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  • हिन्दी की छात्रा होने के नाते मुझे शर्मिंदगी है

    आज सुबह यह खबर आई कि हिन्दी की प्रसिद्ध विद्वान फ्रांचेस्का ऑर्सिनी को वैध वीज़ा होने के बावजूद दिल्ली हवाई अड्डे से वापस भेज दिया गया। इसी प्रसंग को लेकर यह टिप्पणी लिखी है जानकी पुल की युवा संपादक अनुरंजनी ने। अनुरंजनी गया स्थित दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में शोध कर रही हैं और बतौर शोधार्थी  फ्रांचेस्का ऑर्सिनी के शोध को महत्व को और अच्छे ढंग से समझती हैं- मॉडरेटर

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    भारत में जब सब दीपावली मना रहे थे तब हमारे ही देश में एक ऐसी घटना घट रही थी जिसे सुन कर शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो ज्ञान के प्रति लोकतान्त्रिक रवैया रखता हो और उसे शर्मिंदगी नहीं हुई होगी! हमें यह खबर दीपावली की अगली सुबह मिलती है कि हिन्दी की प्रसिद्ध विद्वान फ्रांचेस्का ऑर्सिनी को वैध वीज़ा होने के बावजूद दिल्ली हवाई अड्डे से वापस कर दिया गया वह भी बिना कोई कारण बताए! यह सुन कर बतौर भारतीय नागरिक और हिन्दी की विद्यार्थी होने के नाते शर्मिंदगी के सिवा क्या बचता है? जो व्यक्ति अपना पूरा अकादमिक जीवन हिन्दी भाषा और साहित्य को दे रहा हो उसका प्रवेश ‘हिन्दी के देश’(?) में ही बिना किसी कारण के प्रतिबंधित कर दिया जाए यह कितनी बड़ी बदसलूकी है। क्या अब भारत ‘अतिथि देवो भव’ की संकल्पना को नहीं मानता या फिर अतिथि भी वही होंगे जिनका ज्ञान से कोई लेना-देना न हो? अभी ज़्यादा दिन नहीं बीते जब तालिबान के विदेश मंत्री भारत आए और यहाँ आकर अपनी ओछी, संकुचित मानसिकता का भरपूर प्रदर्शन किया जिसमें भारत सरकार ने भी उनकी भरपूर सहायता की। यह संकीर्ण मानसिकता थी महिला पत्रकारों को ‘प्रेस-कॉन्फ़्रेंस’ में आने को प्रतिबंधित करना। क्या यह बिना भारत सरकार की सहमति, सहायता से मुमकिन हो सकता था? नहीं हो सकता था। तो जब भारत में स्त्री-पुरुष को तथाकथित समान अधिकार हैं तब ऐसा कैसे हो गया? जब लोगों ने इसका विरोध किया तब जाकर अगले ‘प्रेस-कॉन्फ़्रेंस में महिला-पत्रकारों को बुलाया गया। लेकिन इसकी नौबत क्यों आई? क्या यहाँ भारत सरकार को उक्त विदेश-मंत्री का देश वापसी नहीं कर देना चाहिए था?

    ‘द वायर हिन्दी’ के ‘फेसबुक हैण्डल’ पर इससे जुड़े लेखों पर जिस तरह की टिप्पणियाँ आ रही हैं उन्हें देख कर भी ताज्जुब ही हो रहा है। यह कैसा नशीला पदार्थ हम भारतीयों को दे दिया गया है जिसके कारण हम तार्किक होना भूल ही गए हैं, हम अपनी सरकार से सवाल करना भूल चुके हैं और जो सवाल कर रहे उसे फ़तवा जारी कर दे रहे! क्या हम सुनने का धैर्य खो चुके हैं? मुझे ऐसे में राजेश जोशी की कविता ‘मारे जाएँगे’ बहुत याद आती है। कितनी सटीक हैं ये पंक्तियाँ –

                                          “जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे

                                          मारे जाएँगे

                                          कटघरे में खड़े कर दिए जाएँगे, जो विरोध में बोलेंगे

                                          जो सच-सच बोलेंगे, मारे जाएँगे”

    जब विदेश में भारतीय विद्यार्थियों के साथ कुछ भी अनुचित होता है या उन्हें बदसलूकी से वापस भेज दिया जाता है तब हम भारतीयों का खून खौल उठता है, हम पता नहीं कितने अपशब्द विदेशी सरकारों को अर्पित करते हैं फिर जब वैसा ही सलूक हमारे अपने देश में हो रहा है तो क्यों हमें अच्छा लग रहा है? क्यों भारतीय आम जनता फ़्रांचस्का की विद्वता को ही कठघरे में खड़ा कर रही है जबकि उनकी विद्वता के सामने हमारे खड़े होने की भी स्थिति नहीं है? ऐसे में यह विचार और प्रबलता से उठने लगता है कि भारत के लोग मूलत: कुंठित लोग हैं जिन्हें भारतीय मूल के किसी व्यक्ति का विदेश में सत्ता में आने या उसकी संभावना देख कर अत्यधिक खुश होते हैं, मसलन ऋषि सुनक या कमला हैरिस लेकिन इटली से आई सोनिया गाँधी जिन्होंने अपना सब कुछ भारत को सौंप दिया उनके प्रति घृणा और वितृष्णा का भाव रखते हैं, उन्हें गाली देते रहते हैं।

