• कविताएं
  • शहरयार की तीन कविताएँ

    आज पढ़िए युवा कवि शहरयार की कविताएँ। शहरयार का पहला कविता संग्रह हाल में ही आया है, नाम है ‘एक पुराना मौसम लौटा’। लेकिन ये कविताएँ संग्रह से बाहर की हैं और युवा मन की बेचैनी को दर्शाने वाली संवेदनशील कविताएँ हैं। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर 

              ================================

    1

    बाज़ार में हाहाकार है,
    पर मेरे अंदर एक अजीब-सा करार है।
    गैस की टंकी क्या कम हुई,
    जैसे मनोरंजन की एक नई खिड़की खुल गई।
    नहीं…! मुझे सरकार से कोई शिकायत नहीं…
    मुझे तो बस तमाशा देखना है
    कि कैसे लोग ख़ाली सिलेंडर लेकर
    सड़कों पर दौड़ रहे हैं,
    कैसे नीली लौ के लिए
    दुआएँ माँग रहे हैं।
    मैं चाहता हूँ किल्लत और बढ़े,
    लाइनें और लंबी हों,
    पड़ोसी के घर का चूल्हा ज़रा और देर से जले,
    ताकि खिड़की से झाँकते हुए
    मुझे लुत्फ़ उठाने का कारण मिले।
    अजीब-सी प्यास है मेरी
    कि लोग परेशान हों और मैं मुस्कराऊँ,
    इस बिगड़ती हुई स्थिति को सिलसिलेवार एक वेब सीरीज की तरह देख पाऊँ।
    हम शायद ऐसे ही हो गए हैं,
    दूसरों के घर धुआँ न उठने पर,
    अपने मन में घी के दीये जलाते हैं।
    दूसरों की परेशानी जितनी गहरी होगी,
    हमारा टाइमपास उतना ही शानदार होगा।
    नहीं…! मैं ईरान या यूक्रेन की नहीं… पड़ोस की बात कर रहा हूँ,
    उसके घर के संकट का आनंद ले रहा हूँ,
    क्योंकि
    वह भी प्रतीक्षारत है
    कि कब यह संकट
    मेरे घर तक पहुँचता है।

    ============

    2

    सिर्फ़ तमाशा
    सड़क पर लोग घेरा बनाकर खड़े थे,
    मदद करने वाले हाथ कम,
    और मोबाइल ज़्यादा बड़े थे।
    उस लड़के को हल्की चोट आई थी,
    पर भीड़ को जैसे यह बात पसंद नहीं आई थी।
    उनके चेहरों पर साफ़ लिखा था-
    “अगर थोड़ा और ख़ून गिरता,
    तो वीडियो अच्छा आता,
    सोशल मीडिया पर हमारा भी नाम हो जाता।”
    वे मदद के लिए आगे नहीं बढ़ रहे थे,
    बस एक अच्छे ‘एंगल’ के लिए लड़ रहे थे।
    कोई तड़प रहा है, तो कोई मर रहा है,
    इंसान अब बस वीडियो रिकॉर्ड कर रहा है।
    किसी को अस्पताल पहुँचाने की जल्दी नहीं,
    सबको बस अपना कैमरा चलाने की पड़ी है।
    हम इतने पत्थर दिल कब से हो गए?
    कि दूसरों की तक़लीफ़ में भी मज़ा ढूँढने लगे।
    भीड़ तो बहुत है इस दुनिया में,
    पर अफ़सोस, इंसान बहुत कम रह गए।

    पता नहीं यह कैसी भूख है,
    कि हमें किसी का दर्द भी अब तमाशा लगता है।
    मदद करने की जगह,
    सिर्फ़ तमाशबीन बने रहना,
    आजकल का सबसे बड़ा सच लगता है

    =======================

    3

    एक लिबास, एक रूह
    भीड़ में अलग दिखता था
    मेरा कुर्ता-पाजामा,
    सर पर रखी वह टोपी-
    मेरी पहचान भी थी और मेरा मान भी।
    डर था कि कहीं यह लिबास
    दिलों के बीच
    कोई दीवार न खड़ी कर दे।
    पर शुक्रिया उन कंधों का,
    जिन्होंने अहसास तक न होने दिया
    मुझे ‘अलग’ होने का।
    वे लड़के, वे लड़कियाँ…
    मेरे दोस्त, मेरे अपने!
    उन्होंने मुझे वैसे ही अपनाया,
    जैसे समंदर लहरों को अपनाता है,
    बिना यह पूछे
    कि वे किस किनारे से आई हैं।
    आज नफ़रत की गर्म हवाओं के बीच
    जब दुनिया दीवारों की नुमाइश करती है,
    मुझे लगता है-
    कि ये लोग
    मेरे पिछले जन्मों की कोई दुआ हैं,
    कोई नेक कमाई,

    जो इस जनम में मिली है।
    मैं सोचता हूँ…
    काश! हर इंसान इन जैसा होता,
    तो आने वाली नस्लें गर्व से कह पातीं-
    “हमारे पूर्वज नफ़रत के दौर में भी,
    मोहब्बत की एक मुकम्मल दास्तान छोड़ गए हैं।”

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    1 mins
    WordPress Center Ankara Escort: Beypazarı Escort, Pursaklar Escort, Etimesgut Escort İstanbul Escort: Esenyurt Escort, Bahçelievler Escort, Maltepe Escort Bursa Escort: Gürsu Escort, Keles Escort, İznik Escort What are the best budget smartphones available in 2025? Reason Why Everyone Love Travel Doubts About Lifestyle You Should Clarify MTDb – Ultimate Movie&TV Database Device Scroll Image For WPBakery Page Builder Recent Posts For Elementor AH Survey – WordPress Survey Builder With Multiple Questions Types Blog Post Image Accordion Addon For Elementor Multi Vendor Coupon Marketplace Plugin for WooCommerce Cleaning Services Booking Management for WordPress and WooCommerce Kuveyt Türk 3D Virtual POS Gateway for WooCommerce SurvForm – Survey Form Builder Plugin For WordPress List Fusion – Best PopUp and Lead Generation Plugin