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  • सेरेंडिपिटी फेस्टिवल, गोवा: एक लेखक की डायरी

    गोवा में सेरेंडिपिटी फेस्टिवल होता है, जिसकी बड़ी ख्याति है। हिन्दी के युवा कथाकार निहाल पराशर ने भाग लिया और वहाँ के अनुभवों पर यह डायरी लिखी आप भी पढ़िए, किस तरह लेखकों को नये नये अनुभव होते हैं- मॉडरेटर 

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     मेले में कविता सुनाता मैं

    सेरेंडिपिटी 2025

    डायरी

    गोवा

    14.12.25 – 22.12.25

     

    14.12.25 / गोवा

    कई दिनों बाद ख़ुद को एक कवि की तरह देख रहा हूँ।

    फ़िलहाल गोवा में हूँ। यहाँ सेरेंडिपिटी फेस्टिवल में एक कवि की तरह आया हूँ। कविता का मंच भी अद्भुत है—एक टैक्सी में!

    दरअसल दो महीने पहले मेरे दोस्त दरस (दर्शन सिंह ग्रेवाल) का फ़ोन आया। बहुत समय बाद हम बात कर रहे थे। दरस रेख़्ता फेस्टिवल और देश-दुनिया के तमाम समारोह का कला निर्देशन करता आया है। ख़ुद कविताएँ भी लिखता है और साथ ही एक बेहतरीन गायक भी है। मैं दरस को बहुत पसंद करता हूँ। हम बहुत ज़्यादा नहीं मिले हैं, लेकिन जितना भी मिले अच्छा समय साथ बीता। मुझे याद आता है, सबसे पहले शायद दस साल पहले मिले होंगे–उत्तराखंड में; फिर दिल्ली में; और एक बार अमृतसर में। घुमक्कड़ कलाकार है।

    दरस ने सेरेंडिपिटी फेस्टिवल में कविता पढ़ने की बात की। बहुत ही अलग कॉन्सेप्ट! सेरेंडिपिटी बहुत बड़ा आयोजन है। आर्ट्स फेस्टिवल में शायद सबसे बड़ा है। देश-विदेश से लोग आते हैं–हज़ारों की तादाद में। मैं इस आयोजन के बारे में जानता हूँ, लेकिन पहले कभी इसे दर्शक या कलाकार की तरह देखने का मौक़ा नहीं मिला। गोवा के पणजी के अलग-अलग इमारतों में इसके कई आयोजन स्थल होते हैं। करीब छः से साथ जगहों में ये फेस्टिवल फैला हुआ है। फेस्टिवल एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए मुफ़्त टैक्सी सर्विस देती है। दस दिन तक फेस्टिवल चलता है। नाटक होता है; संगीत होता है; तरह-तरह के आर्ट इंस्टालेशन होते हैं! बहुत कुछ होता है। मुझे इतनी जानकारी थी। लेकिन इससे ज़्यादा नहीं।

    आम जनता के लिए जो टैक्सी सर्विस है, उसमें अनजान लोगों को कवितायें सुनानी हैं– ऐसा दरस ने मुझसे कहा! ये भी बताया कि कभी पाँच लोग तो कभी सिर्फ़ एक इंसान को भी कविता सुनानी पड़ सकती है। आईडिया बहुत अलग लगा। मैंने ऐसा कुछ किया नहीं है। सुन कर भी लगा कि ये किस तरह का आयोजन है। और समझ आया कि दरस बेहद अलग दुनिया में रहता है। मेरे आसपास तो ऐसा कोई ना कर रहा है, ना ऐसी बातें ही हो रही हैं। और सबसे बड़ी बात–सेरेंडिपिटी इस कविता पाठ के आयोजन को अपने बाक़ी आयोजनों की तरह ही प्रमोट करेगा। आर्ट क्यूरेटर जिन कवियों को निमंत्रण देंगे, उनकी फीस भी देंगे, रहने का इंतज़ाम भी करेंगे। गोवा में दिसंबर के महीने में आठ-दस दिन; काम कविताएँ सुनाना, वो भी सिर्फ़ शाम पाँच बजे से सात बजे तक; तरह-तरह के कलाकारों से मिलना; और सबसे ज़रूरी बात पूरे फेस्टिवल में शुरुआत से अंत तक रहना। मेरे पास ना कहने का कोई कारण तो नहीं था। सिवाय इसके कि मैं अब कविताएँ नहीं लिखता। मैं अपनी कविताओं के साथ असहज हूँ।  

    पुरानी कविताएँ हैं। दस साल पुरानी; बारह साल पुरानी। कॉलेज के दिनों में बहुत कविताएँ लिखता था। अब पढ़ता हूँ तो पसंद नहीं आती। वो मेरे बनने का समय था। बहुत कुछ कच्चा ही था। लेकिन दरस मुझे एक कवि की तरह देखता है। दस साल पहले हम सोनापानी (उत्तराखंड) में मिले थे। बहुत कम बातचीत हुई थी। उसे जो मेरे बारे में याद रहा शायद मेरी कविताएँ रही होंगी।

