• समीक्षा
  • ‘बीसवीं शताब्दी के तानाशाह’ के बहाने कुछ बातें

    हाल में राजकमल प्रकाशन से अशोक कुमार पांडेय की किताब आई है ‘बीसवीं शताब्दी के तानाशाह’। इस किताब को पढ़कर तानाशाहों, विशेषकर कोरिया के तानाशाह किम इल सुंग पर यह टिप्पणी लिखी है कुमारी रोहिणी ने। रोहिणी ने कोरियन भाषा से पीएचडी की है और दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में कोरियाई भाषा पढ़ाती हैं और समय समय पर हिन्दी में लिखती हैं। आप भी इस टिप्पणी को पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

    ====================================

    अशोक कुमार पांडेय की हाल ही में आई नॉन-फ़िक्शन किताब ‘बीसवीं शताब्दी के तानाशाह’ के बारे में जब जाना, उसे हाथ में लेकर उसके कुछ पन्ने उलटे-पलटे तो एक सवाल दिमाग़ में कौंध उठा। दरअसल जब भी कोई नई किताब आती है, एक पढ़ने-गुनने वाला व्यक्ति अनायास ही सोच उठता है कि इस समय इस किताब की क्या प्रासंगिकता है? उसकी ज़रूरत क्या है? क्योंकि एक किताब (ख़ासकर जब वह नॉन-फ़िक्शन हो) को लिखने के पीछे की अवधारणा, उसकी लेखन-प्रक्रिया और फिर प्रकाशन, इन सभी फ़ैसलों के पीछे कई कारक काम करते हैं। और वे कारक लेखक, पाठक और प्रकाशक सबके लिए अलग-अलग और अलग-अलग तरहों से महत्वपूर्ण होते हैं। कई बार ये कारक एक दूसरे से ओवरलैप भी करते हैं और कई बार सर्वथा अलग होते हैं। 20वीं सदी के ये छह किरदार सत्ता में आए, पनपे, और आख़िरकार करोड़ों लोगों की ज़िंदगी में हिंसा और भय को स्थायी जगह देकर चले गए। दरअसल अशोक कुमार पांडेय की यह किताब आने उन्हीं छह किरदारों के बहाने 20वीं सदी की राजनीति, समाज और सत्ता के चरित्र को सामने लाने का प्रयास करती है।
    किताब के शीर्षक को देखते हुए एक सवाल लगातार सिर उठाता है कि तानाशाह कौन होता है? कोई शक्तिशाली शासक? कोई ऐसा नेता जो आदेश देता है और पूरा देश उस आदेश के सामने नतमस्तक हो जाता? या वह व्यक्ति जो राज्य की संस्थाओं को अपने विस्तार का हथियार बना लेता है? इतिहास हमें बताता है कि तानाशाह वही है जिसके लिए सत्ता एक आईने की तरह है। एक ऐसा आईना जिसमें वह केवल और केवल ख़ुद को ही देखता है, खुद को आगे बढ़ाता है, और अख़िरकार खुद को राष्ट्र से भी ऊपर रख देता है।

    तानाशाह का पर्याय बन चुके अडोल्फ़ हिटलर के शब्दों में ही कहें तो – “The state is me.”
    और यह पंक्ति ‘बीसवीं सदी के तानाशाह’ नाम की इस किताब की एक अदृश्य रीढ़ है।
    लेकिन मेरे इस किताब के प्रति आकर्षित होने के कुछेक अलग कारण हैं। जिनमें से पहला है इसके छह किरदारों में से एक में किम इल-सुंग का होना। किम-इल-सुंग यानी उत्तर कोरिया की राजनीति का एक स्थायी, लगभग शाश्वत नाम। दूसरे, इस साल की शुरुआत में आई फ़्योडोर टेरटिट्स्की की किताब ‘एक्सीडेंटल टायरेंट – दी लाइफ ऑफ किम इल सुंग’ को पढ़ना।
    दरअसल पिछले एक दो सालों में दुनिया के तानाशाहों पर कुछ किताबें अंग्रेज़ी में आई थीं जिनमें से मैंने फ़्योडोर टेरटिट्स्की की 2025 में छपी ‘एक्सीडेंटल टायरेंट – दी लाइफ ऑफ किम इल सुंग’ को पढ़ा था। इस पूरी किताब के माध्यम से फ़्योडोर ने उस विचार को तोड़ने का प्रयास किया है कि जो कहता है कि उत्तर कोरिया का पहला प्रधानमंत्री और बाद में राष्ट्रपति बनने वाला किम इल-सुंग नाम का शख़्स एक ऑर्गेनिक तानाशाह था। फ़्योडोर ने अपनी किताब में कोरियाई, रूसी, चीनी और जापानी जैसी कई भाषाओं के स्रोतों के माध्यम से यह बताया है कि किम इल-सुंग का सत्ता तक पहुँचना और बाद में तानाशाह बन जाना, किसी तयशुदा योजना का हिस्सा नहीं था। बल्कि इतिहास की घटनाओं, बाहरी शक्तियों, और संयोगों का मिला जुला नतीजा था। यानी, किम इल-सुंग ने शायद खुद भी नहीं सोचा था कि उसका नाम एक लंबे समय तक चलने वाली तानाशाहियत प्रवृति को खड़ा करने वाले व्यक्ति के रूप में इतिहास में दर्ज होगा। यह पूरी तरह से एक आकस्मिक तानाशाहियत यानी बिना पूर्व योजना के आने वाली तानाशाही  थी और शायद इसलिए ही फ़्योडोर ने इस किताब का नाम भी “Accidental Tyrant” रखा है।

