प्रसिद्ध लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक ने लिट फ़ेस्ट पर चली बहस के बहाने साहित्य और साहित्यकारों से जुड़े कई मुद्दे इस लेख में उठाये हैं। इस बहसतलब लेख को आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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“हम तालिबेशुहरत हैं, हमें ‘दाम’ से क्या काम”
शाम ढले, चिराग जले ग्राहक की तालिब एक बाई सड़क पर खड़ी है। संभावित ग्राहक उसके करीब आता है, उससे अपेक्षित सवाल करता है, बाई कहती है – पाँच हजार, आठ हजार, दस हजार या जिस के भी काबिल वो हो। ग्राहक को रेट कुबूल है तो वाह वाह! दोनों राज़ी। नहीं कुबूल तो चलता किया जाता है। इस का निचोड़ ये है कि बाई पैसे के लिए अपनी जिस्मानी खिदमात फरोख्त करती है, उसमें मुलाहज़े की कोई जगह नहीं।
एक लेखक है, उसको किसी लिटरेरी फेस्टिवल में शिरकत का न्योता मिलता है जिसमें शामिल होता है – एयर-फेयर, फाइव-स्टार-होटल स्टे, पिक अप एण्ड ड्रॉप फ्रॉम एयरपोर्ट, जमा बाकी खिदमात जो हास्पिटैलिटी बिजनेस का स्वाभाविक हिस्सा होती हैं। लेखक पूछता है पैसा कितना मिलेगा। पसंदीदा जवाब नहीं मिलता है तो कहता है, नहीं आ सकता, किसी दूसरे लेखक को बुला लो, उसकी जेहनी खिदमात फीस बिना – इज्जतदार लफ़्ज़ ‘मानदेय’ – उपलब्ध नहीं हैं।
क्या फर्क है ऊपर दर्ज दो मिसालों में?
खाकसार की निगाह में कोई फर्क नहीं। एक का स्टॉक-इन-ट्रेड जिस्म है, दूसरे का जेहन है। मंजूरशुदा, मनमाफिक कीमत अदा किये बिना दोनों ही हासिल नहीं। फर्क सिर्फ ये है कि बाई जो करती है किसी शौक की खातिर नहीं करती, जरूरत के, मजबूरी के तहत करती है। जबकि लेखक की ऐसी कोई जरूरत, कोई मजबूरी उजागर नहीं क्योंकि कहता है, दावा ठोक के कहता है – हम साहित्यकार हैं, पैसे के लिए नहीं लिखते।
क्या सच कहता है?
मेरे खयाल से तो नहीं! वो तो बाकायदा मांग खड़ी करता है।
अगेंस्ट सर्विसिज़ टु बी रेंडर्ड!
मांग नाकुबूल हो तो लिट् फेस्ट को अपनी अज़ीम हाजिरी के नाकाबिल करार देता है। ये कहना सुनना उसे कुबूल नहीं कि लिट् फेस्ट्स से पैसा मिलना खुशी की बात है लेकिन न मिलना मातम मनाने का, हत्तक का मुद्दा नहीं।
अपने जैसे सारे लेखकों का सेल्फ-अप्वायंटिड रहनुमा बन के एक लेखक मानदेय के हक में जो वजुहात बताता है, उनपर गौर फरमाइए:
- जब फेस्टिवल वालों को कॉर्पोरेट सेक्टर से मोटी मोटी रकमें मिलती हैं तो उनमें लेखक का हिस्सा भी तो होना चाहिए! वो क्यों फ्री में हाजिरी भरे! उनके पास उत्सव धर्म, आवभगत, और मयनोशी के लिए पैसा है तो लेखक को देने के लिए भी होना चाहिए। यानी जब दौलत का दरिया बह रहा हो तो उसमें गोता लगाने का अवसर लेखक को भी मिलना चाहिए, खास तौर से तब जबकि पैसा मेजबान की जेब से नहीं जाना।
इलेक्शन लड़ता नेता अपने भाषण में बोला, “मैं जीत गया तो मैं बनी हुई सड़कें खुदवा कर फिर बनवाऊँगा।”
“क्यों?”
“उन्होंने कमा लिया, मैं न कमाऊँ?”
- घर से एयरपोर्ट और वापिसी का खर्चा तो खुद करना पड़ता है!
एक पहाड़ी गाँव में गरम पानी का चश्मा था। उसकी उस खासियत की वजह से गाँव की महिलायें चश्मे पर जाकर कपड़े धोती थीं। चश्मा इतना मशहूर हो गया कि मीडिया की तवज्जो में भी आया। एक पत्रकार वहाँ पहुँचा। उसने कुदरत का करतब आँखों से देखा तो एक महिला से पूछा, “गरम पानी तो कपड़ों के साथ कमाल करता होगा?”