    पिछले साल भी दरस सेरेंडिपिटी में अपनी कविताएँ सुनाने आया था। इसलिए उसे पूरी जानकारी थी कि ये कैसा अनुभव रहेगा। उसने मुझसे बस इतना कहा, “भाई, मौज आएगी। ऐसा कुछ आपने किया नहीं होगा। आप चलो।” मैंने हाँ कर दिया, लेकिन बहुत समझ नहीं आया कि करना क्या है।

    आज शाम गोवा पहुँचा। हम फेस्टिवल के जिस सेगमेंट में आयें हैं उसका नाम है “Poems on the move”. मेरे अलावा चार और कवि हैं। दरस भी है। मैं सबसे आख़िर में आया। सेरेंडिपिटी फेस्टिवल में कई तरह के आयोजन होते हैं। इस तरह के फेस्टिवल में क्यूरेटर सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। मैं इस बारे में अलग से बात करूँगा। ‘पोएम्स ऑन द मूव’ के तीन क्यूरेटर हैं– सलिल चतुर्वेदी (कवि और लेखक), जितेन ठुकराल और सुमिर टागरा (प्रसिद्ध आर्टिस्ट ‘ठुकराल एंड टागरा’)। किसी से मिल नहीं पाया। समझ भी नहीं पाया क्या करना है! और सीधा शटल कैब में बैठ गया।

    अनजान लोग आते गए। मैं उन्हें अपनी कविताएँ सुनाता गया। लोग सवाल पूछते; कविताओं के बारे में बात करते; अपने बारे में भी बहुत कुछ बताते। बहुत अलग अनुभव है। मैंने ऐसा कुछ महसूस नहीं किया है। पहला दिन जल्दी बीत भी गया।

    अगले आठ दिन रोज़ शाम पाँच से सात के बीच शटल में कविताएँ सुनाऊँगा। आज तो बस पहला दिन ही था। पहला दिन अच्छा बीता। कल से फेस्टिवल भी देखूँगा कि कैसा है। इतने सालों से सेरेंडिपिटी का नाम सुनता आया हूँ। मैं इस तरह के मल्टी-आर्ट्स फेस्टिवल को समझना चाहता हूँ। ये मुझे बहुत आकर्षित करता है। दुनिया में तो इस तरह के बहुत फेस्टिवल हैं। लेकिन हमारे देश में ज़्यादा नहीं है। एक तो सेरेंडिपिटी है, दूसरा Kochi Biennale है।

    डिनर दरस और सुचित्रा के साथ ग्रीनर कैफ़े में किया। हम तीनों एक ही होटल में रुके हैं।

    डिनर के साथ कविताओं पर लंबी बात चली। दर्शन बहुत ही रूहानी इंसान है। उससे बात कर के अच्छा ही लगता है।

    मैंने आज फिर से ख़ुद को अच्छी कविता क्या है जैसे सवाल का जवाब देते पाया। मैं इस सवाल से बहुत समय से जूझ रहा हूँ। मेरे पास इसका जवाब तो नहीं है। अच्छी कविता क्या होती है? अच्छी कहानी क्या है? अच्छा आर्ट क्या है? यहाँ बड़ा पेच ‘अच्छा’ शब्द जुड़ने से पैदा हो रहा है। क्या किसी कला का सिर्फ़ होना काफ़ी नहीं है? ‘अच्छा’ तो कई कारणों से होता है। उस कला को महसूस करने वाले के जीवन पर बहुत कुछ निर्भर करता है। ‘एस्थेटिक सेंस’ बहुत चीज़ों के मेलजोल से बनता है– आपने कैसा जीवन जिया; आप किस वर्ग से संबंध रखते हैं। जो किसी के लिए भोंडा हो, वो किसी के लिए बेहद सुंदर आर्टवर्क हो सकता है। ये बहुत वृहद बात है।

    हमारी बात कविताओं पर होती रही। मैं मानता आया हूँ कि कविताएँ ‘higher form of art’ हैं। कहानियों में कहानीकार अपनी मेहनत से बच सकता है। लेकिन एक अच्छी कविता कहने के लिए आपको एक अच्छा इंसान भी होना पड़ेगा।

    पर धीरे-धीरे मेरी ये समझ टूट रही है। अच्छा इंसान होना भी एक भ्रम है। क्या ही अच्छा होता है? कोई भी इंसान पूरा अच्छा या पूरा बुरा तो नहीं होता है। मैंने तो इतनी सुंदर कविताएँ ऐसे लोगों से सुनी हैं जो अपने जीवन में क्या कुछ नहीं कर रहे। हाँ, शायद संवेदनशीलता एक ज़रूरी शर्त हो। जो इंसान हर पल को, हर लम्हें को महसूस कर पाये, शायद वो अच्छी कविताएँ भी लिख पाये।

