रंजिता सिंह फ़लक के काव्य संग्रह ‘चुप्पी प्रेम की भाषा है’ की कुछ कविताएँ हमने थोड़े समय पहले इस मंच पर भी पढ़ी थी।आज उनकी कविताओं पर यह टिप्पणी प्रस्तुत है जिसे युवा कवि जावेद आलम ख़ान ने लिखा है। इस टिप्पणी की ख़ास बात है कि वे आज की कविताओं में संदर्भों के अनुसार शास्त्र-उल्लिखित नायिकाओं का भी यथोचित उल्लेख करते हैं- अनुरंजनी
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प्रेम में ख़ामोशी ही अभिव्यक्ति
सरदार पूर्ण सिंह ने कहा था प्रेम की भाषा मौन होती है।रंजीता सिंह फलक ने इस वाक्य को अपने सृजनकर्म का आधार बना लिया।उनका नया काव्य संग्रह इस मायने में अनोखा है कि इस पूरे संग्रह में प्रेम की अव्यक्तता संबंधी कविताएं हैं।इस विषय पर एक ही पुस्तक में इतनी कविताएं देखना सुखद है।निश्चित रूप से इन कविताओं में प्रेम की विभिन्न अवस्थाओं में अनुभव किए गए भाव हैं जो अनकहे रह गए।पूरी पुस्तक की कविताओं को चार खंडों में रखा गया है।
पहला खंड है – प्रेम की कराह है पावस ऋतु।इस खंड की कविताओं को बारहमासा भी कह सकते हैं जहां आधुनिक संदर्भों में नायिका की मनःस्थिति को सामने लाया गया है।यह नायिका कहीं एकनिष्ठ प्रेम में मग्न स्वाकीया लगती है कहीं प्रेम में छली गई परकीया।यहां प्रेषित पतिका का अगाध दुख है तो आगत पतिका का सोल्लास मान भी लेकिन चुप्पी इनकी हर नायिका का मूलभूत गुण है।इन नायिकाओं ने प्रतीक्षा को ही मुक्तिमार्ग बना लिया है।
यहां प्रेम के रिक्त बिंदुओं में उकेरी गई भावांजलियां हैं।यद्यपि मौन कभी अकेला नहीं होता।वह स्मृतियों का पिटारा है,प्रेम की वेदनामयी अनुभूति है।
कवि मानती हैं कि चुप्पियों के कई मायने अपने हिसाब से निकाले जा सकते हैं।इस पंक्ति के माध्यम से वे व्यंजना की शक्ति की ओर संकेत करती है किंतु इसी पंक्ति की अभिधा में व्याख्या भी करने लगती हैं।
कुछ बिंब प्रभावी बन पड़े हैं, जैसे –
“चांद पर किसी ने चला दी हो गुलेल”
अथवा
“वह मुझे मिला
जैसे कोई टूटता हुआ तारा”
दूसरे खंड का शीर्षक है – स्मृति, स्वप्न और कामनाएं। इस खंड की कविताओं में मांसल प्रेम की अधिकता है।यहां चुंबनों की स्मृतियां हैं,अभिसार के चित्र हैं।आदिम वनकन्या सी कामनाएं हैं,लोकगाथा के नायक के कसाव भरे स्वप्न हैं।पुष्प है,सुगंध है,कनपटी पर सरसराहट और रक्त की गर्माहट के वर्णन हैं।रति की उद्दीप्त कामनाएं हैं और रतिक्रीडा के पश्चात बचे रह गए चिन्हों को देह पर सहेजे आत्मलीन नायिका है।स्मृति कविता में ‘ दाहिने पैर के अंगूठे में फंसा आतुर होठों का वलय’ की व्यंजना बहुत प्रभावित करती है।
पूरी पुस्तक का केंद्रीय विषय है मौन पर यह मौन अभिव्यंजना नहीं बन पाया।
‘ नीलाभ आभा’ का प्रयोग बड़ा अटपटा है।
तीसरा खंड है – प्रेम की नागरिकता। ये कविताएं अधिक सघन और व्यंजनापूर्ण हैं।यहां भी प्रेम में आकंठ डूबी नायिकाओं के चित्र हैं जो बार बार प्रेम में छली जाती हैं फिर भी प्रेम करना नहीं छोड़तीं।इनमें रंगों का जिक्र है जो अलग अलग अनुभूतियों के प्रतिनिधि बनकर आए हैं।प्रेम में पड़ी स्त्री की अकुलाहट,बेचैनी,उदासी आदि के साथ उसकी घ्राणशक्ति को भी कविता में सुंदरता से पिरोया गया है यह कहकर –
“औरत की नाक/सूंघ ही लेती है/हजार परतों में दबाई गई देह गंध”
इनकी नायिकाएं इतनी उत्कण्ठित हैं कि वे बस प्रेम करना चाहती हैं जबकि स्वीकार करती हैं कि उनका अंत प्रेम से ही होगा।वे अपने प्रियतम की स्मृतियों को प्रेम की नागरिकता में अपना स्थाई पता बताती है।विरह से अधिक उपेक्षा से डरती है।अधिकांश कविताएं प्रेम की खुमारी में डूबी अर्धचेतन स्त्री की कविताएं हैं जिसने समस्त दुराव – छुपाव को अनावृत कर दिया हैं।
