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  • समीक्षा
  • चुप्पी प्रेम की भाषा है’ : ढाई आखर, अकथ कहानी

    हाल ही में कवयित्री रंजिता सिंह ‘फ़लक’ का काव्य संग्रह ‘चुप्पी प्रेम की भाषा है’ प्रकाशित हुआ है।इससे पहले उनकी कुछ प्रेम कविताएँ हम जानकीपुल पर पढ़ चुके हैं, जिनसे हमारा परिचय युवा कवि आशुतोष प्रसिद्ध ने कराया था। आज उनके काव्य-संग्रह से हमारा परिचय करा रहे हैं साहित्यकार और प्राध्यापक डॉ. विनय कुमार– अनुरंजनी

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    प्रेम, जिसे अनुरक्ति, अनुराग, इश्क, मोहब्बत, उल्फत, चाहत, छोह, दिल्लगी, प्रीति, प्यार इत्यादि अनेक शब्दों से अभिव्यक्त करते हैं, भाषा में पूर्णतः अभिव्यक्त हो पाता है क्या? ….! इसीलिए तो दार्शनिक इसपर चिंतन करते हैं! कवि, प्रेमी और भक्त इसे जीते हैं।
    हिन्दी की लब्धप्रतिष्ठ कवयित्री रंजीता सिंह ‘फ़लक’ का एक कविता-संग्रह वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है, जिसका नाम है, ‘चुप्पी प्रेम की भाषा है’। किसी भी कृति के अर्थपूर्ण शीर्षक से कृति की आत्मा प्रतिबिम्बित होती है। .. तो इस शीर्षक का क्या अर्थ है? मुझे खलिल जिब्रान की एक लघुकथा याद आ रही है, ‘प्रेम और घृणा’ (Love and Hate)। एक स्त्री ने एक पुरुष से कहा, “मैं तुमसे प्यार करती हूँ!”
    तब पुरुष ने कहा, “मेरे हृदय में तुम्हारे प्यार के लायक कुछ है।”
    फिर स्त्री ने कहा, “क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करते ?”
    तब पुरुष ने बस उसे देखा और कहा कुछ नहीं।
    तब महिला जोर से चिल्लाई,“मैं तुमसे घृणा करती हूँ!”
    तब पुरुष ने कहा, “तो मेरे हृदय में तुम्हारी घृणा के लायक कुछ है..!”
      इसीलिए तो कबीर कहते हैं, “मन मस्त हुआ तब क्यूँ बोले?”
    अस्तु, वाणी प्रकाशन से 2025 में प्रकाशित ‘चुप्पी प्रेम की भाषा है’ में 75 कविताएँ संगृहीत हैं। 172 पृष्ठों का यह कविता-संग्रह चार खंडों में उपविभाजित हैं। खंड -1 ( प्रेम की कराह है पावस ऋतु) में 17 कविताएँ, खंड-2 (स्मृति, स्वप्न और कामनाएँ) में 13 कविताएँ, खंड-3 (प्रेम की नागरिकता) में 27 कविताएँ और खंड-4 (पिता के लिए नहीं लिखी कोई कविता) में 18 कविताएँ हैं।
    चार खंडों में उपविभाजित ये कविताएँ अपने पाठकों को एक सहज सुलभता देती हैं कि वो अपनी रुचि के खंड से अपनी पसंदीदा कविताएँ पढ़ सकें। सशक्त और संवेदनशील प्रेम कविताएँ रंजीता सिंह की पहचान रही हैं, पर इस संग्रह को पढ़ते हुए पाठक को प्रेम का ऐसा विपुल संसार मिलता हैं, जहाँ प्रेम सिर्फ देह और नेह तक संकुचित न होकर आत्मा और अध्यात्म तक भी प्रसार पा रहा है। चौथे खंड में रक्त संबंधों पर लिखी गई कुछ खास मार्मिक और याद रह जाने वाली कविताएँ हैं, जिनमें ‘पिता के लिए नहीं लिखी कोई कविता’, ‘भाई! तुम्हें देखते हुए’, भतीजे के लिए लिखी गई कविता आदि देर तक पाठक की स्मृति में रची-बसी रह जाती हैं।
    प्रथम खंड ‘प्रेम की कराह है पावस ऋतु’ शीर्षक कविता में कवयित्री लिखती हैं –
    “मृत्यु निश्चित छीन लेगी/ मेरी आँखों के सारे स्वप्न /पर शेष तो रहेंगी/ हृदय की अतृप्त कामनाएँ/ क्या ब्रह्मांड में नहीं गूँजेगी/ मेरी आर्त पुकार /एक निष्कलुष हृदय की/ निर्दोष कामना से /क्या खंडित नहीं होगा /नियति का दर्प।/ यह प्रेम की ऊर्जा में आस्था और विश्वास का प्रश्न है!