    ऐसी बातें हम डिनर पर करते रहे! पहले दिन के हिसाब से काफ़ी कुछ हुआ। यहाँ सब दर्ज कर रहा हूँ। क्यों कर रहा हूँ? मुझे मालूम नहीं।

     

    15.12.25 / गोवा

    दोपहर के समय सेरेंडिपिटी फेस्टिवल के इंस्टॉलेशन देखने गया। बहुत आश्चर्य के साथ आर्ट इंस्टॉलेशन देखता रहा।

    मैंने कई बार महसूस किया है कि मैं, या फिर ज़्यादातर कलाकार, अपनी कला क्षेत्र में इतना डूब चुके रहते हैं कि हमें दूसरी कलाओं को समझने का, परखने का समय ही नहीं मिलता। या फिर ऐसा भी होता है कि हम कई बार ख़ुद से बहुत दूर जो कला है उसे देखना ही नहीं चाहते। इसके कई कारण हो सकते हैं।

    लेकिन जो कलाकार दूसरे कला क्षेत्र में आवाजाही करते रहते हैं; दूसरी कलाओं को समझने की भरपूर कोशिश करते हैं, उनकी ख़ुद की कला भी समृद्ध होती है।

    यहाँ सेरेंडिपिटी में मैं बहुत अद्भुत काम देख पा रहा हूँ। एक प्रदर्शनी बहुत रोचक थी। इसका नाम था ‘Whispers of Pastoral Scents’, जिसे ‘Edible Issues’ नाम के कलाकारों ने क्यूरेट किया था। ‘एडिबल इश्यूज’ अनुषा और एलिजाबेथ नाम की दो कलाकारों का साझा नाम है। इस प्रदर्शनी में इन्होंने डेक्कन पठार के ग्रामीण क्षेत्र में किसान और मज़दूर रोज़मर्रा के जीवन में जिस गंध से मुखातिब होते हैं, उन गंधों को शीशी की अलग-अलग बोतलों में क़ैद किया था! मिट्टी का ख़ुशबू, पशु के खाने के चारे की गंध, गाय के मल की गंध—ये सब शीशी की बोतल में क़ैद था। इस प्रदर्शनी के ज़रिए ये बताना चाह रहे थे कि ये जो गंध हैं, ये हमारी याददाश्त का सबसे ज़रूरी हिस्सा है। हम लोगों को जान सकते हैं, समझ सकते हैं अगर हम ये समझ पायें कि सुबह से शाम तक वो किस तरह के गंधों से घिरे रहते हैं।

    एक दूसरी प्रदर्शनी में गया। यहाँ फोटोग्राफर दिव्या कोवासजी ने ख़ुद के कई चित्र लिए थे—और इन चित्रों से अपने परिवार के कई जनरेशन की कहानी कही थी! बहुत रोचक काम था दिव्या का।

    इस तरह की कई प्रदर्शनी देख कर महसूस हुआ कि कला की कोई सीमा नहीं है। ये जानकारी हमें होती है—लेकिन एक अच्छा काम देख कर इस बात पर यकीन बढ़ जाता है।

    शाम के समय मैं अपनी शटल में कविता सुनाता रहा। चार ब्रिटिश महिलायें एक साथ आयीं—उन्हें हिंदी नहीं आती थी। लेकिन फिर भी उन्होंने मुझसे कविताएँ सुनी। वो सब कलाकार थीं। एक महिला तो पिछले पचास वर्षों से लंदन में थियेटर करती रहीं थीं। उनका कहना था कविता को उसके ध्वनि से भी समझा जा सकता है। मुझे लगता है शायद ये बात लयबद्ध कविताओं के लिए सही हो, लेकिन छंदमुक्त कविताओं के लिए शायद नहीं। छंदमुक्त में तो शब्द ही सबसे ज़रूरी हैं। फिर भी, उन्हें कविताएँ सुनाना अलग अनुभव था। मैं अपनी कविताओं का अंग्रेज़ी अनुवाद साथ ही साथ करता रहा। सबसे मज़ेदार था मेरी कविता “अनुवाद” का अनुवाद करना!

