आज हिन्दी दिवस है। आज हम दो लेख पढ़ेंगे। पहला लेख है भाषा प्रयोगों की अराजकता पर, दूसरा लेख जेन जी की हिन्दी पर है। पहले लेख में लेखक प्रचण्ड प्रवीर ने भाषा प्रयोगों को लेकर विस्तार से लिखा है। आइये पढ़ते हैं- मॉडरेटर
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सन् २०२६ के सितम्बर का महीना जिस भी कारण से याद किया जाय, हम उसे ‘बैक टू एटीज’ ट्रेण्ड के कारण याद रखेँगे। इसलिए नहीँ कि हम इन्स्टाग्राम या फेसबुक के मारे-बिचारे हैँ, बल्कि इसलिए कि हम आधे भारत की तरह पिछड़े, मूर्ख और बेकार जनता हैँ। अब हमेँ इन सब ‘ट्रेण्ड्स’ का पता नहीँ रहता है, पर यह फौरन मालूम हो गया जब कि हमारे प्रिय प्रकाशक मित्र ने हमेँ ई-पत्र लिखकर लानत भेजी।
हमारे मित्र कहने को तो किताबेँ ‘पैशन’ से छापते हैँ, पर परिणाम देख कर लगता आया है कि ‘फैशन’ की तरह छापते हैँ। एक बार ऐसी शिकायत करने पर उन्होँने अपना तकियाकलाम झट से सुना दिया — ‘फैशन के दौर मेँ गारण्टी की चाह न करेँ’। यह जुमला अस्सी के दशक से सुनते ही आ रहे थे। ‘जेन जी’ के हवाले से यह मालूम चलता है कि बाजार मेँ ऐसा दावा अब सुनाई नहीँ देता। मुझे लगने लगा है कि हिन्दी साहित्य की दुनिया मेँ हमारे प्रकाशक मित्र का ही तकियाकलाम चुराकर लगभग सभी (प्रकाशक, सम्पादक, लेखक, कवि, आलोचक आदि, आदि) ने अपना जुमला बना लिया है।
बहरहाल, हम ऐसे नामुराद आदमी हैँ कि लानत-मलामत को नहीँ छुपाते। हमारा मानना है कि सुख और दुःख दोनोँ को बाँटना चाहिए। ‘ह्वी॰ शान्ताराम’ भारतीय मूल्य याद दिलाया करते थे कि सुख बाँटने से बढ़ता है और दुःख बाँटने से कम होता है। हम भी ऐसा ही मानते हैँ। किन्तु इसी ‘हैँ’ मेँ ही हमारे प्रकाशक मित्र की घनघोर आपत्ति छिपी है। उनका कहना है कि अनुनासिक के लिये चन्द्रबिन्दु का प्रयोग आपकी दादागिरी है। आप ‘हैं’ को ‘हैँ’ लिखते हैँ, वस्तुतः यही तानाशाही का मूल है। इसी मेँ अलोकतान्त्रिकता के बीज छिपे हैँ, जिसका वे पूरी शक्ति से पुरजोर विरोध करते हैँ।
हम लोकतन्त्र मेँ यकीन करते हैँ या नहीँ, इस विषय को शोधार्थियोँ के लिये छोड़ देते हैँ (क्योँकि आजकल हिन्दी का शोध अलाना बाबू-फलाना बेबी के ‘सोना बाबू’ की कविताओँ से होते हुए अधिक से अधिक उनके चरित्र चित्रण पर जाकर समाप्त हो जाता है)। मुद्दे की बात यह है कि हम जवाब देने मेँ यकीन रखते हैँ। लेकिन हम ऐसे नहीँ हैँ कि ईँट का जवाब पत्थर से देँगे। हम तो ‘दूध माँगोगे तो खीर देँगे वाले’ बिरादरी से हैँ।
पिछले साल उन्होँने हमारे वर्तनी-प्रयोग से असहमति जतायी और हमने ‘वर्णोच्चार विधान’ नाम की पुस्तक लिख मारी जो इस साल जनवरी के पुस्तक मेले मेँ प्रकाशित हुई, और हमारी अन्य किताबोँ की तरह ही अचर्चित रही। पर यह उस विफलता का शिकायतनामा नहीँ है।