    ‘युद्ध और वसंत’ शीर्षक कविता की पंक्तियाँ मन:स्थिति पर प्रेम के प्रभाव का चित्रण करती हैं – किसी वसंत / उसने हथेलियों पर/ लिखा मेरा नाम/ और /उस बरस /मन के आँगन में/ खिल उठे ढेर सारे फूल /
    ‘तुम्हारा शहर’ शीर्षक कविता की पंक्तियाँ कहती हैं कि जब तक स्मृति रहती है, स्मृतिचिह्न शेष रहते हैं – जीवनपर्यन्त विलुप्त हुआ तुम्हारा शहर /जब भी किसी काल के उत्खनन में मिलेगा/ तो उसी शहर में मिलेंगे/ मेरे वो तमाम पत्र/
    जो अनवरत /रात के तीसरे या चौथे पहर/मैंने तुम्हें लिखे थे/  इन एक जोड़ी आँखों के स्वप्न/जिनपर दुर्भाग्य/ किसी परमाणु बम-सा गिरा था/ जिसमें बेमौत मरी थीं/ ढेर सारी कोमल कल्पनाएँ!
    कवयित्री का मानना है कि प्रेम सायास बोल-बोलकर अभिव्यक्त नहीं हो सकता –
    “चुप रहना अच्छा है/ क्योंकि/चुप्पियों के कई मायने/ अपने हिसाब से/निकाले जा सकते हैं/ पर कही गई बात का/बस एक ही मतलब होता है /
    चुप्पी प्रेम की भाषा है/ शायद इसीलिए संसार की/ सबसे सुंदर प्रेम कथाएँ कहीं दर्ज न हो सकीं /इतिहास की जितनी भी /प्रेम कथाएँ हमने पढ़ी हैं/ उससे कहीं ज्यादा कहानियाँ/चुप्पियों की अबूझ लिपि/
    में दर्ज हैं/जो आज तक न पढ़ी गई/ न सुनी गई/
    तुम्हें सोचते हुए/ कुछ भी कहने-सुनने से ज्यादा/ मैंने पढ़ा तुम्हारा मौन/और आश्वस्त हुई कि /सबसे सुंदर और कालजयी है/अघोषित प्रेम!/
    (‘चुप्पी और प्रेम’)
    जब किसी भी यत्न से कवयित्री अपनी स्मृतियों से उबर नहीं पाती तो –
    मैंने तब असंख्य दुआएँ माँगी/उस असाध्य रोग की/जिसे विज्ञान अल्जाइमर या /डिमेंशिया कहता है/ ठीक ही तो है/ समस्त स्मृति का लोप हुए बिना/ कहाँ मुमकिन है/तुम्हें विस्मृत कर पाना!/(स्मृति-लोप)
    यह तो ‘निराला’ की उस इच्छा की तरह है, जब वे अपने कवि-कर्म को दुख का कारण मानते हुए कहते हैं, “हो इसी कर्म पर वज्रपात!”