    अनुवाद

    हम सभी सिर्फ कविताओं का
    अनुवाद कर रहे होते हैं
    कुछ अलग भाषा से
    अपनी समझने वाली भाषा में

    जैसे तुम किसी दूसरी भाषा में
    मुझसे कुछ कहती हो
    और मैं अपनी अधपकी समझ से
    उसका अनुवाद करता हूँ

    जैसे मेरा अंतर
    मुझसे दूसरी भाषा में
    बातचीत करता है
    और मैं सिर्फ उसका अनुवाद लिखता हूँ

    जैसे ये सारी दुनिया
    दूसरी भाषा में
    पूरी देर बात करती रहती है
    और सारे कवि उसका अनुवाद करते रहते हैं

    बहुत कुछ अनुवाद में खो जाता है

    काश, हम मौन पढ़ पाते

     

    16.12.25 / गोवा

    गोवा में तीसरे दिन की शुरुआत दौड़ने से हुई। मैं मुंबई से सोच कर ही आय था कि गोवा में समुद्र किनारे दौड़ूँगा। पहले दिन आलस के कारण दौड़ने नहीं जा पाया। लेकिन आज सुबह ही मैं दौड़ने निकल गया। करीब आठ किलोमीटर दौड़ा।

    जब मुराकामी की किताब “व्हाट डू आई टॉक अबाउट व्हेन आई टॉक अबाउट रनिंग” पढ़ रहा था तब से ही दौड़ने को लेकर एक आकर्षण बना हुआ है। दौड़ना सिर्फ़ एक शारीरिक प्रक्रिया नहीं है। इसमें पूरा शरीर तो लिप्त है ही, दिमाग़ भी बहुत अलग तरीके से दौड़ने का हिस्सा बना रहता है। दौड़ते हुए आप छोटे-छोटे लक्ष्य बनाते चलते हैं। दिमाग़ आपके साथ एक खेल खेलता है। जब लगता है शरीर में हिम्मत नहीं है तब दिमाग़ कहता है ‘बस वहाँ तक दौड़ जाओ’, और आप दौड़ जाते हैं–शरीर को धता बताते हुए।

    आज मैंने भी ऐसा ही किया। आठ किलोमीटर दौड़ गया। इसका नतीजा ये हुआ कि शरीर में दर्द है। वापस होटल आकर शरीर को आराम की ज़रूरत थी। शायद पहले दिन इतना नहीं दौड़ना चाहिए था। इसलिए कल सिर्फ चलूँगा–ब्रिस्क वॉक।

    सुबह दौड़ते समय ही मेरे पुराने दोस्त दविंदर सिंह जी का मेसेज आया। वो भी सेरेंडिपिटी फेस्टिवल के लिए अमृतसर से आए हुए हैं। दविंदर और उनके परिवार से बहुत आत्मीय संबंध रहा है। 2018-19 में जब दविंदर जी के साथ अमृतसर पर किताब लिख रहा था, तब अमृतसर बहुत जाना होता था। बहुत ही खूबसूरत परिवार है।

    शाम के समय दविंदर जी और डॉली जी मेरे शटल में कविताएँ सुनने आए। बहुत ही अच्छा लगा उनसे इस तरह मिलना। कविता सुनाने में भी बड़ा आनंद आया। बाद में हमने डिनर भी साथ ही किया।

    सेरेंडिपिटी में इस तरह दोस्तों का मिलना बड़ा अच्छा लग रहा है। कल ही चिंकी सिन्हा (एडिटर, आउटलुक) से यूँ ही मिल गया। चिंकी भी पटना से हैं, और कुछ समय से हमारी दोस्ती है। कुछ देर बातें की– समंदर किनारे; देर रात। 

    आज का कविता सेशन भी बेहतर था। एक बार तो सेरेंडिपिटी के वॉलंटियर्स ही शटल में बैठ गए। उन्हें कविताएँ भी सुनाता रहा, और बातें भी करता रहा।

     

    19.12.25 / गोवा

    सुबह से होटल के कमरे पर ही हूँ। सोचा था सुबह दौड़ने जाऊँगा। लेकिन नहीं जा पाया। कल भी नहीं गया था। एक तरह के आलस से घिरा हुआ हूँ।

    वैसे ये कोई नई बात नहीं है। मुझे कुछ भी करने के लिए ख़ुद को अधिक प्रेरित करना पड़ता है। जैसे ये डायरी लिखना ही। मैंने सोचा था रोज़ ही कुछ लिखूँगा, लेकिन दो दिन से कुछ लिख नहीं पाया। इसका एक कारण तो ये भी है कि मैं फेस्टिवल ठीक से नहीं देख पाया था। शुरुआत के दो दिन बहुत उत्साह था। लेकिन फिर ये उत्साह जाता रहा।

    अब तीन दिन बचे हैं। कोशिश है जो कुछ भी बचा रह गया है उसे देख लूँ। हाँ, मैं कुछ इंफॉर्मेटिव वीडियो ज़रूर बना रहा हूँ अपने इंस्टाग्राम के लिए। आज भी कुछ शूट करूँगा।

    ‘पोएम्स ऑन द मूव’ के सेशन को GoPro कैमरा पर भी शूट कर लेता हूँ। जो भी अनुभव है उसे भी अलग से शूट कर रहा हूँ; कैमरे में देखते हुए बात कर रहा हूँ। अपने अनुभवों पर एक व्लॉग बना लूँगा।