    दरअसल, कोरियाई प्रायद्वीप में 20वीं सदी की राजनीति को समझना, कभी-कभी धुँधलके में से किसी आकृति को पहचानने जैसा है। जापानी उपनिवेशवाद, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सत्ता की प्रकृति में आया बदलाव, शीत युद्ध की खींचतान, इन सबके बीच से किम इल-सुंग का उभरना, एक ऐसी घटना थी जिसका महत्त्व जितना इतिहास में था उससे कम वर्तमान में नहीं है।

    ‘बीसवीं सदी के तानाशाह’ किताब के किम इल-सुंग वाले अध्याय में लेखक ने स्पष्ट रूप से तो कहीं नहीं कहा है कि किम केवल एक तानाशाह था, बल्कि वह उन्होंने उस प्रक्रिया को खोलने का प्रयास किया है जिसके जरिए उत्तर कोरिया की सत्ता और ख़ुद किम इल-सुंग ने अपने नाम को एक मिथकिय चरित्र का दर्जा दिलवा दिया।

    दरअसल, किम की सत्ता केवल सेना या पार्टी पर नहीं टिकी थी; उसे असल आधार उन कथाओं से मिलता था जिन्हें सत्ता ने खुद गढ़ा था। उन कथाओं में ज़िक्र होता था जापानी कब्ज़े के खिलाफ किम इल-सुंग के ‘वीरता के कारनामे’ उसकी ‘क्रांतिकारी वंशावली’ और बाद में उसकी ‘दैवीय बुद्धिमत्ता’ का।

    दुनिया के बाक़ी तानाशाहों से किम इल-सुंग को जो एक चीज अलग करती है वह है उसका सत्ता को वंशानुगत बनाकर तानाशाही को एक पारिवारिक व्यवस्था में बदल देना। हिटलर या मुसोलिनी जैसे तानाशाह जहाँ अपनी मौत के साथ खत्म हो गए थे वहीं किम इल-सुंग ने सत्ता के लिए एक वंश तैयार किया। जिसने राज्य को एक प्रकार की राजशाही जैसा रूप दे दिया, बस नाम में शामिल किया गया समाजवाद।
    और यह सब उसी समय में हुआ जब दुनिया में औपनिवेशिक शासन का ढाँचा टूट रहा था, राष्ट्र-राज्य अस्तित्व में आ रहे थे, और नई विचारधाराएँ अपने पैर जमाने के लिए कंपीटिशन में लगी हुई थीं। उत्तर कोरिया के उभरते नेता किम ने इस पूरे भू-राजनीतिक संकट को अपने लिए एक अवसर में बदल दिया। किम को मंचूरिया में जापान के ख़िलाफ़ होने वाले गुरिल्ला वॉर में सक्रिय होने के कारण सोवियत संघ का समर्थन मिला, वहीं समान वैचारिकी के कारण चीन और कोरियाई राष्ट्रवादी गुट भी इसके साथ खड़े हुए।

    ‘बीसवीं शताब्दी के तानाशाह’ में किम पर लिखा अध्याय भी इन तथ्यों की पुष्टि करता है कि किम इल-सुंग केवल एक शासक नहीं था, बल्कि वह एक निर्माता था, एक राष्ट्र का निर्माता। लेकिन उसने एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण किया जो उसके अपने ही व्यक्तित्व और मिथक का प्रतिबिंब बन कर रह गया। उस राष्ट्र के लोगों के लिए उनका नेता ही उनका देश हो गया।