“साबुन तो अपना लगाना पड़ता है!” महिला नाक चढ़ा कर बोली।
- मेरा वक्त जाया हुआ – रीड, चरखा कातना था, नहीं कात सका – तीन दिन मुझे घर से बेघर हो कर गुजारने पड़े, उसकी कोई भरपाई तो होनी चाहिए न!
गौरतलब है कि भरपाई उस लेखक को चाहिए जिसका स्वांग है कि वो पैसे के लिये नहीं लिखता, जिसको फेस्टिवल वालों का बाजरिया कॉर्पोरेट सेक्टर हासिल खटकता है, साफ इशारा करता है कि ऐसे हासिल में लेखक क्यों शामिल नहीं है!
ये कैसा लॉजिक है? इतनी खिदमत करा लेंगे, हर तरह की तवज्जो से नवाजे जाएंगे, शाम को, कर्टसी स्पॉन्सर, ड्रिंक डिनर में शिरकत का सुख पाएंगे – शुक्र जानिए जो ये न कहें कि मैं नॉनड्रिंकर हूँ, मुझे उसका कैश कम्पेंसेशन मिलना चाहिए – यादगार के तौर पर यादगार गिफ्ट हैम्पर पाएंगे लेकिन हाजिरी की उजरत के तौर पर कोई नकद रकम नहीं मिलेगी तो शादी में रूठा हुए फूफा बन के दिखाएंगे। यानी ये कोई प्रीमियम नहीं कि लिट् फेस्ट में शिरकत से आपको अन्य लेखकों से, लाइक-माइन्डिड पीपुल से, इन्टरऐक्ट करने का मौका मिलता है।
फिर सलाह देते हैं कि किसी और लेखक को बुला लो। क्या नायाब अछूती, कभी किसी को न सूझी राय है, जो इस खुशफहमी को अन्डरलाइन करती है कि मुर्गा बांग नहीं देगा तो सवेरा नहीं होगा। मोर नहीं नाचेगा तो तीतर, बटेर भी जलवाअफ़रोज़ नहीं होंगे।
साहित्यकार खुद अपनी जुबानी नहीं कहता तो उसकी तरफ से उसके तरफदार कहते हैं कि साहित्यकार पैसे के लिए नहीं लिखता।
मेरी अरज है कि पैसे के लिए ही लिखता है। फ़ेस-सेविंग-डिवाइस के तौर पर ये आडंबर खुद उनका खड़ा किया हुआ है, जिनको पैसे की कहीं दूर से भी झलक दिखाई नहीं देती। वो उस मुबारक दिन के लिए तरसता है जब वो अपनी कलम से अमीष त्रिपाठी, चेतन भगत, देवदत्त पटनायक जैसा मुद्रा उपार्जन का कोई मैयार खड़ा कर पाएगा।
सेमुअल जॉनसन ने कहा है कि कोई अहमक ही होगा जो पैसे के अलावा किसी और वजह से लिखता होगा। (No man but a blockhead ever wrote except for money) साहित्यकार वो दिन देखने के लिए तड़पता है जबकि उसकी कलम इतनी मकबूलियत हासिल कर चुकी होगी कि पैसा घर में परनालों से बहता आएगा, रोशनदानों से भीतर गिरेगा, बरसाती पानी की तरह छत में से टपकेगा। लेकिन ये पाखंडभरा नारा हर हाल में खड़ा किये रहेगा कि साहित्यकार पैसे के लिए नहीं लिखता। ईश्वर की कृपा से पहले से बनी हैसियत न हो तो दो टाइम गुरुद्वारे जाकर खाना खाता है और फुटपाथ पर सोता है।
वही साहित्यकार लिटरेरी फेस्टिवल्स में अपनी हाजिरी की फीस चाहता है। चाहता ही होता तो गनीमत थी डिमांड करता है, बस चले तो वसूल करता है। साथ में दलील पेश करता है कि मुशायरों में शिरकत पर भी तो शायरों को पैसा मिलता है, कवियों को भी तो कवि सम्मेलनों से कविता पढ़ने की फीस मिलती है!