    कविता सुनाने के दौरान बहुत ग़ज़ब लोग मिल रहे हैं। कई लोग सिर्फ़ कविता सुनने ही आते हैं। उन्हें किसी और जगह नहीं जाना होता। लेकिन कुछ लोग इतनी जल्दी में रहते हैं कि उन्हें हैंडल करना मुश्किल होता है। ये दोनों ही तरह के अनुभव समृद्ध करने वाले हैं।

    एक बड़ा मज़ेदार अनुभव हुआ। एक पति-पत्नी शटल में आए। उन्होंने बताया कि कई सालों से वो सेरेंडिपिटी फेस्टिवल आते रहे हैं। दोनों ही ‘कॉर्पोरेट स्लेव’ हैं–ऐसा उन्होंने बताया। लेकिन ये उनके लिए अच्छा ‘एस्केप’ रहता है दिसंबर के महीने में। बच्चे ‘सेटल’ हो चुके हैं। बहुत ज़िम्मेदारी नहीं है। कला को समझने वाले व्यक्ति लग रहे थे दोनों। बहुत ज़हीन तरीके से बात भी कर रहे थे। मैंने उन्हें अपनी कविताएँ सुनायी। उन्हें अच्छी भी लगीं। तारीफ़ भी किया। कई तरह के मतलब भी खोजने में सफल हुए। फिर जो पति साहब थे उन्होंने बड़े हक के साथ कहा, “चलिए अब कुछ सोशल चेंज पर सुनाइये।” मुझे बड़ा अचरज हुआ! अचानक ही ऐसा लगा जैसे वो साहब एक दुकान में बैठे हैं और अपनी पसंद की शर्ट खोज रहे हैं। खैर, मेरे पास उनके नाप की शर्ट नहीं थी। मैंने कहा, “ऐसे डिमांड पर कविता तो उपलब्ध नहीं है…” उन्हें थोड़ा दुख हुआ। “अच्छा, आपके पास सोशल चेंज पर नहीं है… ठीक है, किसी और शटल में शायद मिल जाये।”

    मेरे शटल से उतरने के बाद वो किस शटल में गए, इसकी जानकारी नहीं है। लेकिन उम्मीद करता हूँ उन्हें सोशल चेंज पर कोई कविता ज़रूर मिल जाये।

    इस मायने में ये अनुभव बहुत अलग है। कई बार जब आप अपनी कला लेकर बाज़ार में निकल जाते हैं, तब उसे देखने-परखने वाले अलग तरीके से समझते हैं। लोग मेरी कविताओं के मानी भी खोज रहे हैं–कई बार तो जो मैंने नहीं सोचा वो भी सोच पाते हैं; कई बार मुझे ही अपने शब्दों को अलग तरीके से देखने की प्रेरणा दे देते हैं।

    एक और अनुभव है। इस फेस्टिवल में बहुत से NRI (नॉन रेसिडेंट इंडियन) भी आए हैं; विदेशों से भी बहुत लोग आए हैं। और भारतीय लोग, जो अभी भी देश में रहते हैं, वो तो हैं ही। मैंने अनुभव किया कि NRI और कॉर्पोरेट जगत के लोग बातों-बातों में ये ज़रूर पूछते हैं कि कविता और राइटिंग से कितना कमा लेते हो। उनका आशय बस ये समझना है कि भले ही उनके सामने बैठा आर्टिस्ट फेस्टिवल में बुलाया गया है–पर अंत में है तो आर्टिस्ट। कितना ही कमा लेता होगा! विदेशी इस तरह की बात नहीं करते। वो आर्ट की बात करते हैं। वो कई बार ये भी कहते हैं कि ये बेहद अच्छा कॉन्सेप्ट है और वो ख़ुशनसीब हैं कि एक कवि के साथ गोवा की सड़कों पर चल रहे हैं।

    सब ऐसे नहीं हैं। कई भारतीय मिले, जो यहीं रहते हैं, वो बहुत अच्छी और समृद्ध बातें करते रहे। कल ही एक फोटोग्राफर मिले–जो फैशन फोटोग्राफी करते हैं–अर्नब। उनके साथ बहुत सुंदर बातचीत रही।

    हम कलाकारों के अपनी कला के अलावा दूसरी कला के साथ समय बिताने पर बात कर रहे थे। जैसे मैं फोटोग्राफी से बहुत कुछ सीखता हूँ। अर्नब कविताओं से बहुत कुछ सीखते हैं। इस फेस्टिवल में यही हुआ है–दूसरे कलाकारों के काम को देख कर, उनसे बात कर के, बहुत कुछ मैं सीख कर ही जाऊँगा। एक ही बात को कहने के बहुत तरीके हो सकते हैं। आपका क्राफ्ट आपको कई बार बंधन में ज़रूर बाँधता है, लेकिन उतना ही आज़ाद भी कर देता है। और इसलिए तो हम जीवन भर कला से घिरे रहना चाहते हैं।

