• स्मरण
  • अवधेश प्रीत: गर रहते तो चार कदम और साथ चल लेते

    तीन दिन पहले ही जाने-माने लेखक, संपादक अवधेश प्रीत का निधन हो गया। आज उनको याद करते हुए वरिष्ठ लेखक संतोष दीक्षित की यह टिप्पणी पढ़िए- मॉडरेटर

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    कल ही सहयात्री कथाकार अवधेश प्रीत को अंतिम विदाई देकर आया हूं। कल सारे दिन उनके बरामदे में बैठा यही सोचता रहा कि लगभग पैंतीस वर्षों का हमारा साथ कैसे इतनी जल्दी व्यतीत हो गया! कितनी सारी घटनाएं… हलचल… संग-साथ की यात्राएं… बहसें… मंच… सब हमने साथ तय किए थे। कल निधन की सूचना सबसे पहले जब सुलभ जी को दी, छूटते ही लगभग सुबकते हुये उन्होंने यही कहा  कि आखिर हमारी तिकड़ी टूट ही गई! जाने किसकी नजर लग गई थी इसे?

    पटना में देखते ही देखते पिछली सदी के अंतिम दशक के उत्तरार्ध में एक कथा त्रयी उभरी जिसकी चर्चा सर्वत्र होने लगी थी। संभवतः कथाकार ओमा शर्मा ने संगमन के किसी रिपोर्ताज में पहली बार इसका जिक्र किया था।अवधेश प्रीत इस कथा-त्रयी के सबसे महत्वपूर्ण कड़ी थे। अभी उनके बारे में पहली बार ‘थे’ लिखते हुए मैं अपने शरीर में जिस तरह के कंपन महसूस रहा हूं, यह मेरे लिए शोक की एक बिल्कुल नई अनुभूति है। मेरी कलम बार-बार थम जा रही है। कई तरह के आवेगों से भरा बैठा हूं। कई कई दृश्य आंखों के आगे अचानक से तैरते और फिर उतनी ही तेजी से तिरोहित होते जा रहे हैं। किसी एक बिंदु पर स्वयं को थिर कर पाना कभी-कभी कितना मुश्किल हो जाता है…उफ़!

    याद आ रहा है अवधेश प्रीत के पहले कथा संग्रह के आने का दिन। ‘हस्तक्षेप’ शीर्षक से यह संग्रह पटना के एक स्थानीय प्रकाशक श्याम जी ने छापा था। दफ्तर से जल्दी छुट्टी लेकर अवधेश जी को मोटरसाइकिल के पीछे बिठा, हम दोनों ए. एन. कॉलेज के पीछे श्याम जी के डेरे पर पहुंचे। किताब हासिल करने के बाद बोरिंग रोड चौराहे पर की तेज रोशनी में हमने इसकी गहन पड़ताल की– सब कुछ दुरूस्त है न…? ऐसा न हो कि किसी के आगे भद पिट जाए! फिर जोशो खरोश से हाथ मिला इस कामयाबी का जश्न मनाया। अब अवधेश जी को घर पहुंचने की जल्दी थी और इधर मैंने बियर पीने की जिद लगा रखी थी। अवधेश जी को पीने-पिलाने में कोई रुचि नहीं थी। वह सिगरेट के शौकीन थे और अंततः इसी लत ने उनके फेफड़ों को कमजोर किया होगा… । उन दिनों तक अवधेश मुलुक, तालीम और ग्रासरूट जैसी कहानी लिख खुद को चर्चित कर चुके थे। बाद में अपनी बहुचर्चित कहानी नृशंस और अली मंजिल के प्रकाशन के बाद तथा नृशंस के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में मंचन के बाद जब उन्हें राजकमल ने ब्रेक दिया, हस्तक्षेप को खारिज करते हुए इसकी कुछ कहानियों के साथ नई कहानियों को जोड़ पहला औपचारिक संग्रह ‘नृशंस’ को ही माना गया। लेकिन मैं आज तक उस ‘बियर’ के स्वाद को नहीं भूला हूं  जिसे मैंने गांधी मैदान में बैठकर पिया था। अवधेश ने मारे डर के केवल एक घूंट भरा था। यह ‘बिहार में बहार’ के दिनों की केवल एक याद है! इसके बाद तो ऐसे दर्जनों मौके आते रहे और दोस्तियां बढ़ती गईं।