यहाँ ‘मिलने’ और ‘मांगने’ में फर्क समझने की जरूरत है। एक मकबूल पत्रकार ने फ़ेस बुक पर पोस्ट किये अपने लेख में बीबीसी समेत दस ऐसी जगह दर्ज कीं जहां से उन्हें पैसा मिला – रिपीट, मिला – लेकिन किसी एक भी ऐसी जगह का जिक्र न किया जहां से उसने पैसा मांगा तो मिला। बड़ी ऑर्गेनाज़ेशंस का दस्तूर है कि वो अपने इनवाइटीज़ को ऐसे आनरेरियम से नवाजती हैं जो इनवाइटी का लिहाज है, उसका हक नहीं है। मिलना ऑप्शन है, मांगना कम्पलशन है, बल्कि टपकती लार है।
पत्रकार साहब का हमखयाल लेखक निमंत्रण हासिल होने पर पूरी धृष्टता से कहता है – इतना पैसा दो वरना किसी और लेखक को बुला लो।
उस धमकी के तहत मेजबान जरूर कहता होगा – हमें आप ही माँगता है, भिडू, नहीं तो हम रो रो के जान दे देंगे।
मेरे सामने एक लिट् फेस्ट की ऐसी मिसाल है कि आमंत्रित लेखक को मानदेय राशि – दस हजार रुपये – का लिफाफा थमाया गया तो उसने ये कह के लेने से इंकार कर दिया कि इतनी खिदमत हो गई, इतनी इज्जत हासिल हो गई, मानदेय की अभी कसर रह गई!
पत्रकार के हमखयाल लेखक के लिए ये मिसाल कोई मायने नहीं रखती। उसके लिए एक ही बात मायने रखती है – पैसा! मानदेय! उसकी बड़ी इगो से मैच करता बड़ा! भरपूर! टोकन अमाउन्ट नहीं चलेगा।
‘साहित्यकार पैसे के लिए नहीं लिखता’ क्योंकि कहता है – ‘हम तालिबेशुहरत हैं हमें ‘दाम’ से क्या काम! दाम न होगा तो क्या नाम न होगा!’ ‘हम तो जुदा नसल हैं, पैसे की मोहमाया से मुक्त हैं’। सवाल है, जब एक लम्बे भाव ताव के बाद साहित्यकार प्रकाशक से एडवांस हासिल करता है, जब प्रकाशित पुस्तक की रॉयल्टी मिलती है तो क्या कहता है? ‘नहीं चाहिए। मालिक का दिया सबकुछ है’। या ये कि ‘मेरी तरफ से गुरुद्वारे को चंदा दे देना! हम तो शोहरत के अभिलाषी हैं, पैसे पर निगाह नहीं रखते’।
नहीं कहता। नहीं कह सकता। उलटे रेगुलर रॉयल्टी स्टेटमेंट न मिलने की शिकायत करता है, पीरियाडिक रॉयल्टी न मिलने पर आसमान सिर पर उठा लेता है। प्रकाशक के खिलाफ कोर्ट में जाने की धमकी देता है, कभी कभार शहीदी अंदाज से धमकी पर खरा उतर कर भी दिखाता है। फिर भी असंतोष बना रहेगा तो प्रकाशक बदल लेगा। फिर, फिर और फिर प्रकाशक बदल लेगा। किसलिए? वो तो पैसे के लिए नहीं लिखता! वो तो तालिबेशुहरत है! न मिले पैसा। पुस्तक प्रकाशित हो गई न! खुश होने के लिए क्या इतना काफी नहीं!
बड़े से बड़ा लेखक – साहित्यकार – दुहाई देता है कि उसे ईमानदारी से रॉयल्टी नहीं मिलती। क्यों? क्यों? क्या नहीं जानता कि ‘जब आए संतोषधन सब धन धूरि समान’।
देसी प्रकाशक से उम्मीद करना बेमानी है कि वो ईमानदारी से रॉयल्टी की पेमेंट करेगा। अगर आपको ये बात हज़्म नहीं तो बेहतर यही होगा कि पैसे का खयाल त्याग दें – मिल जाए तो खुद को खुशकिस्मत समझें – या कोई और कारोबार देखें – अगरचे कि साहित्यकार पैसे के लिए नहीं लिखता’ वाला बेताल अभी भी आपके कंधे पर सवार न हो।
एक आत्मघाती खयाल लेखक को खुद प्रकाशक बनने का भी आता है ताकि रॉयल्टी की चिख चिख खत्म हो, घी खिचड़ी में ही जाता दिखे, लेकिन उस खयाल का अमूमन नतीजा होता है – न खुदा ही मिला न विसालेसनम।
एक साहित्यिक लेखक की चार किताबें एक जगह छपीं जिन से उसने बड़ा नाम कमाया। बड़ा लेखक, चर्चित लेखक माना जाने लगा। उसी लेखक की अगली पाँच किताबें पाँच जुदा प्रकाशनों से छपीं। हर बार प्रकाशक बदला। क्यों भला? जब पैसा मुद्दा नहीं तो पहला क्या काटता था?