    फ्रांचेस्का ऑर्सिनी से जुड़ी खबर पर अन्य बे-सिर-पैर की टिप्पणियों में एक टिप्पणी में एक यह भी थी कि ‘हम भारतीयों को विदेशियों से ज्ञान लेने की ज़रूरत नहीं है, हमें जो ज्ञान चाहिए वह अपने देश से ले लेंगे’। यह कैसी अकड़ है जो हमें कितना अज्ञानी बना रही है। यह भी उसी तथाकथित ‘राष्ट्रीयता’ की उपज है जिसमें भारत में ही सब कुछ पा लेने के विचार को थोपा जा रहा है। भारतीय शिक्षा व्यवस्था कैसी है यह हम सब जानते हैं। हमारे यहाँ शोध की भी क्या स्थिति है इससे भी हम सब परिचित हैं। जिस तरह से ‘पीएचडी’ को सहायक प्राध्यापक के लिए अनिवार्य कर दिया गया उसके बाद जिस कदर शोध(?) करने वालों की बाढ़ आई है (‘ज्ञान की आँधी’ आने के बाद) उसमें शोध की गुणवत्ता क्या है और तरीका क्या है यह भी जानकार लोगों से छुपा नहीं है, जहाँ न जाने कितने लोग फ़र्जी शोध कर रहे, जहाँ सब कुछ पैसे के बल पर, पैरवी के बल पर हो रहा। यह बात भारतीयों को खास कर हिन्दी वालों को चुभ सकती है लेकिन आज की सच्चाई यही है कि हिन्दी से जुड़े विषयों पर गहनता से शोध-कार्य भारत में नहीं बल्कि भारत से बाहर हो रहे हैं जिसमें एक बड़ा नाम फ्रांचेस्का ऑर्सिनी का भी है। और बीती रात जिस तरह का व्यवहार फ्रांचेस्का ऑर्सिनी के साथ किया गया इसे देख हिन्दी की छात्रा होने के नाते मेरे पास शर्मिंदगी के सिवा कुछ नहीं है।

    2 thoughts on “हिन्दी की छात्रा होने के नाते मुझे शर्मिंदगी है

    1. यहाँ दो स्थितियाँ हैं,
      (१) संबंधित व्यक्ति का हिंदी का विद्वान होना
      (२) वैलिड वीजा होते हुए भी प्रवेश नहीं देना
      आपत्ति शायद दूसरी वजह पर नहीं है, क्योंकि यह सामान्य प्रक्रिया है, जिसमें सरकारें किसी विदेशी को प्रवेश देने के अधिकार को सुरक्षित रखती है ।
      Visa होना किसी देश में प्रवेश की गारंटी नहीं होती।
      आपत्ति का आधार शायद पहला है कि चूँकि वे हिंदी की विदुषी हैं, इसलिए उन्हें नहीं लौटाना चाहिए । अगर वे मेडिकल, कंप्यूटर, फ़्रेंच जर्मन, चीनी या किसी और विषय की विदुषी होती तो शायद आपत्ति नहीं होती। किसी व्यक्ति को प्रवेश नहीं देने का कारण सार्वजनिक करने की कोई व्यवस्था होती नहीं है लेकिन इससे संबंधित जानकारी ली जा सकती है। थोड़ी activism दिखाइए जानकारी लीजिए ।
      जहाँ तक लौटाने की बात है, कुछ तो वजह रही होगी, यूँ ही कोई बेवफ़ा नहीं होता । वो पहली बार तो आ नहीं रही थी । वैसे भी इतने सारे लोग visa लेकर रोज आख़िर आ ही रहे हैं।
      जहाँ तक तार्किक होने का क्या अर्थ है, सरकार ने जो किया आँख बंद कर उसका विरोध कर देना। फ़र्ज़ कीजिए कोई CIA का agent किसी भाषा का विद्वान हो तो उसपर सरकार को करवाई नहीं करनी चाहिए? तार्किक होकर सोचिए।

      1. वामपंथी विचारधारा के चश्मे को उतारिये , स्वयम्भू बौद्धिकता के दर्प को हटाकर सोचिए कि कोई भी सरकार आव्रजन नीति के तहत् ही विदेशियों को अपने देश में प्रवेश देती है पूरी जांच पड़ताल के वाद । तो कृपया अपना सरकार विरोधी ऐजेण्डा मत चलाइये , यदि शोधार्थी हैं तो निष्पक्ष शोध करके निर्लिप्त भाव से अपनी बात सामाजिक पटल पर रखिये इससे आप भी सम्मान की अधिकारी होंगी 🙏

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