आज पढ़िए ट्विंकल तोमर सिंह की कविताएँ। वह पेशे से अध्यापक हैं। कविताएँ, कहानियाँ लिखती हैं। जानकी पुल पर इनकी कविताएँ पहली बार प्रकाशित हो रही हैं- मॉडरेटर
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1.
श्यामली छाप उपले
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श्यामली को मैंने देखा
बढ़ते हुए दिन के ताप में
धरती पर नंगे पांव बैठी हुई
गोबर में धँसी हुई
थाप रही है उपले।
उसकी थाप पर कहीं कोई संगीत नहीं जागता
गोबर में लिपटी हाथ की उंगलियों को
संगीत में विशारद की चाह कहाँ?
उसके जीवन में संगीत बस इतना ही रहा
या तो दूल्हे को द्वारचार पर दीं गा-गा कर गालियाँ
या फिर एक लय में थापती रही उपले।
उसके हाथ की लकीरें जैसे कि एक मुहर हैं
हर उपले पर छोड़ती जाती है अपने निशान
जैसे कहती हो, जानते हो ये उपले हैं ‘श्यामली-छाप’।
हर रात चूल्हे में उसके हाथ की लकीरों वाले
उपले ही नहीं, उसके हाथ भी जलते हैं
उपलों की भस्म में ढूँढने से भी नहीं मिलती उसकी अस्फुट आह।
प्रतिदिन सुबह से श्यामली थापती है उपले
ढालती है लकीरों भरे हाथों के सांचों में गोमय की कलाकृति
कला में उसकी बस इतनी ही हिस्सेदारी है।
उस पर लिखी जा रही है कविता
उसे चित्रित कर रहा है चित्रकार
उसका छायाचित्र ले रहा है कला सिनेमाकार।
गोबर की परत के नीचे उसकी हथेलियों में
एक अलग सी, छोटी सी, क्षीण सी लकीर है
जो बताती है उसके भाग्य में है
कुछ क्षण की नायिका का योग!
पर वह यह नहीं जानती
वह जानती है मात्र उपले पाथना।
श्यामली थापती जाती है उपले
उपलों पर छोड़ती है उसी भाग्य वाली रेखा का निशान
जिसे चूल्हे में भस्म होना ही है!
2. निर्वस्त्र
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यदि वस्त्रों को
वाणी का वरदान होता,
तो वे मुखर होते
उद्घोषणा में नहीं,
एक संकोचपूर्ण क्षमा-याचना में।
‘क्षमा करना मनुष्य,
हम सौंदर्य के वृद्धिकर्ता हैं,
अंतःकरण की मलिनता के रक्षक नहीं’।
‘हम तन की आकारों को
विस्तार दे सकते हैं,
पर आत्मा के विकारों को
किसी वस्त्र-आवरण से
ढका नहीं जा सका आज तक’।
काया स्वयं कहती
‘मैं भी छिपा नहीं सकती तुम्हारे कर्म
मुझे रँग सकते हो
गंध, गहनों, गोदने से,
समय के धोबीघाट पर
फटना, मैला होना, चीथड़े होना
टाल नहीं सकते’!
ऊपर रेशमी फतूही
फिर मांस-मज्जा की चादर,
और उसके भीतर
कहीं, बहुत भीतर
हम कितने निर्वस्त्र!
हम कितने नग्न!