    जहाँ तक इस किताब को पढ़ने के तरीक़े का सवाल है तो इसे किसी अपराध सूची की तरह नहीं पढ़ा जा सकता है, जिसमें एक-एक तानाशाह के कारनामों का ब्योरा दिया गया हो। इसके बजाय इसे पढ़ते हुए लगातार एक बात जो ध्यान में रखी जा सकती है कि किसी तानाशाह या तानाशाही प्रवृति का जन्म केवल किसी एक व्यक्ति की सनक से नहीं होता। बल्कि उस राष्ट्र-राज्य का सामाजिक विश्वास, आर्थिक संकट, युद्धों से होने वाली तबाही, लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोरी, और जनमानस में पलता निराशा और भय, ये सब कारक लगातार इस प्रवृति को खाद पानी देते रहते हैं। यानी तानाशाह पैदा नहीं होते बल्कि गढ़े जाते हैं, अपने समय की मिट्टी से, अपने समाज की दरारों से।

    हालाँकि इस किताब को पढ़ते हुए बार-बार यह सवाल भी मन में आ रहा था कि इस सूची में पोल पॉट क्यों नहीं है? कम्बोडिया में खमेर रूज़ शासन के दौरान लगभग 17 लाख लोगों की मौत, बीसवीं शताब्दी के शायद सबसे भयावह नरसंहारों में एक है। और इस नरसंहार का ज़िम्मेदार था पोल पॉट। फिर लेखक ने इस नाम को क्यों छोड़ दिया? क्या इतनी भारी संख्या में होने वाली मौत का इस किताब के लेखक के लिए कोई ऐतिहासिक महत्व नहीं है?

    हालाँकि किताब इस सवाल का सीधे-सीधे जवाब देती नहीं दिखती है। लेकिन इसे पढ़ने के बाद इस नाम को छोड़ देने के पीछे की कुछ वजहें मुझे समझ आईं। उसमें सबसे पहली वजह शायद हो सकती है कि अशोक कुमार पांडेय ने इस किताब के माध्यम से केवल दमन की भयावहता की सूची तैयार नहीं की है। उन्होंने संभवतः केवल उन्हीं नामों को शामिल किया है जिनकी सत्ता दशकों तक स्थायी संरचना के रूप में खड़ी रही, जिनके शासन ने दुनिया के आधी सदी के राजनीतिक ताने-बाने पर असर डाला। इस तुलना में देखें तो पोल पॉट का शासनकाल बहुत छोटा, महज़ चार साल का ही रहा। हालाँकि इससे उसके दमन और आतंक की गंभीरता और भयावहता कम नहीं हो जाती और न ही कम आंकी जाती है।
    दूसरी वजह यह हो सकती है कि लेखक तानाशाहों के माध्यम से केवल दमनकारी प्रवृति और नर्सिसिज्म को ही नहीं दिखाना चाहता हो, बल्कि ‘विचारधारात्मक विविधता’ को दिखाना भी एक लक्ष्य रहा हो सकता है।
    अपने छह किरदारों के माध्यम से यह किताब दक्षिणपंथ, वामपंथ, फासीवाद, कम्युनिज़्म सभी विचारों से उपजे तानाशाहों पर बात करती है। और इन सबके मुक़ाबले पोल पॉट का शासन और सत्ता का ढाँचा अलग था। दुनिया भर के इतिहासकार पोल पॉट को ‘क्लासिक डिक्टेटरशिप’ के बजाय ‘मास डिस्ट्रक्शन’ की श्रेणी में रखते नज़र आते हैं। उनके अनुसार उसके सत्ता की प्रवृति तानाशाही न होकर एक चरमपंथी क्रांतिकारी प्रयोग जैसी थी, और जो जल्द ही धराशायी हो गई।

    अंत में अपने उस सवाल पर वापस लौटते हुए कि किसी किताब को उस समय में लिखे जाने का औचित्य और प्रासंगिकता क्या है, कहना चाहूँगी कि यह किताब इस सवाल को एक ख़ास नैरेटिव शैली में एंटरटेन करती है और बताती है कि तानाशाहों को समझना केवल इतिहास को समझना नहीं, बल्कि इतिहास के माध्यम से अपने समय को भी समझना है।

    हमारी राजनीतिक आकांक्षाएँ, हमारा डर, हमारी संस्थाओं की कमजोरी, हमारे समाज की दरारें, ये सब मिलकर तय करते हैं कि किसी देशकाल में कोई किसी तानाशाह का उदय होगा या नहीं।

    एक ज़रूरी बात जिसे किसी भी जागरूक, लोकतांत्रिक और वैचारिक रूप से सशक्त राष्ट्र को हमेशा याद रखनी चाहिए कि तानाशाही केवल अतीत की विरासत ही नहीं, भविष्य की एक खतरनाक संभावना बनकर भी हमारे बीच उपस्थित रहती है।

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    1 mins