बहुतेरे शिक्षा ग्रन्थोँ और प्रातिशाख्योँ (वैदिकशास्त्र के अध्ययन हेतु उच्चारण शास्त्र के प्रतिमान ग्रन्थ) का अध्ययन करके हमने स्थापित किया कि अनुनासिक स्वर-वर्ण ऋक संहिता मेँ भी हैँ, जिसे ‘रङ्ग’ की सञ्ज्ञा दी गयी है। अनुनासिक स्वर के स्वरूप-सिद्धि हेतु विभिन्न लिपियोँ मेँ चन्द्रबिन्दु का प्रयोग होता आया है। ठीक तैत्तिरीय प्रातिशाख्य की अनुज्ञा से ब्राह्मी लिपि मेँ भी ‘अनुनासिक’ और ‘अनुस्वार’ का भेद स्पष्ट रखा गया है। हिन्दी ने संस्कृत भाषा के ‘अयोगवाह’ को पूर्णतः अपनाया है और अनुनासिक के लिये चन्द्रबिन्दु को स्वीकार किया है, यह तथ्य है। अतः इसी आधार पर आधुनिक हिन्दी मेँ तत्सम शब्द ‘निद्रा’ के लिए वर्तनी ‘नीँद’ होनी चाहिए न कि ‘नींद= नीन्द’; जो कि भ्रामक है। अगर कोई ‘हिँदी’ शब्द लिखना चाहे तो आज के मानकीकरण के अनुसार वर्तनी समस्या यह खड़ी होती है कि ‘हिंदी’ पद मेँ बिन्दी से अनुनासिक ‘इँ’ पढ़ा जाय या ‘परसवर्ण’ के नियमानुसार ‘अनुस्वार’ को मानते हुए ‘हिन्दी’ पढ़ा जाय? वर्तनी को देखकर उच्चारण का तुक्का लगाना उन भाषाओँ के अनुकूल हैँ जहाँ स्वर-वर्ण की कोई अनिवार्य व्यवस्था नहीँ है जैसे कि अरबी, फारसी और उर्दू।
संस्कृत की तरह हिन्दी भी आक्षरिक भाषा है, जहाँ अक्षर का उच्चारण किया जाता है। इसलिए ‘जनता’ को ‘ज+ न+ ता’ पढ़ते हैँ ‘जन्ता’ नहीँ। ‘उपग्रह’ को अक्षर मेँ तोड़ेँ तो ‘उ’+ ‘पग्’ + ‘र’+ ‘ह’ का उच्चारण शुद्ध होता है, उप+ग्रह उच्चारण नहीँ। अक्षर स्वर्ण वर्ण से निर्दिष्ट होते हैँ, जहाँ स्वर वर्ण के आगे या पीछे व्यञ्जन वर्ण लगते हैँ। इस उदाहरण मेँ ‘उ’ स्वर वर्ण होने के नाते स्वतन्त्र अक्षर है। इसी तरह ‘र’ = र्+ अ, ‘पग्’ = ‘प्’+ अ + ‘ग्’, और ‘ह’ = ‘ह्’ + ‘अ’ अक्षर हैँ। अनुस्वार और अनुनासिक के उच्चारण हेतु भाषाशास्त्र के सुविचारित नियम हैँ।
प्राचीन संस्कृत को वाल्मीकि ने रामायण मेँ ‘भाषा’ कहा है, ‘संस्कृत’ भाषा नहीँ। पतञ्जलि ने अष्टाध्यायी पर अपने ‘महाभाष्य’ मेँ स्पष्ट कहा है कि यदि शब्दानुशासन मेँ नियमोँ के अनुसार व्यवहार किया जाता है तो वह ‘संस्कृत’ (=सही ढङ्ग से व्यवस्थित) है, अन्यथा प्राकृत और अपभ्रंश है जहाँ नियमोँ की ऐसी बाध्यता नहीँ है। नियम ही क्योँ बनेँ? पतञ्जलि उत्तर देते हैँ शब्दोँ के साधु होने के लिये कि जो सही समझा जा सके। अधिक विस्तार मेँ जाने के बजाय, यह कहना उचित है कि पूर्वोक्त उदाहरणोँ की तरह सही वर्तनी ‘सिंह’ है, ‘संशय’ है; ‘भैय्या’ और ‘कौव्वा’ है। शेष हमने पुस्तक मेँ लिख मारा है।
हमारी पूरी किताब पढ़कर प्रिय प्रकाशक मित्र ने कहा, “हम आपकी बात क्योँ मानेँ? सैद्धान्तिक रूप से केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय’ हिन्दी को ‘हिंदी’ लिखता फिरता है। टाइम्स ग्रुप वाले अपने हर अखबार मेँ बिन्दी के लिये खूनी लाल रङ्ग का प्रयोग करते हैँ कि ‘डरो बिन्दी से’, जिसका हमने खून कर दिया है! आप ही ज्यादा काबिल पैदा हुए हैँ जो डर को मिटाना चाहते हैँ? हिन्दवी से लेकर तमाम डिजिटल प्लेटफॉर्म, जिनका जन्म ही हिन्दी के उद्धार और संरक्षण के लिये हुआ है, सब बेवकूफ हैँ? आप ही ‘बेसी’ होशियार हैँ, महाराज?
