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Diwali
  • कथा-कहानी
  • भैया आज भी घरकुण्डा बनाते हैं!

    अब दीवाली के बाद दिवाली की कहानी पढ़िए। प्रचण्ड प्रवीर के ‘कल की बात’ सीरिज़ में यह कहानी- मॉडरेटर

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    कल की बात है। जैसे ही मैँने वापस कॉलोनी मेँ कदम रखा, खुशबू ने मुझे आश्चर्य से देखते हुए कहा, “अरे आप दीवाली मेँ घर आये हुए हैँ?” मैँने उसे समझाया, “नहीँ-नहीँ। दरअसल यह मेरा होलोग्राफिक अवतार है जिसे तुम देख रही हो।” सुनते ही उसने मुँह फुला कर कहा, “आप भी ना। आज पूरे मोहल्ले मेँ आपकी चर्चा हो रही है और आप हैँ कि…।” अब बारी मेरे आश्चर्यचकित होने की थी। संजीदा आवाज़ मेँ मैँने कुछ उत्सुकता से पूछा, “मेरे बारे मेँ कोई अफवाह फैल गयी है क्या? बात यह है कि मैँ चटोर नहीँ हूँ, वो तो मोहन..।” खुशबू ने सफाई दी, “नहीँ-नहीँ। वो बात नहीँ है। मन्दाकिनी दीदी मायके आयी हुयीँ हैँ। उनकी माँ की तबीयत ठीक नहीँ है इसलिये ससुराल मेँ लड़-झगड़ कर दो दिन के लिये दीवाली मेँ यहाँ आयी हैँ। मुझसे मिली तो बातोँ-बातोँ मेँ बात निकली कि आपके घर मे बहुत अच्छा घरकुण्डा बनता था। मैँने आपकी तारीफ मेँ कह दिया कि भैय्या आज भी घरकुण्डा बनाते हैँ और खुद ही रङ्गते भी हैँ। यहाँ तक कि अपने बड़े-से घर मेँ डेढ़-सौ दियोँ मेँ तेल डालकर अच्छे से सजाते हैँ।”
    दीपावली के सामान से लदा हुआ था, इसलिये मैँ जल्द से जल्द बात खतम कर के घर जाना चाहता था। मैँने हाँ मेँ हाँ मिलाते हुए कहा, “ये भी कहती कि वे रङ्गोली भी बना देते हैँ। पटाखे भी खुद ही बाँधते हैँ। कन्दील भी बनाते हैँ।” खुशबू की आँखेँ आश्चर्य से फैल गयी। उसने कहा, “अरे भैय्या, आप यकीन नहीँ करेँगे कि जब मैँ मन्दाकिनी दीदी को ये सब बता रही थी, तब उन्होँने भी ठीक यही कहा।”
    “क्या कहा?” मैँने हैरानी से पूछा। खुशबू कहने लगी, “यही कि तुम्हारे भैय्या रङ्गोली भी बनाते हैँ। पटाखे भी खुद ही बाँधते हैँ। रङ्ग-बिरङ्गे कन्दील बनाते हैँ। आकाश मेँ उड़ने वाला आकाशदीप बनाते हैँ। आतिशबाजी मेँ आपका जवाब नहीँ। एक समय मेँ आप पेशेवर आतिशबाज थे।”
    खुशबू का भरोसा नहीँ किया जा सकता है। एक तो बहुत शरारती है और दूसरी बात यह कि नमक-मिर्च लगाने मेँ उसका कोई जोड़ नहीँ है। लेकिन मन्दाकिनी की बात कुछ-कुछ सच थी। आश्चर्य था कि मन्दाकिनी को पुरानी बातेँ याद थीँ। मैँने खुशबू को बताया, “अच्छा। अब तो सबके पास बहुत पैसा आ गया। जिसे देखो वह बहुत-से पटाखे खरीद लाता है। पिछली सदी की बात है। उन दिनोँ मोहल्ले मेँ हम लोग चन्दा कर के पैसे इकट्ठा कर लेते थे। उसके बाद बहुत किस्म के पटाखे खरीद कर लाते थे। रात को पूजा के बाद मैदान मेँ मोहल्ले के लोग जुटते थे। तब चन्दे के पैसे से लाये महँगे पटाखे— रॉकेट, आसमानी तारा, बड़ा वाला अनार, बड़ी वाली घिरनी — इन सबका बन्दोबस्त किया जाता था। उस समय एक मनिहार आया करता था, जो किस्म-किस्म के सस्ते पटाखे बनाता था। उसे पटाखोँ की अच्छी जानकारी थी। साथ ही वह करतब करते हुए आतिशबाजी करके दिखाता था। मैँने उससे पटाखे बाँधना सीखा था। पर मुझे कन्दील बनाने मेँ और आकाशदीप बनाने मेँ बहुत मज़ा आता था।”