    अवधेश जी मूलतः उत्तर प्रदेश के थे। जन्म गाजीपुर के एक गांव बलुआं तरांव में हुआ। हिंदी से एम.ए. की डिग्री कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल से ली। उन दिनों उनके शिक्षक पिता रुद्रपुर में रहते थे। वहीं घर भी बनाया। रोजगार की तलाश में अवधेश पटना आए और खगौल दानापुर से अपने संघर्ष की शुरुआत की, जहां उनके एक चाचा रेलवे के मुलाजिम थे। उनसे मेरा परिचय 90-91 के दिनों में हुआ। इन्हीं दिनों मैंने व्यंग्य और लघु कथा के साथ अपने लेखन की शुरुआत की थी। अवधेश जी ‘हंस’ में लगाता छप रहे थे और शहर में उनकी तूती बोलती थी। वह हिंदुस्तान जैसे एक बड़े अखबार में उप संपादक थे और एक मेडिकल ऑफिसर डॉक्टर स्नेहलता सिन्हा से विवाह के उपरांत महेंद्रू स्थित उनके घर में शिफ्ट हो चुके थे। तब आज के नई धारा फेम डॉक्टर शिवनारायण भी उसी मकान की एक कोठरी में रहकर संघर्ष कर रहे थे। कथाकार नरेन तब उनके बेहद करीबी थे। वह दिल्ली, बनारस आदि जगहों से घूम कर आते और बताते की अवधेश प्रीत की कहानियों की कहां-कहां कितनी चर्चा हो रही है। कहना ना होगा कि अवधेश प्रीत की प्रतिष्ठा ने ही मेरे अंदर भी कथाकार बनने की इच्छा जगाई और हमने आगे की यात्रा साथ चलते पूरी की।

    इसके आगे के दिनों में वह हमेशा ऊर्जा  से लबालब मिलते। उनके ड्राइंग रूम में खूब गहमागहमी रहती। कभी भोजपुरी फिल्म का कोई प्रोड्यूसर या डायरेक्टर अपनी आगामी किसी फिल्म की पटकथा लिखवाने का कॉन्ट्रैक्ट दस्तखत करवा रहा होता तो कभी कोई युवा कवि-कथाकार उनसे अपने भविष्य के लेखन के टिप्स ग्रहण कर रहा होता। उन्होंने कई भोजपुरी फिल्मों की स्क्रिप्ट भी लिखी थी उन दिनों। कुछ साइनिंग अमाउंट भी झटक लेते थे, यह पता है। इन्हीं के बीच कथा लेखन का कार्य भी चलता रहता। उन दिनों वह हिंदुस्तान का साहित्य पेज देख रहे थे जिसकी काफी प्रतिष्ठा थी। उस पेज को संवारने, बनाने में अनिल विभाकर, नागेंद्र तथा सियाराम यादव जैसे प्रखर और बौद्धिक पत्रकारों का भी योगदान रहा था।अवधेश प्रीत इसे और भी बेहतर बना रहे थे। उन्होंने ढेर सारे युवा रचनाकारों को केवल प्रकाशित ही नहीं किया, उन्हें मार्गदर्शन देकर प्रोत्साहित भी किया। कल उनके अंतिम दर्शन को आवास से लेकर श्मशान तक आने वाले लेखकों, पत्रकारों का तांता जिस तरह से लगा रहा तथा शहर के बाहर के लोगों के इतने सारे फोन काॅल्स आए… तभी महसूस हुआ कि उन्होंने अपने जीवन में क्या सब और कितना कुछ अर्जित किया है!

           अवधेश प्रीत की शुरुआती कहानियों में बिहार का खौलता यथार्थ है और बकौल राजेंद्र यादव– एक फायर दिखाई देता है। सत्ता से एक आम आदमी का संबंध, वाम राजनीति के विरोधाभास, उनके अंतःसंघर्ष तथा क्षुद्रताएं एवं सम्प्रदायिकता इन कहानियों का मूल स्वर रहा है। इन कहानियों से गुजरते हुए आप उन दिनों के सामाजिक-राजनीतिक विमर्श से भली भांति परिचित हो सकते हैं। इसके आगे की अपनी कहानियों यथा नृशंस, अली मंजिल हमज़मीन, फसाद का मैदान, बाबूजी की छतरी, चांद के पार एक चाबी  में अपने समय की सामाजिक विसंगतियों, सामंती रीति-रिवाज तथा वंचित वर्ग की पीड़ा की मुखर अभिव्यक्ति हुई है। उनकी हाल-फिलहाल की पत्रिकाओं में छपी कहानी जैसे ‘मिनी’ में स्त्री विमर्श का एक नया आयाम देखने को मिलता है।