    संग्रह के दूसरे खंड ‘स्मृति, स्वप्न और कामनाएँ’ शीर्षक कविता में कवयित्री किताब के स्पर्श से और उसके शब्दों के माध्यम से अपने प्रेम तक पहुँच जाती हैं –
    मेरी गर्दन पर /किसी जुंबिश की तरह/महसूस होते हो तुम/खासकर उन दिनों में/जब तुमसे दूर/
    बहुत दूर/मैं पढ़ रही होती हूँ/तुम्हारी लिखी कोई किताब/
    (स्मृति, स्वप्न और कामनाएँ)
    प्रेम में कैसे दृष्टिबोध का विस्तार होता है, कवयित्री के शब्दों में –
    तुम्हें प्रेम करते हुए/मैंने अपनी आँखों से देखा वो सब/ जिन्हें पूरी जिंदगी/ अपने साथ रहते हुए भी कभी नहीं/देख पाई थी।/(तुम्हें प्रेम करते हुए)
    एक कविता है,’ख्वाहिश’- बची हुई ढेर सारी/ख्वाहिशों में/ एक छोटी-सी ख्वाहिश/ये भी है कि/
    काश!/टिका सकूँ अपना माथा/तुम्हारे सीने पर/और चूम सकूँ /तुम्हारी वो आँखें /जिन्हें अब तक ठीक से/ सीधे-सीधे देख भी नहीं पाई/
    यह “छोटी-सी आशा, चाँद-तारों को छूने की आशा” से कम नहीं है!
    ‘चुप्पी प्रेम की भाषा है’ संग्रह के खंड तीन (प्रेम की नागरिकता) में कुछ छोटी-छोटी कविताएँ हैं, पाँच-सात पंक्तियों तक की, जिनको सशब्द पढ़ने के बाद भी पाठ मन में निश्शब्द गूँजते रहते हैं –
    मात्र ढाई पंक्ति की एक कविता देर तक जेहन में अटकी रह जाती है –
     मेरी टूटी हुई नींद के टुकड़े
    क्या कभी तुम्हें
    गाढ़ी नींद में चुभे हैं?
    इसी तरह  – इंतजार का नीला रंग/याद का हरा रंग/प्यार का लाल रंग/एतबार का पीला रंग/और वस्ल का अबरखी रंग/ये सारे रंग/इस साल का फागुन/हमारे जिस्मों पर मल गया/ (फागुन)
    ‘अंत’ शीर्षक कविता की पंक्तियाँ हैं –
    अगर तुम मुझे मार ही डालना चाहते हो/तो तुम्हें छल या षड्यंत्र करने की/कोई जरूरत नहीं/तुम बेकार की/नफरत में खुद को नष्ट न करो/आओ और मुझे प्रेम करो/ मेरा अंत करने के लिए बस/प्रेम ही काफी है/
    इन पंक्तियों को पढ़ते हुए कबीर की पंक्ति का स्मरण हो आता है, “प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाहिं।”
    स्मृतियों में सुखद-दुखद यादें बसी होती हैं। इन्हीं के साथ तो जीना होता है –
    आखिरकार/प्रेम की नागरिकता में/दर्ज़ हुआ/ मेरा स्थाई पता/तुम्हारी स्मृतियाँ/(प्रेम की नागरिकता)
    कवयित्री “ईश्वर की सत्ता के नियोजित” दुख से संयोजित होकर जीने के सूत्र का संकेत देती हैं – हजार बार प्रेम में पड़ सकने का/जोखिम/उठा सकने वाली/ स्त्रियाँ ही सँभाल सकीं/ ईश्वर की सत्ता के नियोजित/ अथाह दुख/(अथाह दुख)
     इस संग्रह की कविताओं में स्त्री-विमर्श का स्वर भी सुनाई पड़ता है –
    तुमने बगावत की/तो उसे कहा गया/पौरुष/हमने बगावत की/ तो कही गई/ चरित्रहीनता/(चरित्रहीनता)
    यहाँ स्त्री-विमर्श एक अलग सलीके से आता है, इसी खंड की एक और कविता ‘कठपुतली’ इस विमर्श को नए ढंग से प्रस्तुत करती है –
    सबसे ज्यादा सफल और /सशक्त स्त्रियाँ ही प्रेम में सबसे ज्यादा असफल रहीं
    क्योंकि वो चाहकर भी न बन सकी /किसी के हाथ की कठपुतली।
    रंजीता सिंह के यहाँ स्त्री-विमर्श है, विद्रोह है, पितृसत्ता के प्रति असंतोष है, लेकिन समकालीन कविता में अधिकतर कवयित्रियों द्वारा जिस आक्रामक और एकतरफा तरीके से पुरुष सत्ता को चिह्नित किया जा रहा है, वहाँ अतिशयबोध कई बार असहज कर देता है, उससे दीगर रंजीता सिंह अपने पितृसत्तात्मक समाज पर प्रश्न भी उठाती हैं, आरोप भी लगाती हैं, लेकिन वहाँ मात्र आक्रामकता नहीं, व्यवहारसुलभता और पारिवारिक परस्परता का भाव भी है और प्रसिद्ध कवयित्री महादेवी और अनामिका के गढ़े नए पुरुष की संभावना भी है ।