देखा जाय तो यही हिन्दी क्या, भारतवर्ष के समस्त वाद-विवादोँ का मौलिक तथा आध्यात्मिक स्वरूप है। बात यह नहीँ रह जाती कि सामने वाला जो कह रहा है वह सत्य है या नहीँ। जो बात कही जा रही है, उसमेँ तथ्य है या नहीँ? बात केवल इतनी-सी रह जाती है कि आपकी औकात क्या है जो हमारे अज्ञान को, हमारे अहंकार को, हमारी जड़ता को रेखाङ्कित करेँ? सामने वाले को गाली देकर, नीचा दिखाकर, वितण्डा खड़ाकर, उसकी औकात याद दिलाकर जो आत्मिक सुख मिलता है वह सम्यक रूप से वादविवाद मेँ परास्त करने मेँ कहाँ से मिलेगा?
लिहाजा हमारे प्रकाशक मित्र ने एक सुप्रसिद्ध राष्ट्रीय समाचारपत्र के रविवारीय पृष्ठ का पीडीएफ भेजा। वहाँ दुमदार लेखकोँ ने (अशुद्ध वर्तनी के लिये माफ कीजिएगा क्योँकि मैँ ‘दुमदार’ ही लिखना चाह रहा था पर गलती से ‘दुमदार’ लिखा जा गया है। इसका कारण स्पष्ट है मेरा सॉफ्टवेयर रोमन वर्णोँ से देवनागरी वर्णोँ मेँ परिवर्तन करके लिखता है; जहाँ दुम के लिये ‘dum’ लिखना पड़ता है। मेरा अभीष्ट और मिलता-जुलता पद, जो कि पूर्वोक्त पद के प्रथम अक्षर (यहाँ पर =दु) मेँ ‘उ’ स्वर के बजाय ‘अ’ स्वर के प्रयोग से बनता। रोमन स्क्रिप्ट मेँ वहाँ ‘a’ के बदले ‘u’ का प्रयोग करने का चलन है।) बताया कि जिसे कहा बाजारू, उसी ने जीता बाजार!
वाह! वाह!
बाजार जीत लिया!!
चाँद पर झण्डा फहरा लिया!!!
क्या बात है! तालियाँ, तालियाँ।
यहाँ कुछ बातेँ गौर करने लायक है। हमारे प्रकाशक मित्र कहेँगे वर्तनी का डङ्का पीटने वाले आप, नुक्ता लगाना भूल गये। हम पूछते हैँ कि साहिब आपको पता है कि अरबी-फारसी मेँ कितने तरह के ‘ज’ से मिलते-जुलते वर्ण हैँ जिनका ‘ज’ मेँ समाहार हो गया है? वे नहीँ जानते तो हमेँ बताना पड़ जाता है कि उच्चारण साम्य रखने वाले पाँच — जीम, जाल, जे, जुआद, जोय — उर्दू और अरबी वर्णमाला (हुरूफ+ए+तहज्जी) के वर्ण आते हैँ। हिंदी या सामान्य देवनागरी में इनका उच्चारण और पहचान इस प्रकार है:—
- जीम (ج): इसका उच्चारण हिन्दी के ‘ज’ की तरह होता है। (जैसे: जहाज)
- जाल (ذ): इसका उच्चारण अँग्रेजी के ‘Z’ या ‘Dh’ की तरह होता है। (जैसे: ज़ीशान)
- जे (ज़े – ز): इसका उच्चारण ‘ज़’ ध्वनि के लिए होता है। (जैसे: ज़मीन)
- जुआद (ज़ुआद/स्वाद – ض): अरबी में इसका उच्चारण ‘द्वाद’ या ‘ज़ुआद’ जैसा होता है, उर्दू में इसे ‘ज़’ की तरह ही पढ़ा जाता है। (जैसे: ज़रूर)
- जोय (ज़ोए – ظ): इसका उच्चारण भी ‘ज़’ की तरह थोड़ा भारी आवाज़ में होता है।
अब बताइए कि उच्चारण भेद ही करना है, इतना आवश्यक है तो आप श्रीमान् चन्द्रबिन्दु से मुँह मोड़कर नुक्ता का बोसा क्योँ लेना चाहते हैँ? उर्दू साहित्य के हिन्दी मेँ लिपीकरण करने की इतनी ही पड़ी है तो श्री वागीश शुक्ल के सारे सुझावोँ को मान लीजिए जो उन्होँने पुस्तकाकार मेँ उपलब्ध करा रखी है।