कवि के द्वारा कुछ कविताओं में पुरुष- सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध की भी अभिव्यक्ति हुई है जहां वे कहती हैं कि “प्रेम का निर्वहन मेरे हिस्से था और आजादी तुम्हारे हिस्से।” स्त्री और पुरुष के प्रतिरोध में समाज किस तरह दोहरा रवैया अपनाता है इसकी पीड़ा इन पंक्तियों में देखिए – “तुमने बगावत की तो उसे कहा गया पौरुष/हमने बगावत की तो कही गई चरित्रहीनता।”
प्रेम में अस्तित्व गंवाने के बावजूद उसे उसकी फिक्र है।उसे दुख है कि वह किसी की जिंदगी में होते हुए भी जरूरतों में क्यों नहीं है।
चौथा खंड है – ‘ पिता के लिए नहीं लिखी कोई कविता’।इस खंड की कविताएं कुछ हद तक दार्शनिक भाव लिए हैं।इनमें प्रेमिका या पत्नी से इतर स्त्री के बेटी,बहन,बुआ और मां के रूप में कवि दिखाई देती हैं।अपने पिता,भाई,भतीजे,पुत्री के लिए लिखी इन कविताओं में स्त्री मन की चिंता,परवाह,वात्सल्य, उलाहने आदि की सुखद अभिव्यक्ति हुई है।ये सभी कविताएं आत्मालाप हैं। आकार में पिछले खंडों से अधिक लंबी कविताएं हैं।स्वर भी पिछली कविताओं से कुछ अलग है।यहां प्रेम की अल्हड़ता,किशोर लालसा,तरल वेदना न होकर परिपक्वता दिखाई देती है।
इस संग्रह में जो स्त्री है वह निश्चित रूप से प्रेमलीन स्त्री है,छली गई स्त्री है।लेकिन वह महज शिकायत करने तक ही स्वयं को सीमित कर लेती है।उसमें वह प्रतिरोध यहां दिखाई देता है और आज की स्त्री मुखर है।इस संग्रह में परिवर्ता को लेकर एक खास छटपटाहट भी दिखाई देती जो आम स्त्री का भी प्रतिनिधित्व कर रही है।
जैसे ..मुझे नहीं आता,अदृश्य हुई औरतें,पुरुष,एकल स्त्री के शब्द,अच्छा लगता है जैसी कविताएं इसकी बानगी हैं।
“अच्छा लगता है”कविता से
प्रेम में स्त्री मूढ़ जरूर हो जाती है
पर नहीं खोती आत्मसम्मान
तुम्हारी हर बात पे
हामी भरती स्त्री को
यूं आदेशित न करो कि
वो भूल जाए प्रेम में
तुम्हारी हर बात मानना।
भाषा हिंदी उर्दू मिश्रित, सहज और प्रवाहमयी है।कवि के पास पर्याप्त शब्द हैं।प्रेम की अभिव्यक्ति में कई जगह उर्दू के शब्द सहायक हुए हैं पर कई जगह उनका प्रयोग अतिरंजननापूर्ण लगता है।कुछ मुहावरों और सूक्तियों का प्रयोग बड़ा दिलचस्प है।जैसे
“छली होता है भूरी आंखों वाला पुरुष”
लंबी कविताओं में कही कहीं दोहराव के बावजूद कथ्य की कसावट दिखाई देतो है।पहले बंद में कही गई बात दूसरे बंद में बिना किसी प्रयोजन के पुनः आती है।इससे कविता का रस प्रवाह बाधित होता है।
कई बार वे सूत्र वाक्य देकर स्वयं ही उसकी व्याख्या करती प्रतीत होती हैं।इससे कविता की व्यंग्यात्मकता समाप्त हो जाती है।पूरे संग्रह की कविताएं स्वगत कथन सी लगती हैं जिनमें लंबे लंबे ब्यौरे हैं।एक ओर पाठक को भावावस्था की गहराई में ले जाते हैं दूसरी ओर अधिक वर्णनात्मकता कविता को उथला भी कर देती है।
एक बात और ध्यातव्य है कि इस संग्रह की लगभग सभी कविताएं मध्यकालीन प्रेमी प्रेमिकाओं सी भावानुभूतियों का वर्णन करती सी प्रतीत होती हैं।पर यहां प्रेम आधुनिक संदर्भों से भी जुड़ा है।प्रेम कविताओं में बिंबों और प्रतीकों का बड़ा महत्व होता है।यहां कुछ नए बिंब अलग कलेवर में है। साथ ही भाव योजना इतनी प्रबल जरूर कि पाठक इनसे जुड़ा रहता है।
कुल मिलाकर इस संग्रह से गुजरना प्रेम के सागर में डूबते उतरते हिचकोले खाते जाना है और अंत में प्रेम की सुखद स्मृतियों के साथ किनारे लग जाना है।आकंठ प्रेम में डूबी नायिका जो बहते हुए उसी प्रेम की दुनिया को अपनी निगाह से देख रही है,महसूस कर रही है और दर्ज करती जाती है।क्योंकि प्रेम में बिना पूरा डूबे कोई पार नहीं उतरता।बकौल बिहारी –
“तन्त्री नाद कवित्त रस सरस राग रति रंग
अनबूड़े बूड़े तिरे जो बूड़े सब अंग”
कविता संग्रह – चुप्पी प्रेम की भाषा है
कवि – रंजीता सिंह ‘ फ़लक’
प्रकाशक -वाणी प्रकाशन।

