योगेश ध्यानी पेशे से मरीन इंजीनियर हैं और उनकी कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। आज अलग अलग मिज़ाज की उनकी कुछ कविताएँ पढ़िए, जिनमें दिल्ली से लेकर पहाड़ तक के बिंब हैं- मॉडरेटर
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1. शहर दिल्ली
(1)
बहुत बड़ा था वह शहर
और मेरे कदम की माप
बहुत छोटी
उसे गले लगाने के लिए
जब तक फैला पाता
मैं अपनी बाँह
उतनी देर में फ्लाईओवरों से होते हुए
शहर के दूसरे छोर तक
पँहुच जाती थी मेट्रो
फिर मैंने देखा
शहर के ही मध्य
सुबह से रात की बेला के बीच
रोज़ एक छोर से
वापस अपने छोर की यात्रा करता
शहर का एक वासी
वह जब भी देखता बस की खिड़की से बाहर
किसी घर के विज्ञापन की होर्डिंग
तो उसकी आँखें चमक उठतीं
लेकिन माथा
किसी अबूझ चिन्ताओं से घिर जाता था
इन्हीं आँखों और चिन्ताओं की इन्हीं लकीरों में
झिलमिलाती दिखाई दी
मुझे दिल्ली।
(2)
कुछ लोग शहर को
उसकी चकाचौंध में बसा मानते थे
कुछ उसके अंधेरों में पुकारते थे उसे
जबकि शहर अक्सर
अपने पुल पर खड़े-खड़े
चुपचाप
नीचे बहती नदी को देखता रहता था।
(3)
वह नाटकों, गोष्ठियों और कलाओं का शहर था
वह उद्योगपतियों, नेताओं और राजनीति का भी शहर था
दूर से देखने पर शहर के दोनों हिस्से अलग-अलग नज़र आते थे
पार्टी दफ्तर, संसद और कारखाने अलग
तो नाट्यशालाएं और कलादीर्घाएं अलग जगहों पर थी
शहर के दो मुख दूर से एक दूसरे की तरफ पीठ किये लगते थे
लेकिन शहर जानता था
कारखाने से निकलकर कारोबारी ही
लेते थे नाटकों में हिस्सा
और पार्टी की गुप्त मीटिंग के बाद
नेता ही पढ़ा करते थे
गोष्ठियों में अपनी कविताएं।
2. रील्स
एक लम्बे ऊंचे आलीशान पुल के
बीचों-बीच पड़ गयी है दरार
हम पुल पर गर्व करना चाहते थे
लेकिन दरार पर हँस देते हैं
कोई गिर रहा है
हम हँस रहे हैं
हमें हँसता देख
वह और ज़ोर से गिर रहा है
हम ऐसी बातों पर हँस रहे हैं
जो दरअसल उठकर
उन्हें ठीक करने की हैं
दीवार पर आईना
अपने अक्ष से टेढ़ा हो गया है
उसे सीधा करने की बजाय
हम उसके प्रतिबिंब पर हंस रहे हैं
संसार इतनी सारी खीझों से भर गया है
इतनी विद्रूपताओं और दरारों से
कि गणतंत्र दिवस की परेड के सिवा
कोई भी दृश्य दोषमुक्त नहीं है
इतनी अधिक हो गयी है खीझ
और हंसने के सबब इतने कम
कि शायद अब इस खीझ पर हँसना ही
मुनासिब है इस संसार में।
3. विज्ञापन
पहले जहाँ ऑटो के पीछे लिखा रहता था
“माँ पिता का आशीर्वाद”
अब वहाँ किसी माॅल का विज्ञापन है
ट्रेन या बस में
हमारी सीट के ठीक पीछे
और आँख के ठीक आगे
किसी सिनेमा का विज्ञापन है
पहले चलती या रुकी हुई बस में
मिल सकती थी सवारी की आँख
सड़क पर चलते किसी पैदल राहगीर से
अब वह संभावना भी ख़त्म हुई
सिर्फ बस की सतह पर नहीं
बल्कि उसके काँच पर भी चस्पा है
क्रिकेट की किसी टीम का विज्ञापन
विज्ञापन जगह तलाश रहे हैं लगातार
वे गश्त कर रहे हैं
हमारी नसों में
हमारी सांस के उतार-चढ़ाव के ठीक बाहर