ऐसे मेँ हमारे प्रिय प्रकाशक मित्र का कहना हो जाता है ऐसे तो आप ‘मंजिल’ के लिये ‘मञ्जिल’ और ‘इनकार’ के लिये ‘इङ्कार’ की वकालत करना चाहेँगे। हम कहना चाहेँगे कि हिन्दी बोलने वाले ९९.९% लोग चवर्ग और तालव्य वर्णोँ का अशुद्ध उच्चारण करते हैँ। आज जिस तरह से ‘चवर्ग’ उच्चरित है वह ‘अफ्रिकेट’ (स्पर्श-सङ्घर्षी) है और शास्त्र-समर्थित ‘पैलेटल’ (तालव्य) नहीँ। मन्जिल मेँ वह ‘ज’ तालव्य ‘ज’ नहीँ है। हमेँ शास्त्रीय उच्चारण करना हो तो ‘चञ्चल’ और उसी अनुसार ‘मञ्जिल’ बोलने से कोई हानि नहीँ होगी। कमसे कम लिखेँगे तो उस मौलिक योजना को समझ सकेँगे जिससे यह भाषा बनी है।
– टेररिस्ट!
– आप ‘टेररिस्ट’ हैँ।
– आतङ्कवादी हैँ।
– शर्म आनी चाहिए आपको कि आप शुद्धतावादी हैँ। हम जानते हैँ कि आप फासीवादी हैँ।
– आप ज्यादा पढ़ लिये हैँ इसलिए दूसरोँ को नीचा दिखा रहे हैँ!
उनके सनसनीखेज प्रस्थापनाओँ पर हम क्या बताते कि हमारे आतङ्क से कितने सम्पादकोँ की गरदन कट चुकी है। कितनोँ ने निराशा से धारदार उस्तरे से अपनी नायाब मूँछेँ मूँड़ ली और चूड़ियाँ पहन ली हैँ। कितने समाचार वाचकोँ की नौकरी चली गयी है? कितनोँ कवियोँ और साहित्यकारोँ ने जहर खाकर खुदकुशी कर ली है! लेकिन प्रकाशक मित्र ऐसा बोलते हैँ तो हम उनकी बात का बुरा नहीँ मानते! दोस्त ऐसा कह सकता है। कोई और कुछ कहना चाहे तो उनके लिये हम ‘मीर तकी मीर’ का शेर जवाब मेँ लिख दे रहे हैँ – तू यूँ गालियाँ गैर को शौक़ से दे, हमेँ कुछ कहेगा तो होता रहेगा।
मित्र से हमने इतना ही कहा कि वैखरी के चार उपयोगितामूलक आयाम ‘सुनना’, ‘बोलना’, ‘पढ़ना’ और ‘लिखना’ है। हिन्दी के वे सभी विद्वान् चुल्लू भर पानी मेँ डूब जाँय जिन्हेँ शुद्ध बोलने, लिखने की काबिलियत नहीँ है। वे मसखरे हैँ, दिलजले हैँ, बकवादी हैँ, जनवादी हैँ, लेकिन यह तय है वे विद्वान् नहीँ हैँ। यहाँ विनम्रता से जोड़ा जा रहा है कि भाषा मसखरोँ, दिलजलोँ, बकवादियोँ और जनवादियोँ – सभी के लिये हैँ। किसी की बपौती नहीँ है!
परन्तु प्रिय प्रकाशक मित्र ने बड़ी गम्भीरता से एक बात कही जिससे खफा होकर हमेँ इतना सब कुछ कहना पड़ रहा है। उन्होँने कहा, “हिन्दी को स्कर्ट मेँ घुमाने वालोँ की वाहवाही हो रही है और इस युग मेँ आप साड़ी लिपटाने के प्रयास मेँ जुटे हैँ।“
इस वक्तव्य की नारीवादी मीमांसा करने वाली शेरनियाँ भले ही अविलम्ब दहाड़ना शुरू कर देँ, किन्तु प्रयुक्त रूपक का तात्पर्य उसी समाचार पत्र के अन्य शीर्षक मेँ हैँ — “हिन्दी पढ़ते-पढ़ते बोला, भाई, यह तो संस्कृत है।” यह किसी आठवीँ के बच्चे का रुदन है कि वह हिन्दी नहीँ पढ़ सकता है। उसके अक्षम और भाषायी रूप से अयोग्य अभिभावक भी हाँ मेँ हाँ मिला रहे हैँ। वाह रे एमबीए डिग्रीधारी नालायक माता-पिता! तेरी निगाह ने काम क्या लाजवाब किया। अँग्रेजी को हर हमेशा इन्तिखाब किया?