    “और घरकुण्डा बनाने मेँ?” खुशबू ने शरारत से पूछा। मुझे इसके पीछे गहरी चाल लगी। मैँने कहा, “बहुत पुरानी बात है। एक नटखट लड़की थी। वह कुएँ के पास ईँटोँ को मिट्टी से जोड़कर, ऊपर से गीली मिट्टी लेप कर, सूख जाने पर चूने से पोतने के बाद उसपर कलाकारी किया करती थी। उसकी कलाकारी बड़ी सुन्दर हुआ करती थी। लाल रङ्ग से वह घरौँदे की मुण्डेर बना दिया करती थी। और फिर एक शरारती लड़का था। वह भी उसके बनाये घरौँदे के सामने कुछ वैसा ही पर बेढ़ब घरौँदा बनाने की कोशिश करता था। पूछो क्योँ?”
    खुशबू ने आश्चर्य से पूछा,  “बताइये ना! क्योँ?” मैँने कहा, “लड़के ने कसम खायी थी कि एक घर बनाऊँगा, तेरे घर के सामने।” खुशबू हँसने लगी फिर पूछा, “क्या हुआ फिर घर बनाने का?” मैँने कहा, “यही तो कहानी का रहस्य है।” खुशबू ने अधीर होके पूछा, “कहानी पूरी कीजिये ना फिर?” मैँने जल्दीबाजी मेँ टालते हुए कहा, “कभी और बताऊँगा। अभी बहुत काम है।”  खुशबू ने नाराज होते हुए बोली, “ये कोई बात नहीँ हुई। कुछ तो बताइए इस कहानी मेँ आगे क्या होता है?” मैँने आगे बढ़ते हुए कहा, “जो इस अधूरी कहानी को सुनेगा वह समझ जायेगा कि यदि दूर कहीँ इक्कीस दीपक जल उठेँ और उसके जवाब मेँ एक आवारा आकाशदीप सन्देसा लिये उड़ जाये…।” खुशबू ने टोका, “कौन-सा सन्देसा?” मैँने जाते-जाते बात पूरी की, “दिल में जो प्यार हो तो, आग भी फूल है, सच्ची लगन जो हो तो, परबत भी धूल है।”
    लक्ष्मी-पूजा का मुहूर्त ही साढ़े-सात बजे के बाद का था। पूजा करने के बाद डेढ़-सौ दीपक जलाने मेँ कितना समय लग जाता है! आँगन-देहरी, सभी जगह दीपक जलाने के बाद जब मैँने छत पर सामने की मुण्डेर पर इक्कीसवाँ दीपक जलाया, मैँने मन्दाकिनी के घर की छत की तरफ देखा। दस बज गये थे। आतिशबाजी से आकाश रौशन था। रह-रह कर पटाखे फूट रहे थे। ऐसे मेँ ना जाने मेरी अधूरी कहानी मन्दाकिनी के कानोँ तक पहुँची भी या नहीँ। और पहुँच भी गयी हो तो उसका पैगाम आये यह तो अचरज की ही बात होगी।
    मेरा दिल धक्-सा रह गया। मैँने देखा मन्दाकिनी की छत से एक लाल आकाशदीप उड़ चला। देखते ही देखते वह आकाशदीप मेँ आवारा सन्देसा लिये उड़ रहा था। मुझे दूर से लगा कि रङ्गीन फुलझड़ियोँ की हल्की हरी-नीली रौशनी मेँ लाल साड़ी पहने शायद वह खिलखिलाती आकृति मन्दाकिनी ही थी।
    मैँ नीचे उतर आया। कुछ सोचते-विचारते हुए मैँ कुएँ के पास वाले मन्दिर की ओर बढ़ चला। दीवाली की रात थी। लगातार पटाखे फोड़े जा रहेँ थे। मैँने सोचा कि अभी पकवान उड़ाये जा रहे होँगे या घरोँ मेँ लोग जुआ खेलने मेँ व्यस्त होँगे। हनुमान जी को प्रणाम कर के मैँ कुएँ की मुण्डेर पर कुछ देर बैठा रहा। पुराने हरसिंगार के पेड़ से भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी। यहीँ अक्सर मन्दाकिनी और मैँ घरौन्दा बनाया करते थे, अब तो कोई घरकुण्डा बनाता ही नहीँ। मैँने सोचा कि मेरी ख़ाम-ख़याली कुछ ज्यादा ही हो गयी। ज्योँ ही मैँ उठने को हुआ, सामने मन्दाकिनी खड़ी दिख गयी। इतने सालोँ के बाद मन्दाकिनी का रूप-ऐश्वर्य चौगुना हो चुका था। चमकती साड़ी, कत्थई होठोँ की लाली, गले मेँ चमकता हीरोँ का हार, तिस पर दीवाली की रौनक मेँ पूरी सजी-धजी मन्दाकिनी मैँने पहले कभी ना देखी थी। मुझे अपलक देखता देखकर, अनदेखा करते हुए वह पहले मन्दिर गयी। मैँ सोच रहा था कि अब वो मुझे नहीँ पहचानेगी। लेकिन बाहर आकर उसने बिना किसी सम्बोधन के बेफिक्री से मुझसे दूर से ही पूछा, “आज कन्दील नहीँ बनायी?” बीत गये सालोँ के गिले-शिकवे के साथ मैँने कहा, “किसके लिये बनाऊँ? सोचा था कि किसी के घर के आगे एक घर बनाऊँगा, सो वो भी न हो सका।”