    ‘चुप्पी प्रेम की भाषा है’ के चौथे खंड (पिता के लिए नहीं लिखी कोई कविता) की रचनाओं तक पहुँचकर लगता है कि कवयित्री की रचना-यात्रा ग़म-ए-जाना से ग़म-ए-दौराँ की ओर भी है। जिगर मुरादाबादी के शब्दों में कहें तो –
    इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है
    सिमटे तो दिल आशिक़ फैले तो ज़माना है
    प्रत्येक अनुकूल स्थान का एक भाव-क्षेत्र होता है! ‘यात्राएँ’ शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियाँ हैं –
    यात्राएँ/हमें कभी/पूरा का पूरा/लौटने नहीं देतीं/यात्राओं में/ हम अक्सर छूट जाते हैं /थोड़े-थोड़े /उन जगहों पर/जहाँ पहुँचकर/हमने ठहर जाना चाहा था/
    चौथे खंड में रक्त संबंधों पर लिखी गई कुछ खास मार्मिक और याद रह जाने वाली कविताएँ हैं, जिनमें ‘पिता के लिए नहीं लिखी कोई कविता’,’भाई! तुम्हें देखते हुए’, भतीजे के लिए लिखी गई कविता ‘जन्मदिन’ आदि देर तक पाठक की स्मृति में रची-बसी रह जाती हैं।
    पिता को याद करते हुए कवयित्री लिखती हैं –
    पिता को याद करते ही/ जाने क्या हो जाता है/पिता को सोचते ही/चेतनाशून्य/ कोमा मरीज सी हालत हो जाती है/अनुपस्थित पिता को/अपने चारो तरफ़ साकार देखती हूँ /
    (पिता के लिए नहीं लिखी कोई कविता)
    रंजीता सिंह की कविताओं में भाई और भतीजा भी प्रेम के मुख्य पक्ष के रूप में मुखरित होते हैं- सोचती हूँ तुम्हे रोज देख पाती /
    तो कितना सुन्दर हो जाता ये जीवन/
    जीवन-दर्शन पर विचार करते हुए कवयित्री बुद्ध और बौद्ध दर्शन को जीवन का सार तत्त्व मानते हुए कहती हैं-
    दरअसल/ आसक्ति का परम ही /
    हमें अनासक्त करता है/तृप्ति -अतृप्ति ,मोह -विराग /घृणा -प्रेम ,सुख -दुख /के मध्य /
    निर्विकार हो लेना ही /बुद्धत्व है /
    (बुद्धत्व)
    कवयित्री विपश्यना की अनुभूति को आत्मसंधान की अवस्था मानती है –
    न लिखने वाले दिनों में/ विपश्यना वाली अनुभूति से /गुजर रही होती हूँ/कुछ दिन/ संसार में होते हुए भी /असांसारिक होने और /चुपचाप /सृष्टि और नियति के मध्य अपने /आगत /को जान सकने की लालसा के साथ/विगत के समस्त शोक पर श्वेत वस्त्र डाल/हर संबंध, हर कामना, हर सुख, हर दुख को/अंतिम यात्रा के लिए/ शांतचित्त विदा करना/और जैसे फिर से नया जन्म लेना/(विपश्यना)
    विपश्यना की अनुभूति से एक नया जीवन-दर्शन आलोकित होता है और संसार के प्रति दृष्टि बदल जाती है! फिर –
    पुरुषों की भीड़ से विरक्त गुजरते हुए/मैं कई बार ठहरी/उन तमाम पुरुषों के पास/ जो भीतर से स्त्री थे/ और आचरण में /पूरे के पूरे मनुष्य/(पुरुष)
    वह रिश्तों में विद्रोह को सांस्कृतिक नहीं मानती हैं और पुरुष सत्ता को एक सजग और सशक्त स्त्री की नई दृष्टि से बाँचती भी हैं।
    ‘पुरुष’ कविता को पाठक अपने स्तर पर कई तरह डिकोड कर सकता है, यह कविता स्त्री कवियों द्वारा लिखी गई तमाम कविताओं में एक अलग तरह का आस्वाद लेकर आती है, जहाँ पुरुष समाज की तमाम विसंगतियों पर तीखा प्रहार करते हुए भी कवयित्री उन पुरुषों की सहृदयता नहीं भूलना चाहती, जिनमें मनुष्यता-बोध बचा रहा।
     पूरे के पूरे मनुष्य होना तो वही है, जैसा होने के लिए वेद के ऋषि कहते हैं, “मनुर्भव!”