वे फोन पर घंटी के पीछे छुपे हैं
कुछ लोगों का कहना है
कि अब उनकी नींद में भी चलने लगे हैं विज्ञापन
और ऐसा सुनकर हैरत भी नहीं होती
ज़रूरत और इच्छाओं जैसी
पिछली सदी की बातों से
बहुत आगे बढ़ चुका है बाज़ार
अब सिर्फ टूथपेस्ट, साबुन या साइकिल के ही विज्ञापन नहीं होते
अब तो स्कूल, अस्पताल, खेल और प्रदेशों के भी विज्ञापन होते हैं
और इसमें भी मानो
इन सबकी अगुवाई करते प्रतीत होते हैं
सरकारी योजनाओं के विज्ञापन।
4. पहाड़
(1)
पहाड़ कोई चौपाया जानवर था
अब जिसके
आगे के दो पैर
ज़मीन पर बैठ गये हैं
उसके बहुत से रहवासी
मैदानों पर गिर गये हैं
जो बचे हैं उन्होंने
किसी तरह रोक रखा है
अपना गिरना।
(2)
पहाड़ की बोली आ जायेगी
आ जायेंगे पहाड़ के गीत
कोई न कोई ले ही आयेगा साथ
पहाड़ का मंडुवा, झंगोरा, जख्या
मसूप बाज और ढोल भी आ जायेंगे
याद किये जाने पर
मैदान पर सब कुछ
वैसे ही आ जायेगा
जैसे आती है पहाड़ से नदी
बस एक
पहाड़ ही नहीं आयेगा
उसकी कमी पहाड़ सी पड़ी रहेगी
मैदान में बस गये
पहाड़ी आदमी के सीने में।
5. उस पल में
साधु-महात्मा मौलवी और पादरियों ने कहा
हर पल खुश रहने की कोशिश का ही नाम है ज़िन्दगी
इधर दुनिया हर दिन को उदास करने पर आमादा थी
उदासी इतनी गहरी और ठहरी थी
कि उसका साया खुशी के तयशुदा मौकों पर भी न टलता
गीत-संगीत रौशनी और आतिशबाजी
सब उसे भगाने की कोशिश करते
लेकिन उदासी किसी टूटी टांग वाली बछिया सी
हमेशा दरवाज़े पर बंधी रहती
हंसने-हंसाने के लिए बहुत से यत्न हुए
नये जुमले गढ़े गये
रचे गये नये-नये तरीकों के अट्टहास
किन्तु सब ठहाकों के पीछे विद्युत-रेख सी
दमकती रही उदासी
फिर जब वह किसी भी चिकित्सा पद्धति, कलाओं,
जादू-टोने या तंत्र-मंत्र से स्थगित नहीं हुई
तब उसे रिकार्ड में दर्ज होने से रोका
एक फोटोग्राफर ने
उसने बस क्लिक से पहले कहा, “हंसो”
और उदासी तस्वीरों से बेदखल हो गयी
ऐसा कहते हुए उस पल में वो फोटोग्राफर ही था
इस दुनिया का साधु, मौलवी और पादरी।
6. लेकिन फिक्र की बात नहीं
जब सब बोल रहे हों
तो एक कोने में बैठा
चुप आदमी खींचता है ध्यान
बहुत सारी रोशनी के बीच
अंधेरे पर रुकती है आँख
बारात की भव्य सजावट
और चमकीले कपड़ों के बीच
रंगीन टोपी पहने उस काले चेहरे पर टिकती है आँख
जिसके माथे से चूती पसीने की एक लकीर
बहुत देर से जस की तस बनी हुई है
उसके दोनों हाथ चांदी की तरह चमचमाते भारी बाजे को
मजबूती से पकड़ने में व्यस्त हैं
उसके गाल की हर नस फूंक से उभरी हुई है
दो घोड़ी वाली विशाल बग्घी में बैठे दूल्हे पर नहीं
बल्कि आँख रुकती है
बग्घी के आगे घोड़ों की लगाम संभाले
बालक की उम्र पर
उसके रंग या पोशाक पर नहीं
घोड़े की पिछली टांग के
एक लाल निशान पर रुकता है ध्यान
जो थोड़ा गीला जान पड़ता है
बहुत सारे बल्बों वाले विशाल झूमर के
एक फ्यूज बल्ब को देखने लगती है आँख
ये सारे दृश्य भी
उस जिये जा रहे सपने के हिस्से हैं
जो अपनी हक़ीक़त के साथ
