बैचलर्स किचन: व्यंजन की नहीं, अनुपस्थिति की किताब

हाल में मीडिया विशेषज्ञ विनीत कुमार की किताब आई है ‘बैचलर्स किचन: अपना स्वाद, अपना अन्दाज़’। अपने ढंग की अकेली इस किताब पर आज पढ़िए, अंग्रेज़ी-हिन्दी के जाने-माने क्रिटिक आशुतोष कुमार ठाकुर ने। यह किताब ‘अनबाउंड’ से प्रकाशित हुई है- मॉडरेटर 

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कुछ किताबें रसोई में रखी नमकदानी की तरह होती हैं. वे चुपचाप एक कोने में रखी रहती हैं. पर जब वे नहीं होतीं, तब स्वाद अधूरा रह जाता है. चर्चित मीडिया आलोचक विनीत कुमार की ‘बैचलर्स किचन: अपना स्वाद, अपना अंदाज़’ ऐसी ही एक किताब है. पहली दृष्टि में यह एक बैचलर की रसोई की दास्तान लगती है. पर कुछ ही पन्नों के बाद स्पष्ट हो जाता है कि यह भूख की नहीं, स्मृति की किताब है. यह व्यंजन की नहीं, अनुपस्थिति की किताब है.

हमारे समाज में रसोई लंबे समय तक स्त्री के हिस्से में डाली गई जगह रही है. पुरुष का चूल्हे के सामने खड़ा होना या तो आपातस्थिति माना गया है या फिर मज़ाक. ‘लड़का भात बनाना भी नहीं जानता’ जैसा वाक्य केवल तंज़ नहीं है. वह एक सांस्कृतिक व्यवस्था का बयान है. विनीत की किताब इसी वाक्य के सामने खड़ी होती है. वह इसे व्यक्तिगत चुनौती की तरह नहीं, सामाजिक प्रश्न की तरह ग्रहण करती है.

असल में यह किताब श्रम-विभाजन, लिंग-भूमिकाओं और घरेलू सत्ता-संबंधों पर एक सूक्ष्म, अनुभवजन्य टिप्पणी है. यह रेसिपी नहीं सिखाती. यह उस प्रक्रिया को दर्ज करती है जिसमें एक युवक घर से दूर जाता है. महानगर में किराये के कमरे में बसता है. और धीरे-धीरे सीखता है कि रसोई केवल पेट भरने की जगह नहीं, आत्म-संरचना की जगह भी है.

रसोई एक निजी राजनीति

भोजन और रसोई पर पिछले वर्षों में अनेक महत्वपूर्ण किताबें आई हैं. मधुर जाफरी की An Invitation to Indian Cooking  भारतीय व्यंजनों को सांस्कृतिक सेतु की तरह प्रस्तुत करती है. चित्रा बनर्जी  दिवाकरुणि की The Mistress of Spices मसालों को स्मृति और जादुई यथार्थ के साथ जोड़ती है. अन्थोनी बॉर्डेन की Kitchen Confidential पेशेवर रसोई की अराजकता और श्रम-संस्कृति का भीतरू सच खोलती है. भारतीय संदर्भ में पुष्पेश पंत की India:The Cookbook और तराना हुसैन खान की Degh to Dastarkhwan भोजन को इतिहास, भूगोल और तहज़ीब की लंबी परंपराओं में रखती हैं.

लोकप्रिय पाक-परंपरा में तरला दलाल, संजीव कपूर और रणवीर बरार, जैसे नामों ने रसोई को सार्वजनिक दृश्यता दी है. उनकी दुनिया में रेसिपी एक कौशल है, एक प्रदर्शन है, एक साझा आनंद है. वहाँ रसोई प्रायः परिवार, मेहमान और उत्सव के लिए खुली रहती है.

इन सबके बीच ‘बैचलर्स किचन’ का आग्रह भिन्न है. यह पेशेवर रसोइए की दुनिया नहीं है. यह किसी टीवी स्टूडियो की चमकती रसोई भी नहीं है. यह उस युवक की रसोई है जो किराये के कमरे में रहता है. जिसके पास सीमित बर्तन हैं, सीमित साधन हैं और बहुत-सी स्मृतियाँ हैं.

यहाँ खाना बनाना प्रदर्शन नहीं, संवाद है. यहाँ केवल एक व्यक्ति और उसकी थाली है. यही वह बिंदु है जहाँ यह किताब रसोई का एक अलग समाजशास्त्र रचती है.

लोकप्रिय पाक-लेखन में रसोई अक्सर सामूहिकता का उत्सव होती है. ‘बैचलर्स किचन’ में रसोई एकांत का अनुशासन है. वहाँ भोजन साझा होने से पहले आत्म के भीतर पकता है. यह आत्म-अस्वीकृति के विरुद्ध एक छोटी-सी प्रतिरोध है.

