कल जानकी पुल पर प्रसिद्ध लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक ने लिट फ़ेस्ट, मानदेय को लेकर अपने विचार रखे। आज उसकी प्रतिक्रिया में सुहैब अहमद फ़ारूक़ी की यह टिप्पणी पढ़िए। सुहैब जी पुलिस अधिकारी हैं, शायर हैं और हिन्दी-उर्दू दोनों ज़बानों में खूब लिखते हैं। आप भी पढ़िए- मॉडरेटर
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सुमोपा साहब के जानकी पुल पर प्रकाशित उद्गारों पर आपने साहित्य, मानदेय और अहंकार की त्रिकोणीय बहस छेड़ दी है, तो मुझ जैसे नॉन-टेक्निकल फेसबुकिया साहित्यकार (?) भी इस छेड़छाड़ में शरीक होना अपना फ़र्ज़ समझता है और फिर मौसम भी फ़ाग का है, जहाँ छेड़छाड़ स्वयं एक केंद्रीय स्थानक बन जाती है।
यह पूरा मामला अस्ल में पाठक साहब के एक सीधे-सादे सवाल से शुरू हुआ है—अगर आयोजक करोड़ों ख़र्च कर रहे हैं, तो लेखक को कुछ पारिश्रमिक मिल जाए, तो इसमें आख़िर एतराज़ क्या है? बीते दिनों वर्तमान हिंदी साहित्य जगत में स्थापित और मूर्धन्य हस्तियों ने इस मुद्दे को उठाकर उसे व्यावहारिक धरातल पर रखा था — और अब सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब ने अपने लेख में इसे नैतिक आत्ममंथन की शक्ल दे दी है।
मेरी कम-समझी में पाठक साहब की सबसे बड़ी ताक़त उनकी बेबाकी है। वे बिना लाग-लपेट उस मिथक पर चोट करते हैं कि “साहित्यकार पैसे के लिए नहीं लिखता।” रॉयल्टी, एडवांस और मानदेय की हक़ीक़त गिनाकर वे दिखाते हैं कि यह दावा अक्सर आत्म-छलावा ही साबित होता है। यहीं वसीम बरेलवी साहब का शेर पूरा मानी पकड़ लेता है—
अपने हर हर लफ़्ज़ का ख़ुद आइना हो जाऊँगा
उस को छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा
यानी लेखक की बुलंदी दूसरों को गिराकर नहीं, अपने अल्फ़ाज़ की सच्चाई से तय होती है।
लेख का दूसरा मज़बूत पहलू “प्रेरणा” के मिथक पर सीधा प्रहार है — लिखना इंतज़ार नहीं, अनुशासन है। इस संदर्भ में जनाब जौन एलिया जैसे फरमाते हों—
तुम बनो रंग तुम बनो ख़ुश्बू
हम तो अपने सुख़न में ढलते हैं
अर्थात सच्चा लेखक माहौल के रंग में नहीं, अपने सुख़न की क़िस्मत में ढलता है।यहाँ तक पाठक साहब का लेख आत्मालोचन का एक ज़रूरी औज़ार बन जाता है। मगर जनाब, कुछ हदें भी हैं। मुझे लगता है कि पाठक साहब के उद्गार में कुछ जगह अतिरंजना नज़र आती है — ख़ास तौर पर देह-श्रम और बौद्धिक श्रम की तुलना में। यह रूपक झकझोरता ज़रूर है, मगर रचनात्मक मेहनत के सांस्कृतिक वजूद को पूरी तरह समेट नहीं पाता।
इसी तरह “मांगना बनाम मिलना” की नैतिक लकीर आज की पेशेवर दुनिया में कुछ ज़्यादा ही आदर्शवादी लगती है। लेखक का पारिश्रमिक पूछ लेना हर बार लालच नहीं होता — कई बार यह महज़ पेशेवर गरिमा का सवाल होता है। और एक बात, लिट-फ़ेस्ट को सिर्फ़ “एहसान” की तरह देखना भी एकतरफ़ा नज़र है। मंच और लेखक — दोनों एक-दूसरे के सहारे खड़े हैं।
अब उस मुख्यधारा के लेखन और लेखकों की टिप्पणी पर दो-चार बातें करता हूँ। अफ़सोस यह रहा कि बहस कहीं-कहीं मानदेय से फिसलकर “लुगदी लेखक”, “पत्रकार”, “इवेंट मैनेजर टाइप” जैसी दराज़ों में जा गिरी। जबकि मसला वर्गीकरण का नहीं, मेहनताने का था। संयत लहजे में कहा जाए तो — अगर साहित्य की गुणवत्ता का पैमाना यह हो जाए कि कौन किस उत्सव में बुलाया जाता है, तो फिर रचना नहीं, नेटवर्क फ़ैसला करेगा। अगर किसी लेखक की ज़बान या तेवर से इख़्तिलाफ़ है, तो उसका जवाब भी अदबी गरिमा में दिया जाना चाहिए। “लुगदी” जैसे अल्फ़ाज़ बहस को रौशन नहीं करते — सिर्फ़ तापमान बढ़ाते हैं।