इसमें शामिल हो गये हैं
इन चेहरों की उदासी से
कम हो रही है इस जश्न की कान्ति
लेकिन फिक्र की बात नहीं
जश्न की अन्तिम तस्वीरों से फोटोग्राफर
इन्हें अपने हुनर से हटा देगा।
7. कीर्तन
कुछ हंसी हुई कुछ ठठ्ठा
कुछ भक्ति
ज़ोर से लगाये हुए जयकारे हुए
बहुत से गीत हुए
जिनकी धुनें फिल्मों से उधार थीं
ढोलक पर थापें हुई
ज़मीन पर पैरों की थिरकन
कुछ शोर हुआ कुछ संगीत
इसी शोर में संभव हुई कुछ गपशप
इसी में रचे गये कुछ तंज
इसी में चखा गया प्रसाद और
उछाले गये फूल
आरती के दौरान
मन ही मन मांगी गयी माफियां
और दोहराई गयीं मन्नतें
और फिर अन्त में लौटना हुआ सबका
अपने-अपने उसी जगत में
जो एक उदास दिनचर्या
खो चुकी इच्छाओं और किसी अनाम
प्रतीक्षा से भरा हुआ है।
8. आओ बातें करें
आओ हम गर्मियों की बातें करें
नहीं नहीं….
लू और पसीने की दुर्गंध की नहीं
सूखे कंठ की भी नहीं
हम आमों की प्रजातियों की बात करेंगे
जैसे हमने बीती सर्दियों में की
रेशमी कम्बलों और रंगीन स्वेटरों की बातें
और बर्फ में लहू जमने की बातें छोड़ दीं
आओ इस शहर की बातें करते हैं
शहर के ऊपर बन रहे फ्लाईओवर की
फ्लाईओवर के भी ऊपर टंगी बड़ी-बड़ी होर्डिंग्स की
इसकी कि फ्लाईओवर से कितना आसान हो गया है
एक पाॅश इलाके से दूसरे तक जाना
कितनी आय कितनी बचत कितनी सुविधा
कितना व्यापार
हम बस इसी सब के इर्द-गिर्द रखेंगे अपनी बात
फ्लाईओवर के नीचे झांकने से
बिगड़ सकता है
बातों का स्वाद
आओ उस बन रहे मन्दिर की बात करें
उसके पत्थर उसके स्तम्भ उसका रास्ता
उसका इतिहास, उसकी पूजा
उसका वैभव उसकी आस्था
तुम चाहो तो हम घंटों करते रह सकते हैं इनकी बात
लेकिन ध्यान रहे हम नहीं छेड़ेंगे वह प्रसंग
कि कभी उस रास्ते पर कुछ घर और दुकानें थीं
उनका क्या हुआ!
तुम कहते हो तो हम
इस विश्व की बात भी करेंगे
पर याद रखो
युद्ध और हत्याओं से क्षुब्ध नहीं होना है
हम गोलियों का शिकार हुए लोगों
या जंग में नेस्तनाबूद हुए शहर की बात नहीं करेंगे
इसके बजाय हम करेंगे
तथाकथित हत्यारे के
देशप्रेम पर बात।
9. तुलनाएं लेंगी हमारी जान
तुलनाएं लेंगी हमारी जान
समान और असमान के
असमंजस चुभेंगे
हमारे तलवों में
किसी खीझ में छूटेंगे यह प्राण
किसी सर्पदंश से नहीं
न जरा से
भरभराकर अचानक टूटी
अपेक्षाओं की इमारत के मलबे में
घुटेगी हम सबकी साँस
अधूरी चाहनाओं के रक्त में मिलकर
उसे काला कर देने से
विषाक्त होगा यह शरीर
मृत्यु के बाद जब निढाल पड़ी होगी
यह देह
तो ठीक उसके बगल में लेटा होगा
उसी के आकार का
एक अधूरापन।
10. प्रसिद्ध अभिनेता की मौत
वही जिसकी कभी बाट जोही जाती थी
जिसके न आने से
अधूरी रह जाती थीं चीज़ें
और उदास हो जाती थी
बिछी हुई कालीन
कैमरे जिसकी आँख में झांकना चाहते थे
और हर बार एक काला चश्मा
बीच में आ जाता था
जिसकी तस्वीर बेचकर लोग
गुज़ारा कर सकते थे
वह अपनी प्रसिद्धि के बाद कहाँ गया
किसी ने नहीं जानना चाहा
इसका जवाब
कैमरों की फ्लैश लाइट
