अनुपम त्रिपाठी की पाँच कविताएँ

आज पढ़िए युवा कवि अनुपम त्रिपाठी की कविताएँ। उनकी इन कविताओं में दिनंदिन के जीवन का संगीत है, जो बड़ी सहजता से आ जाता है, लेकिन बहुत सघनता से आता है। आइये उनकी पाँच कविताएँ पढ़ते हैं- मॉडरेटर
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(1)
दिनारंभ
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सर्दी की एक भोर
गलते फर्श पर पड़ते हैं
माँ के गर्म मुलायम पाँव
और प्रकाश फैलना शुरू होता है

उगता है दिवाकर
शुरू होता है पक्षियों का गान
कलावंत कसते हैं तानपुरा
बरगद खरज लगाता भैरव जैसा दिखता है

खदकती है चा,
रेडियो पर बज उठते हैं भीमसेन जोशी
बर्तनों से निष्पादित होती हैं सरोद की स्वर लहरियां
और कुकर की सीटी जैसे बाँसुरी का तार पंचम
आलू उबलते हैं
दिनचर्या शुरू होती है…

सर्दी की एक भोर
गलते फर्श पर पड़ते हैं
रजतकेशी माँ के गर्म मुलायम पाँव

देवता स्वयं लेने आये थे उसे
वह तो कल्याण में रत थी…

—

(2)
एक सत्य के पीछे

एक सत्य के पीछे
जहाँ तक जा सकता था, गया
माचिस जलाई और आग लकड़ी के आखिरी सिरे तक फैली
तब तक जब तक
ऊँगली जल नहीं गयी
तीली नहीं छोड़ी
एक सर्दी की दुपहर
सीलन भरे कमरे में रजाई में लेटे लेटे
जब अँधेरा बहुत ज्यादा लगने लगा और
समझ में आया कि डर दुपहरी में भी लग सकता है, केवल रात ही उसका समय नहीं
तब उठकर भागने के अलावा कुछ नहीं बचा…

इस संसार में यदि प्रेम कविताओं का कोई ठिकाना हो सकता है,
तो वो जरूर किसी शांत नदी के पास, किसी पर्वत की उंचाई पर, या
रात में किसी चलती ट्रेन की खिड़की से देखे गए गाँव में हो सकता है,
जहाँ रौशनी अँधेरा चीरती नहीं, दाग की तरह लगती है…

हालाँकि यह एक खाए अघाए लड़के का स्टेटमेंट लग सकता है.
लेकिन प्यार में पड़कर
अपराध के बहुत पास से गुजरने का अवसर जरूर मिलता है और जाने अनजाने एक सवाल उठ ही जाता है–
‘कहीं हम गलत तो नहीं कर रहे हैं’

हालांकि सत्य अवस्था से अधिक कुछ नहीं
सभ्यता में मारे गए करोड़ों बच्चे
प्यार की निशानियाँ थे
और उन्हें पूरी जिम्मेदारी से मिटाया गया…

सवाल जिनके भीतर से उठना था,
उनके भीतर जवाब के अतिरिक्त कुछ नहीं बचा था…

(3)
बारिश और पकौड़ियाँ

रात बारिश हुई
और जब लगातार होती रही तो वह काम पर जा न सकी
फिर घर पर बैठे-बैठे उसका मन हुआ
पकौड़ियाँ खाने का
गोल-गोल आलू की पकौड़ियाँ
साथ में कुछ हरी मिर्च भी तल लेगी।

उसने अपने आदमी से कहा कि पकौड़ियाँ खाने का मन है।
‘हाँ-हाँ बनाओ बनाओ, दोस्तों को भी बुला लेता हूँ- उसका आदमी बोला।

बड़े करीने से काटना पड़ता है आलू:
उसने मन में बुदबुदाया
फिर उसे बेसन में डुबोया और कड़ाही में तलने लगी
एक-एक आलू का कतरा।

वह तलती गयी और बाहर बैठे लोग खाते गये चाव से
‘भाभी क्या करारी पकौड़ियाँ हैं’
‘भाभी चटनी का जवाब नहीं’
‘और ये हरी मिर्च तो क्या ही कहने’

अंदर से जाती थीं पकौड़ियाँ
बाहर से आती थी वाह वाही

हालाँकि इच्छा उसकी थी…
महज इच्छा ही रही!

(4)
मुरलीधर शर्मा के दो बेटे थे जो सुबह नहीं उठते थे,
पत्नी का रेडियो मोहल्ले का अलार्म था।
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मुरलीधर शर्मा के दो बेटे थे। वे सुबह जल्दी नहीं उठ पाते थे।
पत्नी का रेडियो मोहल्ले के लिए अलार्म था, घर के लिए नहीं। मुरलीधर को सुबह होते देखना अच्छा लगता था। खिड़की से देखते थे सुबह का फैलना। और बच्चों से कहते थे कि सुबह उठना अच्छी बात है।

सुबह की संगीत में चिड़ियों और मंदिर की घण्टियों की आवाज़ें ही नहीं, पत्नी का कड़ाही में सब्जी तलना भी शामिल था।

कूकर की सीटी थी नींद से जगाने का स्थायी जुगाड़।
वह खाना बनाती और प्रार्थना के शब्द बुदबुदाती।
पिछले चालीस साल से मुरलीधर यह सुनते आ रहे थे।

इस तरह प्रार्थना का बुदबुदाना रेडियो कूकर की सीटी सब्जियों का तलना और चिड़ियों की आवाज़ – इन सबके साथ होती थी मुरलीधर की सुबह।

एक सुबह ये हुआ कि प्रार्थना के शब्द मुरलीधर को सुनाई नहीं पड़े, सब्जी तलने की आवाज़ भी नदारद थी। कूकर में नहीं उबल रहे थे आलू। पत्नी का रेडियो चालू नहीं किया गया था।

उस दिन मुरलीधर उठे और उन्होंने खिड़की को बंद कर दिया। उन्हें उस दिन से सुबह में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं रही।
बच्चों को सुबह उठाने की चिंता से वे मुक्त हो चुके थे। मोहल्ला अब देर तक सोता रहता है।

(5)
होना न होना

तुम हो—
न दिए गए उत्तरों में
स्मृतियों में खेलती, गुदगुदाती,
चहकती, रूठती, मनाती
हँसती-इठलाती

तुम हो
जहाँ कोई नहीं है
जहाँ कोई नहीं पहुँच पाता
जहाँ कोई झांक नहीं सकता

तुम हो
मृत्यु से पहले तक
मेरी समस्त क्रियाओं की सहभागी
मेरे भीतर शोर मचाती
मुझे उदास करती, छोड़ जाती
तुम हो —

—तुम नहीं हो

माल रोड से अभी भी गुज़रती है 212
तुगलकाबाद की दीवारों पर
अभी भी कोई लड़का लिख रहा होता है नाम
हडसन लेन का कैफे वहीं है
जहाँ हम साथ साथ जाते
त्रिवेणी में अभी भी लगती हैं प्रदर्शनियां
मंडी हाउस में अभी भी बनाते हैं लोग
चित्र, नाटक और खाते हैं समोसे पकोड़े इत्यादि
अब भी कोई न कोई पढ़ रहा है आपका बंटी
और छात्रा मार्ग पर दिख ही जाता है
उदासी में डूबा कोई एक

मैं अब भी देर से ही घर आता हूँ
और रात के सन्नाटे में उतर जाता हूँ
सपने अब भी वही आते हैं मुझे
क्या गज़ब की महिमा है इस मृत्यु लोक की
कि बाकी सब कुछ वैसा ही है जैसा था
केवल एक
तुम नहीं हो…

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