“लुगदी” शब्द की etymology से अपरिचित लोगों को बताना मेरा फ़र्ज़ है कि वर्षों पूर्व सफ़ेद बढ़िया वाला काग़ज़ आम प्रकाशन के लिए अनुपलब्ध था या सरकारी कोटे से कम उपलब्ध रहता था। इस काग़ज़ पर छपी पुस्तकें महँगी होती थीं और इसी वजह से पुस्तकालयों की शोभा और साहित्यिक आभिजात वर्ग की धरोहर बनती थीं। इस एलीट और सरकारी पहुँच वाले सफ़ेद काग़ज़ से इतर, जनता-जनार्दन को हिंदी में पब्लिक रेट पर साहित्य उपलब्ध कराने वाले प्रकाशकों को कम पैसों में सहज और सुलभ रूप से उपलब्ध रिसाइकल्ड काग़ज़ पर जनप्रिय लेखकों को छापना पड़ता था। बाद में इसी “रिसाइकल्ड कागज़” को साहित्य के जेठों और सासों ने अपनी स्थापित वरिष्ठता की नाज़ुक श्रेष्ठता बचाए रखने के लिए लोकप्रिय लेखकों के संदर्भ में “लुगदी साहित्य” का टैग बना दिया। फिर हज़रत जौन एलिया की पंक्तियाँ यहाँ याद आती हैं—
क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में
जो भी ख़ुश है हम उस से जलते हैं
कभी-कभी हमारी नाराज़गी तर्क से कम, असुरक्षा से ज़्यादा पैदा होती है। अगर कुछ “पत्रकार” सचमुच लुगदी लेखकों को मंच दिला रहे हैं, तो इसे साज़िश नहीं, साहित्य की लोकतांत्रिक हवा समझना चाहिए — जहाँ फ़ैसला पाठक करता है, वंशावली नहीं। और इसी मोड़ पर हमारे दौर के एक जरूरी शायर शकील जमाली साहब का यह शेर जैसे पूरी बहस सेपर्दा उठा देता है—
सब लिफ़ाफ़े की हुसूली के लिए हो रहा है
हम जो ये शग़्ल, जो ये कार-ए-अदब कर रहे हैं
हासिल-ए-बहस
कुल मिलाकर यह पूरी बहस मुझ जैसे कम-फ़हम को तीन बातें सिखा गई—
✔ साहित्य में पैसा भी एक हक़ीक़त है
✔ आत्मालोचन लाज़िमी है
✔ मगर वर्ग-श्रेष्ठता का भाव पूरी बहस को खोखला कर देता है
इन अ वन लाइनर—
यह बहस साहित्य से शुरू हुई थी, अहंकार तक पहुँच गई — जबकि ज़रूरत इस बात की थी कि लेखक अपने अल्फ़ाज़ का आईना बने और व्यवस्था अपने ढाँचे पर सवाल उठाए।
अंत में:
मुझे इस बहस से पिछली सदी के आठवें दशक के उत्तरार्ध का एक वाक़या याद आता है। उस समय क्रिकेट जेंटलमेन का एक एलीट खेल था; बाज़ार का खेल में बिल्कुल दख़ल नहीं था। भारतीय टीम के विश्वकप जीतने से पहले क्रिकेट की कमेंटरी सिर्फ़ अंग्रेज़ी में होती थी। उन दिनों मेरे एक चचा, जो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से इंजीनियर होकर दुबई में नौकरी करते थे, दीर्घ अवकाश पर घर आए हुए थे। वे अलीगढ़ में यूनिवर्सिटी स्तर पर क्रिकेट खेल चुके थे और क्रिकेट को धार्मिक भाव से देखते थे। उनके सौजन्य से हासिल कलर टीवी पर हम भी क्रिकेट देखते थे। एक दिन बड़े उदास और क्लांत स्वर में बोले,
–“यार मुन्ना, अब क्रिकेट छोड़ना पड़ेगा।”
यहाँ छोड़ने से मुराद क्रिकेट देखना छोड़ने से था।
मैं उनके इस वाक्य से, उनके सौजन्य से हासिल रंगीन क्रिकेट-दर्शन से वंचित होने की आशंका से घबरा उठा। वजह उन्होंने यह बताई कि हिंदी में क्रिकेट कमेंटरी प्रसारित होने लगी है, जिससे अब रिक्शा चलाने वाले और सब्ज़ी बेचने वाले भी क्रिकेट देख और समझ सकते हैं — यानी क्रिकेट अभिजात्य वर्ग से निकलकर लोकप्रिय हो रहा है।
एक और मिसाल याद आ गई। सास और नवविवाहित बहू के बीच विवाद पर पंचायत बैठी। हज़ार तर्कों के बावजूद सास अपनी बहू के ख़िलाफ़ एक भी आरोप सिद्ध नहीं कर सकी। पंचों का फ़ैसला अपने विरुद्ध जाता देखकर सास ने अनमने ढंग से कहा,
–“चलो, आपका फ़ैसला सर-आँखों पर, मगर एक बात तो आपको माननी ही होगी कि बहू की सारी बातें ठीक नहीं हैं।”
पूछा गया, –“क्या?”
बोली, –“वह आटा गूँधते वक़्त हिलती क्यों है?”
तो हज़रात, बात वही तथाकथित कुलीनता और सीनियरिटी की है, जिसे सहज सुलभता और लोकप्रियता रास नहीं आती, नहीं सुहाती।
दुआओं में याद रखिएगा।
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