दूसरे नये चेहरों पर थीं
लोगों के पास तस्वीरें बेचकर गुज़ारा करने के लिए
नये चेहरे थे
समूह में बातों का समय भरने के लिए
नये विषय थे
नायकों की कभी कोई कमी नहीं थी
हमारे देश में
वही जो कभी जीवन का पर्याय था
उसकी मृत्यु की ख़बर पर
लोगों ने जाना
कि वह अब तक ज़िन्दा था
वे थोड़े ग़म में थे
और थोड़ी हैरत में….।
11. इस समय प्रसारित है जो कुछ भी
डाॅक्टर की सलामती
मरीज से कहीं ज्यादा
उसका कम्पाउंडर चाहता है
जैसे नेता की सलामती जनता से ज्यादा
उसका ड्राइवर चाहता है
हर प्रचारित सच के बरक्स
एक दूसरा ज़मीनी सच है
सतह से इतनी बारीकी से जुड़ा हुआ
कि उसे खुरच कर नुमाइश में लगा देना
असंभव है
इस समय प्रसारित है जो कुछ भी
दरअसल प्रायोजित है
वह सच की उखड़ी हुई पपड़ी भी नहीं है
वह बस सच की ज़मीन पर लगा दिया गया
भूसे का ढेर है
हम उस पर हाथ पांव मार रहे हैं
और वह दृश्य को साफ करने की बजाय
हमारी ही आँखों में गिरकर
हमें अंधा बना रहा है।
12. कल्पना से ही बचा हुआ है जीवन
असल में कहीं कुछ नहीं है
न कल्पना में न यथार्थ में
किसी किसी क्षण में
उदासी हमारी परछांई को ढक लेती है
उस क्षण और उससे लगे दूसरे क्षणों में
वह उदासी
कल्पना के सारे दरवाज़े बन्द कर देती है
और हम बन्द देह की हवा में घुटते हैं
आखिर यह कल्पना ही तो है
कि जीवन में खुशी नाम की कोई चीज़ है
कि दुख नहीं है
कि मन छटपटा नहीं रहा
शान्त और भरा हुआ है
कि बहुत दूर ज़मीदोज़ हो गयी इमारत से
सुरक्षित निकल आये हैं सारे लोग
कि रास्ते के घायल को
पीछे वाले राहगीर ने पंहुचा दिया है घर
कल्पना से ही बचा हुआ है जीवन
उसके होने से ही गति है
उसके साकार हो जाने पर
हमें दूसरी
नयी कल्पनाओं की ज़रूरत होगी।
13. फोन पर बात
(1)
फोन आता है
शहर में रह रही बहन
कुछ देर पहाड़ घूम आती है
पहाड़ में रह रहा भाई
बहन के घर हो आता है
बिना किसी चीज़ को हाथ लगाये वे
एक दूसरे की कहानी में टहल आते हैं
वे वहीं रहना चाहते हैं
लेकिन उनके मन-मस्तिष्क और देह से बंधी
तमाम डोरियाँ
उन्हें वापस अपनी कहानी में खींचती रहती हैं
फोन कटता है
और वे अपनी-अपनी कथा में
लौट आते हैं।
(2)
कैसी हो, क्या बनाया से लेकर
बेटी कहाँ है और नाती पोते कैसे हैं तक
एक महीन सा धागा जुड़ा रहा
दो बहनों के बीच
इस बीच हैंडसेट बदलते रहे
और दोनों के हालात भी
अब उनमें किसी तरह का साम्य नहीं था
फिर भी जैसे दोनों के बचपन की बनावट एक सी थी
दोनों बखूबी पहचानते थे
सबके चले जाने के बाद
एक दूसरे की दोपहर की थकान को
उन्होंने जी नहीं लगता कहकर
जाने कितनी ही दोपहर
फोन पर
हल्के किये अपने जी।
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परिचय :
नाम – योगेश कुमार ध्यानी
जन्मतिथि- 3 सितम्बर 1983
सम्प्रति – मैरीन इंजीनियर
निवास – कानपुर
मोबाइल – 9336889840
इमेल – yogeshdhyani85@gmail.com
परिचय – साहित्य मे छात्र जीवन से रुचि,
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