‘अकेले का क्या है, कुछ भी खाकर सो जाएगा’ जैसे वाक्य के सामने यह किताब खड़ी होकर पूछती है कि क्यों. क्यों अकेले रहते हुए अपने खाने को स्वादिष्ट और उसकी प्रस्तुति को सुंदर नहीं बनाया जाना चाहिए. क्यों अपने लिए प्रयोग करना या पारंपरिक भोजन को याद करना किसी शर्म का विषय हो.

यहीं यह किताब घरेलू श्रम के प्रश्न से भी जुड़ती है. जब एक पुरुष अपने लिए खाना बनाता है, तो वह अनजाने में उस अदृश्य श्रम को पहचानता है जिसे घरों में वर्षों से स्त्रियाँ निभाती आई हैं. वह समझता है कि भात अपने आप नहीं पकता. दाल अपने आप स्वादिष्ट नहीं होती. उसके पीछे समय, धैर्य और देखभाल का श्रम है.

इस अर्थ में ‘बैचलर्स किचन’ रसोई को पुनर्परिभाषित करती है. यह उसे केवल स्वाद का स्थल नहीं, श्रम और स्मृति का स्थल भी बनाती है. यह कहती है कि अपने लिए पकाना आत्म-सम्मान है. अपने लिए प्लेट सजाना आत्म-देखभाल है.

यह रसोई उत्सव की नहीं, आत्म-निर्माण की भी है. यहाँ भोजन किसी अतिथि के लिए नहीं, स्वयं के लिए रचा जाता है. यह निजी है, पर संकीर्ण नहीं. इसमें माँ की स्मृतियाँ हैं, घर की गंध है, हॉस्टल के दिनों की सादगी है, महानगर के एकांत का स्वाद है.

लोकप्रिय शेफों की रसोई में तकनीक और प्रस्तुति का कौशल प्रमुख है. ‘बैचलर्स किचन’ में प्रस्तुति भी है लेकिन यह अपने भीतर की गरिमा के लिए है. यह अंतर सूक्ष्म है, पर गहरा है.

इस किताब के पास अपना तर्क है. अपना आस्वाद है. अपना सौंदर्यबोध है. यह कहती है कि बैचलर लाइफ कोई अधूरापन नहीं है. वह भी एक पूर्ण अनुभव है. और उस पूर्णता को स्वाद, रंग और गरिमा की आवश्यकता है.

यही इसकी सबसे बड़ी सामाजिक टिप्पणी है. रसोई को निजी राजनीति में बदल देना. एक साधारण-सी थाली को आत्म-सम्मान के बयान में बदल देना.

मनोरमा. माँ और स्मृति का सामाजिक अर्थ

किताब का भावनात्मक केंद्र लेखक की माँ हैं. उनका नाम है मनोरमा. पूरी किताब में विनीत उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं. माँ को नाम से पुकारना केवल शैली का प्रयोग नहीं है. यह एक सांस्कृतिक दूरी को कम करने का प्रयास है. इससे माँ एक मिथकीय आकृति नहीं रहतीं. वे एक जीवित मनुष्य बनकर सामने आती हैं.

रसोई में जो कुछ पकता है, वह केवल भोजन नहीं है. वह मनोरमा की स्मृतियों से बना हुआ स्वाद है. दाल में तड़के के साथ एक घरेलू इतिहास भी शामिल है. घर से दूर रहने वाले युवक के लिए माँ की रसोई केवल पोषण नहीं, पहचान का स्रोत है.

यह निकटता भावुकता में नहीं बदलती है. यह एक सामाजिक संकेत देती है कि घरेलू श्रम को अदृश्य न माना जाए. माँ की उपस्थिति को केवल त्याग की मूर्ति में सीमित न किया जाए. उन्हें उनके नाम से याद करना उन्हें मनुष्य की गरिमा लौटाना है.

अध्यायों की बनावट और अनुभव का भूगोल

पंद्रह अध्यायों में विन्यस्त इस किताब की विषय-सूची पर नज़र डालते ही स्पष्ट हो जाता है कि यह कोई पारंपरिक पाक-पुस्तक नहीं है. यहाँ अध्याय शीर्षक रेसिपियों के नाम नहीं हैं. वे जीवन-स्थितियों के नाम हैं. वे स्मृतियों के दरवाज़े हैं. वे एक सामाजिक भूगोल के संकेतचिह्न हैं.

‘मनोरमा रसोई’ केवल एक अध्याय नहीं, एक भावात्मक केंद्र है. यहाँ रसोई माँ की स्मृति से दीप्त होती है. यह वह स्थान है जहाँ स्वाद, संबंध और समय एक-दूसरे में घुल जाते हैं. ‘लड़का भात बनाना नहीं जानता’ शीर्षक में छिपा हुआ व्यंग्य दरअसल एक पूरी सामाजिक संरचना की आलोचना है. यह उस तंज़ का उत्तर है जो घरेलू कौशल को लिंग के आधार पर बाँट देता है.

‘देखने का टीवी तो ताकता रहता है कड़ाही’ में शहरी जीवन की विडंबना दर्ज है. महानगर के किराये के कमरे में टीवी चलता रहता है, पर कड़ाही की खामोशी अधिक मुखर होती है. यह शीर्षक अकेलेपन की उस ध्वनि को पकड़ता है जो बर्तनों की खनखनाहट में छिपी रहती है.

