हिंदी के गौरव का सवाल गौरव सोलंकी के सवाल से कहीं ज़्यादा बड़ा है

ज्ञानपीठ-गौरव प्रकरण ने हिंदी के कुछ बुनियादी संकटों की ओर इशारा किया है. लेखक-प्रकाशक संबंध, लेखकों की गरिमा, पुरस्कार की महिमा को लेकर कई लेख लिखे गए. आज प्रसिद्ध कवि-लेखक-पत्रकार प्रियदर्शन का यह लेख इस पूरे प्रकरण को व्यापक परिदृश्य में देखे जाने का आग्रह करता है- जानकी पुल.

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गौरव सोलंकी और ज्ञानपीठ प्रकाशन से जुड़े विवाद पर पिछले कई दिनों से लिखने की सोच-सोच कर बचता रहा तो शायद इसकी एक वजह यह भी थी कि इस विवाद के मुख्य किरदारों से निजी तौर पर मेरी कोई ऐसी जान-पहचान नहीं है जिससे मैं इस संकट के मूल तक पहुंच सकूं। एक युवा लेखक के तौर पर गौरव सोलंकी का बहुविध लेखन अपने आवेग और अंदाज़ में- कुछ सीमाओं के बावजूद- मुझे अच्छा और पठनीय लगता रहा है। एक लेखक और संपादक के तौर पर रवींद्र कालिया को भी बस दूर से जानता रहा हूं, निजी मुलाकातें नहीं हैं। इस विवाद से जुड़े तीसरे शख्स आलोक जैन के बारे में मेरी अच्छी-बुरी कोई राय नहीं है- सिवा अपनी एक पुरानी मान्यता के, जो इत्तिफाक से उनके ख़िलाफ़ जाती दिख पड़ती है- कि मालिकों या प्रबंधकों को संपादकों के कामकाज में दखल नहीं देना चाहिए। यह भी साफ कर दूं कि ज्ञानपीठ या नया ज्ञानोदय में अब तक मेरी कोई रचना नहीं छपी है- दरअसल न मैंने भेजी और न उन्होंने मांगी। पिछले दिनों एक कहानी ज़रूर दी जो स्वीकृत होकर पड़ी है और शायद किसी अंक में आ सकती है।

लेकिन इस छोटे से प्रलोभन की वजह से मैं ज्ञानपीठ के विरुद्ध लिखने से कतराऊं, ऐसा कतई नहीं है। इसके पहले नया ज्ञानोदय के छिनाल प्रसंग पर आख़िरकार मैंने लिखा ही था। फिर ऐसा नहीं है कि जिन विषयों पर मैं लिखता रहा हूं, सबके किरदारों से मेरा निजी परिचय हो ही। वैसे भी मिलने-मिलाने की यारबाश दुनिया से मैं कई वजहों से दूर खड़ा या पड़ा हूं, इसलिए मेरे संपर्क नहीं के बराबर हैं। मगर फिर भी ज्ञानपीठ के मौजूदा विवाद के प्रसंग में यह निजता मुझे ज़रूरी लगती रही तो शायद इसलिए कि इस पूरे विवाद में कुछ ऐसा ज़रूर है जो दोनों पक्षों के निजी टकराव से उपजा है। कम से कम मुझे लगता है कि इस विवाद की सार्वजनिक की जा रही वजहें इसकी मूल वजहें नहीं हैं।