    ‘चुप्पी प्रेम की भाषा है’ हिन्दी कविता के क्षेत्र में स्वागतयोग्य पुस्तक है! इस संग्रह के लिए प्रसिद्ध कवि अरुण कमल जी कहते हैं, “काव्य उच्छ्वास ऐसे कि पाठक विगलित हो जाये और बार-बार स्वयं के रहस्यमय आन्तरिक लोक को अनावृत्त होते हुए देखे। यह कविता संग्रह उनके हृदय का कार्डियोग्राम है।”
    अनामिका जी कहती हैं, “रंजीता का यह संग्रह इसी अर्थ में विशिष्ट है कि यह स्त्री-मन की विशिष्टता रेखांकित करता है कि प्रेम किससे हुआ, यह बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं रह जाता, एक बार अगर प्रेम के आइडिया से भी प्रेम हो गया तो फिर एक के बहाने सारी दुनिया अपनी-अपनी लगने लगती है!”
    लीलाधर जगूडी़ जी ने अपने ब्लर्ब में संग्रह के प्रति बहुत उदारता से लिखा है कि रंजीता सिंह हमेशा इस कोशिश में रही हैं कि कविता की भाषा और उद्देश्य को एक नया चेहरा दिया जाए। चुप्पी का संवाद और अनुभूति ही प्रेम का आत्मिक प्रत्यय बन जाता है।
    प्रेम के विषय में हम चाहे जितना पढ़ें, लिखें, बोलें, विचार की दृष्टि से इस ‘ढाई आखर’ का बहुत सारा सदैव शेष रह जाता है। इसीलिए तो ‘चुप्पी प्रेम की भाषा है’! गुलजार के शब्दों में –
    प्यार कोई बोल नहीं, प्यार आवाज नहीं;
    एक खामोशी है, सुनती है, कहा करती है!
    इस संग्रह का तमाम कविताओं से गुजरते हुए पाठक बरबस ही ठहरेगा और ये ठहराव ही कविता का मूल सत्व है।रंजीता सिंह के पास हिंदी-उर्दू की मिलीजुली मीठी, प्रवाहमयी और प्रांजल भाषा है, कविता अपने शिल्प, बिम्ब और भाषा के साथ बड़ी सहजता से पाठक के साथ दूर तक जा सकती है ।
    मुक्त छंद की कविताओं पर अमूमन सपाटबयानी के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन रंजीता सिंह के यहाँ मुक्त छंद भी एक विशेष लय-ताल में है, जिससे कविताएँ अतिरिक्त सरसता के साथ तार्किक स्तर पर भी सुदृढ़ महसूस होती हैं।
    यह संग्रह निश्चित ही समकालीन कविता में एक सशक्त काव्य-संग्रह की तरह उद्धृत किया जाएगा। संग्रह की भावभूमि को जानने और इसमें अन्तर्निहित ख़ामोशी को सुनने के लिए, संग्रह की पंक्तियों की सरसता की अनुभूति के लिए, प्रेम की विविध दशाओं और दिशाओं के शब्द-चित्र से होकर गुजरने के लिए एक पठनीय कृति है, ‘चुप्पी प्रेम की भाषा है’!
    चुप्पी प्रेम की भाषा है
    रंजीता सिंह फ़लक
    वाणी प्रकाशन
    समीक्षक – डॉ० विनय कुमार सिंह
    9631544404

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