कोई बड़ी बात नहीं कि अगली किताब फिर किसी जुदा प्रकाशन से छपे।
साहित्यिक लेखक जरा चल जाए तो वो अपनी हैसियत फिल्म स्टार्स जैसी समझने लगता है। उन जैसे ही टेम्पर टेंट्रम दिखाना सीख जाता है। ट्रेजेडी ये है कि अपनी औकात -जिसे कोई दूसरा नहीं, अतिशयोक्ति अलंकार के तहत खुद आँकता है – के काबिल पैसा उसे कभी मिल ही नहीं सकता। मिलता है तो वो औकात के पैमाने के मार्कर को दो प्वायंट ऊपर सरका देता है, वो मिलता है तो और ऊपर सरका देता है, लेकिन जब भी सवाल होगा, जवाब में वो बोले न बोले, उसके हमखयाल तरफदार जरूर बोलेंगे – साहित्यकार पैसे के लिए नहीं लिखता।
कैसा पाखंड है, सारे ही जिसके पोषक हैं!
इस बाबत अभी एक और कथन मिजाज में लाइये:
अनुराग से लिखिए, अंतर्प्रेरणा से लिखिए, वजह से लिखिए (बेवजह लिखिए) पर हमेशा पैसे के लिए लिखिए।
Write out for love, write out for instinct, write out of reason, but always write for money. (Louis Untermeyer)
ऐसा ही दूसरा पाखंड ये है की हमें तो प्रेरणा आ के हिलाती है तो ही लिखते हैं।
‘हैरी पॉटर’ की प्रणेता विश्व प्रसिद्ध लेखिका जे के रॉलिंग अपने स्ट्रगल के दौर में रेस्टोरेंट में बैठ कर पेपर नेपकिंज़ पर लिखती थी क्योंकि रेगुलर पेपर, टाइपराइटर अफोर्ड नहीं कर सकती थी। उसको प्रेरणा रेस्टोरेंट में आकर कंधे से झिंझोड़ती थी?
खलील जिब्रान सिग्रेट का पैकेट फाड़ कर उसे सीधा करते थे और उलटी, न छपी साइड पर लिखते थे तो क्या प्रेरणा के मोहताज थे? प्रेरणा संयोगवश कहीं और हाजिरी भर रही हो, सिनेमा देखने गई हुई हो, तो नहीं लिखते थे?
सॉल बेलो आधी रात को नींद से जाग कर लिखने के लिए उठते थे प्रेरणा के जगाये?
इसी संदर्भ में डब्ल्यू. सामरसेट मॉम की सुनिए:
मैं तभी लिखता हूँ जब प्रेरणा आकर हिलाती है। मैं खुशकिस्मत हूँ कि ऐसा हर सुबह ठीक नौ बजे आकर करती है।
(I write only when inspiration strikes. Fortunately, it strikes every morning at nine o’clock sharp – W. Somerset Maugham)
जैक लंडन कहते हैं – प्रेरणा का इंतजार नहीं किया जा सकता, उसे काबू में करने के लिए डंडा लेकर उसके पीछे दौड़ना पड़ता है।
हजरात, लेखक को अपनी ज़िंदगी में दो ही काम होते हैं – या लिखता है या लिखने लायक सोचता है। इस में प्रेरणा का क्या रोल है? सिवाय इसके कि काम न करने का इज़्ज़तदार बहाना है। नल खोलो तो पानी बहता है। प्रेरणा आ के नल नहीं खोलती।
अपनी सरकारी मुलाज़मत के दौर में आप का खादिम मजबूरन संडे राइटर था। प्रेरणा के सम्मान में मैं एक इतवार चूक जाता था तो लेखन में दो हफ्ते का गैप आ जाता था। प्रेरणा फिर जलवाअफ़रोज़ होना भूल जाती थी तो तीन हफ्ते का, चार हफ्ते का। कैसे मैं प्रेरणा के हिलाए ही लिखना अफोर्ड कर सकता था। सच पूछें तो ये लग्ज़री सिर्फ बड़े लेखकों के हिस्से में आती है जो एक पुस्तक लिखते हैं तो प्रेरणा की सत्ता के वशीभूत पाँच साल कुछ लिखना जरूरी नहीं समझते, महज एक किताब की आन-बान-शान की धूप सेंकते हैं।
अंत में, जाहिर है – ताज्जुब भी है – कि सारे ही लेखक, साहित्यकार, इस बाबत एकमत हैं कि उन्हें लिटरेरी फेस्टिवल्स में शिरकत का पैसा मिलना चाहिए क्योंकि बकौल खुद, हमारी वजह से ही लिट् फेस्ट्स हैं। ‘हम से हैं लिट् फेस्ट्स, लिट् फेस्ट्स से हम नहीं’ के अंदाज से।
सिवाय आपके खादिम के। क्योंकि वो बिरादरी-बाहर है। लुगदी है।
सुरेन्द्र मोहन पाठक
22.02.2026