हिन्दी को देवनागरी के बजाय ‘रोमन’ मेँ लिखने की माँग और हिन्दी को ‘हिङ्गलिश’ बनाने की माँग के पीछे मौलिक कारण क्या है? स्पष्ट रूप से वह है अपनी अक्षमता, अपनी कुपढ़ता, अपने अज्ञान को ढँकना और अँग्रेजी के भाषाई साम्राज्यवाद के सामने आत्मसमर्पण कर देना। दूसरे शब्दोँ मेँ ‘ङ’, ‘ञ’, ‘ण’, ‘न’ और ‘म’ का उच्चारण न कर पाने की विफलता! सबका समाहार अँग्रेजी के ‘n’ और ‘m’ से कर देना। इसी तरह ‘श ष स’ मेँ भेद न कर पाना। वे नहीँ जानते कि ‘ज्ञ’ का उच्चारण ‘ग्ञँ’ जैसा क्योँ होता है।
क्योँकि किसी माई के लाल ने कभी भाषा पढ़ी नहीँ। क्योँ नहीँ पढ़ी? सिलेबस मेँ नही थी! आप सबने तो अँग्रेजी मेँ ही आनर्स किया? कहाँ से अँग्रेजी आ गयी? जब प्रयास से आयी तो प्रयास से हिन्दी सीखिये, साहित्य मेँ अनाचार क्योँ फैला रहे हैँ? फोनोलॉजी जानते नहीँ। हिन्दी फोनेटिक्स मेँ इतना नहीँ पता कि ‘ख’ दरअसल ‘क्’+‘ह्’ न होकर वस्तुतः ‘क्’+ ‘ᳲक’ है। अरे, अरे, अरे, आपने तो जिह्वामूलीय ᳲक का नाम भी नहीँ सुना। कैसे सुनेँगे हिन्दी के विद्वान हैँ न? लेकिन आप महानुभाव अँग्रेजी का चम्मच लेकर पैदा होने वाले अँग्रेजी मेँ फोनोलॉजी और मॉर्फोलॉजी पढ़ेँगे और उछलते फिरेँगे – ‘यू नो हिन्दी इज अ पूअर लैङ्वेज।‘
हिन्दी मेँ सब दरिद्र, दीन-हीन! भक्ति और चाटुकारिता मेँ लीन। हाय रे आत्महीन!
मुक्तिबोध के शब्दोँ मेँ –
उदरम्भरि बन अनात्म बन गये,
भूतोँ की शादी मेँ कनात-से तन गये,
किसी व्यभिचारी के बन गये बिस्तर,
दुःखों के दाग़ोँ को तमग़ोँ-सा पहना,
अपने ही ख़यालोँ मेँ दिन-रात रहना,
असङ्ग बुद्धि व अकेले मेँ सहना,
जिन्दगी निष्क्रिय बन गयी तलघर,
अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया!!
सुझाव है, बाजार जीतने वाले ‘दुमदार’ लेखक अपने दफ्तर मेँ ‘हिन्दी मिली अँग्रेजी’ का उपयोग करते हुए अन्तरराष्ट्रीय क्लाइन्टोँ को ‘नई वाली अँग्रेजी’ मेँ पत्र लिखेँ। इस सुझाव के साथ वैधानिक चेतावनी भी है कि इस पर अमल करते ही अगले ही दिन वे नौकरी से चलता कर दिये जाएँगे। अँग्रेजी के नामचीन न्यूजचैनल देवनागरी मेँ लिखे कुछ शब्दोँ का प्रसारण करेँ या फिर हिन्दी मेँ मिली अँग्रेजी बोलकर ‘नई वाली अँग्रेजी’ का मार्ग प्रशस्त करेँ। गारण्टी है कि भारत के तमाम ‘इलीट क्लास’ उचक-उचक कर हाय-हाय करने लगेँगे। यहाँ विनम्रता से जोड़ा जा रहा है कि भाषा मसखरोँ, दिलजलोँ, बकवादियोँ और जनवादियोँ – सभी के लिये हैँ। इसीलिए सभी स्कर्ट की लम्बाई पर विमर्श कर सकते हैँ। लोकतन्त्र है भाई! मजाक चल रहा है?