3. तुम्हारे जूते
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तुम्हारे जूते के अंदर
कभी भी कोई पाँव नहीं धरेगा
कोई कभी नहीं जान पायेगा
कि तुम्हारे जूतों में बिच्छुओं का परिवार रहता है
जो काटते हैं तुम्हारे हर एक कदम आगे बढ़ाने पर
कोई क्यों जानेगा
कि तुम्हारे जूते में कभी अँगूठा मुड़ जाता है,
तो कभी उंगली घिसल जाती है
जैसे कि महीने के अंत में बटुवे में पड़ा एक मुड़ा-तुड़ा नोट
तुम्हारे जूते में एक जगह छोटा सा छेद है
जो सिर्फ तुम्हें पता है, उन्हें नहीं पता
तुम मन को समझाते हो तो क्या हो गया
अभी चल जाएगा,
प्रेमचंद भी तो फटा जूता पहन लेते थे
तुम्हारे जूते घिस गए हैं, उनमें चमक बाकी नहीं रही
तुम जानते हो जूतों से व्यक्तित्व की पहचान होती है
पर तुम जानते हो
व्यक्तित्व की पहचान बनाने के लिए कई जूते घिसने पड़ते हैं
इसलिए सह लेते हो सबकी तुम्हारे जूतों को टटोलती उपेक्षा भरी नज़र
तुम्हारे जूतों के अंदर झक सफ़ेद मोजे नहीं हैं
खाली जूते पटपटाते चलते हो
जैसे कि बिन प्लास्टर बिन पर्दे बिन सजावट का तुम्हारा घर
तुम्हारे जूतों के अन्दर कभी भी कोई पाँव नहीं धरेगा
न ही तुम उनके जूते पहन कर
तेज भाग पाओगे
उनका जूता तुम्हारे पैरों के अनुकूल कभी नहीं होगा
तुम्हारा जूता काट रहा है
पर न तुम्हारे पैर से बड़ा है न छोटा
तुम छोटे छोटे डग रखते भी पहुँच जाओगे
बिना किसी की कृपादृष्टि के
बिना किसी बोझ को आत्मा पर लादे
क्या यही करम कम नहीं हैं?
4. तुम मौन रहना
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तुम मौन रहना
तुम्हारा मौन रहना बहुतों को खलेगा
तुम्हारे मुँह से कुछ शब्द निकलते थे
कुछ सही कुछ ग़लत
उनसे उनके मस्तिष्क की जुगाली चलती थी
अब तुम मौन हो
और वे बैचैन हैं
तुम मौन रहना
क्योंकि शब्दों को शब्दों से गुणा करने पर
अनंत तक चलने वाली बातें पैदा हो जातीं हैं
फिर इतना शोर होता है
कि तुम्हें अपना ही स्वर खोजने के लिए
भटकना पड़ता है
तुम मौन रहना
तुमसे पहले भी इस दुनिया की बतकही चलती थी
तुम्हारे बाद भी चलती रहेगी
पर जब तुम दुनिया के सुर में सुर न मिला सको तो
तुम मौन रहना
तुम मौन रहना
पर डरना बिल्कुल भी नहीं
ये जानो कि मौन रहने से वाणी चुप रहती है
शब्द खोते नहीं हैं
वे तो विचारों की गंगा में डुबकी लगा कर
और पवित्र हो जाते हैं
बोलने का गुण ईश्वर ने दिया था
कि हम बता सकें हमें कहाँ दर्द हैं, हमें कितनी भूख है
या बता सकें किस दिशा में लगे हैं सुंदर फल
कहाँ बहता है मीठे जल वाला झरना
पर आज सब बोल रहे हैं
बोल रहे हैं, चिल्ला रहे हैं, अपनी महिमा जता रहे हैं
जिससे तुम भूल जाओ अपना रास्ता
एक संत था मस्तमौला, रहस्यवादी
यूँ ही नहीं कह कर गया
चींटी के पग नुपूर बाजे तो भी साहेब सुनता है
तुम चींटी की पदचाप सुनना
इसलिए मौन रहना
चींटी की तरह
तुम अपना रास्ता कभी बिसराना नहीं
चलते रहना,
तुम मौन रहना!
5. कामकाजी औरत
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कामकाजी औरत
सुबह सुबह
काम पर भागने की जल्दी में
उखाड़ती है शीशे पर चिपकी एक बिंदी
झट से चिपकाती है माथे पर.
सास कहती हैं
सूना माथा अपशगुन है.
लाल बिंदी जैसे बिजली का एक खटका है
खटका दबाया और
सुहाग की प्रभा चेहरे को
झिलमिल झिलमिल कर उठी.
कामकाजी औरत
लौट आती है थक कर
धूल सने माथे पर
उसी बिंदी के चारों ओर
उगे मिलते हैं अनेकों स्वेद बिंदु
जैसे खिल उठा हो एक तारामंडल
चांद को बीच में बिठा कर
कामकाजी औरत
बिंदु बिंदु मिला कर
खींच रही है अपने माथे पर
अपने तरीके से भाग्य की रेखाएं
देखो न
सुबह के अम्लान मुख से अधिक
म्लान मुख में सुंदर लग रही है.