    अवधेश के कथा कहने का अंदाज हमेशा दिलचस्प किस्सागोई से भरा रहता। वह समकालीन ज्वलंत खबरों को  किस्से में बदल पाने में महारत रखते थे। उनकी कहानियों पर लिखते हुए कभी मैंने एक टिप्पणी की थी – ‘अवधेश प्रीत अपनी कहानियों में किसी खास शिल्प के प्रति आग्रह नहीं रखते। कथानक भी वह कथ्य के अनुरूप फैलाते हैं। जैसे कुशल मछेरा मछलियों की रिहाइश के अनुरूप जाल फैलता है। कहानियाँ वह लिखते नहीं, रचते हैं। बल्कि कहा जाए तो बुनते हैं। कपड़े की तरह करघे पर। उनकी भाषा गंगा-जमुनी तो है ही, इनमें गंवई शब्दों और देशज मुहावरों का भी वह यथासंभव प्रयोग करते हैं। उनकी कहानी एक नजर में परिपक्व को नजर आती हैं।’

     अवधेश प्रीत असमय चले गए। वह पिछले कई महीनों से चौबीसों घंटे ऑक्सीजन सपोर्ट पर रहने लगे थे। स्नेहलता भाभी और दोनों डॉक्टर बेटियां उनका भरपूर ख्याल रखतीं। बड़े दामाद भी डॉक्टर हैं। इन लोगों ने मिलकर घर के एक कमरे को पूरी तरह से एक आईसीयू यूनिट में बदल दिया था। इतनी देखभाल और सतत डॉक्टरों की निगरानी में रहने के कारण वह जितना अधिक जी सकते थे जी सके। मैं बीच-बीच में जाता था। जाने में भी बहुत संकोच होता था। कुछ कर न पाने की अपनी असहायता का बोध सबसे अधिक चुभता है। अवधेश की जिंदगी मुट्ठी के रेत की तरह धीरे-धीरे फिसल रही थी। दुख इसी बात का है इस दौरान बहुत कम लोगों ने उनकी सुध ली। उन्हें बहुत नजदीक से जानने वालों ने भी उनकी कितनी उपेक्षा की, यह मैं व्यक्तिगत रूप से जानते हुए भी सार्वजनिक नहीं कर सकता।

    “लेखक की असली जिंदगी उसकी मृत्यु के बाद शुरू होती है।”–

    अवधेश जी के नहीं रहने पर आज फ्रांस के आलोचक और सिद्धांतकार रोलां बार्थ की कही यह उक्ति याद आ रही है। बार्थ ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘लेखक की मृत्यु’ में यही तर्क दिया था कि ‘किसी रचना का अर्थ लेखक की मंशा से नहीं बल्कि पाठक की व्याख्या से तय होता है!’ अवधेश जी को नियति ने जितना समय दिया, उसमें वह लगातार अपना काम करते रहे। चार कहानी संग्रह के साथ उन्होंने ‘अशोक राजपथ’ और ‘रूई लपेटी आग’ जैसे चर्चित उपन्यास भी दिए! उनका यह लिखा भविष्य की पीढ़ी के लिए भी पाथेय का काम करता रहेगा, ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है। उनका जाना मेरे लिए एक व्यक्तिगत क्षति भी है। अब मेरे खुद के जीवन में बहुत कम लोग ऐसे रह गए हैं जिनसे जब चाहूं, जितना चाहूं, बेतकल्लुफ़ होकर बातें कर सकूं! उनके न रहने की यह शून्यता आजीवन भरने वाली नहीं। उन्हें अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए बरबस ही भारतेंदु की यह पंक्ति याद आ रही है‐–

          कहैंगे सबै ही नैन नीर भरि भरि

        पाछे प्यारे हरिश्चंद की कहानी रहि जायेगी।

         

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