     

    20.12.25 / गोवा

    कल का दिन बड़ा अनप्रोडक्टिव रहा। इस अपराधबोध के साथ ही आज सुबह की शुरुआत की है। सुबह-सुबह करीब नौ किलोमीटर दौड़ गया। अभी कुछ देर पहले ही वापस होटल कमरे पर आया। अच्छा महसूस कर रहा हूँ। पहले दिन की तरह थका हुआ नहीं हूँ। बचे दो और दिनों में भी ऐसा ही करूँगा, ऐसा सोचा है। सोचने और करने की दूरी भर तय कर लूँ तो जीवन आसान हो जाएगा।

    कल शाम मैंने कला जगत में ‘क्यूरेटर्स’ की दुनिया देखी। दुनिया भर के अलग-अलग आर्ट्स फेस्टिवल के क्यूरेटर यहाँ आए हैं- एक आर्ट्स एक्सचेंज प्रोग्राम में। आर्ट्स फेस्टिवल में क्यूरेटर सबसे महत्वपूर्ण होता है। वही निर्णय लेता है कि किस कलाकार की कला लोगों को देखनी चाहिए। मैं जिस प्रोग्राम का हिस्सा हूँ, “पोएम्स ऑन द मूव’, उसके क्यूरेटर सलिल चतुर्वेदी + ठुकराल एंड टागरा है। सलिल ख़ुद एक कवि हैं, और पिछले चौदह सालों से यहाँ गोवा में रहते हैं। उन्होंने अपनी कविताओं की किताब भी मुझे दी। सुंदर कविताएँ हैं। सिर्फ़ सोलह साल की उम्र में एक दुर्घटना में उनके रीड़ की हड्डी बहुत प्रभावित हो गई, जिसके बाद से वो व्हीलचेयर पर हैं। लेकिन बेहद सक्षम हैं। ख़ुद ही अपनी कार चलाते हैं। उनकी साथी मोनिका के साथ भी समय बहुत अच्छा बीता। दोनों बहुत हिम्मत देते हैं।

    ठुकराल एंड टागरा दरअसल जतिन ठुकराल और सुमिर टागरा का साझा ब्रांड नाम है। दोनों अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार हैं।

    सारे क्यूरेटर एक जगह थे, और उन्हें ओल्ड गोवा ‘हाई-टी’ पर जाना था। रास्ते के लिए हमारी शटल उन्हें दी गई। बहुत ही अलग अनुभव रहा क्योंकि पाँच लोगों में सिर्फ़ दो लोगों को मेरी भाषा आती थी। दो लोग ब्रिटेन से थे, और एक महिला नीदरलैंड्स से। मेरे बगल में शीरीन नाम की एक आर्ट क्यूरेटर थीं, जो भारतीय मूल की ही थीं, और दुबई में रहती हैं। शिरीन का परिवार केरल से है। लेकिन वो दुबई में ही पली-बढ़ी हैं। दुबई में सीबीएसई स्कूल से पढ़ाई करने के कारण उनकी हिंदी बहुत अच्छी थी। और उन्होंने मेरी कविताओं का अनुवाद भी सबके लिए किया।

    मेरी पहली कविता का अनुवाद सुन कर नीदरलैंड्स की आर्ट क्यूरेटर बहुत ज़ोर से रो पड़ी। मुझे समझ ही नहीं आया कि इस माहौल को कैसे सम्भाला जाये। लेकिन आगे की कविताओं से शायद उन्हें राहत मिली। बाद में उन्होंने बताया कि हाल ही में उन्होंने अपने गॉडफादर की मृत्यु को बहुत करीब से देखा है। इसलिए ये समय उनके लिए बहुत इमोशनल है। मेरी कविता में मृत्यु का ज़िक्र था, जिसके करण वो ट्रिगर हुईं और उन्हें रोना आ गया।

    कविता के अनुवाद से भी आप किसी और तक पहुँच सकते हैं…।

    मैंने ख़ुद को बहुत समय से एक कवि की तरह नहीं देखा है। लेकिन ये पूरा अनुभव शायद मुझे फिर से एक कवि की तरह ख़ुद को देखने की दृष्टि दे रहा है।

    इस आर्ट एक्सचेंज में मैंने ये भी देखा कि क्यूरेटर कितने ताक़तवर होते हैं। कई कलाकार क्यूरेटर के आगे-पीछे करते रहते हैं। क्योंकि क्यूरेटर बहुत तरह की ताक़त रखते हैं–आपकी कला को कई फेस्टिवल में ले जाने की; कई तरह के ग्रांट दिलवाने की। आर्ट्स की पॉलिटिक्स को बहुत तो नहीं जानता लेकिन जितना भी समझ रहा हूँ, आश्चर्य में ही चला जाता हूँ।

    अभी मैं अपनी गोवा की पुरानी दोस्त श्रद्धा से मिलने जा रहा हूँ। श्रद्धा और उसका परिवार गोवा में कई सालों से मेरा एक घर रहा है। बहुत ही अच्छा लगता है उनसे मिलकर।

    देर हो रही है! श्रद्धा से मिलने निकलता हूँ!

