रखा जाता है. ऐसे में यह चिंता जताई जा सकती है कि यह व्यवस्था कब तक टिकी रह पाएगी?
दक्षिण कोरिया की सॉफ्ट पावर के इस गवाह की आगामी यात्रा दिलचस्प होगी कि अपनी तमाम चुनौतियों के बावजूद दक्षिण कोरिया अपने मनोरंजन उद्योग में नवाचार के कौन से प्रयास करेगा और वैश्विक स्तर पर अपने दर्शकों को बांधे रखने के लिए हाल्यू का उपयोग कैसे करेगा.