उर्दू वाले रोएँगे कि हाय, हाय। हमारे उर्दू मेँ विसर्ग नहीँ होता पर हिन्दी मेँ विसर्ग लिख कर बड़ा उपकार कर रहे हैँ। लेकिन ऐसा करने वालोँ के उस्तादोँ के उस्ताद को भी ‘श्वास प्रयत्न’ और ‘श्वास-नाद’ प्रयत्न का भेद मालूम न होगा। पूरी दुनिया को ‘घोष’ और ‘अघोष’ के बारे मेँ तब पता चला जब आधुनिक उपकरण बनेँ और आज से कमसे कम २८०० साल पुराने शास्त्र ‘ऋक् प्रातिशाख्य’ के सूत्रोँ की पुष्टि हुई। पर यह कौन जानता है? मध्ययुग के हिन्दी काव्य मेँ मूर्धन्य और महाप्राण वर्णोँ का प्रयोग वीर-रस मेँ क्योँ होता था? यह साधारण-सा प्रश्न आज हिन्दी के कवियोँ और विद्वानोँ के ज्ञान की परिधि से बाहर का विषय बन गया है।
क्योँ?
हर भाषा की उत्कृष्टता के मानक होते हैँ। हिन्दी की उत्कृष्टता का मानक संश्लिष्ट विचारोँ, सम्यक शब्दोँ और स्थापित व्याकरण के दायरे से बाहर नहीँ जा सकती। भाषा का स्वरूप गत्यात्मक है, किन्तु वह अनर्गल नहीँ हो सकती। कमसे कम एक भाषा मेँ तो कदापि नहीँ, जिसकी जड़ेँ हजारोँ साल पुरानी है जिसका शब्दानुशासन का दुनिया मेँ कोई साम्य नहीँ है।
हमारे समय की मूलभूत समस्या के दो तरह से घटित हैँ, जिसपर कोई कुछ नहीँ कहता। वे हैँ — १. अपने अतीत से नितान्त अपरिचितता और घोर विमुखता। २. धन को ही सर्वोच्च प्राथमिकता देना।
आने वाला कल जैसा भी हो, उसका सजग इतिहासकार हमारे इस कालखण्ड को स्मृतिहीन युग कहकर अवश्य पुकारेगा। हम अपने पुरातन अतीत तो छोड़िये, सौ साल पहले के भारत से अकल्पनीय रूप से कट गये हैँ। किसी को अपने दादा-नाना की बोली नहीँ आती। जीवन शैली वैसी अपना नहीँ सकते। कोई उपवास-व्रत नहीँ कर सकता। तीन-चार भाषाएँ नहीँ जानता। भारत मेँ जहाँ घोर दरिद्रता और अन्न का अभाव था, जहाँ लोग नौ-दस मील पैदल चला करते थे, जहाँ तीन चौथाई आबादी के पास पाँव मेँ चप्पल नहीँ था, जहाँ लोग कई-कई दिन तक नमक-साग खाकर गुजारा करते थे, जहाँ महमारियोँ से गाँव के गाँव उजड़ जाते थे, जहाँ अकाल और कुप्रबन्धन से एक प्रान्त की एक तिहाई आबादी मर गयी – हम सब भूल गये। हम उन सभी कठिनाइयोँ मेँ भी इतनी आत्महीन और इतने पतित नहीँ थे जितने अब हो चुके हैँ। स्थिति ऐसी हो चुकी है कि विना इन्टरनेट, विना बिजली के एक दिन जिन्दा नहीँ रहा जा सकता है। लेकिन असीमित ज्ञान के भण्डार के बाद भी किसी व्यक्ति मेँ ज्ञान उतना ही विरल और अहंकार उतना ही सघन!