    ————

    श्रद्धा से मिलना असल में बहुत अलग रहा। मुझे लगा था मैं श्रद्धा से किसी कैफ़े में मिलूँगा। लेकिन उसने मुझे एक सेमिनार में बुला लिया– मीरामार बीच के पास ही। श्रद्धा के पिता और माँ एक बहुत ज़रूरी मुद्दे पर कई सालों से काम कर रहे हैं- वेस्टर्न घाट का पर्यावरण संरक्षण। इनके एनजीओ का नाम है ‘पीसफुल सोसाइटी’।

    पीसफुल सोसाइटी और कुछ सामाजिक बोध रखने वाले लोगों ने मिल कर एक सेमिनार का आयोजन किया था जिसका नाम था “गोवा- कल, आज और कल”।

    गोवा आज से कुछ दशक पहले तक बेहद समृद्ध था। लेकिन टूरिज्म और भू-माफियाओं के कारण इस छोटे से प्रदेश पर बहुत बुरा असर हुआ है। कई लोग यहाँ रहने लगे हैं। ट्रैफिक की दिक्कत है। गोवा की ख़ुद की संस्कृति खतरे में है। पूरा देश गोवा को बस पार्टी करने वाली जगह समझता हैं! और इसका असर गोवा पर बहुत बुरा हुआ है।

    पिछले कई सालों से गोवा आने के कारण; श्रद्धा और उसके परिवार से लगातार मिलने के कारण–मुझे इस बात की जानकारी रही है। लेकिन इस सेमिनार में मुझे गोवा के लोगों में कितना गुस्सा है, इसका अंदाज़ा मिला। प्रबल नाम के एक सामाजिक कार्यकर्ता और इतिहासकार से मुलाक़ात हुई। वो डेंपे कॉलेज में इतिहास के प्रोफेसर भी हैं। उनका भाषण बहुत प्रभावशाली था। उन्होंने तो ऐसा कहा कि बाहर के किसी भी आदमी को गोवा में सेटल होने की ज़रूरत नहीं। क्योंकि बढ़ती आबादी का असर ये हो रहा है कि गोवा के पहाड़ काटे जा रहे हैं। नई हाउसिंग सोसाइटी बन रही है।

    इसका दूसरा पक्ष ये निकल कर आया कि ये काम असल में तो गोवा सरकार के संरक्षण में ही हो रहा है। जो लोग यहाँ आ रहे हैं, उन्हें तो एक सपना बेचा जा रहा है– समंदर किनारे या गोवा के जंगलों में जीवन जीने का। लेकिन यहाँ की स्तिथि दयनीय है। सरकार और भू-माफिया की मिलीजुली साजिश का शिकार गोवा हो रहा है। और ये बहुत दुखद है।

    हमारे देश में सस्टेनेबल टूरिज्म जैसा कुछ भी नहीं है। हमारे देश के पर्यटक शायद दुनिया के सबसे अशिक्षित पर्यटक हों। मैं औसत लोगों की बात कर रहा हूँ। यहाँ कुछ बेहद ज़िम्मेदार लोग ज़रूर होंगे। लेकिन जितना मैंने देखा है, उनकी आबादी बहुत कम है।

    मैं तो बस कुछ देर के लिए श्रद्धा से मिलने गया था। सोचा था जल्दी मिलकर सेरेंडिपिटी में जो कुछ बचा है, वो देख लूँगा। लेकिन इस सेमिनार में इतनी ज़रूरी बात पर बातचीत होने लगी, कि मैं रुक गया। मैंने पूरा समय सेमिनार को ही दे दिया।

    श्रद्धा, अंकल और आंटी से भी अच्छे से मिला। इनसे मिलना हमेशा अच्छा ही लगता है।

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    22.12.25 / गोवा

    वापसी के रास्ते में हूँ। फेस्टिवल ख़त्म। ‘पोएम्स ऑन द मूव’ ख़त्म। एयरपोर्ट पर बैठा हूँ। अपनी जहाज़ का इंतज़ार कर रहा हूँ।

    जब मैं सेरेंडिपिटी के लिए आया था, तब बिल्कुल भी मालूम नहीं था कि इस फेस्टिवल में होता क्या है; इसे देखना कैसे है; मेरी कविताएँ यहाँ के लिए ठीक हैं भी या नहीं। लेकिन मैं यहाँ से बहुत समृद्ध होकर लौट रहा हूँ। साल का इससे बेहतर अंत नहीं हो सकता था।