    मन्दाकिनी भी अब कुएँ की मुण्डेर के पास आ गयी। उसने अन्धेरे गहरे कुएँ मेँ झाँकते हुए कहा, “मैँने पहले ही कहा था ना – घर का बनाना कोई आसान काम नहीँ, दुनिया बसाना कोई आसान काम नहीँ।“  मैँने मायूसी से कहा, “आखिकार तुम ही सही निकली।“ मन्दाकिनी ने मुझे सँजीदगी से देखा। मैँने काँपते हुए पूछा, “खुशबू ने तुमसे कुछ कहा था?” मन्दाकिनी ने बेफिक्री से कहा, “नहीँ तो। क्या कहेगी? एक ही बार… दोपहर मेँ आयी थी। तुम्हारी कुछ बात निकली तो मैँने बताया कि तुम पेशेवर आतिशबाज बनना चाहते थे।” मैँने हैरानी से कहा, “बनना चाहता था?  मुझे लगा कि तुमने कहा था कि मैँ पेशेवर आतिशबाज था। जितने पटाखे मैँ जानता हूँ और मेरी छत से रौशन होते हैँ, वैसे तुमने कहीँ और देखेँ भी हैँ क्या?” सुन कर मन्दाकिनी एकदम से बोली, “हाँ देखेँ हैँ। लेकिन इस शहर मेँ नहीँ, जापान मेँ।” मैँ निरुत्तर हो गया। मन्दाकिनी ने ठण्डी साँस लेकर कहा, “तुम अब भी वैसे ही हो। छोटी-छोटी बातोँ पर रूठ जाते हो।“ मैँने जब कुछ नहीँ कहा तब उसने पूछा, “इस बार घरकुण्डा बनाया था?” मैँने कहा, “नहीँ। मैँ अब बाज़ार से खरीद कर लाता हूँ।”
    “क्या? बाज़ार से? मेटल का? लकड़ी वाला?” उसने लगभग चिल्ला कर कहा। मैँने घबरा कर कहा, “अब इतना समय कहाँ है कि घरकुण्डा बनाऊँ। मिट्टी का लेप लगाऊँ। तुम बनाती हो क्या?”  मन्दाकिनी ने कुछ न कहा। आकाश मेँ कोई तेज रोशनी का पटाखा फूटा। उसने ऊपर आकाश मेँ देखते हुए कहा, “जानते हो। हर दीवाली मुझे तुम्हारी याद आ जाती है। सोचती हूँ कि क्या तुम अब भी मेरे घर के सामने एक घर बनाओगे? जब भी तेज रौशनी वाले पटाखोँ से आकाश जगमग हो जाता है, मुझे ऐसा लगता है कि तुम मुझे कमर से पकड़ कर हवा मेँ उठा रहे हो और पूरा आकाश खिलखिलाने लगता है। क्या ऐसी आतिशबाजी हो सकती है कभी?”
    मैँने हाँ मेँ सिर हिलाया। उसने हैरानी से मुझे देखा। मैँने खड़े होकर हरसिंगार के पेड़ को जोर से हिलाया और देखते ही देखते उससे रातरानी के फूल झड़ने लगे। फूलोँ की बारिश मेँ बरसोँ पुरानी नटखट मन्दाकिनी लौट आयी। झट-से मन्दाकिनी को कमर से उठाकर हवा मेँ गोल-गोल घुमाने लगा, जैसे दसियोँ अनार एक साथ रौशन हो उठे। तभी फूलोँ की आग भरी बारिश मेँ, आग के फूलोँ की बारिश मेँ आकाश मेँ कई-कई पटाखेँ फूट पड़े। तारोँ भरे घूमते आकाश मेँ रह-रह कर फैलते जाते विशाल लाल-नारङ्गी-बैँगनी-हरे-नीले बनते-बिगड़ते गोलोँ मेँ मैँ सालोँ बाद वापस लौट आयी हँसती-खिलखिलाती मन्दाकिनी को जी भर के देखता रहा।
    काटोँ भरे हैँ लेकिन, चाहत के रास्ते
    तुम क्या करोगे देखेँ, उल्फत के वास्ते
    उल्फत मेँ ताज छूटे
    , ये भी तुम्हेँ याद होगा
    उल्फत मेँ ताज बने, ये भी तुम्हेँ याद होगा
    मैं भी कुछ बनाऊँगा, तेरे घर के सामने
    दुनिया बसाऊँगा, तेरे घर के सामने!

    ये थी कल की बात!

    दिनाङ्क:   २१/१०/२०२५
    सन्दर्भ:    १. गीतकार – हसरत जयपुरी , चित्रपट – तेरे घर के सामने (१९६३)

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