क्योंकि गौरव सोलंकी पहले भी नया ज्ञानोदय में छपते रहे और ज्ञानपीठ से छापे जा चुके हैं। इसके अलावा इत्तिफाक से पिछले कुछ वर्षों में ज्ञानपीठ एक ऐसे प्रकाशन संस्थान के तौर पर उभरा है जिसने युवा लेखकों की किताबें सबसे ज़्यादा छापी हैं। कविता और कहानी की दुनिया में उदीयमान लेखकों को आसानी से प्रकाशक नहीं मिलते हैं- यह सच जाना-पहचाना है। मेरी अपनी एक किताब हिंदी के एक प्रकाशक के पास 4 साल पड़ी रही जो इत्तिफाक से मेरे बहुत करीब भी थे। लेकिन ज्ञानपीठ ने यह चलन तोड़ा और कई नई अभिव्यक्तियों को मंच और मौका सुलभ कराया। यही बात नया ज्ञानोदय के बारे में कही जा सकती है जहां बहुत सारे युवा लेखकों को छपने का मौका मिला। बल्कि नए लेखकों को छापने और ओन करने को लेकर एक तरह की प्रतिद्वंद्विता हंस और नया ज्ञानोदय में दिखती रही। हालांकि नया ज्ञानोदय की इस कामयाबी के पीछे उसमें अपनी तरह का लोकप्रियतावाद भी रहा- यानी ऐसी रचनाओं या ऐसे विशेषांकों को प्राथमिकता देने का खयाल, जो आसानी से पाठक जुटा सकें, और इसी मुहिम में नया ज्ञानोदय के कुछ विशेषांक हास्यास्पद बाज़ारू मुद्राएं अख्तियार करते भी दिखे और इनकी आलोचना भी हुई। लेकिन इन सबके बावजूद नए लेखकों को जोड़ने और पाठकों तक पहुंचने के लिए नया ज्ञानोदय जो कोशिश करता रहा है, वह मुझे एक हिंदी लेखक होने के नाते अच्छी लगती है। आज नया ज्ञानोदय में छपना हिंदी की सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं में से एक में छपना है। 

अपने लोकप्रिय रुझानों की वजह से ही नया ज्ञानोदय जैसी रचनाएं छापता रहा है उन्हें याद करते हुए यह बात मेरे गले नहीं उतरती कि ज्ञानपीठ ने सिर्फ गौरव सोलंकी की एक कहानी में निहित अश्लीलता से डर कर उसे छापने से इनकार कर दिया। मैंने वह कहानी पढ़ी है- वह जैसी भी हो, ऐसी बोल्ड या आक्रामक भी नहीं है कि उसे छापने में किसी को परेशानी हो। जाहिर है, वजह कोई दूसरी है। हो सकता है कि एक युवा लेखक और एक जमे-जमाए संपादक या प्रबंधक के बीच किसी वजह से पैदा खटास यह संग्रह न छापने की वजह बना हो।

लेकिन क्या ऐसा होना चाहिए? क्या किसी संस्थान को सिर्फ इसलिए किसी लेखक को रोक देना चाहिए कि उसकी किसी भी वजह से संपादक या प्रबंधक से नहीं पटी? ज्ञानपीठ जैसे संस्थान को यह छोटापन शोभा नहीं देता। अच्छा हो, सारी कटुताओं के बावजूद ज्ञानपीठ की टीम अपनी परंपरा और अपने लेखक का मान रखते हुए उसका यह संग्रह प्रकाशित कर दे या फिर हिंदी समाज को बताए कि वह कौन सी मजबूरी है जिसकी वजह से उसने अपनी ही ओर से पुरस्कृत और स्वीकृत एक संग्रह छापने से इनकार कर दिया है।