    सेरेंडिपिटी इतना वृहद है कि सब कुछ तो नहीं ही देख पाया। आप सबकुछ देख भी नहीं सकते। पूरी कोशिश ये रहनी चाहिए कि जो कुछ भी आप देख रहे हैं, उसे पूरे मन से देखें। अंतिम दिन मैंने काफ़ी कुछ देखा– कई प्रदर्शनी देखी। मेरी प्राथमिकता ये थी कि कम से कम मैं सारे वेन्यू देख लूँ। और इस प्रक्रिया में मैं सेरेंडिपिटी से और भी प्रभावित हुआ। मैं इस बोध के साथ ही वापस जा रहा हूँ कि मैं कला के बारे में बहुत कम जानता हूँ। कला बहुत वृहद है। और इस तरह के फेस्टिवल कला के विकास के लिए ना सिर्फ़ ज़रूरी हैं बल्कि नैसर्गिक हैं।

    मैंने ऑस्ट्रेलिया से आए एक बहुत अद्भुत डांस शो को देखा–जो असल में थियेटर और डांस दोनों का ही सम्मलित रूप था। ‘चंकी मूव’ नाम के इस बहुप्रतिष्ठित ग्रुप के तरफ़ से ये पेशकश थी–जिसका नाम था ‘यू, ब्यूटी’।

    इसमें दो कलाकार एक बेहद विशाल गुब्बारे के अंदर थे। करीब एक तिहाई शो में वो गुब्बारे के अंदर ही रहे और हम गुब्बारे का आकार बढ़ता-घटता देखते रहे। फिर गुब्बारे से एक लड़की बाहर निकली। अब वो बाहर थी, और उसका साथी अंदर था। इसके बाद गुब्बारा खुला, और सभी दर्शकों को गुब्बारे के अंदर जाना था! हम करीब तीस लोग अब गुब्बारे के अंदर थे! इसके बाद-करीब आधा शो गुब्बारे के अंदर ही हुआ।

    इस परफॉरमेंस में कोई शब्द नहीं थे–बस अंत में लड़की एक गाना गाती है। यहाँ दो प्रेमियों के संबंधों को दिखाया गया था। एक संबंध के अलग-अलग आयाम दिखाये गए थे। इसका अंत बिल्कुल अद्भुत था!

    पहले मुझे लगा ये क्या है? शायद कुछ बकवास है। फिर मुझे इसकी गहराई का अंदाज़ा लगने लगा। ये ग़ज़ब का काम था। बतौर नाटककार, मुझे समझ आया कि मैं कितना कम जानता हूँ नाटक के बारे में। पैंतालीस मिनट के इस परफॉरमेंस ने मेरे दिमाग़ के परखच्चे उड़ा दिए! ये अतिशयोक्ति नहीं है। ये बिल्कुल ऐसा था जैसे हम कोई सपना देखते हैं। ये सपना सरीखा ही था।

    मैं इस तरह के आर्ट से घिरा रहना चाहता हूँ। इस तरह का आर्ट ही तो मैं करना चाहता हूँ; देखना चाहता हूँ। जो लोग इस तरह के आर्ट का हिस्सा हैं, उनसे मिलना चाहता हूँ–सीखना चाहता हूँ। छोटे से जीवन में कितना कुछ करना बाक़ी रह गया है!

    मैंने शटल में अपनी कविताएँ सुनायीं। स्विट्जरलैंड से आए एक पत्रकार से जब मैंने पूछा कि क्या वो हिंदी समझते हैं, तब उन्होंने कहा कि मैं कविताएँ सुनाता रहूँ और उनके लिए अनुवाद ना करूँ। क्योंकि बाक़ी लोगों के सुनने का लय भंग होगा। इस बात पर मैंने उन्हें अपनी कविता ‘अनुवाद’ सुनायी, और इसका अनुवाद भी किया।

    जब शटल राइड ख़त्म हुई तब मैं कविता के बीच में ही था। सभी ने कविताओं को सुना। मुझे अच्छा लगा। और इस तरह मेरी अंतिम शटल राइड पूरी हुई।

    मैं इतना कुछ लेकर वापस जा रहा हूँ। बहुत कुछ है जो मैं शब्दों में बता भी नहीं पाया हूँ; बता भी नहीं सकता हूँ। लेकिन ये ‘सोलो ट्रैवल’ बहुत अलग रहा। मैं समझ पा रहा हूँ कि कई लोग अकेले यात्रा क्यों करते हैं। इस तरह की यात्रा में आप अपने मस्तिष्क के साथ अकेले होते हैं। आप बहुत कुछ सोचते हैं।

    इस तरह की यात्राओं का सिलसिला चलता रहे, ऐसी उम्मीद करता हूँ।

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