दूसरी बात पर आते हैँ और नीतिशतक का यह प्रसिद्ध श्लोक पढ़ते हैँ: —
जातिर्यातु रसातलं गुणगणैस्तत्राप्यधो गम्यतां
शीलं शैलतटात्पतत्वभिजनः सन्दह्यतां वह्निना ।
शौर्ये वैरिणि वज्रमाशु निपतत्वर्थोऽस्तु नः केवलं
येनैकेन विना गुणस्तृणलवप्रायाः समस्ता इमे ॥
जाति पाताल जाए, गुण नष्ट होँ, शील गिर जाए, कुल भस्म हो जाए और वीरता पर वज्र गिरे—हमेँ केवल अर्थ (=धन) चाहिए, क्योँकि इसके बिना अन्य सभी गुण तिनके के बराबर हैँ।
भर्तृहरि के नीतिशतक मेँ ही धन की उपयोगिता और तुच्छता, दोनोँ ही बताने वाले अनेक श्लोक हैँ। दुर्भाग्य है कि विदेह जनक, वर्द्धमान महावीर और गौतम बुद्ध के देश मेँ, जहाँ धन को ठुकरा कर सत्य और अहिंसा जैसे सनातन मूल्य के बरअक्स हमारा इतना पतन हो चुका है कि आये दिन यही देखने को मिलता है कि किसने कितने पैसे बनाये और कितनी कम उम्र मेँ अरबोँ का मालिक हो गया। भले ही वह पैसे अफीम के कारोबार से या वेश्यावृत्ति को बढ़ावा देने के उपक्रम से बना हो। मानव के सामाजिक आचारण वाले मौलिक धर्म और उससे जुड़ी नैतिकता का तिरस्कार करना ही आज के समय का स्थापित मूल्य हो गया है। उपर्युक्त श्लोक का व्यङ्ग्यार्थ नीतिशतक के अन्य श्लोकोँ के साथ समझा जा सकता है, सन्दर्भच्युत होकर नहीँ। इसी भारत मेँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे चार पुरुषार्थोँ का सन्तुलन महाभारत जैसे ग्रन्थोँ स्थापित किया गया है और यह पुरुषार्थ व्यवस्था का समायोजन ही भारत की मौलिक सांस्कृतिक अवधारणा रही है।
केवक धन की अभीप्सा मूल्य व्यापारियोँ का हो सकता है, लोभियोँ का हो सकता है, कवियोँ और साहित्यकारोँ का नहीँ!
बाजार की ओर देखने वाले सब कुछ हो सकते हैँ — मसखरे, मनचले, विदेशी पैसे पर नृत्य करने वाले भाण्ड, क्रान्ति की मशाल लिये भ्रमित कार्यकर्ता, निरन्तर गाली देने की क्षमता रखने वाली बेशर्म जेनजी, गालियोँ को सही ठहराने वाले और नारेबाजी करने वाले बेईमान इन्फुलएन्सर, किन्तु कवि और साहित्यकार के रूप मेँ उनकी भूमिका संदेहास्पद है। पश्चिम मेँ भले ही बुकोवस्की जैसे पियक्कड़ और तमाम तरह के गिरहकट साहित्यकार हुए हैँ, किन्तु भारत मेँ यायावरी और नैतिक पतन की सीमा निर्धारित की गयी। इसीलिये बाणभट्ट सम्राट हर्ष द्वारा ‘लम्पट’ कहे जाने पर आहत हुए और उसका प्रत्युत्तर दिया। फिर यह बाणभट्ट ही थे जिन्होँने हर्षचरित लिखी, किन्तु चारण के रूप मेँ नहीँ।
हमारे दौर मेँ साहित्यकारोँ का सर्वथा ‘लम्पट’ होना, मदिरापान करके सड़कोँ पर गिर पड़ना, दूसरोँ से पैसे माँगना या ऐँठना, गालीबाज होना, कुण्ठित और अश्लील होना – धन और यश अर्जित करने के पतित विधियोँ को अपना कर बुद्धिमता सिद्ध करना बड़ा मूल्य बन चुका है। बुद्धि नहीँ विवेक साहित्यकारोँ को शोभा देता है। कुटिलता नहीँ आर्जवता कवियोँ के लिये वरेण्य है। कटु वचन नहीँ शील ही मर्यादापुरुषोत्तम का आदर्श है। आज के आलोचकोँ की स्थापना का मानदण्ड यह है कि हमने कितने बड़े साहित्यकारोँ को विना किसी तर्क के निपटाया और किसको दुत्कार कर टपका दिया। दुःख की बात है कि इस गर्हित विधि के पैरोकार बहुत हैँ।