‘आओ सिंगल्स, अब फ़ेसबुक पर खाना बनाते हैं’ डिजिटल युग की नई सामूहिकता का दस्तावेज़ है. यहाँ रसोई भौतिक रूप से भले ही एकाकी हो, पर आभासी संसार में वह साझा अनुभव बन जाती है. तस्वीरें, टिप्पणियाँ और लाइक एक नई तरह की संगत रचते हैं. यह अध्याय बताता है कि तकनीक किस तरह एकांत को आंशिक रूप से भर देती है, पर उसे पूरी तरह समाप्त नहीं करती.

‘हॉस्टल की प्लेटें, पॉलिटिक्स बतियाती हैं’ शीर्षक रसोई को छात्र-राजनीति और वैचारिक बहसों से जोड़ देता है. हॉस्टल की थाली केवल भोजन का पात्र नहीं होती. वह वर्ग, विचार और आकांक्षाओं की भी थाली होती है. वहाँ दाल के साथ बहसें भी परोसी जाती हैं. वहाँ रोटी के साथ विचार भी सिकते हैं.

इन शीर्षकों को साथ रखकर देखें तो एक मानचित्र बनता है. यह मानचित्र केवल रसोई का नहीं, उस पीढ़ी का है जो छोटे शहरों से निकलकर विश्वविद्यालयों और महानगरों में पहुँची. वर्ग, लिंग, प्रवासन, तकनीक और स्मृति यहाँ एक-दूसरे से सामना करती नज़र आती हैं. रसोई एक निजी कोना नहीं रह जाती. वह सामाजिक शक्तियों का संगम बन जाती है.

किताब पाठक को ऐसे संसार में ले जाती है जहाँ स्वाद स्मृति से अलग नहीं है, और स्मृति सामाजिक यथार्थ से कटी हुई नहीं है. भात पकने की प्रतीक्षा में खड़ा युवक दरअसल अपने समय के साथ संवाद कर रहा होता है. दाल का उबाल केवल तापमान का प्रश्न नहीं रहता. वह जीवन की अनिश्चितताओं का रूपक बन जाता है.

हिंदी में आंतरिक जीवन, स्मृति और सामाजिक यथार्थ के अंतर्संबंधों पर महत्त्वपूर्ण लेखन हुआ है. कई कृतियों ने आत्म और समाज के बीच के सूक्ष्म जटिलताओं को दर्ज किया है. पर विनीत की किताब इन सबसे अलग धरातल पर खड़ी दिखाई देती है. यहाँ विमर्श का केंद्र रसोई है. यहाँ दार्शनिक प्रश्न किसी अमूर्त अवधारणा से नहीं, भात और दाल के बीच से जन्म लेते हैं.

यह भिन्नता ही इस किताब की सबसे बड़ी ताक़त है. यह बड़े सिद्धांतों को छोटे अनुभवों में पिरोती है. यह दिखाती है कि विचार हमेशा पुस्तकालयों में नहीं जन्म लेते. वे कभी-कभी रसोई की भाप में भी आकार लेते हैं. यह लेखन हमें सिखाता है कि अनुभव का भूगोल केवल शहरों और संस्थानों से नहीं बनता. वह थाली, कड़ाही और चूल्हे से भी बनता है.

सौंदर्य का अधिकार और सामाजिक संकेत

विनीत कुमार ने एक मामूली समझे जाने वाले विषय को सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श में बदल दिया है. उन्होंने दिखाया है कि रसोई केवल घरेलू क्रिया नहीं. यह स्मृति, श्रम, प्रेम और आत्म-प्रतिष्ठा का संगम है.

अंततः ‘बैचलर्स किचन’ रसोई की सीमाओं को पार कर जाती है. वह प्रवासन की कथा बन जाती है. छोटे शहर से महानगर तक की यात्रा. परिवार की सामूहिकता से एकांत की ओर संक्रमण. परिचित स्वादों से नए प्रयोगों तक का सफर. यह उस पीढ़ी की कथा है जिसने किराये के कमरों में अपने छोटे-छोटे संसार गढ़े. जिनके पास विरासत में मिली रेसिपियाँ थीं, पर उन्हें नए संदर्भ में पकाना था.

किताब बंद करने के बाद रसोई को देखने का ढंग बदल जाता है. वह सिर्फ़ पेट भरने की जगह नहीं रह जाती. वह आत्म-परिचय की जगह बन जाती है.

रसोई की उस धीमी आँच की तरह, जो बाहर से दिखाई नहीं देती, पर भीतर बहुत कुछ पका रही होती है.

पुस्तक : बैचलर्स किचन: अपना स्वाद, अपना अंदाज़

लेखक : विनीत कुमार

प्रकाशक : अनबाउंड स्क्रिप्ट

मूल्य : रु 299

 

 

(आशुतोष कुमार ठाकुर समाज, साहित्य और कला पर लिखते हैं.)

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