बेशक, ज्ञानपीठ को ऐसा न करने का हक है। वह कह सकता है कि वह एक निजी प्रतिष्ठान है और वह किसी लेखक को छापे या न छापे, या उसकी किताब स्वीकृत करके अस्वीकृत कर दे, यह उसका अपना विशेषाधिकार है। दुर्भाग्य से यह तर्क हिंदी लेखक समाज की एक दूसरी दुखती हुई रग पर उंगली रखता है। हिंदी के लेखक की अगर अपने समाज में एक हैसियत होती तो कोई प्रकाशक उसके नखरे उठाता, न कि उसके व्यवहार पर उसे दंडित करने की हिमाकत करता। ज्ञानपीठ अगर गौरव सोलंकी की किताब किसी भी बहाने से नहीं छापता है तो उसे यह डर नहीं है कि उसे इसकी क़ीमत चुकानी होगी। लेकिन इससे यह नतीजा निकालना ठीक नहीं कि हिंदी लेखक की हैसियत बढ़ती तो प्रकाशक की हैसियत गिर जाती, वह दोयम दर्जे का नागरिक साबित होता। उल्टे, हिंदी के लेखक की हैसियत हिंदी के प्रकाशक की हैसियत को बड़ा करती। गौरव सोलंकी अगर लाखों में बिकने वाले लेखक होते तो ज्ञानपीठ क्या, उनके पीछे दूसरे प्रकाशक भी कतार बांध कर खड़े रहते और उन्हें ये छोटी सी लड़ाई लड़ने की फुरसत नहीं होती। लेकिन गौरव सोलंकी क्या, हिंदी के किसी भी लेखक को यह हैसियत हासिल नहीं है। इस वजह से हिंदी में लेखन एक निजी शौक और प्रकाशन एक कुटीर उद्योग से ज़्यादा की हैसियत नहीं रखता, और नतीजा ये होता है कि निजी झगड़े अंतिम झगड़ों की तरह हर जगह छितराए दिखते हैं।

असल संकट यही है- हिंदी का रचना संसार लेखकीय और प्रकाशकीय दोनों स्तरों पर एक तरह की विपन्नता का शिकार है। सवाल है, इसके लिए कौन ज़िम्मेदार हैइस सवाल के जवाब हममें से कई लोग एकाधिक बार तलाशने की कोशिश करते रहे हैं और खुद को एक दुष्चक्र में घिरा पाते हैं। प्रकाशक की शिकायत है कि लेखक ऐसा लिख नहीं रहे जिससे बड़ी संख्या में पाठक बनें, और लेखक की शिकायत है कि एक किताब लिखने की वह कीमत नहीं मिल रही जो मिलनी चाहिए। हिंदी में लिखने से पहले आदमी को अपने गुजारे के साधन खोजने पड़ते हैं। वह आठ-दस घंटे की साप्ताहिक नौकरी करने के बाद, घर के ज़रूरी काम निबटाने के बाद, इन सबके दबाव से उबरने के लिए सिनेमा देखने, किताब पढ़ने या मनोरंजन का कोई दूसरा ज़रिया अख़्तियार करने के बाद लिखने की मेज़ पर बैठता है। उसके पास शोध करने की फुरसत भी नहीं होती, साधन भी नहीं होते। इस बात की गारंटी कतई नहीं होती कि अगर वह साल भर लगाकर एक किताब तैयार करेगा तो वह अगले कुछ साल के लिए उसे गुजारे भर रकम लौटा देगी। कुल मिलाकर हिंदी में लेखन एक पेशेवर काम नहीं, एक शौक भर रह जाता है।

हिंदी के लेखकों की इस बेचारगी के साथ हिंदी के प्रकाशकों की सीमाएं जैसे क़दमताल करती हैं। देश भर में ऐसी दुकानें मुश्किल से दिखती हैं जहां हिंदी की किताबें बिक रही हों। यानी कोई पाठक किताब खरीदने के लिए पुस्तक मेलों का इंतज़ार करे या लेखक की सदाशयता पर निर्भर रहे कि वह उसे किताब की प्रति भेज दे। प्रकाशक किताबों को अपने गोदाम से उठाकर सरकारी गोदाम तक पहुंचा देने में अपनी कामयाबी मानते हैं। वे बाज़ार में तो हैं, लेकिन बाज़ार की शर्तों पर नहीं चल रहे। जिस दौर में छोटी सी छोटी चीज़ विजापन के सहारे बिकती है, उस दौर में हिंदी की किताब एक अविज्ञापित सामग्री है जिसके बारे में पाठक को पता नहीं है। कुछ अलग कारणों से अगर कोई किताब चर्चित हो जाए- यानी पाठक उसके बारे में जान जाएं- तो वह बिकती है, इसके प्रमाण बहुतेरे हैं। लेकिन शायद हिंदी के प्रकाशकों के साधनों की सीमा हो कि वह इस बाज़ार में बहुत ताकत झोंकने की हालत में ख़ुद को नहीं पाता। इसका नतीजा यह होता है कि वह कुल मिलाकर ऐसी सरकारी खरीद पर निर्भर करता है जिसमें ज़रा भी पारदर्शिता नहीं होती- इसका खमियाजा फिर लेखक भुगतता है जो ठीक से जान भी नहीं पाता कि उसकी किताब कितनी बिकी, उसकी रायल्टी कितनी बनी। वैसे हिंदी में कुछ बड़े प्रकाशकों को छोड़ दें तो बाकी मेरे खयाल से रायल्टी तक नहीं देते- या फिर देते हैं तो उन महत्त्वपूर्ण लेखकों को, जिनकी किताब उनके प्रकाशन की हैसियत बढ़ाती है।