ऐसे ही तमाम नैतिक पतनोँ का दुष्परिणाम यह हुआ है कि स्कर्ट की लम्बाई कमने को नारी-स्वातन्त्र्य और पुरुषोँ का आधुनिक सौन्दर्यबोध तथा साड़ी लिपटाने के प्रयास को पिछड़ेपन का रूपक मान लिया गया है।
सौन्दर्यबोध के मानक बदलने की यह कोशिश बड़ी कुटिलता से सुविचारित है। इसका स्पष्ट प्रमाण अशुद्ध वर्तनी, खासकर नुक्ते का प्रयोग और चन्द्रबिन्दु के अन्धविरोध मेँ परिलक्षित है। नुक्ता देवनागरी लिपि का अनिवार्य अङ्ग नहीँ है। देवनागरी की वर्णमाला इस तरह निःसृत नहीँ हुई है। उसी वर्णमाला मेँ ‘चन्द्रबिन्दु’ का सूक्ष्म महत्त्व है, जिसका प्राकृत और अपभ्रंश प्रचुरता से प्रयोग किया गया है। हिन्दी के विकास जितनी तरह से भी हुआ हो, जितनी भी भाषाओँ से हुआ हो, वह कभी संस्कृत के विरोध मेँ नहीँ खड़ी हो सकती। हम न तो हिन्दी के आक्षरिक स्वरूप से मुँह मोड़ सकते हैँ न ही उसके ‘स्वनिक’ रूप को बिगाड़ सकते हैँ। यदि करना चाहते हैँ तो यह भाषाई अपराध है, दुरुपयोग है, मूढता है और विकास के नाम पर भ्रामकता है। जिन भाषाओँ के शब्दोँ का हिन्दी मेँ आगम हुआ है, उन सभी का हिन्दी का आक्षरिक स्वरूप और स्वनिक स्वरूप मेँ ही समाहार होना चाहिए।
कहते हैँ कि हिन्दी मेँ अनुनासिक के लिये चन्द्रबिन्दु (जो कि १९५५ तक छपाई के मानक प्रयोग मेँ स्वीकृत थी) के बजाय बिन्दु के परिवर्तन का श्रेय धर्मवीर भारती को जाता है। सम्भवतया उन्होँने ही लाघव के ‘फैशन’ लिए ‘माँ’ को ‘मां’ छापना धर्मयुग की नीति निर्धारित की। यदि यह सुनी-सुनाई बात सत्य है, तब उस स्थिति मेँ धर्मवीर भारती को ही इस पतन का सूत्रधार समझना चाहिए। विचारणीय है कि धर्मवीर भारती से यदि अस्सी के दशक मेँ यह प्रश्न पूछा जाता कि शास्त्र ने जो हमारी समझ की गारण्टी की व्यवस्था की थी, उसी के साथ आपने ऐसा मनचला खिलवाड़ क्योँ किया, वो क्या कहते? मैँ दावा कर सकता हूँ कि वे ‘ट्रेण्ड’ के अनुसार यही कहने को विवश होते कि ‘फैशन के दौर मेँ गारण्टी की चाह’ न करेँ। मेरी इस बात को कोई और माने न माने, ‘दुमदार’ हिन्दी वाले जरूर मानेँगे। ‘हिन्दवी’ वाले भी!
जिस भाषा को लोग ठीक-ठीक बोलना नहीँ जानते हैँ, लिखना नहीँ जानते हैँ; कम-से-कम उनकी पीली आँखोँ मेँ इतनी छिछली शर्म होनी चाहिए कि वे अपनी अज्ञानता को स्वीकारेँ और उसके मौलिक स्वरूप को सिद्ध करने मेँ असमर्थता प्रकट करते हुए अपनी नपुंसकता पर छाती पीटेँ।
जय हो दुमदार हिन्दी वालोँ को!
(भाद्रपद शुक्ल पक्ष द्वितीया, विक्रम संवत २०८३)
(पिछले हिन्दी दिवस के अवसर पर जानकीपुल मेँ प्रकाशित लेख ‘हिन्दी के विद्वान और ‘कौन बनेगा करोड़पति’ पढ़ा जा सकता है – https://jankipul.com/kbc_hindi.html )
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प्रचण्ड प्रवीर की अब तक उन्नीस पुस्तकें प्रकाशित हैँ। सन् २०२६ मेँ उनकी सात पुस्तकेँ प्रकाशित हुई हैँ – १. वर्णोच्चार विधान – भारतीय ध्वनितत्त्वशास्त्र मेँ वर्णविलास २. ऋतम्भरा – उपनिषद् आख्यायिका मञ्जरी (उपनिषदोँ पर आधारित कहानियाँ) ३. कोमल ऋषभ (लघु कथा सङ्ग्रह) ४. कोमल गान्धार (व्यङ्ग्य सङ्कलन) ५. कल की बात : मध्यम (लघु कथा सङ्ग्रह) ६. तीव्र मध्यम (दर्शन और संस्कृति चिन्तन) ७. स्वर्ण-झनक (आलोचना – अम्बुज पाण्डेय के साथ सह-लेखन मेँ)।
वेबसाइट : www.prachandpraveer.com