इस दुष्चक्र के बाहर, बस एक हद तक, कुछ सरकारी या ट्रस्टीशिप में चल रहे प्रकाशन संस्थान भर हैं- जैसे नेशनल बुक ट्रस्ट, प्रकाशन विभाग या फिर ज्ञानपीठ- जो फिर भी पारदर्शिता बरतते हैं और अपने लेखकों को दूसरों के मुकाबले ज़्यादा रायल्टी देते हैं।

दुर्भाग्य से गौरव सोलंकी ने जो लड़ाई छेड़ी है, वह इन्हीं में से एक प्रकाशक के ख़िलाफ़ छेड़ी है। बेशक, उनके मुद्दे और एतराज़ सही हैं, लेकिन उनकी पूरी मुद्रा में एक अतिरिक्त आक्रामकता और हाय-हाय वाला भाव है जिसमें यह भी पता नहीं चल रहा कि वे क्या चाहते हैं। वे लेखकों से किस बात की अपील कर रहे हैं? क्या वे सिर्फ ये चाहते हैं कि ज्ञानपीठ उनकी किताब शर्तों के मुताबिक छाप दे? या हिंदी के पूरे प्रकाशन संसार की जड़ता को तोड़कर कुछ नया करना चाह रहे हैं? यही नहीं, हिंदी के लेखकों के प्रति उनका जो धिक्कार भाव है- कि जो इस बहस में चुप हैं, वे उनके ख़िलाफ़ हैं या फिर प्रकाशकों से डरे हुए हैं- यह भी कुछ अचरज में डालता है। ज़्यादा दिन नहीं हुए, जब नया ज्ञानोदय में हुए छिनाल प्रसंग पर हिंदी के समाज में कहीं ज़्यादा वैध और सार्थक प्रतिक्रिया हुई थी। तब तो गौरव सोलंकी के बाजू इस तरह नहीं फड़के थे?  क्या इसलिए कि तब उन्हें ज्ञानपीठ खुशी-खुशी प्रकाशित कर रहा था? यह आरोप नहीं है, बस यह याद दिलाने की कोशिश है कि जब अपने ऊपर हमले हों तो दूसरों की नीयत पर इतनी तेज़ी से हमले नहीं करने चाहिए।

बेशक, यह लिखने के बाद भी मैं ख़ुद को गौरव सोलंकी के साथ खड़ा पाता हूं। मैं ज्ञानपीठ वालों से यह दूर की अपील ही कर सकता हूं कि वे इस अनावश्यक प्रसंग को और तूल न दें, लेखक और प्रकाशक के जटिल और संवेदनशील रिश्ते को समझते हुए, सारी खटास के बावजूद गौरव सोलंकी का संग्रह प्रकाशित करने का बड़प्पन दिखाएं। हिंदी के गौरव का सवाल गौरव सोलंकी के सवाल से कहीं ज़्यादा बड़ा है और इस पर कहीं ज़्यादा। 


‘जनसत्ता’ से साभार 

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